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वेतन सीमा पच्चीस हज़ार करने की मंज़ूरी मंत्रिमंडल ने दी, ईपीएफ़ योजना में संशोधन की अधिसूचना अभी नहीं आई

16 सितंबर 2026 को दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ईपीएफ़ओ की अनिवार्य वेतन सीमा 15,000 से बढ़ाकर 25,000 रुपये करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। उसी शाम 6 बजे श्रम मंत्रालय ने बताया कि यह 17 सितंबर, विश्वकर्मा जयंती से लागू होगी। दोनों विज्ञप्तियाँ एक ही वाक्य पर ख़त्म होती हैं: मंत्रालय और ईपीएफ़ओ आवश्यक वैधानिक और प्रशासनिक कदम उठाएँगे। इससे आठ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल पर चार महीने की मियाद तय की थी।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की मुख्य इमारत और उसके सामने का लॉन, मई 2007 की तस्वीर; चार महीने में फ़ैसला करने का निर्देश इसी इमारत से निकला
तस्वीर: Legaleagle86 at English Wikipedia., विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

5 जनवरी 2026 की सुबह सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर तीन में आइटम नंबर 54 पुकारा गया। फ़ाइल पर श्रेणी लिखी थी, पीआईएल-डब्ल्यू। मुक़दमे का नाम था नवीन प्रकाश नौटियाल बनाम भारत संघ और एक अन्य, रिट याचिका (सिविल) 1134/2025।

याचिकाकर्ता की ओर से वकीलों की सूची में पहला नाम प्रणव सचदेवा का है, और रिकॉर्ड पर वकील नेहा राठी हैं। सरकार की ओर से हर्षित मनवानी और रिकॉर्ड पर वकील सिद्धार्थ दर्ज हैं।

याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत थी और उसकी तीनों माँगें एक ही संख्या पर टिकी थीं। वह संख्या पंद्रह हज़ार रुपये है।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर ने याचिका सुनी। उन्होंने उसे न ख़ारिज किया, न स्वीकार। आदेश कहता है कि यह मुद्दा भारत सरकार के सक्रिय विचार की माँग करता है, पर इस चरण पर अदालत याचिका पर सुनवाई नहीं कर रही, और याचिकाकर्ता को दो हफ़्ते के भीतर सक्षम प्राधिकारी के सामने अभ्यावेदन देने के लिए भेजा जा रहा है। अभ्यावेदन मिलने पर प्राधिकारी उसे उचित स्तर पर रखेगा और चार महीने की अवधि के भीतर क़ानून के मुताबिक़ फ़ैसला करेगा।

दो हफ़्ते जनवरी में बीते। चार महीने मई में।

मंत्रिमंडल ने फ़ैसला 16 सितंबर 2026 को किया।

पाँच जनवरी, कोर्ट नंबर तीन, आइटम 54

उस दिन की कार्यवाही का रिकॉर्ड एक पन्ने से थोड़ा ज़्यादा लंबा है, और उसमें याचिका की तीनों माँगें ज्यों की त्यों दर्ज हैं। पहली माँग यह थी कि 2014 से न बदली पंद्रह हज़ार रुपये की मौजूदा वेतन सीमा तुरंत बदली जाए, और वह भी उस उप-समिति की सिफ़ारिशों के मुताबिक़ जिसे याचिका कवरेज बढ़ाने और सम्बंधित मुक़दमेबाज़ी सँभालने वाली उप-समिति कहती है, और जिसकी सिफ़ारिशें, याचिका के शब्दों में, ईपीएफ़ओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने जुलाई 2022 में मंज़ूर कर ली थीं।

दूसरी माँग आगे की थी। उसमें कहा गया कि भविष्य के संशोधनों के लिए कोई गतिशील सूत्र या वस्तुनिष्ठ कसौटी तय की जाए, ताकि हर बार सीमा बदलवाने के लिए किसी को अदालत न आना पड़े।

तीसरी माँग सबसे तकनीकी है और सबसे काम की। उसमें कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के पैराग्राफ़ 2(च) का हवाला देकर कहा गया है कि इसी पैराग्राफ़ के तहत वेतन सीमा की सालाना समीक्षा का एक अनिवार्य तंत्र अधिसूचित किया जाए, और वह न्यूनतम मजदूरी, महँगाई, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, आयकर छूट की सीमा और प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय जैसे संकेतकों से जुड़ा हो।

आकाशवाणी समाचार ने 6 जनवरी को इस आदेश की जो रिपोर्ट दी, उसमें याचिका का आधार दर्ज है। उसके मुताबिक़ याचिका का तर्क था कि पंद्रह हज़ार रुपये की मौजूदा सीमा मनमानी और अतार्किक है और उसका महँगाई, न्यूनतम मजदूरी या प्रति व्यक्ति आय की बढ़ोतरी से कोई रिश्ता नहीं है, जबकि विशेषज्ञ निकाय और संसदीय समितियाँ बार-बार इसे बदलने की सिफ़ारिश कर चुकी हैं।

आदेश की एक बात ध्यान से पढ़ने लायक़ है। अदालत ने सरकार को चार महीने की समयसीमा सीधे नहीं दी। उसने याचिकाकर्ता को भेजा, और घड़ी अभ्यावेदन मिलने की तारीख़ से चलनी थी। रिट याचिका उसी दिन निपटा दी गई, इसलिए मामला अदालत में लंबित भी नहीं रहा।

मुक़दमा वहीं ख़त्म हुआ। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि 5 जनवरी के बाद इस समयसीमा पर नज़र रखने वाली कोई अदालत नहीं बची थी। सरकार के पास मई तक का समय था। सितंबर में फ़ैसला आया।

बोर्ड की जुलाई 2022 की बैठक का रिकॉर्ड

याचिका की पहली माँग जिस मंज़ूरी का हवाला देती है, वह ईपीएफ़ओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड की जुलाई 2022 की बैठक की है। बोर्ड इस संगठन का त्रिपक्षीय शीर्ष निकाय है, जिसमें सरकार, नियोक्ता और मज़दूर संगठन तीनों बैठते हैं। उस बैठक का कार्यवृत्त ईपीएफ़ओ अपनी वेबसाइट पर रखता है, और उसे पढ़ा जा सकता है।

231वीं बैठक 29 और 30 जुलाई 2022 को नई दिल्ली में हुई। अध्यक्षता श्रम एवं रोज़गार मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। कार्यवृत्त के पैराग्राफ़ 5 में केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त कवरेज और सम्बंधित मुक़दमेबाज़ी वाली तदर्थ समिति की प्रगति रखते हैं, और उसमें एक पंक्ति है: किसी आच्छादित प्रतिष्ठान के सभी कर्मचारियों से एक निर्धारित वेतन सीमा तक अनिवार्य वैधानिक अंशदान लेकर सबको सामाजिक सुरक्षा देने का प्रस्ताव श्रम मंत्रालय के विचाराधीन है।

नई दिल्ली में केंद्रीय न्यासी बोर्ड (क.भ.नि.) की एक बैठक, जिसमें तत्कालीन श्रम एवं रोज़गार मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष की कुर्सी पर हैं, मार्च 2011 की तस्वीर; यह 193वीं बैठक की है, 231वीं की नहीं
तस्वीर: Ministry of Labour and Employment, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

उसी बैठक के पैराग्राफ़ 5.8 में बोर्ड सदस्य प्रभाकर जे. बानसुरे का सुझाव दर्ज है। उन्होंने कहा कि कवरेज की सीमा घटाकर दस कर्मचारी की जाए और वेतन सीमा बढ़ाकर बीस हज़ार रुपये। यह जुलाई 2022 की माँग है।

तीन महीने बाद, 31 अक्टूबर 2022 की 232वीं बैठक में, बोर्ड सदस्य दिलीप भट्टाचार्य ने इक्कीस हज़ार का आँकड़ा रखा। उन्होंने साथ में एक तथ्य भी रखा, कि ज़्यादातर राज्यों में कर्मचारियों की न्यूनतम मजदूरी अब ईपीएफ़ओ की पंद्रह हज़ार की मौजूदा सीमा से ऊपर जा चुकी है। मंत्रिमंडल की 16 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में यही बात नरम पड़कर आती है। वहाँ लिखा है कि कई राज्यों और व्यवसायों में न्यूनतम मजदूरी मौजूदा सीमा के क़रीब पहुँच गई है। बोर्ड सदस्य ने चार साल पहले कहा था कि वह ऊपर निकल चुकी है।

अब उसी 231वीं बैठक के कार्यवृत्त का आख़िरी हिस्सा। वहाँ एजेंडा मदें एक-एक कर दर्ज हैं, और हर मद के नीचे लिखा है कि बोर्ड ने क्या किया। मद 8, 10, 17, 18 और 19 पर लिखा है कि एजेंडा में रखा प्रस्ताव मंज़ूर किया गया। मद 12 और 22 पर सैद्धांतिक मंज़ूरी दर्ज है।

मद संख्या 26 कवरेज और सम्बंधित मुक़दमेबाज़ी वाली तदर्थ समिति की प्रगति और सिफ़ारिशों की है। उसके नीचे एक ही वाक्य है: बोर्ड ने सामने रखी सूचना का संज्ञान लिया।

संज्ञान लेना और मंज़ूरी देना एक ही दस्तावेज़ में अलग-अलग शब्दों से लिखे गए हैं। याचिका की भाषा में यह जुलाई 2022 की मंज़ूरी है। बोर्ड के अपने कार्यवृत्त में यह संज्ञान है। पत्र सूचना कार्यालय ने 30 जुलाई 2022 को इसी बैठक पर विज्ञप्ति भी जारी की थी। उसमें चारों तदर्थ समितियों की सिफ़ारिशों पर हुई प्रगति को विचार-विमर्श के लिए बोर्ड के सामने रखे जाने की बात है। वेतन सीमा का आँकड़ा उसमें नहीं है।

16 सितंबर की दो विज्ञप्तियाँ, तीन घंटे के फ़ासले पर

16 सितंबर 2026 को दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति आई। उसका पहला वाक्य यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ईपीएफ़ओ के तहत अनिवार्य कवरेज की वेतन सीमा 15,000 से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने के श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है।

उसमें लागू होने की तारीख़ नहीं है।

शाम 6 बजे श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय की दूसरी विज्ञप्ति आई, और उसकी भाषा बदल चुकी थी। उसका पहला वाक्य कहता है कि वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दी गई है। उसके नीचे की पंक्ति है, "यह वृद्धि 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा जयंती और सेवा दिवस से प्रभावी होगी।" यह घोषणा श्रम एवं रोज़गार तथा युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने उसी दिन एक प्रेस वार्ता में की।

तीन घंटे में एक प्रस्ताव की मंज़ूरी एक लागू वृद्धि बन गई। पर दोनों विज्ञप्तियाँ एक ही वाक्य पर ख़त्म होती हैं। मंत्रिमंडल वाली में वह इन शब्दों में है: "श्रम और रोजगार मंत्रालय और ईपीएफओ निर्णय के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक वैधानिक और प्रशासनिक कदम उठाएंगे।" मंत्री वाली विज्ञप्ति में यही वाक्य ज़रा अलग शब्दों में दोहराया गया है।

यानी 17 सितंबर से जो लागू होना था, उसे लागू करने के वैधानिक कदम उसी विज्ञप्ति में भविष्य की बात हैं। यह मंत्रिमंडल की मंज़ूरी है, अधिसूचना नहीं। अधिसूचना के बिना योजना का पाठ वही रहता है जो पहले था।

दोनों विज्ञप्तियों में एक और एहतियात है जो दोहराया गया है। मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति में लिखा है कि इस मंज़ूरी से भविष्य निधि बचत, कर्मचारी पेंशन योजना के तहत पेंशन सुरक्षा और कर्मचारी जमा लिंक्ड बीमा योजना के तहत बीमा सुरक्षा तक पहुँच का विस्तार होगा, और यह विस्तार "प्रभावी योजना के प्रावधानों के अनुसार" होगा। मंत्री वाली विज्ञप्ति में यही शर्त "लागू वैधानिक और योजना संबंधी प्रावधानों के अनुसार" बनकर आती है। जिन प्रावधानों का यह हवाला है, वे अभी नहीं बदले हैं।

प्रस्ताव कहाँ से आया, यह दोनों विज्ञप्तियाँ बताती हैं। अंतर-मंत्रालयी विचार-विमर्श के बाद व्यय वित्त समिति ने 16 जून 2026 की अपनी बैठक में इसकी सिफ़ारिश की थी।

पंद्रह हज़ार की संख्या पैराग्राफ़ 2(च)(ii) में रहती है

यह संख्या किसी क़ानून की धारा में नहीं लिखी। वह योजनाओं के पैराग्राफ़ों में लिखी है। उसे बदलने के लिए राजपत्र में अधिसूचना निकालनी पड़ती है।

कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के पैराग्राफ़ 2 का खंड (च) तय करता है कि कौन बाहर रखा गया कर्मचारी (excluded employee) है। उसका उपखंड (ii) कहता है कि जिस कर्मचारी का वेतन, उस समय जब वह अन्यथा फंड का सदस्य बनने का हक़दार होता, पंद्रह हज़ार रुपये प्रति माह से अधिक हो, वह इसी श्रेणी में है। यही वह दरवाज़ा है जिससे कोई कर्मचारी ईपीएफ़ से बाहर रह जाता है।

उसी योजना में दो और जगह यह संख्या आती है। पैराग्राफ़ 26 का उप-पैराग्राफ़ (6) कहता है कि सहायक भविष्य निधि आयुक्त के दर्जे से नीचे का न हो, ऐसा अधिकारी नियोक्ता और कर्मचारी के संयुक्त लिखित अनुरोध पर ऐसे कर्मचारी को सदस्य बना सकता है या पहले से सदस्य होने पर उसे पंद्रह हज़ार रुपये से ऊपर के वेतन पर अंशदान की इजाज़त दे सकता है। और पैराग्राफ़ 26क के उप-पैराग्राफ़ (2) का परंतुक कहता है कि जिस सदस्य का मासिक वेतन पंद्रह हज़ार रुपये से अधिक है, उसका और उसके लिए नियोक्ता का अंशदान पंद्रह हज़ार रुपये के मासिक वेतन पर देय रक़म तक सीमित रहेगा।

22 अगस्त 2014 को भारत के राजपत्र, असाधारण, भाग II खंड 3 उपखंड (i) की संख्या 442 में श्रम और रोज़गार मंत्रालय की तीन अधिसूचनाएँ एक साथ छपीं। पहली जी.एस.आर. 608(ई) है। वह कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 5 के साथ धारा 7(1) के तहत जारी हुई, उसका नाम कर्मचारी भविष्य निधि (संशोधन) योजना, 2014 है, और वह 1 सितंबर 2014 से लागू हुई। उसने ठीक तीन काम किए: पैराग्राफ़ 2(च)(ii) में, पैराग्राफ़ 26(6) में और पैराग्राफ़ 26क(2) के परंतुक में "छह हज़ार पाँच सौ रुपये" की जगह "पंद्रह हज़ार रुपये" रखा। फ़ाइल संख्या एस-35012/1/2012-एसएस.2, हस्ताक्षर अपर सचिव अरुण कुमार सिन्हा के।

भारत के राजपत्र, असाधारण का एक हिंदी पन्ना, जिसके मुखशीर्ष पर राजचिह्न और "प्राधिकार से प्रकाशित" तथा नीचे मंत्रालय का नाम और अधिसूचना की संख्या छपी है; यह पन्ना 5 अगस्त 2019 का है, पर 2014 की तीनों अधिसूचनाएँ भी इसी शक्ल के पन्नों पर छपी थीं
तस्वीर: Government of India, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

उसी अधिसूचना के नीचे पाद-टिप्पणी में योजना का संशोधन-इतिहास छपा है। योजना 2 सितंबर 1952 को एस.आर.ओ. 1509 से प्रकाशित हुई थी, और इन सम्बंधित पैराग्राफ़ों को उसके बाद पाँच बार बदला गया: जी.एस.आर. 584 (11 मई 1959), जी.एस.आर. 1522 (16 दिसंबर 1960), जी.एस.आर. 201 (8 फ़रवरी 1961), जी.एस.आर. 689 (19 अक्टूबर 1990) और जी.एस.आर. 326(ई) (4 मई 2001)।

यह सूची मंत्रिमंडल की अपनी विज्ञप्ति से मेल नहीं खाती। विज्ञप्ति कहती है कि ईपीएफ़ओ की वेतन सीमा "2004 से 2014 तक के दशक में अपरिवर्तित रही"। राजपत्र की पाद-टिप्पणी के हिसाब से इन पैराग्राफ़ों में पिछला बदलाव 4 मई 2001 का है। फ़र्क़ तीन साल का है। तेरह बरस को एक दशक लिखने से ठहराव छोटा दिखता है।

अब वही पाठ आज कैसा है। ईपीएफ़ओ अपनी वेबसाइट पर योजना का समेकित पाठ रखता है। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक उस पाठ में पैराग्राफ़ 2(च)(ii), पैराग्राफ़ 26(6) और पैराग्राफ़ 26क(2) तीनों में "पंद्रह हज़ार रुपये" ही लिखा है। ईपीएफ़ योजना का परिचय देने वाले उसी वेबसाइट के पन्ने पर आज भी छपा है कि अनिवार्य कवरेज पंद्रह हज़ार रुपये प्रति माह से नीचे के कर्मचारियों के लिए है, और उससे ऊपर वालों के लिए विकल्प स्वैच्छिक है।

नया कर्मचारी भीतर आएगा, पुराना सदस्य पहले से भीतर था

अख़बारों में यह ख़बर अक्सर एक ही वाक्य में निपटा दी गई कि पंद्रह से पच्चीस हज़ार के बीच कमाने वालों को अब पीएफ़ मिलेगा। इस वाक्य में दो अलग लोग एक में मिला दिए गए हैं, और उनका फ़र्क़ पाठक के लिए सबसे काम की चीज़ है।

मंत्रिमंडल की हिंदी विज्ञप्ति में यह फ़र्क़ साफ़ लिखा है: "वर्तमान में, 15,000 रुपये प्रति माह से अधिक वेतन पर रोजगार में शामिल होने वाला एक नया कर्मचारी स्वत: ईपीएफ संरचना के तहत कवर नहीं होता है और अनिवार्य भविष्य निधि, पेंशन और संबंधित बीमा सुरक्षा से बाहर रह सकता है।" वाक्य का विषय नया कर्मचारी है।

मान लीजिए दो लोग हैं और दोनों का वेतन बीस हज़ार रुपये है।

पहला आज किसी दफ़्तर में नया जुड़ रहा है। पैराग्राफ़ 2(च)(ii) के हिसाब से वह बाहर रखा गया कर्मचारी है, क्योंकि जिस समय वह सदस्य बनने का हक़दार होता, उसका वेतन पंद्रह हज़ार से ऊपर है। उसे भीतर लाने का एक ही रास्ता अभी है, पैराग्राफ़ 26(6) वाला संयुक्त अनुरोध, जिसके लिए नियोक्ता का राज़ी होना ज़रूरी है। सीमा पच्चीस हज़ार होते ही वह अपने आप भीतर आ जाएगा, और नियोक्ता की रज़ामंदी की ज़रूरत नहीं रहेगी। 51 लाख का सरकारी आँकड़ा इसी दरवाज़े का है।

मेरठ की एक कपड़ा इकाई में चलते करघे, अप्रैल 2022 की तस्वीर; पंद्रह हज़ार की सीमा ऐसी ही निजी इकाइयों के वेतन रजिस्टर पर लगती है
तस्वीर: Ravi Dwivedi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

दूसरा आदमी पाँच साल से उसी दफ़्तर में है। वह तब जुड़ा था जब उसका वेतन पंद्रह हज़ार से नीचे था, इसलिए वह पहले दिन से सदस्य है और आज भी सदस्य है। वेतन बढ़ने से उसकी सदस्यता ख़त्म नहीं होती। कवरेज के सवाल पर उसके लिए 16 सितंबर के फ़ैसले में कुछ नहीं है।

उसके लिए जो बदल सकता है, वह अंशदान का आधार है। अभी पैराग्राफ़ 26क(2) का परंतुक उसका और उसके नियोक्ता का अंशदान पंद्रह हज़ार रुपये पर देय रक़म तक सीमित रखता है। 2014 में जी.एस.आर. 608(ई) ने इसी परंतुक की संख्या भी उसी अधिसूचना में बदली थी जिसमें 2(च)(ii) की बदली थी। अगर इस बार भी वैसा ही हुआ, तो बीस हज़ार पाने वाले पुराने सदस्य का अंशदान बीस हज़ार पर बनेगा और उसका हाथ में आने वाला वेतन घटेगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो नहीं घटेगा। यह किस तरह होगा, यह अधिसूचना बताएगी, और अधिसूचना अभी नहीं है।

ईपीएस की 8.33 फ़ीसदी और पेंशन-योग्य वेतन की सीमा

ईपीएफ़ओ तीन योजनाएँ चलाता है और तीनों में यह संख्या अलग-अलग जगह बैठी है। भविष्य निधि की बात ऊपर हो चुकी। पेंशन का हिसाब दूसरी योजना में है, और वहीं वह सवाल है जिस पर सरकार ने अब तक एक भी वाक्य नहीं कहा।

कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 के पैराग्राफ़ 3 का उप-पैराग्राफ़ (1) कहता है कि नियोक्ता हर महीने जो अंशदान देता है, उसमें से कर्मचारी के वेतन की 8.33 फ़ीसदी के बराबर हिस्सा पेंशन कोष में भेजा जाएगा। भविष्य निधि योजना का पैराग्राफ़ 29 नियोक्ता के अंशदान की दर दस फ़ीसदी रखता है और परंतुक के ज़रिए तय प्रतिष्ठानों के लिए उसे बारह फ़ीसदी करता है। पेंशन का पैसा इसी में से निकलता है।

उसी पैराग्राफ़ 3 के उप-पैराग्राफ़ (2) में परंतुक है: जिस सदस्य का वेतन पंद्रह हज़ार रुपये प्रति माह से अधिक है, उसके लिए नियोक्ता और केंद्र सरकार का अंशदान पंद्रह हज़ार रुपये के वेतन पर देय रक़म तक सीमित रहेगा।

और पैराग्राफ़ 11 का उप-पैराग्राफ़ (3) एक पंक्ति में कहता है कि अधिकतम पेंशन-योग्य वेतन पंद्रह हज़ार रुपये प्रति माह तक सीमित रहेगा। पैराग्राफ़ 12(2) में पेंशन का सूत्र इसी से बनता है: पेंशन-योग्य वेतन को पेंशन-योग्य सेवा से गुणा करके सत्तर से भाग। इसका मतलब सीधा है। अगर यह सीमा नहीं हिलती, तो पच्चीस हज़ार कमाने वाले की पेंशन भी पंद्रह हज़ार पर ही गिनी जाएगी।

2014 में यह सीमा हिली थी, और अलग अधिसूचना से हिली थी। उसी 22 अगस्त के राजपत्र में जी.एस.आर. 609(ई) है, जो धारा 6क के तहत कर्मचारी पेंशन (संशोधन) योजना, 2014 लाती है। उसने पैराग्राफ़ 3(2) के परंतुक में और पैराग्राफ़ 11(3) में छह हज़ार पाँच सौ की जगह पंद्रह हज़ार रखा, पेंशन-योग्य वेतन निकालने की अवधि बारह महीने से बढ़ाकर साठ महीने की, पैराग्राफ़ 12(2) में नया परंतुक जोड़कर 1 सितंबर 2014 से पहले और बाद की सेवा के लिए अलग-अलग अधिकतम पेंशन-योग्य वेतन तय किया, और उसी तारीख़ को मौजूद सदस्यों के लिए संयुक्त विकल्प का नया उप-पैराग्राफ़ 11(4) जोड़ा। तीसरी अधिसूचना जी.एस.आर. 610(ई) थी, जिसने बीमा योजना के पैराग्राफ़ 7(1) और 22(3) में यही संख्या बदली।

इस बार ऐसी कोई अधिसूचना नहीं है। मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति में इस पूरे सवाल को छूने वाला एक ही वाक्य है: "यह वैधानिक योगदान और पेंशनयोग्य-वेतन संरचना को मौजूदा वेतन स्तरों को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करने में भी सक्षम करेगा।" यह दिशा बताता है। यह कोई प्रावधान नहीं बदलता।

इसी ख़ाली जगह में एक आँकड़ा तैर रहा है। द हिंदू ने 17 सितंबर की अपनी रिपोर्ट के परिचय में लिखा कि पेंशन में कर्मचारी का अंशदान बढ़कर 2,082.5 रुपये हो सकता है। यह पच्चीस हज़ार का 8.33 फ़ीसदी है। इस आँकड़े के भीतर दो मान्यताएँ बैठी हैं जो किसी दस्तावेज़ में नहीं हैं: पहली, कि पैराग्राफ़ 3(2) और 11(3) की सीमा भी पच्चीस हज़ार हो जाएगी; और दूसरी, कि यह रक़म कर्मचारी देता है, जबकि पैराग्राफ़ 3(1) इसे नियोक्ता के अंशदान में से भेजता है।

51 लाख, 11,339 करोड़, और एक करोड़ का आँकड़ा

सरकार का अपना आँकड़ा एक ही है। मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति के मुताबिक़ 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों के ईपीएफ़ओ कवरेज में आने की उम्मीद है। सालाना सरकारी व्यय लगभग 11,339 करोड़ रुपये आँका गया है, जबकि मौजूदा सालाना बजटीय सहायता लगभग 10,250 करोड़ रुपये है। पाँच साल का अनुमानित व्यय लगभग 56,696 करोड़ रुपये है।

इस पर रखने के लिए तीन और आँकड़े उसी विज्ञप्ति में हैं। ईपीएफ़ओ के पास इस समय लगभग 7.68 लाख अंशदायी प्रतिष्ठान हैं। उनमें लगभग 7.98 करोड़ अंशदायी सदस्य हैं। पेंशन योजना लगभग 82 लाख पेंशनभोगियों को भुगतान करती है।

द हिंदू की 17 सितंबर की रिपोर्ट का परिचय कहता है कि सरकार 51 लाख से एक करोड़ तक नए अंशधारकों की उम्मीद कर रही है। एक करोड़ का यह ऊपरी सिरा मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति में नहीं है, मंत्री की विज्ञप्ति में नहीं है, और इस रिपोर्ट के लिए पढ़े गए किसी सरकारी दस्तावेज़ में नहीं मिला। मंत्री वाली विज्ञप्ति तो 51 लाख भी नहीं कहती, उसमें सिर्फ़ बड़ी संख्या में अतिरिक्त कर्मचारी लिखा है।

2014 में अधिसूचना पहले आई थी, अमल की तारीख़ बाद में

पिछली बार का पूरा क्रम ईपीएफ़ओ के अपने काग़ज़ों में दर्ज है। वह इस बार से उल्टा है।

14 जुलाई 2014 को ईपीएफ़ओ मुख्यालय ने सभी अपर केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों को एक चिट्ठी भेजी, संख्या को-ऑर्ड/3(6)2011/अमेंडमेंट स्कीम/9235। उसका विषय था, वेतन सीमा 6,500 से 15,000 करने पर तैयारी की तुरंत ज़रूरत। पहला पैराग्राफ़ कहता है कि वित्त मंत्री ने 2014-15 के बजट भाषण में यह घोषणा की है, और इसकी अधिसूचना जल्द जारी होने की संभावना है। बजट भाषण का पैराग्राफ़ 40 उस वक़्त तक इस बढ़ोतरी को हो चुकी बात की तरह लिख चुका था, और उसके लिए 250 करोड़ रुपये का प्रावधान भी दर्ज था। राजपत्र तब भी बाक़ी था।

उसके बाद पाँच निर्देश हैं। हर दफ़्तर अपने प्रतिष्ठानों की सूची प्रवर्तन अधिकारी के हिसाब से बनाए। प्रवर्तन अधिकारी प्रतिष्ठानों में जाकर गिनें कि 6,500 से ऊपर और 15,000 तक वेतन पाने वाले कितने कर्मचारी अब तक सदस्य नहीं बने हैं, क्योंकि यह आँकड़ा अधिसूचना जारी होते ही चाहिए होगा। दौरे का कार्यक्रम ऐसा बने कि जहाँ मज़दूर ज़्यादा हैं वहाँ पहले पहुँचा जाए, ख़ास तौर पर भवन निर्माण उद्योग और प्लेसमेंट एजेंसियों में। अधिकारी जहाँ जाएँ, वहाँ मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधियों से भी मिलें और उन्हें आने वाली अधिसूचना के बारे में बताएँ। और प्रतिष्ठानों के साथ बैठकें कर उन्हें अधिसूचना का आशय समझाया जाए।

चिट्ठी पर हस्ताक्षर पी.के. उदगाता के हैं, अतिरिक्त केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त-प्रथम (अनुपालन)।

फिर 22 अगस्त को राजपत्र में तीनों अधिसूचनाएँ छपीं। 28 अगस्त को उन्हीं उदगाता ने दूसरी चिट्ठी भेजकर अधिसूचनाओं की प्रतियाँ सब दफ़्तरों को भेजीं, और उसमें लिखा कि 14 जुलाई, 23 जुलाई और 1 अगस्त की चिट्ठियों में क्षेत्रीय दफ़्तरों को अधिसूचना जारी होने से पहले तैयारी शुरू करने को कहा गया था। अमल 1 सितंबर से शुरू हुआ, यानी राजपत्र छपने के दस दिन बाद।

इस बार अमल की तारीख़ 17 सितंबर घोषित हुई। उससे पहले की तारीख़ वाली कोई अधिसूचना नहीं मिली। ईपीएफ़ओ की परिपत्र सूची में वेतन सीमा पर 2026 की कोई प्रविष्टि नहीं है, और उस सूची में 2026 की कुल एक ही प्रविष्टि है, 28 मार्च की। ईपीएफ़ओ के प्रेस विज्ञप्ति वाले पन्ने पर 2026 की इकलौती प्रविष्टि 26 फ़रवरी की है। राजपत्र की अपनी वेबसाइट egazette.gov.in इस मशीन पर खुलती ही नहीं। उसके बदले सर्वर की त्रुटि लौटती है। श्रम मंत्रालय की वेबसाइट जावास्क्रिप्ट के बिना कुछ नहीं दिखाती। इसलिए यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि अधिसूचना कहीं नहीं है। यह कहा जा रहा है कि ईपीएफ़ओ ने ख़ुद जहाँ-जहाँ अपना पाठ और अपने परिपत्र छापे हैं, वहाँ वह नहीं है।

और जो पाठ वहाँ है, वह पंद्रह हज़ार कहता है।

स्रोतसुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया, रिकॉर्ड ऑफ़ प्रोसीडिंग्स, रिट याचिका (सिविल) 1134/2025, नवीन प्रकाश नौटियाल बनाम भारत संघ, 5 जनवरी 2026, आइटम 54, कोर्ट नंबर 3, कोरम जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर (इंडियन कानून पर उपलब्ध प्रति), आकाशवाणी समाचार, 6 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, पीठ, वकील और याचिका के आधार, पत्र सूचना कार्यालय, मंत्रिमंडल, 16 सितंबर 2026, दोपहर 3:07: ईपीएफ़ओ वेतन सीमा 15,000 से 25,000 रुपये करने की मंज़ूरी (हिंदी प्रति: रिलीज़ आईडी 2310894), पत्र सूचना कार्यालय, श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय, 16 सितंबर 2026, शाम 6:00: डॉ. मनसुख मांडविया की प्रेस वार्ता और 17 सितंबर से प्रभावी होने की घोषणा (हिंदी प्रति: रिलीज़ आईडी 2311102), भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग II खंड 3 उपखंड (i), संख्या 442, 22 अगस्त 2014: जी.एस.आर. 608(ई), 609(ई) और 610(ई) की मूल प्रतियाँ, ईपीएफ़ओ के परिपत्र संख्या को-ऑर्ड/3(6)2011/अमेंडमेंट स्कीम, 28 अगस्त 2014 के साथ संलग्न, ईपीएफ़ओ मुख्यालय पत्र संख्या को-ऑर्ड/3(6)2011/अमेंडमेंट स्कीम/9235, 14 जुलाई 2014, पी.के. उदगाता, अतिरिक्त केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त-प्रथम (अनुपालन): अधिसूचना से पहले की तैयारी के पाँच निर्देश, कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 का समेकित पाठ, ईपीएफ़ओ की अपनी वेबसाइट पर: पैराग्राफ़ 2(च)(ii), 26(6), 26क(2) और 29, कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 का समेकित पाठ, ईपीएफ़ओ की अपनी वेबसाइट पर: पैराग्राफ़ 3(1), 3(2), 6, 11(3), 11(4) और 12(2), केंद्रीय न्यासी बोर्ड (ईपीएफ़) की 231वीं बैठक का कार्यवृत्त, 29 और 30 जुलाई 2022, नई दिल्ली: मद संख्या 26 और पैरा 5.8, केंद्रीय न्यासी बोर्ड (ईपीएफ़) की 232वीं बैठक का कार्यवृत्त, 31 अक्टूबर 2022, नई दिल्ली: वेतन सीमा इक्कीस हज़ार करने का सुझाव, बजट भाषण 2014-15, पैराग्राफ़ 40: ईपीएस की अनिवार्य वेतन सीमा 6,500 से 15,000 रुपये करने और न्यूनतम पेंशन एक हज़ार रुपये करने की घोषणा, द हिंदू, 17 सितंबर 2026: 51 लाख से एक करोड़ नए अंशधारकों और 2,082.5 रुपये पेंशन अंशदान का आकलन, पत्र सूचना कार्यालय, श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय, 30 जुलाई 2022: केंद्रीय न्यासी बोर्ड की 231वीं बैठक की आधिकारिक विज्ञप्ति

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।