पीएफ़ देर से जमा करने का जुर्माना साल में 37 फ़ीसदी तक था, अब 12 फ़ीसदी पर निपट रहा है
विश्वास, 2026 योजना 28 दिसंबर को बंद होगी और ईपीएफ़ओ कहता है कि तारीख़ आगे नहीं बढ़ेगी। कर्मचारी का ब्याज माफ़ नहीं हुआ है, घटा सिर्फ़ जुर्माना है।
जब कोई नियोक्ता कर्मचारी की तनख़्वाह से भविष्य निधि का हिस्सा काटता है, वह पैसा कर्मचारी का हो चुका होता है।
उसे तय समय में जमा कराना नियोक्ता का काम है। देर होने पर दो चीज़ें लगती हैं। जमा न हुई रक़म पर ब्याज, और उसके ऊपर जुर्माना।
ईपीएफ़ओ की विज्ञप्ति कहती है कि सामान्य नियमों में यह जुर्माना प्रति वर्ष 37 फ़ीसदी तक जा सकता है।
अब वह घटाया गया है।
नई दरें
विश्वास, 2026 के तहत जुर्माने की तीन दरें तय की गई हैं, और वे देरी की लंबाई से बँधी हैं।
दो महीने तक की देरी पर 0.25 फ़ीसदी प्रति माह।
दो से चार महीने की देरी पर 0.50 फ़ीसदी प्रति माह।
चार महीने से ज़्यादा की देरी पर 1 फ़ीसदी प्रति माह।
आख़िरी वाली दर को साल में बदलिए तो 12 फ़ीसदी बनती है।
हमारी अपनी गणना में यह 37 फ़ीसदी वाली ऊपरी सीमा का लगभग एक-तिहाई है।

जो माफ़ नहीं हुआ
यहाँ एक फ़र्क़ है जो पूरी योजना का मतलब तय करता है।
ब्याज और जुर्माना दो अलग चीज़ें हैं।
ब्याज वह है जो देर से जमा हुई रक़म पर कर्मचारी के खाते की तरफ़ जाता है। जुर्माना वह है जो देर करने की सज़ा है।
योजना में शर्त यह है कि नियोक्ता आवेदन करने से पहले बकाया ब्याज पूरा चुकाए।
यानी जो पैसा कर्मचारी का बनता है, वह घटाया नहीं गया। घटी सिर्फ़ सज़ा है।
यह बात विज्ञप्ति में साफ़ लिखी है और इसे साथ पढ़े बिना योजना का मतलब उलटा निकल जाएगा।
कौन-से मामले
योजना 14 जून 2024 से पहले की देरी से जुड़े मामलों पर लागू है, और चार श्रेणियाँ बताई गई हैं।
जिनमें जुर्माने की कार्यवाही अभी किसी अदालत या अधिकरण में लंबित है।
जिनमें ईपीएफ़ओ जुर्माने का आदेश पारित कर चुका है पर वसूली पूरी या आंशिक रूप से बाक़ी है।
जिनमें नोटिस जा चुका है पर अंतिम आदेश नहीं आया।
और जिनमें ईपीएफ़ओ के रिकॉर्ड में देरी दर्ज है पर अभी नोटिस भी नहीं गया।
धोखाधड़ी, ग़बन और जानबूझकर रिकॉर्ड बिगाड़ने के मामले इसमें नहीं आते।
अदालतें क्या कर रही हैं
विज्ञप्ति का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है।
बंबई हाई कोर्ट की पुणे पीठ ने रिट याचिका संख्या 4246/2018 में नियोक्ता को दो हफ़्ते के भीतर इस योजना में आवेदन करने का निर्देश दिया, अधिकरण का पहले वाला आदेश उसी के मुताबिक़ बदला, और याचिका निपटा दी।
उस याचिका की संख्या पर ध्यान दीजिए। वह 2018 की है।
मद्रास हाई कोर्ट ने रिट याचिका संख्या 38008/2024 उसी वक़्त निपटा दी जब नियोक्ता ने योजना का लाभ लेने की इच्छा जताई, और उसके साथ अधिकरण की कार्यवाही भी ख़त्म कर दी।
केरल हाई कोर्ट की एर्नाकुलम पीठ ने उन्नीस अलग-अलग मामलों में ऐसे ही निर्देश दिए हैं।
यानी अदालतें इन मुक़दमों को सुनकर तय नहीं कर रहीं। वे उन्हें योजना की तरफ़ भेज रही हैं।
काम कैसे होगा
पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है।
नियोक्ता पहले बकाया ब्याज चुकाता है। फिर ईपीएफ़ओ के नियोक्ता पोर्टल पर विश्वास 2026 मॉड्यूल में जाकर अपनी श्रेणी चुनता है, दस्तावेज़ चढ़ाता है और डिजिटल प्रमाणीकरण करता है।
सिस्टम ख़ुद घटा हुआ जुर्माना जोड़ देता है।
भुगतान के लिए पंद्रह दिन मिलते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर पंद्रह दिन अपने आप और।
भुगतान की पुष्टि पर ईपीएफ़ओ डिजिटल दस्तख़त वाला निपटान प्रमाणपत्र देता है, और उसके बाद अदालत या अधिकरण की लंबित कार्यवाही ख़त्म हो जाती है।
देश के 153 क्षेत्रीय कार्यालयों में विश्वास प्रकोष्ठ और हेल्प डेस्क बनाए गए हैं।
और नाम को लेकर एक उलझन
एक बात विज्ञप्ति के भीतर ही खटकती है।
शीर्षक में लिखा है, विश्वास अधिनियम, 2026 के तहत।
पहले ही पैराग्राफ़ में लिखा है, विश्वास, 2026 नामक एकमुश्त निपटान योजना।
और आगे चलकर, विश्वास योजना, 2026।
अधिनियम और योजना एक चीज़ नहीं होते। अधिनियम संसद बनाती है। योजना सरकार अधिसूचित करती है।
यह जो चीज़ है, वह जून 2026 में अधिसूचित हुई और छह महीने चलनी है। छह महीने की मियाद अधिनियम की नहीं होती।
इसलिए इसे योजना कहना सही लगता है, और शीर्षक में अधिनियम लिखा जाना चूक लगती है। हिंदी के डेस्क सरकारी विज्ञप्ति का शीर्षक अक्सर ज्यों का त्यों उठाते हैं, इसलिए यह ग़लती आगे भी छपेगी।
तारीख़
योजना 28 दिसंबर 2026 को बंद होगी।
विज्ञप्ति में यह भी लिखा है कि आवेदन की अंतिम तिथि आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
सरकारी योजनाओं में यह वाक्य आमतौर पर नहीं लिखा जाता, और लिखे जाने के बाद भी तारीख़ें बढ़ती रही हैं। इस बार क्या होता है, यह दिसंबर में ही पता चलेगा।
स्रोतश्रम और रोजगार मंत्रालय, ईपीएफ़ओ की विज्ञप्ति, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, विश्वास 2026 दिशानिर्देश, कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952