ईसीएलजीएस 5.0 की सीमा 2.55 लाख करोड़ थी, साढ़े तीन महीने में 2.50 लाख करोड़ की गारंटी निकल चुकी है
योजना 31 मार्च 2027 तक चलनी थी, या तब तक जब तक सीमा न भर जाए। 20 अगस्त की स्थिति में सीमा का 98 फ़ीसदी इस्तेमाल हो चुका था। और जो विज्ञप्ति यह आँकड़ा देती है, वही जागरूकता बढ़ाने की बात भी करती है।

एक योजना की दो तारीख़ें होती हैं। एक वह जब वह ख़त्म होनी है, और एक वह जब उसका पैसा ख़त्म हो जाता है।
ईसीएलजीएस 5.0 की पहली तारीख़ 31 मार्च 2027 है।
दूसरी तारीख़ शायद इस महीने आ जाए।
सरकार की शनिवार को जारी विज्ञप्ति में लिखा है कि 20 अगस्त 2026 तक इस योजना के तहत 6,73,979 गारंटियाँ जारी हो चुकी हैं और गारंटी की गई रक़म 2,50,024 करोड़ रुपये तक पहुँच गई है।
योजना की सीमा 2.55 लाख करोड़ रुपये है।
यानी सीमा का 98 फ़ीसदी से ऊपर इस्तेमाल हो चुका है। बचा है क़रीब 4,976 करोड़ रुपये।
योजना को मंज़ूरी 5 मई 2026 को मिली थी। साढ़े तीन महीने में यह वहाँ पहुँच गई जहाँ उसे ग्यारह महीने में पहुँचना था।
और उसी विज्ञप्ति में जागरूकता की बात है
इसी विज्ञप्ति में आगे लिखा है कि योजना की पहुँच अधिकतम करने के लिए सरकार सक्रिय रूप से जागरूकता को बढ़ावा दे रही है।
दोनों वाक्य एक ही पन्ने पर हैं।
एक जगह यह है कि सीमा का 98 फ़ीसदी ख़र्च हो चुका है। दूसरी जगह यह है कि और लोगों को इसकी जानकारी दी जा रही है।
अगर कोई छोटा कारोबारी यह विज्ञप्ति पढ़कर आज बैंक जाए, तो उसके सामने पूरी योजना नहीं होगी। उसके सामने बचा हुआ दो फ़ीसदी होगा, और उसमें भी वे आवेदन शामिल हैं जो 20 अगस्त के बाद के दो हफ़्तों में आ चुके होंगे।
योजना की शर्त साफ़ है: यह 31 मार्च 2027 तक, या 2.55 लाख करोड़ की गारंटी जारी होने तक, जो भी पहले हो। और अभी जो पहले होता दिख रहा है, वह दूसरी शर्त है।
अब वह हिसाब जो कहीं नहीं छपता
इस योजना की असली कहानी औसत में है।
कोविड के समय जो ईसीएलजीएस चली थी, उसके चरण एक से चार तक कुल 1.19 करोड़ गारंटियाँ जारी हुईं और उनकी कुल रक़म 3.68 लाख करोड़ रुपये थी। वे योजनाएँ 31 मार्च 2023 को ख़त्म हुईं।
इसका औसत निकालिए। 3.68 लाख करोड़ को 1.19 करोड़ से भाग दीजिए। हर गारंटी औसतन 3.09 लाख रुपये की थी।
अब ईसीएलजीएस 5.0 का औसत निकालिए। 2,50,024 करोड़ रुपये, 6,73,979 गारंटियाँ। हर गारंटी औसतन 37.1 लाख रुपये की है।
बारह गुना।
यह एक ही नाम वाली दो अलग योजनाएँ हैं। पहली बहुत सारे लोगों को छोटे-छोटे क़र्ज़ देने की योजना थी। दूसरी कम लोगों को बड़े क़र्ज़ देने की योजना है।

97.3 और 80.79
विज्ञप्ति दो और आँकड़े देती है, और वे साथ में पढ़ने लायक़ हैं।
जारी कुल गारंटियों में संख्या के आधार पर एमएसएमई की हिस्सेदारी 97.3 फ़ीसदी है।
कुल गारंटी शुदा रक़म में उनकी हिस्सेदारी 80.79 फ़ीसदी है।
पहली नज़र में यह अच्छा लगता है। ज़्यादातर पैसा एमएसएमई के पास गया।
पर दूसरी नज़र में इसका अर्थ यह है कि जो 2.7 फ़ीसदी उधारकर्ता एमएसएमई नहीं हैं, उन्होंने 19.21 फ़ीसदी रक़म ली।
अंकगणित इस तरह चलता है। 6,73,979 का 2.7 फ़ीसदी क़रीब 18,197 उधारकर्ता होते हैं। 2,50,024 करोड़ का 19.21 फ़ीसदी क़रीब 48,030 करोड़ रुपये।
यानी उन 18,197 उधारकर्ताओं का औसत क़र्ज़ 2.64 करोड़ रुपये है।
और एमएसएमई का औसत 30.8 लाख।
एक ग़ैर-एमएसएमई उधारकर्ता को औसतन साढ़े आठ गुना बड़ी गारंटी मिली है।
यह अपने-आप में ग़लत नहीं है। बड़ी कंपनी का कार्यशील पूँजी का क़र्ज़ बड़ा होता है, यह स्वाभाविक है। पर इसे दर्ज करना ज़रूरी है, क्योंकि योजना का नाम और उसका प्रचार दोनों एमएसएमई के इर्द-गिर्द चलते हैं।
योजना करती क्या है
यह समझना ज़रूरी है कि सरकार इसमें पैसा नहीं देती। वह गारंटी देती है।
व्यवस्था यह है कि नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी, जिसे एनसीजीटीसी कहते हैं, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को सरकार समर्थित गारंटी देती है। उस गारंटी के भरोसे बैंक उधारकर्ता को अतिरिक्त कार्यशील पूँजी का क़र्ज़ देता है।
अगर उधारकर्ता चुका नहीं पाया, तो नुक़सान बैंक का नहीं, गारंटी देने वाले का होता है।
इसलिए सरकार के खाते में यह ख़र्च तभी दिखता है जब क़र्ज़ डूबे। जब तक सब ठीक चल रहा हो, 2.55 लाख करोड़ की योजना का बजट पर सीधा बोझ शून्य के आसपास रहता है।
यही इस औज़ार की ताक़त है और यही उसका जोखिम। ताक़त यह कि थोड़े जोखिम पर बड़ा क़र्ज़ चल पड़ता है। जोखिम यह कि नुक़सान का बिल बाद में आता है, और तब आता है जब हालात पहले से ख़राब हों।
क़र्ज़ देने वाली संस्थाओं की सूची लंबी है: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक, स्मॉल फ़ाइनेंस बैंक, विदेशी बैंक, सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ और वित्तीय संस्थान।
आवेदन जन समर्थ पोर्टल से होता है।
यह योजना बनी क्यों
पहली ईसीएलजीएस 2020 में आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत आई थी। तब कारण महामारी थी। कारोबार बंद थे, नक़दी नहीं थी, और बैंक जोखिम लेने को तैयार नहीं थे। सरकार ने सौ फ़ीसदी गारंटी देकर वह जोखिम अपने ऊपर लिया।
इस बार कारण अलग है, और विज्ञप्ति उसे साफ़ लिखती है: भू-राजनीतिक घटनाक्रम, जिनसे आपूर्ति शृंखलाएँ प्रभावित हो सकती हैं, लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है और कारोबारों पर तरलता का दबाव बन सकता है।
महामारी और भू-राजनीति में एक बुनियादी फ़र्क़ है। महामारी सबको एक साथ मारती है और उसका अंत दिखता है। व्यापार के झटके कुछ क्षेत्रों को मारते हैं और कुछ को छोड़ देते हैं, और उनका अंत तय नहीं होता।
यही फ़र्क़ शायद इस बात की भी वजह है कि इस बार पैसा कम लोगों तक बड़े हिस्सों में गया। जिन कारोबारों पर निर्यात या आयात का सीधा दबाव है, वे आमतौर पर बड़े होते हैं।

चार चरणों का इतिहास
एक ही नाम के पाँच चरण हैं, और हर चरण अपने वक़्त की एक अलग आपदा का जवाब था। यह क्रम पढ़ने लायक़ है, क्योंकि इससे पता चलता है कि यह औज़ार बार-बार कैसे नया रूप लेता रहा।
पहला चरण मई 2020 में आया। उसमें तीन लाख करोड़ रुपये तक के अतिरिक्त क़र्ज़ पर सौ फ़ीसदी सरकारी गारंटी थी। पात्रता उन कारोबारों की थी जिनका बक़ाया क़र्ज़ 29 फ़रवरी 2020 को पचास करोड़ रुपये तक था और साठ दिन से ज़्यादा की चूक नहीं थी।
दूसरा चरण दायरा बढ़ाकर छब्बीस दबावग्रस्त क्षेत्रों और स्वास्थ्य सेवा तक ले गया, और उसमें पाँच सौ करोड़ रुपये तक के क़र्ज़ आए। ये छब्बीस क्षेत्र कामथ समिति की सिफ़ारिशों से आए थे।
तीसरा चरण आतिथ्य, यात्रा, पर्यटन और नागरिक विमानन के लिए था। इसमें होटल, रेस्तराँ, विवाह घर, ट्रैवल एजेंट, टूर ऑपरेटर, मनोरंजन और खेल की सुविधाएँ तथा सिनेमाघर शामिल थे, और विमानन में एयरलाइंस, हवाई अड्डे तथा ग्राउंड हैंडलिंग। प्रति उधारकर्ता सीमा दो सौ करोड़ रुपये थी, और विमानन के लिए चार सौ करोड़।
चौथा चरण सबसे विशिष्ट था। वह अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिकों, मेडिकल कॉलेजों और तरल ऑक्सीजन तथा ऑक्सीजन सिलेंडर बनाने वाली इकाइयों के लिए था, ताकि वे अपने परिसर में ऑक्सीजन संयंत्र लगा सकें। दो करोड़ रुपये तक के क़र्ज़ पर सौ फ़ीसदी गारंटी और ब्याज की अधिकतम सीमा साढ़े सात फ़ीसदी।
यह आख़िरी चरण उस समय का दस्तावेज़ है जब देश में ऑक्सीजन की कमी थी।
पाँचवें चरण में विमानन फिर लौटा है, इस बार अनुसूचित यात्री एयरलाइंस के रूप में। जो क्षेत्र बाहरी झटकों से सबसे तेज़ हिलता है, वह हर बार इस सूची में आ जाता है।
किसे नहीं मिलेगा
पात्रता की सूची से ज़्यादा उपयोगी अपात्रता की सूची होती है।
एमएसएमई के लिए योजना सभी क्षेत्रों में खुली है। पर जो उधारकर्ता एमएसएमई नहीं हैं, उनके लिए कुछ क्षेत्र बाहर रखे गए हैं।
बाहर रखे गए क्षेत्र ये हैं: ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ, विद्युत यानी उत्पादन, पारेषण और वितरण, दूरसंचार सेवा प्रदाता, चीनी और एथेनॉल, सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियाँ, काग़ज़ और काग़ज़ उत्पाद, शैक्षणिक संस्थान, पेय पदार्थ जिसमें चाय और कॉफ़ी शामिल नहीं, और तंबाकू।
इस सूची को पढ़िए और एक तर्क दिखने लगता है। ये वे क्षेत्र हैं जिनके पास या तो अपनी वित्तीय व्यवस्थाएँ हैं, या जिनकी आमदनी घरेलू और नियंत्रित है, या जिन्हें सरकार सहारा देने लायक़ नहीं मानती।
एक श्रेणी अलग से गिनाई गई है जो इस सूची में नहीं, बल्कि पात्र लोगों में है: अनुसूचित यात्री एयरलाइन कंपनियाँ।
विमानन क्षेत्र का इस योजना में नाम से आना बताता है कि उसे अलग से सोचा गया है। एयरलाइन का ख़र्च डॉलर में होता है और कमाई बड़े हिस्से में रुपये में, इसलिए बाहरी झटकों का असर उस पर सबसे तेज़ पड़ता है।
एक और नियम है जो मिली-जुली कंपनियों के लिए है। जहाँ कोई उधारकर्ता पात्र और अपात्र, दोनों क्षेत्रों में काम करता हो, वहाँ ऋणदाता संस्था वित्त वर्ष 2025-26 में पात्र क्षेत्रों से हुए टर्नओवर के अनुपात के आधार पर पात्रता तय करती है।
दो शब्द जो विज्ञप्ति ख़ुद समझाती है
सरकारी विज्ञप्तियाँ आमतौर पर परिभाषाएँ नहीं देतीं। इसमें दो दी गई हैं, और वे उधार लेने वाले के लिए काम की हैं।
पहला है ईबीएलआर, यानी एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट। यह वह बाहरी संदर्भ दर है जिससे बैंक खुदरा तथा सूक्ष्म और लघु उद्यमों के क़र्ज़ों पर बदलती ब्याज दरें तय करते हैं। यह बेंचमार्क भारतीय रिज़र्व बैंक तय करता है।
दूसरा है एमसीएलआर, यानी मार्जिनल कॉस्ट ऑफ़ फ़ंड्स-बेस्ड लेंडिंग रेट। यह बैंकों के लिए एक आंतरिक संदर्भ दर है, जो उन्हें अलग-अलग तरह के क़र्ज़ों पर न्यूनतम ब्याज दर तय करने में मदद करती है।
इन दोनों में फ़र्क़ उधार लेने वाले के लिए सीधा है। जो क़र्ज़ ईबीएलआर से बँधा हो, उस पर रिज़र्व बैंक की रेपो दर घटते ही ब्याज तेज़ी से घटता है, और बढ़ते ही तेज़ी से बढ़ता है। जो क़र्ज़ एमसीएलआर से बँधा हो, उस पर यह बदलाव धीरे और देर से पहुँचता है, क्योंकि वह बैंक की अपनी लागत के हिसाब से चलता है।
गारंटी योजना ब्याज दर तय नहीं करती। वह सिर्फ़ बैंक का जोखिम घटाती है। ब्याज इन्हीं दो में से किसी संदर्भ दर पर तय होता है, और यही वजह है कि एक ही योजना के तहत दो कारोबारियों को अलग-अलग दर मिल सकती है।

जो इस विज्ञप्ति में नहीं है
तीन चीज़ें ऐसी हैं जिनके बिना यह तस्वीर पूरी नहीं होती, और तीनों इस विज्ञप्ति में नहीं हैं।
पहली, पिछली ईसीएलजीएस के क़र्ज़ों का क्या हुआ। 3.68 लाख करोड़ की गारंटियों में से कितनी भुनाई गईं, यानी कितने क़र्ज़ डूबे और सरकार को कितना चुकाना पड़ा। यही आँकड़ा बताता है कि यह औज़ार कितना महँगा है।
दूसरी, इस बार के 2.50 लाख करोड़ का क्षेत्रवार बँटवारा। एमएसएमई और ग़ैर-एमएसएमई का अनुपात दिया गया है, पर कौन-सा उद्योग कितना ले गया, यह नहीं।
तीसरी, राज्यवार आँकड़ा। किस राज्य के कारोबारियों तक यह पहुँचा, यह जानना उपयोगी होता, क्योंकि पिछली योजनाओं में ऐसी शिकायतें आती रही हैं कि बैंकिंग पहुँच जहाँ कम है, वहाँ गारंटी योजनाएँ भी कम पहुँचती हैं।
विज्ञप्ति में एक लोकसभा अनुलग्नक का हवाला ज़रूर है, जिसमें इनमें से कुछ ब्योरा हो सकता है।
कार्यशील पूँजी क्या होती है
इस योजना में जो पैसा मिलता है, वह मशीन ख़रीदने के लिए नहीं है। वह कार्यशील पूँजी के लिए है, और यह अंतर छोटे कारोबार के लिए सबसे अहम अंतर होता है।
कार्यशील पूँजी वह पैसा है जो कारोबार के रोज़ चलने में लगा रहता है। कच्चा माल ख़रीदने में, मज़दूरी देने में, बिजली और भाड़े में, और उस माल में जो बनकर तैयार है पर बिका नहीं।
छोटे कारोबार की सबसे आम मौत मुनाफ़े की कमी से नहीं होती। वह नक़दी के फँस जाने से होती है। माल भेज दिया, बिल भेज दिया, और भुगतान नब्बे दिन बाद आना है। इस बीच मज़दूरी हर हफ़्ते देनी है।
यही वह जगह है जहाँ ऐसी योजनाएँ काम करती हैं, और यही वजह है कि विज्ञप्ति में तरलता शब्द बार-बार आता है।
पर इसका उल्टा भी सच है। कार्यशील पूँजी का क़र्ज़ बीमारी का इलाज नहीं है, वह दर्द की दवा है। अगर भुगतान देर से आने की वजह बनी रहे, तो अगले साल फिर उतने ही क़र्ज़ की ज़रूरत पड़ेगी, और उस पर ब्याज पिछले साल के क़र्ज़ के ऊपर चढ़ा होगा।
एक कारोबारी के लिए इसका क्या मतलब है
अगर आप छोटे कारोबारी हैं और यह पढ़ रहे हैं, तो व्यावहारिक बात यह है।
योजना अभी बंद नहीं हुई है, पर उसमें बची जगह कम है। आवेदन जन समर्थ पोर्टल से होता है और असल फ़ैसला आपका बैंक करता है, क्योंकि गारंटी बैंक को मिलती है, आपको नहीं।
पात्रता की शर्तें एनसीजीटीसी तय करती है और उनमें खाते की स्थिति शामिल है। यानी जिस खाते पर पहले से चूक दर्ज है, उस पर यह सुविधा मिलना कठिन है।
और यह क़र्ज़ है, अनुदान नहीं। गारंटी का मतलब यह नहीं कि चुकाना नहीं है। इसका मतलब सिर्फ़ यह है कि आपके न चुका पाने का जोखिम बैंक के बजाय सरकार उठा रही है, और बैंक इसीलिए क़र्ज़ देने को तैयार हुआ।
आख़िर में
सरकारी योजनाओं की आलोचना अक्सर यह होती है कि पैसा ख़र्च नहीं हुआ।
यहाँ उलटा हुआ है। पैसा तय समय से बहुत पहले ख़र्च हो गया, और यह अपने-आप में इस बात का सबूत है कि कारोबारों को नक़दी की ज़रूरत थी।
जो सवाल बचता है, वह यह है कि 31 मार्च 2027 तक की बची अवधि में क्या होगा। या तो सीमा बढ़ेगी, या योजना समय से पहले बंद मानी जाएगी।
और जिन कारोबारियों तक जागरूकता अभियान अब पहुँचेगा, उनके पास चुनने के लिए 4,976 करोड़ रुपये बचे थे, 20 अगस्त की स्थिति में।
स्रोतईसीएलजीएस 5.0 पर सरकारी विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026, प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनेट की मंज़ूरी, वित्तीय सेवाएँ विभाग, ईसीएलजीएस, जन समर्थ पोर्टल, योजना का पन्ना