भारत पन्ना
पैसा

रैपिडो पर जुर्माना दस लाख, जबकि आदेश ख़ुद कहता है कि यह दूसरी बार है और दूसरी बार पर धारा 21 पचास लाख तक देती है

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने रोप्पेन ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज़ को सवारी से बुकिंग के वक़्त अतिरिक्त पैसे माँगने वाले सारे प्रॉम्प्ट बंद करने को कहा है और 10,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। आदेश की तारीख़ 31 अगस्त 2026 है; पत्र सूचना कार्यालय ने इसकी घोषणा 15 सितंबर को की। आदेश का पैराग्राफ़ 55 कहता है कि यह कंपनी का दूसरा उल्लंघन है, और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 21 दूसरी बार पर पचास लाख रुपये तक का जुर्माना देती है।

गोवा के वास्को दा गामा में नगरपालिका की इमारत के सामने क़तार में खड़ी मोटरसाइकिल टैक्सियाँ, दिसंबर 2018 की तस्वीर; यह रैपिडो का अड्डा नहीं है, पर बाइक टैक्सी का कारोबार ऐसे ही चलता है
तस्वीर: SerTanmay, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

रोप्पेन ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड, जो रैपिडो नाम से बाइक, ऑटो और कैब बुक कराती है, को अपने ऐप से वे सारे प्रॉम्प्ट हटाने हैं जो सवारी को बुकिंग के वक़्त दिखाए गए किराए से ऊपर पैसे जोड़ने के लिए उकसाते थे। साथ में 10,00,000 रुपये का जुर्माना। आदेश पर तारीख़ 31 अगस्त 2026 है, दस्तख़त केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की मुख्य आयुक्त निधि खरे और आयुक्त अनुपम मिश्रा के, मामला संख्या CCPA-2/53/2025-CCPA। पत्र सूचना कार्यालय ने घोषणा पंद्रह दिन बाद की, 15 सितंबर की शाम 5 बजकर 24 मिनट पर। ज़्यादातर अख़बारों ने 15 सितंबर को ही कार्रवाई की तारीख़ मान लिया।

आदेश का पैराग्राफ़ 55 एक और बात कहता है। वह कहता है कि ये उल्लंघन इसी कंपनी की तरफ़ से दोबारा किया गया उल्लंघन हैं, धारा 21 के अर्थ में। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की वही धारा दोबारा पर पचास लाख रुपये तक जुर्माना लगाने देती है। दस लाख पहली बार की अधिकतम सीमा है। पचास की जगह दस क्यों, यह आदेश में कहीं नहीं लिखा।

स्क्रीन पर लिखे तीन वाक्य, और लाल-हरे रंग का स्लाइडर

रैपिडो पर ऑटो या कैब बुक करते वक़्त ऐप पहले ख़ुद एक किराया बताता है। आदेश के पैराग्राफ़ 11 में दर्ज है कि यह किराया कंपनी का अपना एल्गोरिदम निकालता है। उसमें बेस किराया, दूरी, समय, ट्रैफ़िक, टोल, टैक्स और कैप्टन को मिलने वाली रक़म पहले से गिनी जा चुकी है। हिसाब वहीं पूरा हो जाता है। इसी पर्दे पर पहला वाक्य दिखता है: "Higher the price, higher the chance of getting a ride"।

दूसरा वाक्य तब आता है जब तलाश चलती रहती है और कोई कैप्टन बुकिंग स्वीकार नहीं करता। अनुलग्नक-1 में लगे स्क्रीनशॉट में वह इस तरह है: "Captains aren't accepting at ₹60. Try adding more"। उसके नीचे चार बटन हैं। +₹10, +₹20, +₹30 और +₹40। उसी पर्दे पर एक और पंक्ति छपी है, "We charge no commission. Full amount goes to the captain"।

बेंगलुरु की एक सड़क के किनारे फ़ोन की स्क्रीन देखता राहगीर, पीछे खड़े ऑटो और चलती बसें, नवंबर 2011 की तस्वीर; बुकिंग की तलाश वाले पर्दे इसी तरह के फ़ोन पर खुलते हैं
तस्वीर: Victorgrigas, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

तीसरा वाक्य सरकारी विज्ञप्ति में नहीं है। वह महानिदेशक (जाँच) की 21 जनवरी 2026 की रिपोर्ट में है, जिसे आदेश का पैराग्राफ़ 18 उद्धृत करता है। रिपोर्ट कहती है कि पहले "Captains aren't accepting at ₹33" दिखता था, और अब "Skip the wait! Get a ride faster by adding extra" दिखता है, जो बुकिंग की तलाश शुरू होते ही तुरंत और हमेशा आ जाता है। कंपनी ने सुनवाई में कहा था कि ऐसे प्रॉम्प्ट सिर्फ़ कुछ ख़ास हालात में आते हैं। जाँच का निष्कर्ष उलटा है।

पैराग्राफ़ 33 में एक चौथी चीज़ दर्ज है, और वह लिखे हुए वाक्यों से अलग है। "Set your price" वाले पर्दे पर सवारी किराया ऊपर-नीचे सरका सकती है। ऊपर सरकाने पर हरे रंग में "Higher chance of getting a ride" और ऊपर की ओर एक तीर आता है। नीचे सरकाने पर लाल या नारंगी रंग में "Captains are unlikely to accept orders at this price. Please try increasing the price" या "Lower chance of getting a ride" आता है, नीचे की ओर तीर के साथ। स्लाइडर ख़ुद भी बराबर नहीं बना है। सुझाए गए किराए से नीचे आम तौर पर एक या दो पायदान हैं, ऊपर कई और बढ़ते हुए। और किराया घटाने की कोशिश पर "Reset to ₹__" का विकल्प सामने आ जाता है, जो सवारी को पिछली ऊँची क़ीमत पर वापस खींचता है।

रैपिडो ने अपनी लिखित दलील में बताया कि वह रोज़ लगभग 35 लाख सवारियाँ पूरी कराती है। आदेश का पैराग्राफ़ 57 जोड़ता है कि सेवा 120 से ज़्यादा शहरों में है, और ये प्रॉम्प्ट बाइक, ऑटो और कैब, तीनों में एक जैसे चलते रहे।

डार्क पैटर्न की क़ानूनी परिभाषा और तेरह नामज़द क़िस्में

"डार्क पैटर्न" भारत में कोई तकनीकी मुहावरा भर नहीं है। यह राजपत्र में छपी हुई परिभाषा है। 30 नवंबर 2023 को केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 18 के तहत Guidelines for Prevention and Regulation of Dark Patterns, 2023 अधिसूचित किए। फ़ाइल संख्या CCPA-1/1/2023-CCPA-(Reg), असाधारण राजपत्र भाग III खंड 4, संख्या 783। नीचे दस्तख़त निधि खरे के हैं, यानी वही अधिकारी जिन्होंने अब यह आदेश भी लिखा है।

खंड 2(e) परिभाषा देता है: "any practices or deceptive design pattern using user interface or user experience interactions on any platform that is designed to mislead or trick users to do something they originally did not intend or want to do, by subverting or impairing the consumer autonomy, decision making or choice"। एक शर्त और है। वह हरकत भ्रामक विज्ञापन, अनुचित व्यापार व्यवहार या उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन की हद तक पहुँचनी चाहिए।

खंड 3 बताता है कि ये दिशानिर्देश किन पर लागू हैं: भारत में व्यवस्थित ढंग से सामान या सेवा देने वाले सारे प्लेटफ़ॉर्म, विज्ञापनदाता, और विक्रेता। खंड 4 एक पंक्ति का है, "No person, including any platform, shall engage in any dark pattern practice."। खंड 5 कहता है कि अनुलग्नक 1 में गिनाई गई कोई भी चीज़ करना ही डार्क पैटर्न करना माना जाएगा। सूची ही पैमाना है। खंड 6 जोड़ता है कि ये दिशानिर्देश किसी दूसरे क़ानून की जगह नहीं लेते। वे उसके ऊपर से लागू होते हैं। और खंड 7 के मुताबिक़ किसी उलझन या विवाद में प्राधिकरण का फ़ैसला अंतिम होगा।

अनुलग्नक 1 में तेरह क़िस्में नाम लेकर गिनाई गई हैं। False Urgency, Basket sneaking, Confirm shaming, Forced action, Subscription trap, Interface interference, Bait and switch, Drip pricing, Disguised advertisement, Nagging, Trick Question, Saas billing और Rogue Malwares। हर एक के साथ एक से छह उदाहरण दर्ज हैं।

अनुलग्नक की अपनी भूमिका में एक शर्त भी लिखी है। उसमें कहा गया है कि नीचे दी गई क़िस्में और उदाहरण "provide only guidance and shall not be construed as an interpretation of law or as a binding opinion or decision as different facts or conditions may entail different interpretations"। उदाहरण बाँधते नहीं।

कन्फ़र्म शेमिंग, इंटरफ़ेस इंटरफ़ेरेंस, और परिभाषा पर एक खिंचाव

तेरह में से आदेश सिर्फ़ दो पर टिका है। पहली कन्फ़र्म शेमिंग है, अनुलग्नक की प्रविष्टि (3): "using a phrase, video, audio or any other means to create a sense of fear or shame or ridicule or guilt in the mind of the user so as to nudge the user to act in a certain way that results in the user purchasing a product or service from the platform"। पैराग्राफ़ 15 में प्राधिकरण कहता है कि प्रॉम्प्ट का डिज़ाइन, उनका क्रम और उनकी भाषा मिलकर सवारी के मन में यह आशंका बनाते हैं कि ज़्यादा न देने पर पहले से बुक की गई सेवा मिलने में देर होगी या मिलेगी ही नहीं। यहाँ तक बात परिभाषा के भीतर बैठती है।

दूसरी क़िस्म पर खिंचाव है। इंटरफ़ेस इंटरफ़ेरेंस की राजपत्र में छपी परिभाषा के दो अंग हैं: "a design element that manipulates the user interface in ways that (a) highlights certain specific information; and (b) obscures other relevant information relative to the other information; to misdirect a user from taking an action as desired"। दूसरा अंग माँगता है कि कोई प्रासंगिक जानकारी छिपाई गई हो। राजपत्र ख़ुद इसके तीन उदाहरण देता है, और तीनों एक ही तरह के हैं: "No" वाले विकल्प को हल्के रंग में बनाना, रद्द करने के निशान को बहुत छोटे फ़ॉन्ट में छिपाना, और पॉप-अप के कोने पर लगे 'X' का दबाने पर दूसरा विज्ञापन खोल देना। तीनों में एक बटन छिपा है।

रैपिडो के पर्दे पर कोई बटन नहीं छिपा था। पैराग्राफ़ 35 में प्राधिकरण जो कहता है, वह यह है कि लाल चेतावनी ठीक उसी जगह आती है जहाँ सवारी सुझाए गए किराए से कम देना चाहती है, और हरा संकेत वहाँ जहाँ वह ज़्यादा देती है; कि यह डिज़ाइन एक ऐसे विकल्प को हतोत्साहित करने के लिए बनाया गया है जो कंपनी के अपने कहे के मुताबिक़ पूरी तरह जायज़ है और सवारी को राइड मिलने से नहीं रोकता; और कि "captains are unlikely to accept" जैसी दो-टूक चेतावनी के पीछे कोई आँकड़ा या तरीक़ा रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया।

यानी जो चीज़ "छिपाई" गई मानी जा रही है, वह कोई बटन नहीं है। वह यह तथ्य है कि कम किराया देना भी चलता है। यह एक पाठ है, अक्षरशः मेल नहीं। अनुलग्नक की अपनी भूमिका इस पाठ के पक्ष में जाती है, क्योंकि वह ख़ुद कहती है कि उदाहरण क़ानून की व्याख्या नहीं हैं। पर आदेश इस सवाल को उठाकर तय नहीं करता, और 15 सितंबर की विज्ञप्ति इसका ज़िक्र तक नहीं करती। विज्ञप्ति में स्लाइडर वाली बात है, "obscures" वाली शर्त नहीं।

एक छोटी बात और। कारण बताओ नोटिस में क़िस्म का हवाला "Clause 2(e) read with Annexure, Clause 3, Illustration (a) i.e. Confirm Shaming" के रूप में दिया गया है। राजपत्र में प्रविष्टि (3) ख़ुद परिभाषा है, और उसका उदाहरण (a) बीमा वाला उदाहरण है। हवाला परिभाषा को उदाहरण का नाम दे देता है।

टिप की परिभाषा पर नियामक के अपने वाक्य

आदेश का सबसे स्पष्ट हिस्सा यही है। पैराग्राफ़ 43 कहता है कि "advance tip" की, यानी बुकिंग के वक़्त माँगी गई अतिरिक्त रक़म की बुनियाद ही क़ानूनन नहीं टिकती, क्योंकि टिप की तय समझ यह है कि वह पहले से दी जा चुकी और संतोषजनक पाई गई सेवा के लिए दिया गया स्वैच्छिक आभार है। बुकिंग के वक़्त सवारी के पास आँकने को कुछ होता ही नहीं। सेवा शुरू ही नहीं हुई।

पैराग्राफ़ 46 इसे एक वाक्य में बाँधता है: ऐसा डिज़ाइन सेवा के बाद की स्वैच्छिक भेंट को सेवा से पहले की चुंगी में बदल देता है, और यही धारा 2(47) का अनुचित व्यापार व्यवहार है। पैराग्राफ़ 44 इसमें एक हिसाब जोड़ता है। जब दूरी, समय, ट्रैफ़िक, टोल और कैप्टन की रक़म पहले ही उस किराए में गिनी जा चुकी है जो पर्दे पर दिखा, तो उसके ऊपर माँगी जा रही रक़म किस अतिरिक्त सेवा के बदले है, यह कंपनी न लिखित में बता पाई न सुनवाई में।

अगस्त 2025 का पहला जुर्माना, और दो बार लौटी हुई चिट्ठियाँ

पहली बार मामला टिप का नहीं था। 20 अगस्त 2025 को इन्हीं दो अधिकारियों ने मामला संख्या CCPA-2/35/2024-CCPA में रैपिडो के विज्ञापन पर आदेश दिया था। विज्ञापन यूट्यूब और फ़ेसबुक पर चल रहा था और दावा था, "AUTO IN 5 MIN OR GET ₹50"। उस आदेश के अनुलग्नक में लगी शिकायत में सरफ़राज़ राज ने 23 अप्रैल 2024 को लिखा कि पचास रुपये की जगह पाँच रैपिडो कॉइन मिले। यानी पाँच रुपये।

उसी आदेश का पैराग्राफ़ 48 दो आँकड़े रखता है। अप्रैल 2023 से मई 2024 के बीच राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर रैपिडो के ख़िलाफ़ 575 शिकायतें दर्ज हुईं। जून 2024 से जुलाई 2025 के बीच 1,224। इनमें से आधी शिकायतें कंपनी ने छुईं ही नहीं। दूसरे दौर की सबसे बड़ी श्रेणी अपने आप में एक ख़बर है। आदेश की तालिका में वह इन शब्दों में है, "Extra Amount charge/Ride charge increase after trip Complete", 331 शिकायतें, कुल का 27 फ़ीसदी। पैराग्राफ़ 49 जोड़ता है कि वह भ्रामक दावा कम से कम 548 दिन तक, कई भाषाओं में चलता रहा। जुर्माना दस लाख लगा, और साथ में उन उपभोक्ताओं को पचास रुपये लौटाने का निर्देश जिन्हें नहीं मिले थे।

वह आदेश अब कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती के अधीन है। मौजूदा आदेश का पैराग्राफ़ 7 यह ख़ुद दर्ज करता है। रिट याचिका संख्या 29156/2025। आदेश लिखता है कि मामला लंबित है। इसी वजह से 2026 का आदेश विज्ञापन वाले आधार को छोड़कर सिर्फ़ टिप वाले आधार पर सीमित रहा।

दूसरा आधार आचरण का है। जाँच शाखा ने 2 जनवरी 2026 और 9 जनवरी 2026 को कंपनी के तीनों सरकारी तौर पर दर्ज ईमेल पतों पर नोटिस भेजे। [email protected] पर दोनों बार चिट्ठी लौट आई, त्रुटि कोड 550-5.1.1 के साथ, यानी खाता है ही नहीं। [email protected] और [email protected] से कोई चिट्ठी नहीं लौटी। दोनों जगह पहुँच जाने के बाद भी कंपनी ने किसी नोटिस का जवाब नहीं दिया। पैराग्राफ़ 52 इसे "a deliberate pattern of non-cooperation with the statutory investigation" कहता है। ई-कॉमर्स नियम 2020 का नियम 4 हर मंच से चालू और सही संपर्क पता रखवाता है, और आदेश का उपखंड (iii) यही दोहराता है कि सारे दर्ज पते हर समय चालू रहें।

धारा 21 में पचास लाख है, आदेश में दस लाख

पैराग्राफ़ 55 का वाक्य यह है कि मौजूदा उल्लंघन धारा 21 के अर्थ में उसी पक्ष का दूसरा उल्लंघन हैं। पैराग्राफ़ 56 इसे और आगे ले जाता है: प्रॉम्प्ट रुके नहीं, बल्कि बदलते हुए चलते रहे, और यही वह शरारत है जिसके लिए धारा 21 में बढ़ा हुआ जुर्माना रखा गया है। दोनों वाक्य आदेश के हैं, किसी अख़बार के नहीं।

पैराग्राफ़ 54 में प्राधिकरण अपनी ताक़त ख़ुद लिखता है: जुर्माना दस लाख रुपये तक हो सकता है, और हर बाद के उल्लंघन पर पचास लाख रुपये तक। अधिनियम की छपी हुई प्रति में धारा 21(2) का परंतुक इन शब्दों में है, "Provided that the Central Authority may, for every subsequent contravention by a manufacturer or endorser, impose a penalty, which may extend to fifty lakh rupees."। ध्यान देने की बात यह है कि क़ानून में परंतुक "manufacturer or endorser" से जुड़ा है, और आदेश की पुनरावृत्ति में ये शब्द नहीं आते। इस पर आदेश में कोई चर्चा नहीं है, और यह लेख भी इसे तय नहीं करता।

नई दिल्ली में कृषि भवन के गुंबद, अक्तूबर 2009 की एक सुबह की तस्वीर; आदेश के सिरे पर जो पता छपा है, वह इसी इमारत का है
तस्वीर: Anil Kaushik, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

फिर जुर्माने की मात्रा तय करने के आधार आते हैं। धारा 21(7) में चार हैं। अधिनियम में वे इस क्रम में हैं: अपराध से प्रभावित आबादी और इलाक़ा; अपराध की बारंबारता और अवधि; प्रभावित होने वाले लोगों के वर्ग की कमज़ोरी; और चौथा, "the gross revenue from the sales effected by virtue of such offence"।

आदेश का पैराग्राफ़ 54 तीन गिनाता है। चौथा उसमें नहीं है। यह चूक इस एक आदेश की नहीं है: 20 मई 2026 के मैकेफ़ी वाले आदेश का पैराग्राफ़ 42 भी वही तीन गिनाता है, और ख़ुद रैपिडो के 20 अगस्त 2025 वाले आदेश का पैराग्राफ़ 54 भी। तीनों में "gross revenue" शब्द एक बार नहीं आता। जो अकेला आधार जुर्माने को कंपनी के कारोबार के आकार से जोड़ता, वही तीनों जगह अनुपस्थित है।

पैराग्राफ़ 57 सज़ा बढ़ाने वाली बातें गिनाता है, और सूची लंबी है: 120 से ज़्यादा शहर, पूरे मंच पर एक जैसा इस्तेमाल, रोज़ प्रभावित होने वाली बड़ी संख्या, लंबा समय, पहले हो चुकी सज़ा के बावजूद जारी रहना, जाँच से असहयोग, और अधिनियम के दायित्वों की लगातार अनदेखी। इसके बाद निष्कर्ष लिखा है कि मामला धारा 21(7) की कसौटी पर खरा उतरता है, फिर से उन्हीं तीन आधारों के हवाले से। और फिर पैराग्राफ़ 58 का उपखंड (iv) आता है, जिसमें दस लाख रुपये लिखे हैं। अगला उपखंड पंद्रह दिन में अनुपालन रिपोर्ट माँगता है।

पैराग्राफ़ 54 और पैराग्राफ़ 58 के बीच एक भी वाक्य ऐसा नहीं है जो बताए कि पचास की जगह दस क्यों।

कोई रियायत गिनाई नहीं गई। कंपनी के पक्ष में कोई परिस्थिति दर्ज नहीं है।

प्राधिकरण की अपनी सूची में डार्क पैटर्न के चार जुर्माने हैं, और उनका फ़र्क़ भी कोई तर्क नहीं बताता। मैकेफ़ी सॉफ़्टवेयर इंडिया पर 20 मई 2026 को एक लाख रुपये लगे, जबकि उस आदेश में चार क़िस्में पाई गई थीं, कन्फ़र्म शेमिंग, इंटरफ़ेस इंटरफ़ेरेंस, ट्रिक क्वेश्चन और फ़ोर्स्ड ऐक्शन। फ़िज़िक्सवाला लिमिटेड पर 1 जून 2026 को पाँच लाख, एक क़िस्म, फ़ोर्स्ड ऐक्शन। स्पाइसजेट पर 14 जुलाई 2026 को एक लाख, दो क़िस्में। रैपिडो पर दस लाख, दो क़िस्में, और सूची में यही सबसे बड़ा जुर्माना है।

पूरे उद्योग पर लागू नियम सड़क परिवहन मंत्रालय का क्लॉज़ 14.15 है

बुधवार, 16 सितंबर को उपभोक्ता कार्य सचिव निधि खरे ने सवालों के जवाब में इस मामले पर बात की। वे प्राधिकरण की मुख्य आयुक्त भी हैं। द हिंदू ने उसी दिन शाम 4 बजकर 29 मिनट पर छापी अपनी ख़बर में उनके शब्द इस तरह दर्ज किए: "Now, we found this to be misleading and also an unfair trade practice. And after detailed investigation into the matter and also after hearing, we have ordered discontinuation of this kind of you know built-in mechanism"। अख़बार का शीर्षक था, "Government asks cab aggregators to stop advance tipping option"।

सचिव एक बीत चुके आदेश का ब्योरा दे रही थीं। 16 या 17 सितंबर को कोई नया आदेश, अधिसूचना या परिपत्र जारी नहीं हुआ, न पत्र सूचना कार्यालय से कोई विज्ञप्ति आई। और जो आदेश जारी हुआ था, वह एक कंपनी के नाम है। पैराग्राफ़ 58 के पाँचों निर्देश एक ही पक्ष को संबोधित हैं। चार "The opposite party shall" से शुरू होते हैं, और जुर्माने वाला कहता है कि "the opposite party is directed to pay"। उबर, ओला या किसी और का नाम उनमें नहीं है।

पूरे उद्योग को बाँधने वाला नियम अलग जगह बैठा है, और वह उपभोक्ता कार्य विभाग का नहीं है। वह सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मोटर वाहन एग्रीगेटर दिशानिर्देश 2025 का क्लॉज़ 14.15 है, जिसे यही आदेश पैराग्राफ़ 40 में पूरा उद्धृत करता है: "The App may provide a feature for passengers to give a voluntary tip to the driver, however, such feature shall only be visible after the completion of the journey, and should not be available at the time of booking, before the commencement of the journey or during the journey."। उसके दो और उपखंड हैं, कि पूरी टिप बिना किसी कटौती के चालक को जाए, और कि ऐप में कोई भी टिप-व्यवस्था भ्रामक या जोड़-तोड़ वाली न हो।

इस क्लॉज़ के बारे में आदेश इतना ही बताता है कि मंत्रालय ने इसे संशोधन करके जोड़ा। संशोधन की तारीख़ नहीं दी गई। संख्या भी नहीं। नम्मा यात्री वाले आदेश का पैराग्राफ़ 23 भी वही पाठ उद्धृत करता है और वही दोनों ब्योरे छोड़ देता है। मंत्रालय की अपनी वेबसाइट से इसे मिलाया नहीं जा सका। morth.nic.in पर जिस भी पते पर जाइए, यह मशीन एक ही 41,008 बाइट का ख़ाली पन्ना पाती है। मीडियानामा ने 13 अगस्त 2026 को ख़बर दी थी कि मंत्रालय ने 11 अगस्त 2026 को एग्रीगेटरों के नाम एक सलाह जारी की है; वह सलाह भी नहीं पढ़ी जा सकी, इसलिए यह लेख उसकी इबारत के बारे में कुछ नहीं कहता।

प्राधिकरण ने पूरे क्षेत्र को जो चीज़ भेजी है, उसका दर्जा भी साफ़ है। 5 जून 2025 की सलाह, फ़ाइल संख्या CCPA-1/1/2023-CCPA, सारे ई-कॉमर्स मंचों से कहती है कि वे तीन महीने के भीतर अपना स्व-अंकेक्षण कर लें और डार्क पैटर्न हटा लें, और उन्हें स्व-घोषणा देने के लिए "encouraged" किया जाता है। उसकी क्रियाएँ "advised" और "encouraged" हैं। आदेश की क्रिया "shall" है।

नम्मा यात्री, जुर्माने के बिना, और वह आँकड़ा जो रैपिडो ने नहीं दिया

16 मई 2025 की जिस शिकायत से रैपिडो वाली जाँच शुरू हुई, उसी से एक और जाँच चली। मूविंग टेक इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड, यानी नम्मा यात्री, को भी 28 मई 2025 को कारण बताओ नोटिस गया, उसी तारीख़ को जिस दिन रैपिडो को गया था। उसके ऐप पर वाक्य था, "High Demand, adding a tip helps you find a ride faster"। कंपनी ने वह संदेश 22 मई 2025 को हटा दिया था, नोटिस आने से पहले, और "Extra Fare" वाली पूरी सुविधा 7 जुलाई 2025 से बंद कर दी।

1 सितंबर 2026 को उसी कोरम ने वह मामला बंद कर दिया। एक ही निर्देश है, कि कंपनी अधिनियम और दिशानिर्देशों का पालन करती रहे। दस पन्ने के उस आदेश में "penalty" शब्द एक बार भी नहीं आता।

उस आदेश में वह चीज़ है जो रैपिडो वाले आदेश में कहीं नहीं है, और जिसके न होने पर पूरा मामला टिका है। पैराग्राफ़ 8 के मुताबिक़ प्राधिकरण ने कंपनी से पूछा था कि टिप जुड़ी सवारियों और बिना टिप वाली सवारियों में चालक के पहुँचने का समय कितना अलग रहा। कंपनी ने जनवरी से जुलाई 2025 तक का आँकड़ा दिया। "Extra Fare" वाली सवारियों में औसत पिकअप समय 234.65 से 264.54 सेकंड के बीच रहा, और बिना उसके 211.43 से 239.75 सेकंड। यानी ज़्यादा देने वालों को गाड़ी देर से मिली। चालकों की स्वीकृति दर भी उलटी निकली, टिप वाली सवारियों पर 42 फ़ीसदी और सामान्य सवारियों पर 67। कंपनी ने यह भी बताया कि सुविधा हटाने से उसे लगभग 50 करोड़ रुपये की आमदनी का नुक़सान हुआ।

बेंगलुरु में एक ऑटो की छत पर लगा नम्मा यात्री का साइनबोर्ड, मार्च 2026 की तस्वीर; कंपनी ने अतिरिक्त किराए वाली सुविधा जुलाई 2025 में बंद कर दी थी
तस्वीर: Gpkp, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

रैपिडो से यही चीज़ बार-बार माँगी गई और कभी नहीं मिली। पैराग्राफ़ 11 में दर्ज है कि कंपनी ने ऐसा कोई सबूत नहीं रखा जो बताए कि उसके अपने एल्गोरिदम का निकाला किराया कुछ ही पलों में कम क्यों पड़ने लगता है। पैराग्राफ़ 35 लाल चेतावनी के बारे में यही कहता है। पैराग्राफ़ 48 कर्नाटक हाई कोर्ट के उबर वाले फ़ैसले से शब्द उधार लेकर कहता है कि यह संबंध "couched in secrecy" है।

उबर और ओला की जाँच अब भी चल रही है। 15 सितंबर की विज्ञप्ति और 16 सितंबर को सचिव, दोनों यही कहते हैं। प्राधिकरण की अपनी सूची में नौ पन्नों पर 214 अंतिम आदेश दर्ज हैं, और उनमें दोनों में से किसी का नाम नहीं है।

रैपिडो का अपना कोई बयान रिकॉर्ड पर नहीं है। कोई प्रवक्ता, कोई प्रेस विज्ञप्ति, कोई अपील की सूचना, कुछ नहीं। जो बातें उसके नाम से चल रही हैं, वे इसी आदेश में दर्ज उसकी सुनवाई वाली दलीलें हैं, प्राधिकरण के अपने सारांश में: कि वह एक सॉफ़्टवेयर सेवा है और ऑटो-कैब पर कोई कमीशन नहीं लेती, कि टिप पूरी चालक को जाती है, कि एल्गोरिदम टिप के बिना भी चलता रहता है, और कि यह सब सवारी और चालक के बीच खुली मोलभाव जैसा है। जुर्माना भरा गया या नहीं, अनुपालन रिपोर्ट आई या नहीं, अपील हुई या नहीं, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है।

स्रोतकेंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण: अंतिम आदेशों की तारीख़वार सूची, पहला पन्ना; क्रम 9 पर रोप्पेन/रैपिडो, आदेश की तारीख़ 2026-08-31, और क्रम 7 पर मूविंग टेक इनोवेशंस (नम्मा यात्री), 2026-09-01, मामला संख्या CCPA-2/53/2025-CCPA, रोप्पेन ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के विरुद्ध आदेश, 31 अगस्त 2026, 34 पन्ने; कोरम निधि खरे और अनुपम मिश्रा, मामला संख्या CCPA-2/54/2025-CCPA, मूविंग टेक इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड (नम्मा यात्री), आदेश 1 सितंबर 2026, दस पन्ने; पैराग्राफ़ 8 में जनवरी–जुलाई 2025 के पिकअप समय के आँकड़े, उसी सूची का तीसरा पन्ना, क्रम 61: रैपिडो (रोप्पेन ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज़) के विरुद्ध 20 अगस्त 2025 का आदेश, मामला संख्या CCPA-2/35/2024-CCPA, असाधारण राजपत्र, भाग III खंड 4, संख्या 783, नई दिल्ली, 30 नवंबर 2023: Guidelines for Prevention and Regulation of Dark Patterns, 2023, फ़ाइल संख्या CCPA-1/1/2023-CCPA-(Reg); अनुलग्नक 1 में तेरह क़िस्में, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019, उपभोक्ता कार्य विभाग की अपनी प्रति; धारा 21(2) का परंतुक और धारा 21(7) के चार आधार, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की सलाह, CCPA-1/1/2023-CCPA, 5 जून 2025: ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्मों से तीन महीने में स्व-अंकेक्षण और स्व-घोषणा का अनुरोध, दस्तख़त निधि खरे, पत्र सूचना कार्यालय, उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, 15 सितंबर 2026, शाम 5:24: रैपिडो पर दस लाख का जुर्माना, उसी विज्ञप्ति का हिंदी संस्करण, विज्ञप्ति आईडी 2310583, 15 सितंबर 2026, द हिंदू, 16 सितंबर 2026, शाम 4:29, नई दिल्ली: उपभोक्ता कार्य सचिव निधि खरे के सवालों के जवाब, और उनके उद्धृत वाक्य, मीडियानामा, 13 अगस्त 2026: सड़क परिवहन मंत्रालय की 11 अगस्त 2026 की सलाह की ख़बर; सलाह का मूल दस्तावेज़ इस मशीन से नहीं पढ़ा जा सका, उसी सूची का दूसरा पन्ना: फ़िज़िक्सवाला लिमिटेड, 1 जून 2026, और मैकेफ़ी सॉफ़्टवेयर इंडिया, 20 मई 2026, दोनों डार्क पैटर्न के मामले

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।