यूबीफ्लाई को 285 करोड़, बोर्ड के रिकॉर्ड में अब तक की सबसे बड़ी मंज़ूरी
प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने बुधवार को चेन्नई की यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज़ को उसकी ई-प्लेन परियोजना के लिए 285 करोड़ रुपये मंज़ूर किए, एक लाख करोड़ रुपये के आरडीआई कोष से। बोर्ड के अपने 2014-15 से दर्ज रिकॉर्ड में किसी एक कंपनी को दी गई यह अब तक की सबसे बड़ी रक़म है, और यही आंकड़ा जुलाई में एक अख़बार की रिपोर्ट में पहले भी सामने आ चुका था।

20 जुलाई 2026 की रात 10 बजकर 49 मिनट पर बिज़नेस स्टैंडर्ड ने एक ख़बर छापी। अख़बार का दावा था कि उसने एक आंतरिक दस्तावेज़ देखा है। उसमें प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने आरडीआई कोष के तहत 22 डीप-टेक स्टार्टअप चुने थे, कुल 2,192 करोड़ रुपये की मंज़ूरी के साथ। सबसे बड़ी रक़में पाने वालों में एक नाम था: "द ईप्लेन कंपनी," 285 करोड़ रुपये के साथ।
ठीक दो महीने बाद, बुधवार 23 सितंबर की दोपहर 2 बजकर 27 मिनट पर, पत्र सूचना कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी की। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड, यानी टीडीबी, ने चेन्नई की यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज़ प्राइवेट लिमिटेड को 285 करोड़ रुपये की सहायता मंज़ूर की है। यही कंपनी बाज़ार में "ईप्लेन" के नाम से जानी जाती है। यही रक़म भी। परियोजना की कुल लागत 570 करोड़ रुपये है। बोर्ड का हिस्सा ठीक आधा।
पैसा एक लाख करोड़ रुपये के कोष से आया है। पूरा नाम है अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष, संक्षेप में आरडीआई कोष। मक़सद कंपनी की स्वदेशी ई-प्लेन तकनीक को आगे बढ़ाना है, टीआरएल-6 से टीआरएल-9 तक। यह एक इंजीनियरिंग-स्तर के प्रोटोटाइप से असली परिचालन में परखी और साबित प्रणाली तक की छलाँग है। यह पैसा अनुदान नहीं है। बोर्ड की शर्त वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय डिबेंचर की है। यह एक दीर्घकालिक ऋण-पत्र है, जिसे तय अवधि बाद कंपनी के शेयरों में बदला जा सकता है।
सवाल यह है कि बोर्ड के अपने हिसाब में यह रक़म कहाँ बैठती है।
मामूली, या असाधारण? जवाब बोर्ड की अपनी वेबसाइट पर दर्ज हर मंज़ूरी में मिलता है, कंपनी दर कंपनी, रुपया दर रुपया।
इस लेख में अंग्रेज़ी दस्तावेज़ों और रिपोर्टों के उद्धरण हिंदी अनुवाद में हैं। जहाँ मूल शब्द ही मायने रखता है, वहाँ अंग्रेज़ी मूल भी साथ दी गई है।
बोर्ड के तीस साल के रिकॉर्ड में यह सबसे बड़ी मंज़ूरी है
टीडीबी की वेबसाइट पर एक पन्ना है, "फ़ंडेड एग्रीमेंट्स।" इसमें हर वित्त-वर्ष का अपना उप-पन्ना है, 2014-15 से चालू वित्त-वर्ष 2026-27 तक। हर पन्ने पर चार चीज़ें दर्ज हैं: कंपनी का नाम, परियोजना का शीर्षक, बोर्ड की प्रतिबद्धता और परियोजना की कुल लागत। दोनों रक़में करोड़ रुपये में हैं। यह लेख 23 सितंबर को यह हर उप-पन्ना पढ़कर लिखा गया है। यूबीफ्लाई अभी तक इस सूची में ख़ुद नहीं है। चालू वित्त-वर्ष का पन्ना आज दोपहर तक सिर्फ़ आठ मंज़ूरियाँ दिखाता है। आज की विज्ञप्ति उनमें शामिल नहीं।
तेरह वित्त-वर्षों में बोर्ड ने सौ मंज़ूरियों का आँकड़ा दर्ज किया है जिनमें रक़म का कॉलम भरा है। चार वित्त-वर्षों में यह कॉलम पूरा या आधा ख़ाली है: 2016-17 का आधा हिस्सा, 2018-19, 2019-20 और 2020-21 का ज़्यादातर हिस्सा। इनमें कंपनी और परियोजना का नाम है। रक़म नहीं है। उन बरसों की पूरी तुलना इसलिए नहीं हो सकती, और यह लेख उन्हें गिनती से बाहर रखता है।
इन सौ मंज़ूरियों के मुक़ाबले यूबीफ्लाई की 285 करोड़ रुपये की रक़म सबसे ऊपर बैठती है। इनका औसत आकार 14.15 करोड़ रुपये है। बीच का आँकड़ा, यानी माध्यिका, सिर्फ़ 4.16 करोड़ रुपये है। सौ में अट्ठावन मंज़ूरियाँ 5 करोड़ रुपये से कम की हैं। यूबीफ्लाई की रक़म इस बीच के आँकड़े से लगभग 68 गुना बड़ी है।
इससे पहले किसी एक मंज़ूरी ने कभी 163 करोड़ रुपये को पार नहीं किया था। यह पुराना रिकॉर्ड भी इसी वित्त-वर्ष 2026-27 में बना। कंपनी थी दिल्ली की एनटीएफ़ एनर्जी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड, काम था टाइप-4 सीएनजी सिलेंडर का व्यावसायिक विनिर्माण, कुल परियोजना लागत 333.67 करोड़ रुपये। तीसरे नंबर पर 125 करोड़ रुपये हैं। यह रक़म हैदराबाद की मिडवेस्ट एडवांस्ड मटीरियल्स को मिली थी, ई-मोबिलिटी के लिए दुर्लभ मृदा चुंबक बनाने की परियोजना में, वित्त-वर्ष 2024-25 में। 125 और 163 करोड़ रुपये के बीच बोर्ड ने किसी को कुछ नहीं दिया। सौ में सिर्फ़ दो मंज़ूरियाँ कभी 100 करोड़ रुपये के पार गई हैं। यूबीफ्लाई इस सूची में तीसरी है। रक़म में बाक़ी दोनों से बहुत आगे।
एक और तुलना इससे भी साफ़ है। बोर्ड की तालिका जिन सात वित्त-वर्षों की हर मंज़ूरी की रक़म देती है, उन सभी में एक बात दोहराई जाती है। उस पूरे साल की कुल प्रतिबद्धता, यानी उस साल की सारी कंपनियों को मिलाकर दी गई रक़म, यूबीफ्लाई अकेले को मिली रक़म से कम थी। 2024-25 में पूरे साल भर में सिर्फ़ 211.51 करोड़ रुपये गए। यह आँकड़ा बोर्ड की अपनी सालाना रिपोर्ट में भी दर्ज है, वेबसाइट के आँकड़े से पूरा मेल खाता है। 2021-22 में पूरे साल सिर्फ़ 116.78 करोड़ रुपये गए। अकेले यूबीफ्लाई को मिली रक़म इन पूरे बरसों से बड़ी है।
बोर्ड कितना चुनिंदा है, यह भी उसी सालाना रिपोर्ट में दर्ज है। वित्त-वर्ष 2024-25 में बोर्ड को 275 आवेदन मिले, कुल 1,513.22 करोड़ रुपये की माँग के साथ। मंज़ूरी मिली सिर्फ़ सात को, 211.51 करोड़ रुपये की। सौ में से क़रीब ढाई आवेदन ही पास होते हैं।
बोर्ड ख़ुद 1 सितंबर 1996 को बना था, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड अधिनियम, 1995 के तहत। उसकी 29वीं सालाना रिपोर्ट जनवरी 2026 में वेबसाइट पर आई। यह अपने पूरे इतिहास का हिसाब देती है: 1996 से 2025 तक 412 समझौते, कुल परियोजना लागत 11,759.70 करोड़ रुपये, और इनमें बोर्ड की अपनी प्रतिबद्धता 2,712.99 करोड़ रुपये। यूबीफ्लाई को अकेले मिली रक़म इस उनतीस साल के पूरे जोड़ का दसवाँ हिस्सा है, ठीक-ठीक 10.5 फ़ीसदी। यह पैसा जिस स्रोत से आया, वह अलग कहानी है। बोर्ड को ख़ुद विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से 1996-97 से 2024-25 तक कुल 1,222.17 करोड़ रुपये अनुदान के तौर पर मिले। यही बोर्ड की मूल पूंजी है। इसी से बोर्ड कंपनियों को क़र्ज़ और इक्विटी देता रहा है, ब्याज और वापसी की रक़म दोबारा लगाकर। दोनों आँकड़े अलग हैं। दोनों एक बात बताते हैं: 285 करोड़ रुपये बोर्ड के लिए मामूली रक़म नहीं है।
जुलाई और आज की मंज़ूरी के बीच की कड़ी पक्की नहीं है
बिज़नेस स्टैंडर्ड की जुलाई की रिपोर्ट पूरी सूची भी देती है। टेजस नेटवर्क को 250 करोड़ रुपये मिले थे, अदर एनर्जी को 212 करोड़, अग्निकुल कॉसमॉस को 200 करोड़ और आइडियाफ़ोर्ज को 151 करोड़ रुपये। इन 22 कंपनियों की परियोजनाओं की कुल लागत 4,744 करोड़ रुपये बताई गई थी। "द ईप्लेन कंपनी" यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज़ का ही व्यावसायिक नाम है। कंपनी का अपना पंजीकृत ईमेल पता भी इसी नाम पर बना है, [email protected]। यह पहचान इसलिए साफ़ है।
पर एक कड़ी साफ़ नहीं है। आज की विज्ञप्ति में जुलाई की उस रिपोर्ट का कोई ज़िक्र नहीं है। 22 कंपनियों के उस समूह का भी नहीं। यह लेख उस आंतरिक दस्तावेज़ को ख़ुद नहीं देख पाया, क्योंकि वह सार्वजनिक नहीं है। इसलिए एक पुष्टि नहीं हो सकती। जुलाई की चयन-सूची और आज की यह विज्ञप्ति एक ही फ़ैसले के दो चरण हो सकते हैं, पहले चयन, फिर औपचारिक अनुबंध। या दो अलग कड़ियाँ भी हो सकते हैं। जो साफ़ है, वह यह: आँकड़ा नया नहीं है।
एक लाख करोड़ रुपये का कोष, और बोर्ड इसकी दूसरी कड़ी है
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1 जुलाई 2025 को आरडीआई कोष को मंज़ूरी दी थी। पूरा नाम अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष, रक़म एक लाख करोड़ रुपये। यह छह साल में ख़र्च होगी। इसमें से 20,000 करोड़ रुपये अकेले वित्त-वर्ष 2025-26 के लिए रखे गए थे। ढाँचा दो-स्तरीय है। पहले स्तर पर राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन के भीतर एक विशेष प्रयोजन कोष बना है, जो पूरी रक़म का संरक्षक है। यह कोष सीधे किसी कंपनी को पैसा नहीं देता। पैसा दूसरे स्तर के फ़ंड मैनेजरों तक जाता है। ये वैकल्पिक निवेश कोष, विकास वित्त संस्थाएँ या ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ हो सकते हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग इस पूरी योजना का नोडल विभाग है।
राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन की कार्यकारी परिषद ने 11 अक्तूबर 2025 को कोष के परिचालन ढाँचे और दिशा-निर्देशों को मंज़ूरी दी। प्रधानमंत्री ने 3 नवंबर 2025 को योजना का शुभारंभ किया। मंत्रिमंडल की मंज़ूरी के मुताबिक़ प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद, यानी बिरैक, को नामांकन के आधार पर दूसरे स्तर का फ़ंड मैनेजर बनाया गया। दोनों को अलग से आवेदन नहीं करना पड़ा। बोर्ड ने अपना पहला खुला आवेदन 4 फ़रवरी 2026 को शुरू किया। बिरैक ने 13 फ़रवरी को। अतिरिक्त फ़ंड मैनेजरों के लिए एक अलग आवेदन 31 जनवरी 2026 को बंद हुआ, चयन अभी चल रहा है। पात्रता की शर्तें साफ़ हैं। कंपनी भारत में पंजीकृत हो, मुख्यालय भारत में हो, निवासी भारतीय नागरिकों के नियंत्रण में हो, और तकनीक कम से कम टीआरएल-4 तक पहुँच चुकी हो। संसद में सरकार का अपना जवाब साफ़ है। यह योजना किसी शहर या राज्य के लिए नहीं है। माँग और नतीजे के आधार पर पूरे देश में परियोजनाएँ चुनी जाती हैं। कोष के बारे में बताने के लिए मुंबई, बेंगलुरु, पंचकूला और दिल्ली में अलग-अलग कार्यक्रम भी हुए, नवंबर और दिसंबर 2025 में।
आज की विज्ञप्ति यूबीफ्लाई की परियोजना को "डीप टेक्नोलॉजी" के अंतर्गत रखती है, उपक्षेत्र "स्पेस टेक्नोलॉजी।" आरडीआई कोष की अपनी सूची में क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष एक साथ "डीप टेक्नोलॉजी" की श्रेणी में हैं। हवाई गतिशीलता या विमानन के लिए कोई अलग उपक्षेत्र सूची में नहीं दिखा। विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि बोर्ड ने इसे स्पेस टेक्नोलॉजी में ही क्यों रखा। यह ख़ाली जगह दस्तावेज़ में वैसी ही रहने दी गई है।

डिबेंचर जो शेयर बन सकता है: सरकार को क्या मिलता है
विज्ञप्ति ख़ुद बताती है कि सहायता "वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय डिबेंचर" के ज़रिए दी जाएगी। यह एक दीर्घकालिक ऋण-पत्र है। तय अवधि बाद इसे कंपनी के इक्विटी शेयरों में बदला जा सकता है। बोर्ड की अपनी वेबसाइट आरडीआई कोष के तहत तीन तरीक़े गिनाती है। पहला सिर्फ़ क़र्ज़ है, बिना किसी गिरवी के। रक़म ज़रूरत की आधी होती है। बाक़ी आधा कंपनी या निजी निवेशक ख़ुद लगाएँ। ब्याज 3 से 4 फ़ीसदी सालाना है, अवधि परियोजना के मुताबिक़ 12 से 15 साल। पूरी रक़म एक साथ नहीं मिलती। यह लक्ष्य पूरे होने पर किश्तों में मिलती है।
दूसरा तरीक़ा सीधी इक्विटी है। बोर्ड की मदद का पचीस फ़ीसदी तक हिस्सा सीधे शेयरों में जा सकता है, बशर्ते वह प्रवर्तकों की अपनी जमा पूंजी से ज़्यादा न हो। तीसरा तरीक़ा वही है जो यूबीफ्लाई पर लागू है: क़र्ज़ जो बाद में शेयर बन सकता है। बोर्ड सामान्य क़र्ज़ देता है। तुरंत कोई इक्विटी नहीं माँगता। बाद में अगर कंपनी किसी बड़े मूल्यांकन पर नया निवेश जुटाती है, तो बोर्ड अपने बक़ाया क़र्ज़ का बीस फ़ीसदी तक हिस्सा उसी नए, ऊँचे दाम पर शेयरों में बदल सकता है, पहली किश्त की तारीख़ से हर साल पाँच फ़ीसदी की छूट पर। निकलने का रास्ता दो हैं: प्रवर्तकों की वापस-ख़रीद, या किसी और निवेशक के साथ मिलकर हिस्सा बेचना।
यह योजना अनुदान नहीं देती। छोटी अवधि का क़र्ज़ भी नहीं, वह बाज़ार से लेना पड़ता है। कोई भी मदद परियोजना की कुल लागत के आधे से ज़्यादा नहीं हो सकती। अपवाद सिर्फ़ असाधारण मामलों में है, और उन्हें सचिवों के अधिकार-प्राप्त समूह से अलग मंज़ूरी चाहिए। यूबीफ्लाई के मामले में 285 करोड़ रुपये ठीक 570 करोड़ रुपये के आधे हैं। यह सीमा तक पहुँची है। उसे लांघी नहीं है।
बोर्ड का अपना पुराना, आरडीआई-पूर्व क़र्ज़ अलग शर्तों पर चलता है। ब्याज सीधा पाँच फ़ीसदी है। परियोजना की अवधि आमतौर पर तीन साल से ज़्यादा नहीं होती। वापसी नौ अर्ध-वार्षिक किश्तों में होती है, एक साल की मोहलत के बाद। आरडीआई की शर्तें कहीं नरम हैं। ब्याज कम है, अवधि तीन-चार गुना लंबी।
काग़ज़ पर यूबीफ्लाई: पूंजी पंद्रह लाख, मंज़ूरी 285 करोड़
कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की अपनी वेबसाइट ने इस लेख के लिए हर कोशिश नाकाम कर दी। हर अनुरोध पर उसका सर्वर सीधे एकेमाई की 403 त्रुटि लौटाता है। इसलिए कंपनी के पंजीकरण के आँकड़े यहाँ टोफ़लर के हवाले से हैं। यह वेबसाइट कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय में दाख़िल दस्तावेज़ों को ही जमा करती है।
यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज़ प्राइवेट लिमिटेड 28 फ़रवरी 2019 को बनी थी। पता है चेन्नई का आईआईटी मद्रास रिसर्च पार्क। कंपनी पहचान संख्या U74999TN2019PTC127771 है।

कंपनी की अधिकृत पूंजी 22.53 लाख रुपये है, जमा पूंजी 15.52 लाख रुपये। यह अंकित मूल्य है। बाज़ार में कंपनी की क़ीमत का पैमाना नहीं है। फिर भी फ़ासला बताने लायक़ है: 15.52 लाख रुपये की जमा पूंजी वाली कंपनी को आज 285 करोड़ रुपये की सरकारी मदद मिली है। कंपनी का पंजीकृत ईमेल पता [email protected] है, उसी नाम से जिससे कंपनी बाज़ार में जानी जाती है। कॉर्पोरेट वर्गीकरण में कंपनी अब भी "मोटर वाहन, ट्रेलर और ड्रोन बिक्री" के कोड में दर्ज है। विमानन का कोई अलग वर्ग नहीं है।
रिकॉर्ड में चार निदेशक हैं: विशेष राजारम, सत्यनारायणन रघुरामन चक्रवर्ती, आदित्य घोष और जयकृष्णन रामास्वामी। चक्रवर्ती कंपनी में शेयरधारक भी हैं। उनका जुड़ाव सबसे पुराना है, आठ साल का, यानी कंपनी बनने के क़रीब-क़रीब शुरू से। टोफ़लर के मुताबिक़ 31 मार्च 2024 को ख़त्म साल में कंपनी की आमदनी 1 करोड़ रुपये से कम थी। अगले साल, 31 मार्च 2025 तक, यह बढ़कर 1 से 10 करोड़ रुपये के दायरे में पहुँच गई। ठीक-ठीक रुपया दोनों बरसों का सार्वजनिक नहीं है। टोफ़लर का पूरा ब्योरा भुगतान के बाद ही खुलता है। कंपनी की कुल संपत्ति में भी इसी साल बड़ा उछाल दर्ज है। आँकड़ा प्रतिशत में है, रुपये में नहीं। एक छोटी, हल्की पूंजी वाली कंपनी और एक भारी सरकारी मंज़ूरी, दोनों एक साथ सच हैं।
टीआरएल-6 से टीआरएल-9 तक: प्रमाणन अभी बाक़ी है
प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के दफ़्तर ने अपने "राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन ढाँचे" में टीआरएल के नौ दर्जे परिभाषित किए हैं। टीआरएल-6 का मतलब है: इंजीनियरिंग या पायलट स्तर का प्रोटोटाइप, जो प्रासंगिक परिवेश में परखा गया हो। यह प्रयोगशाला के स्तर से इंजीनियरिंग स्तर की ओर एक क़दम है। टीआरएल-9 बिल्कुल अलग है: असली प्रणाली, अपने अंतिम रूप में, अपेक्षित परिस्थितियों की पूरी सीमा में परखी और साबित हो चुकी। यूबीफ्लाई की तकनीक अभी पहले पड़ाव पर है। यह पैसा उसे दूसरे पड़ाव तक ले जाने के लिए है।
कंपनी का विमान ई200एक्स तीन सीटों का है, एक पायलट और दो यात्रियों के लिए। इसमें कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। लक्षित उड़ान सीमा 110 किलोमीटर है, गति 160 किलोमीटर प्रति घंटा। लैंडिंग गियर पारंपरिक और खड़ी, दोनों तरह की उतराई के लिए बना है। कंपनी ने पूरा ढाँचा ख़ुद डिज़ाइन किया है: बदन, पंख और पिछला ढाँचा, सब मिलाकर।
टीआरएल-9 का एक हिस्सा प्रमाणन भी है। भारत में 5,700 किलोग्राम तक के खड़े उतरने-उड़ने वाले विमानों का टाइप सर्टिफ़िकेट नागर विमानन महानिदेशालय, यानी डीजीसीए, के एक सलाहकार परिपत्र से तय होता है। क़ानूनी सलाहकार वेबसाइटों की रिपोर्टों में इसे परिपत्र एईएसी क्रमांक 1/2024 बताया गया है। यह लेख डीजीसीए की अपनी वेबसाइट पर इस परिपत्र का मूल पाठ नहीं खोज पाया, इसलिए महीने और तारीख़ की पुष्टि नहीं हो सकी, यह ब्योरा द्वितीयक स्रोतों पर टिका है।
कंपनी का अपना प्रमाणन रास्ता इसी ढाँचे में चला है। डीजीसीए ने कंपनी को मई 2023 में डिज़ाइन संगठन की मंज़ूरी दी थी। कंपनी की अपनी लिंक्डइन पोस्ट के हवाले से विमानन पत्रिका अर्बन एयर मोबिलिटी न्यूज़ ने 20 जनवरी 2025 को एक बात लिखी। डीजीसीए ने ई200एक्स के टाइप सर्टिफ़िकेट, यानी विमान डिज़ाइन के प्रमाणन, के आवेदन को स्वीकार कर लिया है। आवेदन स्वीकार होना और प्रमाणपत्र मिलना दो अलग बातें हैं।

इस लेख को कहीं कोई सरकारी दस्तावेज़ नहीं मिला जो कहे कि टाइप सर्टिफ़िकेट जारी हो चुका है। कुछ रिपोर्टों में कंपनी को "प्रमाणित" बताया गया है। 2026 में सेवा शुरू होने का दावा भी है। यह दावा किसी दस्तावेज़ से पुष्ट नहीं हुआ। जब तक प्रमाणपत्र नहीं मिलता, टीआरएल-9 भी नहीं आता। आज की विज्ञप्ति ख़ुद यही मानकर चलती है। तभी तो 285 करोड़ रुपये टीआरएल-6 को टीआरएल-9 तक ले जाने के लिए दिए गए हैं, किसी बना-बनाया विमान बेचने के लिए नहीं।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, 23 सितंबर 2026, दोपहर 2:27 बजे: प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड की यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज़ को सहायता, हिंदी विज्ञप्ति, पत्र सूचना कार्यालय, अंग्रेज़ी विज्ञप्ति, 23 सितंबर 2026, दोपहर 2:27 बजे, हिंदी पाठ से मिलान के लिए पढ़ी गई, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड: वित्त-वर्षवार फ़ंडेड एग्रीमेंट्स सूचकांक, 2014-15 से 2026-27 तक, 23 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड: वित्त-वर्ष 2026-27 के फ़ंडेड एग्रीमेंट्स, 23 सितंबर 2026 तक दर्ज आठ मंज़ूरियाँ, यूबीफ्लाई अब तक इसमें दर्ज नहीं, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड: वित्त-वर्ष 2024-25 के फ़ंडेड एग्रीमेंट्स, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड की 29वीं सालाना रिपोर्ट, वित्त-वर्ष 2024-25, जनवरी 2026 में वेबसाइट पर अपलोड, राज्यवार कवरेज तालिका पृष्ठ 21, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड: आरडीआई कोष के दूसरे स्तर के फ़ंड मैनेजर के तौर पर बोर्ड का पन्ना, वित्त-पोषण के तरीक़े और पात्रता, 23 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, पत्र सूचना कार्यालय, 1 जुलाई 2025: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा आरडीआई योजना को मंज़ूरी, पत्र सूचना कार्यालय, 11 अक्तूबर 2025: राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन की कार्यकारी परिषद द्वारा आरडीआई कोष के परिचालन ढाँचे को मंज़ूरी, पत्र सूचना कार्यालय, 4 फ़रवरी 2026: प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड का पहला आरडीआई खुला आवेदन शुरू, पत्र सूचना कार्यालय, संसदीय प्रश्न, 11 फ़रवरी 2026: डीप टेक फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स के परिचालन पर जवाब, बोर्ड और बिरैक की नियुक्ति और तारीख़ें, पत्र सूचना कार्यालय, संसदीय प्रश्न, 11 मार्च 2026: आरडीआई कोष पर जवाब, आउटरीच कार्यक्रमों की तारीख़ें और शहर, कॉम्प्लिनिटी का विधिक अद्यतन: डीजीसीए के सलाहकार परिपत्र एईएसी क्रमांक 1/2024 का सार, मूल परिपत्र डीजीसीए की वेबसाइट पर स्वतंत्र रूप से नहीं मिला, बिज़नेस स्टैंडर्ड, उदिशा श्रीवास्तव, 20 जुलाई 2026, रात 10:49 बजे: बोर्ड द्वारा चुने गए 22 डीप-टेक स्टार्टअप, आंतरिक दस्तावेज़ के हवाले से, टोफ़लर: यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज़ प्राइवेट लिमिटेड का कॉर्पोरेट रिकॉर्ड, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की फ़ाइलिंग पर आधारित; mca.gov.in ने इस मशीन के हर अनुरोध पर एकेमाई 403 दिया, 23 सितंबर 2026, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार का दफ़्तर: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन ढाँचा, टीआरएल-1 से टीआरएल-9 की परिभाषाएँ पृष्ठ 9, अर्बन एयर मोबिलिटी न्यूज़, 20 जनवरी 2025: कंपनी की लिंक्डइन पोस्ट के हवाले से डीजीसीए द्वारा टाइप सर्टिफ़िकेट आवेदन स्वीकार किए जाने की रिपोर्ट