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छूट अब पिछले तीस दिन की सबसे कम क़ीमत से नापी जाएगी, और हेल्पलाइन से जुड़ना ऐच्छिक नहीं रहेगा

उपभोक्ता मामले विभाग ने 10 सितंबर को ई-कॉमर्स नियमावली में संशोधन अधिसूचित किया। सबसे ठोस बदलाव 'पूर्व मूल्य' की परिभाषा है: वह नंबर जिस पर लकीर खिंचती है, अब बीते तीस दिन की सबसे कम पेशकश होगी। 2020 की नियमावली छह साल में सिर्फ़ एक बार बदली थी, और उस बदलाव ने नियम कड़ा नहीं, ढीला किया था।

बैंक कार्ड हाथ में लिए ऑनलाइन ख़रीदारी करता एक व्यक्ति, यह तस्वीर दिसंबर 2022 की और यूरोप की है; ख़रीदार जिसे बचत समझता है, वह स्क्रीन पर दिखे दो नंबरों का फ़र्क़ होता है
तस्वीर: Bogdan Hoyaux / European Commission, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

स्क्रीन पर दो नंबर होते हैं। ऊपर वाले पर आड़ी लकीर खिंची रहती है, नीचे वाला मोटे अक्षरों में। ख़रीदार जिसे बचत समझता है, वह इन्हीं दोनों का फ़र्क़ है।

लकीर वाला नंबर कहाँ से आता है, यह अब तक किसी नियम में तय नहीं था।

10 सितंबर 2026 की शाम उपभोक्ता मामले विभाग ने उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) (संशोधन) नियमावली, 2026 की घोषणा की। पीआईबी की विज्ञप्ति, जिसकी आईडी 2308832 है और जो शाम 5 बजकर 14 मिनट पर जारी हुई, नौ प्रावधान गिनाती है। इनमें एक वाक्य उस लकीर वाले नंबर को पहली बार परिभाषा देता है। पूरी नियमावली 1 जनवरी 2027 से प्रभावी होगी।

'पूर्व मूल्य' की नई परिभाषा: पिछले तीस दिन की सबसे कम क़ीमत

विज्ञप्ति की भाषा यह है: "पूर्व मूल्य" का अर्थ है सबसे कम कीमत जिस पर घोषणा से पहले 30 दिनों के दौरान वस्तुओं या सेवाओं की पेशकश की गई थी। इस वाक्य में तीन शब्द वज़न उठाते हैं। "सबसे कम", यानी औसत नहीं और आख़िरी दाम भी नहीं। "पेशकश की गई", यानी उस दाम पर बिक्री हुई या नहीं, यह मायने नहीं रखता; दाम टँगा होना पर्याप्त है। और "घोषणा से पहले 30 दिनों के दौरान", यानी गिनती छूट के ऐलान की तारीख़ से पीछे की ओर चलती है, आगे की ओर नहीं। तीनों मिलकर तुलना का आधार मंच के हाथ से निकालकर रिकॉर्ड के हवाले कर देते हैं।

जो छूट अब छूट नहीं कहलाएगी

घोषणा के साथ दो आँकड़े दिखाने होंगे: घटी हुई क़ीमत, और पूर्व मूल्य। नियम अंतिम दाम पर नहीं पड़ता, तुलना के आधार पर पड़ता है। इसका एक व्यावहारिक नतीजा हिसाब रखने का है। तीस दिन तक हर पेशकश का दाम सुरक्षित रखना और उसमें से न्यूनतम निकालना, यह काम मंच को ही करना होगा, और छूट की हर घोषणा के साथ करना होगा। विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि वह रिकॉर्ड कितने समय तक रखना है, न यह कि जब एक ही वस्तु कई विक्रेताओं के पास अलग-अलग दामों पर सूचीबद्ध हो तो "पेशकश" किसकी गिनी जाएगी। दोनों सवाल राजपत्र के पाठ पर टिके हैं।

क़ीमत पर 2020 की नियमावली में जो एक बंदिश पहले से थी

नियम 4(11) दो चीज़ें मना करता है। पहली, कोई ई-कॉमर्स इकाई अपने मंच पर पेश वस्तु या सेवा की क़ीमत में ऐसी हेराफेरी नहीं करेगी जिससे प्रचलित बाज़ार हालात, वस्तु की अनिवार्य प्रकृति और उन असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए, जिनमें वह पेश की गई है, उपभोक्ता पर अनुचित दाम थोपकर अनुचित लाभ कमाया जाए। दूसरी, एक ही वर्ग के उपभोक्ताओं के बीच भेद नहीं किया जाएगा और न उनका मनमाना वर्गीकरण होगा। पहली बंदिश ऊँचे दाम पर है। 2026 की परिभाषा दूसरी दिशा से आती है: वह ऊँचे दाम को नहीं, नक़ली तुलना को पकड़ती है।

2020 की नियमावली में क्या लिखा था, और अब क्या जुड़ा

उपभोक्ता संरक्षण (ई-वाणिज्य) नियम, 2020 सा.का.नि. 462(अ) से 23 जुलाई 2020 को अधिसूचित हुए थे। उनमें आठ नियम हैं। नियम 4 ई-कॉमर्स इकाइयों के कर्तव्य गिनाता है, नियम 5 मार्केटप्लेस इकाइयों की देनदारियाँ, नियम 6 मार्केटप्लेस पर बेचने वाले विक्रेताओं के कर्तव्य, नियम 7 उन इन्वेंटरी इकाइयों के, जो अपना ही माल बेचती हैं, और नियम 8 उल्लंघन का। 2026 की सूची में शिकायत की प्रति, खोज परिणाम, प्रायोजित लिस्टिंग, पूर्व मूल्य, डार्क पैटर्न, विक्रेता-ब्योरा, सहमति, बंडल शुल्क और आयातित माल आते हैं। इनमें से कई उस पाठ पर बैठते हैं जो 2020 से मौजूद है। कौन-सा प्रावधान किस नियम में जुड़ रहा है, यह राजपत्र पाठ देखे बिना तय नहीं होता।

छह साल में एक ही संशोधन, और उसने नियम ढीला किया

17 मई 2021 को सा.का.नि. 328(अ) जारी हुआ। उसने 2020 की नियमावली में ठीक एक काम किया: नियम 4 का उप-नियम (1) पूरा बदल दिया। पहले वहाँ लिखा था कि ई-कॉमर्स इकाई कंपनी अधिनियम 1956 या 2013 के तहत निगमित कंपनी होगी, या विदेशी कंपनी होगी, और भारत में रहने वाला एक नोडल संपर्क व्यक्ति नियुक्त करेगी। संशोधन के बाद वाक्य की बनावट पलट गई: "जहाँ ई-कॉमर्स इकाई कंपनी अधिनियम के तहत निगमित कंपनी है", वहाँ वह नोडल अधिकारी नियुक्त करेगी। निगमित होने की शर्त वाक्य से हट गई और नोडल अधिकारी का कर्तव्य सशर्त हो गया। छह साल में यही अकेला संशोधन है।

एक हवाला जो अपनी जगह पर नहीं है

2020 की नियमावली की पहली पंक्ति कहती है कि नियम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 101 की उप-धारा (1) के उप-खंड (यछ) से मिली शक्तियों के तहत बनाए गए हैं। धारा 101 की उप-धारा (1) में कोई उप-खंड है ही नहीं; वह एक वाक्य है, जो केंद्र सरकार को नियम बनाने की सामान्य शक्ति देता है। खंड (यछ), जो धारा 94 के तहत ई-कॉमर्स और प्रत्यक्ष बिक्री में अनुचित व्यापार प्रणालियाँ रोकने के उपायों की बात करता है, उप-धारा (2) में है। 2021 का संशोधन उसी शक्ति को उप-धारा (2) बताकर उद्धृत करता है।

शुद्धिपत्र ने छह अक्षर सुधारे, हवाला नहीं छुआ

4 अगस्त 2020 को उसी अधिसूचना के लिए शुद्धिपत्र सा.का.नि. 488(अ) निकला। उसमें छह सुधार हैं, और छहों एक ही किस्म के: अंग्रेज़ी पाठ में देवनागरी के अक्षर रह गए थे। पृष्ठ 8 की पंक्ति 40 से 43 तक (क), (ख), (ग), (घ) को (a), (b), (c), (d) पढ़ा जाए; पृष्ठ 9 की पंक्ति 52 पर (ङ) को (e); पृष्ठ 10 की पहली पंक्ति पर (च) को (f)। धारा का ग़लत हवाला शुद्धिपत्र में नहीं आया। नियम 4(1) की वह गड़बड़ भी नहीं आई जिसमें दोनों खंड (a) अक्षर से शुरू होते हैं, एक कंपनी होने का और दूसरा नोडल व्यक्ति नियुक्त करने का।

हेल्पलाइन से जुड़ना, "यथासंभव प्रयास" से आगे

नियम 4(7) आज भी यही कहता है कि हर ई-कॉमर्स इकाई राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन की अभिसरण प्रक्रिया में भागीदार बनने का यथासंभव प्रयास करेगी। अंग्रेज़ी पाठ में शब्द हैं: shall endeavour on a best effort basis. यही वाक्य छह साल से हेल्पलाइन और मंचों के बीच खड़ा है। विज्ञप्ति के मुताबिक़ संशोधित नियमावली में भागीदार बनना आवश्यक है, प्रयास नहीं। हेल्पलाइन क्या कर सकती है और क्या नहीं, यह हमने 10 सितंबर के अंक में लिखा था। बदलाव सिर्फ़ एक तरफ़ का है: जुड़ना अनिवार्य होगा, पर हेल्पलाइन का अधिकार वही रहेगा जो था।

2025 की 17,71,622 शिकायतों में 5,11,196 इसी क्षेत्र की थीं

क़तार में लगी डेस्कों वाला एक बड़ा कॉल सेंटर, यह तस्वीर 2006 की और अमेरिका की है; 2025 में हेल्पलाइन पर आई हर सौ में लगभग उनतीस शिकायतें ई-कॉमर्स की थीं
तस्वीर: Petiatil, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

विज्ञप्ति के अनुसार 2025 में हेल्पलाइन को 17,71,622 शिकायतें मिलीं और उनमें 5,11,196 ई-कॉमर्स क्षेत्र की थीं, जिन्हें विज्ञप्ति लगभग 29 फ़ीसदी बताती है। इन पाँच लाख से ऊपर शिकायतों के आगे 2020 की नियमावली की एक तयशुदा घड़ी है। नियम 4(4) हर इकाई से शिकायत निवारण तंत्र और एक शिकायत अधिकारी माँगता है, और नियम 4(5) कहता है कि अधिकारी 48 घंटे में प्राप्ति स्वीकार करेगा और एक महीने में निपटारा करेगा। विज्ञप्ति में ई-कॉमर्स की शिकायतों का श्रेणीवार या मंचवार ब्योरा नहीं है, इसलिए यह नहीं पता चलता कि इनमें से कितनी दाम से जुड़ी थीं।

डार्क पैटर्न: 2023 के दिशानिर्देश अब नियम बन गए, और सालाना स्व-लेखापरीक्षा

डार्क पैटर्न की रोकथाम और विनियमन के लिए दिशानिर्देश, 2023 केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने 30 नवंबर 2023 को जारी किए थे, अधिनियम की धारा 18 के तहत, फ़ाइल संख्या सीसीपीए-1/1/2023-सीसीपीए(पंजी.)। उनका खंड 4 कहता है कि कोई व्यक्ति, किसी मंच सहित, किसी डार्क पैटर्न प्रथा में शामिल नहीं होगा। खंड 7 यह जोड़ता है कि निर्वचन में अस्पष्टता या विवाद हो तो प्राधिकरण का निर्णय अंतिम होगा। संशोधित नियमावली इन्हीं दिशानिर्देशों का पालन नियम-बाध्यता बनाती है, सालाना स्व-लेखापरीक्षा जोड़ती है और अनुपालन प्रमाणपत्र प्रमुखता से प्रदर्शित करवाती है। लेखापरीक्षा कौन करेगा, किस प्रारूप में और किस तारीख़ तक, यह विज्ञप्ति में नहीं है।

तेरह डार्क पैटर्न, नाम से

दिशानिर्देशों के उपाबंध 1 में तेरह प्रथाएँ नाम लेकर परिभाषित हैं। मिथ्या तात्कालिकता, जिसमें कम बचे होने का झूठा भाव पैदा किया जाता है। बास्केट स्नीकिंग, यानी चेकआउट पर बिना सहमति चीज़ें जुड़ जाना। कंफ़र्म शेमिंग। ज़बरन कार्रवाई। सदस्यता जाल, जिसमें रद्द करने का रास्ता उलझा या छिपा दिया जाता है। इंटरफ़ेस हस्तक्षेप। बेट एंड स्विच। ड्रिप प्राइसिंग। छद्म विज्ञापन। नैगिंग, यानी बार-बार टोकना। ट्रिक क्वेश्चन। सास बिलिंग। और रोग मालवेयर। उपाबंध की भूमिका साफ़ कहती है कि ये प्रथाएँ और दृष्टांत केवल मार्गदर्शन देते हैं, और इन्हें विधि का निर्वचन या बाध्यकारी राय नहीं माना जाएगा।

जो तेरह में नहीं है

इन तेरह में नक़ली तुलना-दाम नहीं है। सबसे पास वाली प्रथा ड्रिप प्राइसिंग है, और उसके चार अंग हैं: दाम के हिस्से शुरू में न बताना या चोरी-छिपे बताना; ख़रीद की पुष्टि के बाद चेकआउट पर बताए दाम से ज़्यादा वसूलना; किसी चीज़ को मुफ़्त बताकर यह न बताना कि इस्तेमाल जारी रखने के लिए ऐप के भीतर ख़रीद ज़रूरी है; और पहले से चुकाई जा चुकी सेवा को तब तक रोके रखना जब तक कुछ और न ख़रीदा जाए। जिस नंबर पर लकीर खिंची है, वह इन चारों में से किसी अंग में नहीं आता। पूर्व मूल्य की परिभाषा उसी ख़ाली जगह पर बैठती है।

बंडल शुल्क, यानी वह पैसा जो किसी और चीज़ के लिए कटता है

विज्ञप्ति कहती है कि मार्केटप्लेस इकाइयाँ मंच से असंबद्ध सेवाओं के लिए बंडल शुल्क नहीं वसूलेंगी, और वफ़ादारी या सदस्यता कार्यक्रमों के लिए एक निर्दिष्ट अपवाद रहेगा। 2020 की नियमावली में इस इलाक़े का नियम प्रकटीकरण का था, वसूली का नहीं। नियम 6(5)(ख) विक्रेता से माँगता है कि किसी वस्तु या सेवा का कुल दाम एक ही अंक में दिखे, साथ में उसका ब्योरा, जिसमें डिलीवरी शुल्क, डाक और हैंडलिंग, वाहन शुल्क और लागू कर जैसे सभी अनिवार्य और ऐच्छिक शुल्क अलग-अलग दिखें। नई बात रक़म रोकने की है। "असंबद्ध सेवा" की परिभाषा विज्ञप्ति में नहीं है, और यही वह जगह है जहाँ अपवाद और बंदिश की सीमा तय होगी।

आयातित सामान पर आयातक का नाम और मूल देश

एक तौलिये पर सिला लेबल, जिस पर पाँच भाषाओं में मूल देश दर्ज है, यह तस्वीर अक्टूबर 2015 की और मैड्रिड की है; भारत में यही ब्योरा 2020 से नियम 6(5) में माँगा जाता रहा है
तस्वीर: Benjamín Núñez González, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यह प्रावधान सूची में नया दिखता है, पर इसका बड़ा हिस्सा 2020 से लिखा हुआ है। नियम 6(5)(घ) मार्केटप्लेस के विक्रेता से माँगता है कि वह मूल देश सहित वे सभी प्रासंगिक ब्योरे दे जो उपभोक्ता को ख़रीद से पहले सूचित फ़ैसला लेने के लिए ज़रूरी हैं। उसी नियम का खंड (च) आयातक का नाम और ब्योरा तथा आयातित उत्पादों की असलियत की गारंटी माँगता है। नियम 4(6) ई-कॉमर्स इकाई पर यह कर्तव्य डालता है कि वह आयातित माल बेचते समय आयातक का नाम और ब्योरा बताए। जहाँ यह लिखा हुआ नहीं है, वह नियम 7 है, जो अपने ही स्टॉक से बेचने वाली इन्वेंटरी इकाइयों पर लागू होता है और जिसकी सूची में न मूल देश आता है, न आयातक।

खोज परिणाम और प्रायोजित लिस्टिंग

नियम 5(3)(च) पहले से माँगता है कि मार्केटप्लेस इकाई सादी और सुबोध भाषा में लिखा एक सार्वजनिक विवरण रखे, जिसमें बताया जाए कि उसके मंच पर वस्तुओं या विक्रेताओं की रैंकिंग तय करने में सबसे अहम कौन-से मानक हैं और उनका सापेक्ष महत्व क्या है। नियम 5(4) यह भी कहता है कि विक्रेताओं के साथ शर्तों में उस विभेदकारी बर्ताव का वर्णन हो जो इकाई एक ही श्रेणी के विक्रेताओं या वस्तुओं के बीच करती है या कर सकती है। 2026 का प्रावधान इस व्याख्या को निषेध में बदलता है: खोज परिणामों में ऐसी हेराफेरी नहीं होगी जो उपयोगकर्ता को गुमराह करे या प्रासंगिकता पर बुरा असर डाले। प्रायोजित लिस्टिंग की पहचान स्पष्ट और प्रमुख घोषणाओं से होगी, और यह उसी इलाक़े में है जिसे 2023 का उपाबंध छद्म विज्ञापन कहता है।

सहमति, और पहले से टिक लगे डिब्बे

नियम 4(9) 2020 से कहता है कि ख़रीद के लिए उपभोक्ता की सहमति तभी दर्ज होगी जब वह स्पष्ट और सकारात्मक कार्रवाई से व्यक्त हुई हो, और कोई इकाई ऐसी सहमति स्वतः दर्ज नहीं करेगी, जिसमें पहले से टिक लगे डिब्बे भी शामिल हैं। 2026 का प्रावधान दूसरी चीज़ पर है। वह कहता है कि मार्केटप्लेस इकाइयाँ स्पष्ट और सकारात्मक सहमति के बिना उपभोक्ता-संबंधी विवरण का निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगी। पहला वाक्य ख़रीद की सहमति का है, दूसरा ब्योरे के इस्तेमाल का।

बेस्ट-बिफ़ोर तारीख़, और वह सूची जिसमें वह नहीं थी

नियम 5(3)(ग) मार्केटप्लेस इकाई से जो सूचनाएँ माँगता है, वे ये हैं: वापसी, धन-वापसी, अदला-बदली, वारंटी और गारंटी, डिलीवरी और शिपमेंट, भुगतान के तरीक़े और शिकायत निवारण तंत्र। समाप्ति तिथि इस सूची में नहीं है। वह नियम 6(5)(ग) में है, जहाँ विक्रेता से कहा गया है कि बिक्री के लिए पेश वस्तु की समाप्ति तिथि, जहाँ लागू हो, बताए। 2026 की सूची बेस्ट-बिफ़ोर और यूज़-बिफ़ोर तारीख़ को मार्केटप्लेस इकाई के ब्योरों में ले आती है, यानी कर्तव्य विक्रेता से मंच की ओर खिसकता है।

नियम तोड़ने पर होता क्या है: सीसीपीए का रास्ता

2020 की नियमावली में सज़ा का अपना कोई प्रावधान नहीं है। नियम 8 पूरा एक वाक्य है: इन नियमों के किसी उल्लंघन पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के उपबंध लागू होंगे। अधिनियम की धारा 20 प्राधिकरण को जाँच के बाद यह अधिकार देती है कि वह ख़तरनाक या असुरक्षित वस्तुओं की वापसी, उनके दाम की प्रतिपूर्ति और अनुचित प्रथाओं को बंद कराने का आदेश दे, सुनवाई का मौक़ा देने के बाद। धारा 21(2) भ्रामक विज्ञापन पर निर्माता या समर्थक पर दस लाख रुपये तक का जुर्माना रखती है, और हर अगले उल्लंघन पर पचास लाख तक; धारा 21(4) प्रकाशक पर दस लाख तक। धारा 89 में सज़ा भी है: दो साल तक क़ैद और दस लाख तक जुर्माना, और अगले अपराध पर पाँच साल तथा पचास लाख तक।

सीसीपीए ने अब तक कितना जुर्माना लगाया

नई दिल्ली में संसद भवन; सीसीपीए के जुर्मानों का कुल जोड़ और 78 प्रविष्टियों वाला अनुबंध यहीं 4 फ़रवरी 2026 के लिखित उत्तर में आया
तस्वीर: डेविड कैसल, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

लोकसभा के अतारांकित प्रश्न 890 का उत्तर 4 फ़रवरी 2026 को राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा ने दिया। उसमें दर्ज है कि प्राधिकरण की स्थापना से 30 जनवरी 2026 तक, उपभोक्ताओं के वर्ग-हित की रक्षा में लगाए गए जुर्मानों की कुल रक़म 2 करोड़ 57 लाख 40 हज़ार 500 रुपये है। अनुबंध में 78 प्रविष्टियाँ हैं। सबसे बड़ी एक प्रविष्टि 11 लाख रुपये की है और सबसे छोटी 500 रुपये की। मंचों के नाम भी उसी सूची में हैं: अमेज़न सेलर सर्विसेज़, फ़्लिपकार्ट इंटरनेट, स्नैपडील और पेटीएम मॉल पर एक-एक लाख; ज़ेप्टो मार्केटप्लेस पर सात लाख; फ़र्स्टक्राई और फ़ार्मईज़ी पर दो-दो लाख; मीशो, मेटा इंडिया और वॉकी-टॉकी मामलों में फ़्लिपकार्ट तथा अमेज़न पर दस-दस लाख। धारा 21(7) जुर्माना तय करते समय प्रभावित आबादी और क्षेत्र, उल्लंघन की आवृत्ति और अवधि, और प्रभावित वर्ग की भेद्यता देखने को कहती है।

1986 का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, और 2019 में उसकी जगह क्या आया

अधिनियम 2019 की धारा 107(1) ने 1986 के अधिनियम को निरसित किया। 1986 के पाठ में जो नहीं मिलता, वह लंबी सूची है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण नहीं है; उसमें उपभोक्ता संरक्षण परिषदें हैं, जो सलाहकार निकाय हैं, नियामक नहीं। उत्पाद दायित्व नहीं है; 2019 का अध्याय 6, जो धारा 82 से शुरू होता है, दोषपूर्ण उत्पाद से हुए नुक़सान पर मुआवज़े का पूरा ढाँचा खड़ा करता है। मध्यस्थता नहीं है; 2019 का अध्याय 5 हर ज़िला और राज्य आयोग से जुड़ा मध्यस्थता प्रकोष्ठ बनवाता है। इलेक्ट्रॉनिक शब्द 1986 के पाठ में नहीं आता। और ज़िला मंच की अधिकारिता वहाँ बीस लाख रुपये तक थी, जबकि 2019 की धारा 34(1) एक करोड़ रुपये तक रखती है, इस परंतुक के साथ कि केंद्र सरकार चाहे तो कोई और मूल्य नियत कर सकती है।

ख़रीदार के शहर में मुक़दमा

1986 की धारा 11(2) में मुक़दमा दायर करने की तीन ही जगहें थीं: जहाँ विपक्षी रहता या कारोबार करता है या उसकी शाखा है; जहाँ कई विपक्षियों में से कोई एक ऐसा है, मंच की अनुमति से; और जहाँ वाद-हेतुक उत्पन्न हुआ। ख़रीदार का अपना शहर उन तीन में नहीं था। 2019 की धारा 34(2)(घ) चौथा आधार जोड़ती है: जहाँ शिकायतकर्ता रहता है या लाभ के लिए काम करता है। ऑनलाइन ख़रीद में, जहाँ विक्रेता किसी और राज्य में हो सकता है और मंच का मुख्यालय तीसरे में, यही खंड सबसे ज़्यादा काम आता है। धारा 35(1) का परंतुक शिकायत इलेक्ट्रॉनिक रूप में दायर करने देता है; 1986 की धारा 12(2) में यह विकल्प नहीं था। धारा 35(1)(घ) प्राधिकरण को ख़ुद शिकायत दायर करने की पात्रता देती है, जो 1986 में केंद्र या राज्य सरकार तक सीमित थी।

1 जनवरी 2027 तक क्या वैसा ही चलेगा

उस तारीख़ तक 2020 की नियमावली अपने मौजूदा रूप में चलेगी, उसी एक संशोधन के साथ जो 2021 में हुआ। पूर्व मूल्य की परिभाषा तब तक बाध्यकारी नहीं है, और नियम 4(7) में हेल्पलाइन से जुड़ने की शर्त "यथासंभव प्रयास" ही रहेगी। सालाना स्व-लेखापरीक्षा और अनुपालन प्रमाणपत्र का प्रदर्शन भी अभी देय नहीं है। जो चीज़ें इस तारीख़ का इंतज़ार नहीं कर रहीं, वे तीन हैं: 2023 के डार्क पैटर्न दिशानिर्देश, जो धारा 18 के तहत 30 नवंबर 2023 से लागू हैं; नियम 4(5) की 48 घंटे और एक महीने की घड़ी; और धारा 20 तथा 21 के तहत प्राधिकरण के अधिकार।

राजपत्र का पाठ अभी सामने नहीं

10 सितंबर की रात तक विभाग की अपनी वेबसाइट के "अधिनियम और नियम" पन्ने पर 2026 की संशोधन नियमावली नहीं चढ़ी थी। वहाँ ई-कॉमर्स से जुड़े तीन दस्तावेज़ हैं: 2020 की मूल नियमावली, 4 अगस्त 2020 का शुद्धिपत्र और 17 मई 2021 का संशोधन। इसका मतलब यह है कि नौ प्रावधानों में से हर एक किस नियम और किस उप-नियम में जुड़ रहा है, यह अभी मिलाकर नहीं देखा जा सकता। विभाग के पन्ने पर ई-कॉमर्स का सबसे नया दस्तावेज़ अब भी सा.का.नि. 328(अ), 17 मई 2021 है।

स्रोतपीआईबी दिल्ली, उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की विज्ञप्ति (आईडी 2308832), 10 सितंबर 2026, शाम 5:14, भारत का राजपत्र, असाधारण, सा.का.नि. 462(अ), उपभोक्ता संरक्षण (ई-वाणिज्य) नियम, 2020, 23 जुलाई 2020, भारत का राजपत्र, शुद्धिपत्र सा.का.नि. 488(अ), 4 अगस्त 2020, भारत का राजपत्र, सा.का.नि. 328(अ), उपभोक्ता संरक्षण (ई-वाणिज्य) संशोधन नियम, 2021, 17 मई 2021, भारत का राजपत्र, फा.सं. सीसीपीए-1/1/2023-सीसीपीए(पंजी.), डार्क पैटर्न की रोकथाम और विनियमन के लिए दिशानिर्देश, 2023, 30 नवंबर 2023, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (2019 का 35), राजपत्र पाठ, उपभोक्ता मामले विभाग, लोकसभा अतारांकित प्रश्न संख्या 890, उत्तर 4 फ़रवरी 2026, राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा, सीसीपीए के जुर्मानों का अनुबंध, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का पाठ, उपभोक्ता मामले विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार

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