उपभोक्ता हेल्पलाइन पंद्रह महीनों में 105 करोड़ रुपये वापस दिला चुकी है, पर वह किसी कंपनी को रिफंड का आदेश नहीं दे सकती
राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन ने 35 क्षेत्रों की 1,66,189 रिफंड शिकायतें मुक़दमा-पूर्व चरण में निपटाईं। औसत रिफंड लगभग 6,318 रुपये का बैठता है। यह पूरा रास्ता कंपनियों की स्वैच्छिक भागीदारी पर टिका है, और आदेश देने की शक्ति सिर्फ़ उपभोक्ता आयोग के पास है।

सबसे छोटा रिफंड एक रुपये का था और सबसे बड़ा 35,83,790 रुपये का। यह फ़ासला उपभोक्ता मामले विभाग की उस विज्ञप्ति में दर्ज है जो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के मई से जुलाई 2026 तक के ई-कॉमर्स रिकॉर्ड का ब्योरा देती है। पंद्रह महीने की पूरी अवधि में हेल्पलाइन ने 35 क्षेत्रों की 1,66,189 रिफंड शिकायतें निपटाईं और उपभोक्ताओं को 105 करोड़ रुपये से ज़्यादा वापस दिलाए। यह सारा पैसा मुक़दमा-पूर्व चरण में लौटा, यानी किसी उपभोक्ता आयोग में गए बिना।
जिस बात का ज़िक्र विज्ञप्ति में कहीं नहीं है, वह यह है कि इस पूरे रास्ते पर किसी को आदेश देने की शक्ति हासिल नहीं है।
हेल्पलाइन कंपनी को आदेश नहीं दे सकती
विभाग इसे समन्वय-आधारित व्यवस्था कहता है। शिकायत मिलने पर वह उसे डिजिटल माध्यम से संबंधित कंपनी को भेजती है, तय समय-सीमा के भीतर समाधान की अपेक्षा करती है, और फिर उपभोक्ता की प्रतिक्रिया पर नज़र रखती है। कंपनियाँ इस कन्वर्जेंस कार्यक्रम में अपनी मर्ज़ी से जुड़ती हैं; विभाग की नवंबर 2024 की विज्ञप्ति में इसे स्वैच्छिक भागीदारी कहा गया है और कंपनी के लिए बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस का अवसर बताया गया है। उसी विज्ञप्ति की अगली पंक्ति साफ़ है: शिकायत हल न हो, तो उपभोक्ता को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत उपयुक्त उपभोक्ता आयोग जाना चाहिए। ब्याज, हर्जाना या जुर्माना तय करने का अधिकार आयोग के पास है, हेल्पलाइन के पास नहीं।
हेल्पलाइन तक पहुँचने के रास्ते
विभाग की विज्ञप्तियों में जो माध्यम गिनाए गए हैं, वे ये हैं:
- टोल-फ़्री नंबर 1915
- व्हाट्सएप और एसएमएस के लिए 8800001915
- आईएनजीआरएएम पोर्टल, पूरा नाम इंटीग्रेटेड ग्रीवांस रिड्रेसल मैकेनिज़्म
- ईमेल [email protected]
- एनसीएच मोबाइल ऐप
- वेब पोर्टल consumerhelpline.gov.in
- उमंग ऐप
फ़रवरी 2025 में राज्यसभा को दिए गए लिखित उत्तर में इन्हीं माध्यमों की सूची दोहराई गई थी और आईएनजीआरएएम को ऑम्नी-चैनल, आईटी-आधारित केंद्रीय पोर्टल कहा गया था। हर दर्ज शिकायत को विभाग की अपनी भाषा में डॉकेट कहते हैं, और महीने भर की गिनती इसी शब्द में होती है।
आठ बजे से आठ बजे तक, सातों दिन

सुबह आठ से रात आठ बजे तक हेल्पलाइन चलती है, हफ़्ते के सातों दिन, राष्ट्रीय अवकाश छोड़कर। यह ब्योरा 4 फ़रवरी 2025 को राज्यसभा में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा के लिखित उत्तर में दर्ज है। उसी उत्तर में लिखा है कि कॉल-बैक की सुविधा भी रखी गई है और इसके लिए अलग कॉल सेंटर बनाया गया है। सत्रह भाषाओं में शिकायत ली जाती है: हिंदी, अंग्रेज़ी, कश्मीरी, पंजाबी, नेपाली, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मैथिली, संताली, बांग्ला, ओड़िया, असमिया और मणिपुरी।
काग़ज़ों की सूची किसी विज्ञप्ति में नहीं मिलती
शिकायत दर्ज कराने वाले के पास क्या-क्या होना चाहिए, यह विभाग की किसी विज्ञप्ति में नहीं लिखा। ऑर्डर संख्या, भुगतान का प्रमाण, कंपनी को पहले भेजी गई शिकायत का संदर्भ: इनमें से किसी को भी सरकारी दस्तावेज़ में अनिवार्य नहीं बताया गया है, और यह चुप्पी अपने आप में एक जानकारी है। जो बात दस्तावेज़ में है, वह यह कि शिकायत आगे उसी कंपनी को जाती है जिसके ख़िलाफ़ की गई है। अर्थ सीधा है: कंपनी अपने रिकॉर्ड में जिस संख्या से आपका सौदा पहचानती है, वही संख्या शिकायत को पहचान देगी।
पंद्रह महीने का हिसाब, दिन के हिसाब से
25 अप्रैल 2025 से 31 जुलाई 2026 तक 463 दिन बनते हैं। इस अवधि में 1,66,189 रिफंड शिकायतें निपटीं, यानी औसतन रोज़ 359। पैसे के हिसाब से देखें तो 105 करोड़ रुपये इन्हीं दिनों में बाँटने पर रोज़ाना लगभग 22 लाख 70 हज़ार रुपये बैठते हैं। विभाग ने इसे पंद्रह महीने की अवधि कहा है; कैलेंडर पर यह पंद्रह महीने और छह दिन है। ये औसत हैं और शिकायतें महीने-दर-महीने बराबर नहीं आतीं, पर विज्ञप्ति के आँकड़ों से जो पैमाना निकाला जा सकता है, वह यही है।
औसत रिफंड छह हज़ार रुपये के आसपास
105 करोड़ रुपये को 1,66,189 शिकायतों पर बाँटें तो प्रति शिकायत लगभग 6,318 रुपये आते हैं। ई-कॉमर्स में यह औसत ऊपर है: 74 करोड़ रुपये और 1,00,466 शिकायतें, यानी लगभग 7,366 रुपये प्रति शिकायत। बाक़ी 34 क्षेत्रों को मिलाकर 31 करोड़ रुपये और 65,723 शिकायतें बचती हैं, जिनका औसत लगभग 4,717 रुपये है। विज्ञप्ति में दोनों रक़में "से अधिक" लिखी हैं, इसलिए ये औसत न्यूनतम हैं और असली आँकड़ा इनसे थोड़ा ऊपर होगा। जो तस्वीर बनती है वह बड़े मुक़दमों की नहीं, हज़ार-दो हज़ार रुपये की रोज़मर्रा शिकायतों की है।
ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी दो तरह से
शिकायतों की गिनती में ई-कॉमर्स का हिस्सा 60.45 फ़ीसदी है, और पैसे की गिनती में 70.48 फ़ीसदी। दस अंकों का यह अंतर बताता है कि ऑनलाइन ख़रीद में अटकी रक़म बाक़ी क्षेत्रों से बड़ी होती है। दूसरे नंबर पर यात्रा एवं पर्यटन है, जहाँ 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा वापस दिलाए गए, पर विज्ञप्ति वहाँ की शिकायतों की संख्या नहीं देती, इसलिए औसत निकाला नहीं जा सकता। कुल 35 क्षेत्रों की बात है और नाम सिर्फ़ दो के दिए गए हैं; बाक़ी 33 में कितनी शिकायतें और कितना पैसा, यह सार्वजनिक नहीं है।
बेंगलुरु का फ़ोन, पूंछ के जूते

विभाग ने चार मामलों का ब्योरा दिया है। बेंगलुरु शहरी में एक उपभोक्ता ने 47,490 रुपये का मोबाइल फ़ोन मँगाया, डिलीवरी की तारीख़ बार-बार आगे खिसकती रही, और हेल्पलाइन के हस्तक्षेप के बाद पूरी रक़म लौटी। आंध्र प्रदेश के एनटीआर ज़िले में 2.5 इंच का हार्ड ड्राइव एनक्लोज़र मँगाया गया था, आया दूसरा मॉडल, जो उपभोक्ता के उपकरण से मेल ही नहीं खाता था। असम के उदलगुड़ी में दोपहिया वाहन की बुकिंग रद्द होने के बाद 5,000 रुपये अटके थे; उपभोक्ता ने 21 मई 2026 को हेल्पलाइन से संपर्क किया और डीलर ने पैसा लौटाकर खाते में जमा होने की पुष्टि दी। जम्मू-कश्मीर के पूंछ में 3,072 रुपये के खेल के जूते मँगाए गए, पहुँचा दूसरा ब्रांड, और वापसी के अनुरोध बार-बार रद्द होने के बाद 29 जून 2026 को शिकायत दर्ज हुई।
एक मिसाल जो गिनती की अवधि से बाहर है
बेंगलुरु वाले उपभोक्ता ने फ़ोन 21 अगस्त 2026 को मँगाया था और डिलीवरी 22 अगस्त को तय थी। जिस अवधि के आँकड़े विज्ञप्ति की सुर्ख़ी में हैं, वह 31 जुलाई 2026 को बंद हो चुकी थी।
यानी विभाग ने जिन चार मामलों को इस उपलब्धि की मिसाल बनाकर पेश किया, उनमें से एक उस गिनती में शामिल ही नहीं हो सकता। बाक़ी तीन में से दो की तारीख़ें अवधि के भीतर हैं, और एनटीआर ज़िले वाले मामले में कोई तारीख़ नहीं दी गई। यह छोटी-सी गड़बड़ी बताती है कि उदाहरण और आँकड़े दो अलग फ़ाइलों से आए हैं।
कितनी शिकायतें आईं, यह विज्ञप्ति में नहीं है
विज्ञप्ति सिर्फ़ निपटी हुई शिकायतें गिनाती है। कुल कितनी रिफंड शिकायतें इन पंद्रह महीनों में आईं, यह आँकड़ा उसमें नहीं है, और उसके बिना निपटारे की दर निकाली नहीं जा सकती। तुलना के लिए जो अकेला सरकारी आँकड़ा मिलता है वह फ़रवरी 2025 के राज्यसभा उत्तर की तालिका है: 2022-23 में हर महीने औसतन 83,832 डॉकेट, 2023-24 में 1,02,976, और अप्रैल से दिसंबर 2024-25 में 1,13,551। ये सभी शिकायतें हैं, सिर्फ़ रिफंड वाली नहीं, और अवधि भी पहले की है। इसके बावजूद पैमाना समझ आता है: महीने में लाख से ऊपर डॉकेट दर्ज होते हैं, और रिफंड के मामले में रोज़ 359 का निपटारा हुआ।
कन्वर्जेंस की गिनती: 263 से 1,038 तक
कन्वर्जेंस कार्यक्रम में शामिल कंपनियों की संख्या 2017 में 263 थी। नवंबर 2024 की विज्ञप्ति में यह 1,009 बताई गई और फ़रवरी 2025 के राज्यसभा उत्तर में 1,038। इन कंपनियों के क्षेत्र भी गिनाए गए हैं: ई-कॉमर्स, यात्रा एवं पर्यटन, निजी शिक्षा, एफ़एमसीजी, कंज़्यूमर ड्यूरेबल्स, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, ख़ुदरा दुकानें, ऑटोमोबाइल, डीटीएच और केबल सेवाएँ, तथा बैंकिंग। इन कंपनियों से जुड़ी शिकायतें सीधे उन्हीं को ऑनलाइन समाधान के लिए भेज दी जाती हैं। जो कंपनी सूची में नहीं, उसके लिए ऐसा कोई तयशुदा रास्ता विज्ञप्ति में नहीं बताया गया।
जो कंपनी इस सूची में नहीं है
नवंबर 2024 में विभाग ने उन दस कंपनियों की पहचान की थी जो कन्वर्जेंस में शामिल नहीं थीं और जिनके ख़िलाफ़ उस वित्त वर्ष में सबसे ज़्यादा शिकायतें आई थीं। विज्ञप्ति में नाम इस क्रम में हैं: डेल्हीवरी लिमिटेड, इलेक्ट्रॉनिक्सकॉम्प डॉट कॉम, डॉमिनोज़ पिज़्ज़ा, हायर अप्लायंसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, फ़र्स्टक्राई डॉट कॉम, थॉमसन इंडिया, महिंद्रा एंड महिंद्रा, रैपिडो, ओरिएंट इलेक्ट्रिक लिमिटेड और सिम्फ़नी लिमिटेड। विभाग ने इन्हें बैठक के लिए बुलाया था ताकि इन्हें कन्वर्जेंस साझेदार बनाया जा सके। इसके बाद इनमें से कौन शामिल हुआ, इसकी कोई सूची विभाग ने प्रकाशित नहीं की।
भाषा, व्हाट्सएप और मशीन
व्हाट्सएप से दर्ज होने वाली शिकायतों का हिस्सा मार्च 2023 में 3 फ़ीसदी था, जो दिसंबर 2024 में 18 फ़ीसदी हो गया। कॉल की गिनती इससे भी तेज़ बढ़ी: दिसंबर 2015 में 12,553, दिसंबर 2024 में 1,55,138। एनसीएच 2.0 के नाम से विभाग ने एआई-आधारित स्पीच रिकग्निशन, अनुवाद प्रणाली और चैटबॉट जोड़े हैं, जिनका मक़सद यह है कि उपभोक्ता अपनी भाषा में बोलकर शिकायत दर्ज करा सके। नवंबर 2024 की विज्ञप्ति में ये तीनों "प्रक्रिया में" बताए गए थे और फ़रवरी 2025 के उत्तर में इन्हें शुरू किया जा चुका बताया गया।
अगला दरवाज़ा: 678 ज़िला आयोग

हेल्पलाइन से बात न बने तो अगला मंच उपभोक्ता आयोग है। आयोग की अपनी वेबसाइट के मुताबिक़ देश में 678 ज़िला आयोग और 35 राज्य आयोग हैं, और सबसे ऊपर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग। ज़िला आयोग की अध्यक्षता ज़िला न्यायाधीश स्तर के अधिकारी करते हैं, राज्य आयोग की उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, और राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, या किसी उच्च न्यायालय के मौजूदा या सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के पास होती है। आदेश यहीं से निकलता है, और कंपनी पर बाध्यकारी होता है।
ऑनलाइन दाख़िल करने का हक़ अधिनियम में है
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 35(1) के परंतुक में लिखा है कि शिकायत इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी दाख़िल की जा सकती है, जिस तरीक़े से विहित हो। धारा 35(2) कहती है कि हर शिकायत के साथ विहित शुल्क लगेगा, और वह इलेक्ट्रॉनिक रूप में भी देय हो सकता है। शुल्क की दर अधिनियम में नहीं, नियमों में तय होती है। आयोग की वेबसाइट पर "ऑनलाइन फ़ाइलिंग" का लिंक अब e-jagriti.gov.in पर जाता है, और उसी पन्ने पर संबंधित लिंक की सूची में भी यही पता दिया गया है।
रक़म की सीमा पर आँकड़े आपस में नहीं मिलते
अधिनियम के राजपत्र पाठ की धारा 34(1) ज़िला आयोग को उन शिकायतों का अधिकार देती है जिनमें प्रतिफल के रूप में चुकाई गई रक़म एक करोड़ रुपये से ज़्यादा न हो; धारा 47(1)(क)(i) राज्य आयोग को एक करोड़ से दस करोड़ तक; धारा 58(1)(क)(i) राष्ट्रीय आयोग को दस करोड़ से ऊपर। तीनों धाराओं में जुड़ा परंतुक केंद्र सरकार को दूसरी रक़म विहित करने की छूट देता है। राष्ट्रीय आयोग की वेबसाइट का संरचना वाला पन्ना मौजूदा सीमाएँ इससे अलग बताता है: ज़िला आयोग में पचास लाख रुपये तक, राज्य आयोग में पचास लाख एक रुपये से दो करोड़ तक, और राष्ट्रीय आयोग में दो करोड़ से ऊपर। उसी वेबसाइट का मुख्य पन्ना तीसरी बात कहता है, कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 21 के तहत राष्ट्रीय आयोग दो करोड़ से ऊपर की शिकायत सुनता है, जबकि 2019 के अधिनियम की धारा 107(1) में लिखा है कि 1986 का अधिनियम एतद्द्वारा निरसित किया जाता है।
दो साल की दीवार
धारा 69(1) साफ़ है: ज़िला, राज्य या राष्ट्रीय आयोग किसी शिकायत को तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक वह वाद-हेतुक उत्पन्न होने की तारीख़ से दो साल के भीतर दाख़िल न हो। वाद-हेतुक यानी वह घटना जिससे शिकायत पैदा हुई, न कि वह दिन जब आपने आख़िरी बार कंपनी को याद दिलाया। धारा 69(2) इसमें एक झरोखा छोड़ती है: देर का पर्याप्त कारण बताने पर शिकायत बाद में भी सुनी जा सकती है, बशर्ते आयोग देर माफ़ करने के कारण लिखित में दर्ज करे। यह छूट अपने आप नहीं मिलती, माँगनी पड़ती है।
इक्कीस दिन में फ़ैसला न हो तो शिकायत मंज़ूर मानी जाएगी
धारा 36(2) के दूसरे परंतुक में लिखा है कि शिकायत ग्राह्य है या नहीं, यह सामान्यतः दाख़िल होने की तारीख़ से इक्कीस दिन के भीतर तय किया जाएगा। इसके ठीक बाद धारा 36(3) वह बात कहती है जो कम लोगों को पता है: अगर आयोग इस अवधि में ग्राह्यता का सवाल तय नहीं करता, तो शिकायत स्वीकृत मान ली जाएगी। पहले परंतुक में एक और सुरक्षा है, कि शिकायतकर्ता को सुने बिना शिकायत ख़ारिज नहीं की जा सकती। ये तीनों प्रावधान एक ही उपधारा में साथ-साथ बैठे हैं।
तीन महीने, और जाँच वाले मामलों में पाँच
मंज़ूरी के बाद धारा 38(2)(क) आयोग को इक्कीस दिन में शिकायत की प्रति विपक्षी को भेजने और पक्ष रखने के लिए तीस दिन देने को कहती है, जिसे अधिकतम पंद्रह दिन बढ़ाया जा सकता है। धारा 38(7) निपटारे की समय-सीमा तय करती है: विपक्षी को नोटिस मिलने की तारीख़ से तीन महीने, और अगर वस्तु की जाँच या परीक्षण ज़रूरी हो तो पाँच महीने। उसी उपधारा में लिखा है कि देर होने पर आयोग को निपटारे के वक़्त उसका कारण लिखित में दर्ज करना होगा, और स्थगन तभी मिलेगा जब पर्याप्त कारण लिखकर दिखाया जाए।
उपभोक्ता कौन है, और कौन नहीं
अधिनियम की धारा 2(7) में उपभोक्ता की परिभाषा से वह व्यक्ति बाहर है जो सामान पुनर्विक्रय के लिए या किसी वाणिज्यिक प्रयोजन से लेता है। परिभाषा के स्पष्टीकरण (क) में एक ज़रूरी छूट है: अगर कोई व्यक्ति सामान ख़रीदकर उसका इस्तेमाल केवल स्वरोज़गार से आजीविका कमाने के लिए करता है, तो वह वाणिज्यिक प्रयोजन नहीं माना जाएगा। स्पष्टीकरण (ख) ख़रीद के दायरे में ऑफ़लाइन और ऑनलाइन, दोनों तरह के इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन, टेलीशॉपिंग, प्रत्यक्ष बिक्री और मल्टी-लेवल मार्केटिंग को रखता है। सिलाई मशीन ख़रीदने वाली दर्ज़ी उपभोक्ता है, थोक में माल उठाकर आगे बेचने वाला नहीं।
बीमा की शिकायत इस रास्ते से नहीं जाती
बीमा लोकपाल परिषद की वेबसाइट के मुताबिक़ बीमा लोकपाल की व्यवस्था बीमा लोकपाल नियम 2017 से चलती है और वहाँ माँगा गया मुआवज़ा पचास लाख रुपये से ऊपर नहीं हो सकता। शर्त यह भी है कि पहले बीमा कंपनी या ब्रोकर के पास औपचारिक शिकायत दर्ज हो और वह एक महीने में जवाब न दे। लोकपाल के पास जाने की समय-सीमा एक साल है, जो शिकायत ख़ारिज होने की तारीख़ से गिनी जाती है, या जवाब न आने पर उस एक महीने के पूरा होने से। यह रास्ता उपभोक्ता आयोग से अलग है और इसकी अपनी शर्तें हैं।
बैंक की शिकायत के लिए अलग लोकपाल
भारतीय रिज़र्व बैंक के शिकायत वाले पन्ने पर योजना का नाम रिज़र्व बैंक इंटीग्रेटेड ओम्बड्समैन स्कीम दिया गया है, जिसमें 5 अगस्त 2022 के संशोधन शामिल हैं। बैंक की विनियमित इकाइयों के ख़िलाफ़ शिकायत cms.rbi.org.in पर दर्ज होती है। ख़ुद रिज़र्व बैंक के विभागों से जुड़ी शिकायत के लिए अलग ईमेल पता [email protected] दिया गया है। इसी पन्ने पर शिकायत से पहले बैंक को कितने दिन देने हैं, यह नहीं लिखा; वह शर्त योजना के पूरे दस्तावेज़ में देखनी होगी।
जहाँ यह रास्ता ख़त्म होता है
नवंबर 2024 की विज्ञप्ति का एक वाक्य पूरी व्यवस्था की हद बता देता है: शिकायत मिलने के बाद हेल्पलाइन उसे संबंधित कंपनियों, नियामकों या सरकारी विभागों को समाधान के लिए भेज देती है। यानी जिस क्षेत्र का अपना नियामक है, वहाँ हेल्पलाइन डाकघर है, फ़ैसला करने वाली जगह नहीं। जो कंपनी कन्वर्जेंस कार्यक्रम में शामिल नहीं, उसके लिए कोई तयशुदा चैनल दस्तावेज़ों में दिखता नहीं। और जहाँ कंपनी जवाब देने से इनकार कर दे, वहाँ 105 करोड़ रुपये वाली इस पूरी मशीनरी के पास एक भी ऐसा औज़ार नहीं जो उसे मजबूर कर सके।
एक ही विज्ञप्ति में दो अलग औसत
फ़रवरी 2025 का राज्यसभा उत्तर अपने पाठ में कहता है कि प्रति माह दर्ज शिकायतों का औसत 2017 के 37,062 से बढ़कर 2024 में 1,12,468 हो गया। उसी उत्तर के साथ लगी तालिका दूसरी बात कहती है: 2023-24 का मासिक औसत 1,02,976 और अप्रैल से दिसंबर 2024-25 का 1,13,551। पाठ में दिया गया 1,12,468 का आँकड़ा तालिका की किसी भी पंक्ति से मेल नहीं खाता, और उत्तर में यह नहीं बताया गया कि वह किस अवधि का है।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, उपभोक्ता मामले विभाग की विज्ञप्ति, 9 सितंबर 2026, पत्र सूचना कार्यालय, राज्यसभा में राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा का लिखित उत्तर, 4 फ़रवरी 2025, पत्र सूचना कार्यालय, उपभोक्ता मामले विभाग, कन्वर्जेंस कार्यक्रम पर विज्ञप्ति, 24 नवंबर 2024, पीआरएस पर उपलब्ध उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 का राजपत्र पाठ, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की वेबसाइट, आयोगों की संरचना वाला पन्ना, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग का मुख्य पन्ना, ऑनलाइन फ़ाइलिंग लिंक सहित, बीमा लोकपाल परिषद की वेबसाइट, शिकायत की पात्रता वाला पन्ना, भारतीय रिज़र्व बैंक, शिकायत दर्ज कराने से जुड़ा पन्ना