भारत पन्ना
पैसा

उर्वरक सब्सिडी किसान के खाते में नहीं जाती, वह कंपनी को जाती है

यूरिया की 45 किलो की बोरी पर किसान 242 रुपये देता है। सरकार के अपने हिसाब से वह बोरी लगभग 2,200 रुपये की पड़ती है। बाक़ी रक़म कंपनी को मिलती है, और किसान को उसका आँकड़ा कभी नहीं बताया जाता।

उर्वरक सब्सिडी किसान के खाते में नहीं जाती, वह कंपनी को जाती है

खेत में यूरिया की एक बोरी डालने वाला किसान उस बोरी के 242 रुपये देता है। यह क़ीमत सरकार ने तय की है और 1 मार्च 2018 से नहीं बदली।

सरकार के अपने आकलन के मुताबिक़ वही बोरी लगभग 2,200 रुपये की पड़ती है।

बीच का अंतर लगभग 1,958 रुपये का है, और वह सरकार भरती है।

अब वह बात जो इस पूरी व्यवस्था को समझने के लिए ज़रूरी है। वे 1,958 रुपये किसान के खाते में नहीं आते। वे उर्वरक बनाने वाली कंपनी को जाते हैं।

सरकार ने संसद में यही कहा है

यह हमारा निष्कर्ष नहीं है, सरकार का अपना वाक्य है।

25 जुलाई 2025 को लोकसभा में दिए गए उत्तर में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने लिखा कि उर्वरक डीबीटी व्यवस्था के तहत विभिन्न ग्रेड के उर्वरकों पर सौ फ़ीसदी सब्सिडी उर्वरक कंपनियों को जारी की जाती है, और यह हर दुकान पर लगी पीओएस मशीन से आधार प्रमाणन के आधार पर होने वाली असली बिक्री पर तय होती है।

यही बात नवंबर 2024 के उत्तर में भी है।

तो दुकान पर लगी वह मशीन किसान का लाभ गिनने की मशीन नहीं है। वह कंपनी के दावे की पुष्टि करने की मशीन है।

और उसी उत्तर का दूसरा वाक्य

उसी 25 जुलाई वाले उत्तर में एक और पंक्ति है, जो लगभग कहीं नहीं छपी।

उसमें लिखा है कि उर्वरक की बिक्री "नो डिनायल" आधार पर होती है, क्योंकि इसमें कोई तय लाभार्थी है ही नहीं। आधार से प्रमाणित कोई भी व्यक्ति उर्वरक ख़रीद सकता है।

यानी यह योजना किसानों के लिए लक्षित नहीं है। छोटे किसानों के लिए भी नहीं। किसी के लिए भी नहीं।

एक हद है, और वह हद बड़ी है

पीओएस व्यवस्था में गड़बड़ी रोकने के लिए एक सीमा तय है। एक ख़रीदार महीने में 50 बोरी और पूरे सीज़न में 300 बोरी तक ले सकता है।

300 बोरी यानी साढ़े तेरह टन यूरिया।

काउंटर पर उसके 72,600 रुपये चुकाने होंगे। उन बोरियों पर सरकारी सब्सिडी चार से छह लाख रुपये के बीच बैठती है।

यह सीमा एक आधार नंबर पर, एक सीज़न में है।

शीर्षक में किसान, ब्योरे में ख़रीदार

30 अगस्त की विज्ञप्ति में एक छोटी चीज़ ध्यान खींचती है।

अंग्रेज़ी शीर्षक में लिखा है 14 करोड़ आधार से जुड़े "बायर्स", यानी ख़रीदार। हिंदी शीर्षक में वही संख्या "किसान" के साथ छपी है।

हिंदी विज्ञप्ति के भीतर का पाठ ख़ुद "खरीदार" लिखता है। सिर्फ़ शीर्षक में वह किसान बन जाता है।

ऊपर वाला वाक्य याद रखिए कि योजना में कोई तय लाभार्थी नहीं है। ऐसे में हर ख़रीदार को किसान कह देना आँकड़े को वह अर्थ दे देता है जो उसमें है नहीं।

आत्मनिर्भरता वाले साल में आयात ढाई गुना हुआ

अब बजट के काग़ज़ों की बात।

2025-26 वह साल था जिसमें भारत को यूरिया में आत्मनिर्भर हो जाना था।

उसी साल आयातित यूरिया के लिए रखी गई रक़म बजट अनुमान में 21,000 करोड़ रुपये थी। संशोधित अनुमान में वह 51,972 करोड़ हो गई, यानी ढाई गुना से ज़्यादा।

और इसी दौरान देश में बने यूरिया के लिए किया गया भुगतान घटा।

तीन साल तक गिरने के बाद कुल उर्वरक सब्सिडी इसी वजह से फिर बढ़कर संशोधित अनुमान में 1.86 लाख करोड़ रुपये पर पहुँच गई।

एक ब्योरा और, जो इस पूरी कहानी में छेद करता है। जुलाई 2025 वाले उत्तर में लिखा है कि पीओएस के ज़रिए असली बिक्री पर सब्सिडी देने की व्यवस्था आयातित यूरिया पर लागू नहीं होती। 2024-25 में आयातित यूरिया की सब्सिडी 21,000 करोड़ रुपये थी।

यानी इतनी बड़ी रक़म उसी तर्क से बाहर दी जाती है जिस तर्क पर पूरी डिजिटल व्यवस्था टिकी हुई है।

और वह बचत वाला आँकड़ा

एक आँकड़ा इन दिनों हर जगह दोहराया जा रहा है, कि डीबीटी से देश ने 3.48 लाख करोड़ रुपये बचाए।

यह आँकड़ा आर्थिक सर्वेक्षण में भी दर्ज है। उसके फ़ुटनोट का पीछा करने पर एक सरकारी विज्ञप्ति मिलती है, और वह विज्ञप्ति इस अनुमान का श्रेय एक निजी संस्था को देती है।

यानी यह सरकारी ऑडिट का निकाला हुआ आँकड़ा नहीं है।

उस अनुमान के भीतर उर्वरक वाला हिस्सा और दिलचस्प है। उसमें उर्वरक की बिक्री में आई गिरावट को बचत मान लिया गया है।

बिक्री घटना और चोरी रुकना, दोनों एक बात नहीं हैं। कम बिक्री का मतलब यह भी हो सकता है कि किसान ने कम खाद डाली।

स्रोतउर्वरक विभाग, विज्ञप्ति, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, लोकसभा उत्तर, 25 जुलाई 2025, केंद्रीय बजट, सब्सिडी विवरण

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।