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चार कंपनियों ने भाव तय किए, और सबूत उनकी अपनी बैठक के कार्यवृत्त और ईमेल निकले

प्रतिस्पर्धा आयोग ने ट्रस्टीज़ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया और तीन ट्रस्टीशिप कंपनियों को डिबेंचर सेवाओं का बेंचमार्क भाव तय करते पाया। कुछ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराए गए हैं।

चार कंपनियों ने भाव तय किए, और सबूत उनकी अपनी बैठक के कार्यवृत्त और ईमेल निकले

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने ट्रस्टीज़ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया और तीन कंपनियों को प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण से रुकने और दूर रहने का निर्देश दिया है।

तीनों कंपनियाँ डिबेंचर ट्रस्टीशिप का काम करती हैं। आईडीबीआई ट्रस्टीशिप सर्विसेज़, एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज़ और एसबीआईकैप ट्रस्टी कंपनी।

आयोग ने पाया कि इन्होंने 2020-21 और 2021-22 की अवधि में डिबेंचर ट्रस्टीशिप सेवाएँ देने के लिए एक बेंचमार्क भाव तय किया था।

सबूत क्या था, यह विज्ञप्ति में लिखा है। ट्रस्टीज़ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की बैठक के कार्यवृत्त, और कुछ ईमेल का आदान-प्रदान।

पहले यह समझिए कि काम क्या है

डिबेंचर वह काग़ज़ है जिससे कोई कंपनी बाज़ार से क़र्ज़ उठाती है। निवेशक पैसा देता है और कंपनी ब्याज सहित लौटाने का वादा करती है।

निवेशक सैकड़ों या हज़ारों हो सकते हैं। वे सब मिलकर कंपनी पर नज़र नहीं रख सकते।

इसलिए बीच में एक डिबेंचर ट्रस्टी रखा जाता है। उसका काम निवेशकों की तरफ़ से देखना है कि कंपनी शर्तें निभा रही है या नहीं, गिरवी रखी संपत्ति सुरक्षित है या नहीं, और चूक होने पर क़दम उठाना।

यानी यह भरोसे का काम है, और यह उन लोगों के लिए किया जाता है जो ख़ुद मौजूद नहीं होते।

इसी सेवा का भाव तय किया गया।

मुंबई में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की इमारत, जहाँ से डिबेंचर जैसे काग़ज़ों का कारोबार चलता है
तस्वीर: नियंत शेखर, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

कार्टेल का मतलब

कार्टेल तब बनता है जब वे कंपनियाँ जिन्हें आपस में मुक़ाबला करना चाहिए, मुक़ाबला न करने पर सहमत हो जाएँ।

यह कई तरह से होता है। भाव तय कर लेना। उत्पादन घटा-बढ़ाकर तय कर लेना। बाज़ार आपस में बाँट लेना। या निविदाओं में तय कर लेना कि इस बार कौन जीतेगा।

नुक़सान सीधा है। ख़रीदार के पास चुनने को कुछ नहीं बचता, क्योंकि जिनके बीच चुनना है वे पहले ही आपस में तय कर चुके हैं।

आयोग ने इस मामले में प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3(1) के साथ धारा 3(3) के दो खंडों का उल्लंघन पाया।

⚠ इस लेख के लिए हम अधिनियम का मूल पाठ नहीं खोल सके, इसलिए इन धाराओं की शब्दावली यहाँ नहीं दी जा रही। जो दिया जा रहा है वह आयोग की विज्ञप्ति का अपना विवरण है, कि यह भाव तय करने का मामला है।

और वह हिस्सा जो कंपनियों से आगे जाता है

आयोग ने अधिनियम की धारा 48 के तहत एसोसिएशन और तीनों कंपनियों के कुछ अधिकारियों को भी दोषी पाया।

यह धारा उन लोगों पर लागू होती है जो उल्लंघन के समय कंपनी के कामकाज के लिए ज़िम्मेदार थे।

इसका मतलब यह है कि ज़िम्मेदारी सिर्फ़ कंपनी के नाम पर नहीं रुकती। वह उन तक जाती है जिन्होंने बैठक में बैठकर तय किया।

आदेश केस संख्या 29/2021 में पारित हुआ है और उसकी प्रति आयोग की वेबसाइट पर है।

एसोसिएशन वाली बात

इस मामले की सबसे पढ़ने लायक़ बात यह है कि सबूत कहाँ से आया।

व्यापार संघ का काम अपने आप में जायज़ है। सदस्य मिलते हैं, साझा दिक़्क़तों पर बात करते हैं, नियामकों से बात करते हैं, मानक बनाते हैं।

पर वही मेज़ जहाँ यह सब होता है, वह मेज़ भी है जहाँ प्रतिस्पर्धी एक साथ बैठे होते हैं।

और संघ की बैठक का कार्यवृत्त लिखा जाता है। ईमेल भेजे जाते हैं और सहेजे जाते हैं।

इसलिए संघ के भीतर बना कार्टेल पकड़ में आने वाला सबसे आसान कार्टेल होता है। जो बात गुप्त रखनी थी, वह रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती है।

अब क़ानून का इतिहास

भारत में इस तरह के आचरण को रोकने वाला पहला बड़ा क़ानून एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम था, जिसे एमआरटीपी कहा जाता है। वह 1969 में बना और 1 जून 1970 से लागू हुआ।

उस दौर की सोच अलग थी। चिंता यह थी कि आर्थिक ताक़त कुछ हाथों में जमा न हो जाए, और बड़ी कंपनियों के विस्तार पर पहले से इजाज़त की व्यवस्था थी।

1991 के बाद अर्थव्यवस्था खुली और वह ढाँचा उस बाज़ार से मेल नहीं खाता था।

फिर एक समिति बनी, जिसे उसके अध्यक्ष के नाम पर रघुवन समिति कहा जाता है। उसकी सिफ़ारिशों पर नया क़ानून बना।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 में पारित हुआ।

पर यहाँ एक बात है जो अक्सर छूट जाती है। क़ानून बनने और चलने के बीच सात साल लगे।

अधिनियम के वे हिस्से जो प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौतों और दबदबे के दुरुपयोग से जुड़े हैं, 20 मई 2009 को अधिसूचित हुए। आयोग मार्च 2009 में विधिवत गठित हुआ। और एमआरटीपी अधिनियम 1 सितंबर 2009 को हटा।

यानी यह क़ानून, जो 2002 का कहलाता है, असल में 2009 से काम कर रहा है।

सोच में क्या बदला

दोनों क़ानूनों का फ़र्क़ सिर्फ़ तारीख़ का नहीं है।

पुराना क़ानून आकार पर नज़र रखता था। सवाल यह था कि कोई कंपनी कितनी बड़ी है।

नया क़ानून आचरण पर नज़र रखता है। सवाल यह है कि उसने किया क्या।

बड़ा होना अपने आप में अपराध नहीं है। भाव तय करना अपराध है, चाहे करने वाले छोटे हों या बड़े।

इसी वजह से यह मामला दिलचस्प है। जिन तीन कंपनियों का नाम है, उनमें दो के पीछे बड़े सरकारी बैंकों के नाम हैं और एक निजी बैंक का। मामला उनके आकार का नहीं है। मामला उस बैठक का है जिसमें भाव तय हुआ।

जो इस आदेश में नहीं है

विज्ञप्ति में जुर्माने की कोई रक़म नहीं दी गई है।

आयोग ने रुकने और दूर रहने का निर्देश दिया है। कितना जुर्माना लगा, या लगा भी या नहीं, यह विज्ञप्ति नहीं बताती।

यह भी नहीं बताया गया कि जाँच कैसे शुरू हुई और शिकायत किसने की।

आदेश की पूरी प्रति आयोग की वेबसाइट पर है, और ये बातें उसी में देखी जा सकती हैं।

स्रोतभारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, विज्ञप्ति, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, केस संख्या 29/2021 का आदेश, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय, प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।