भारत पन्ना
पैसा

रिज़र्व बैंक ने टाटा संस को तुरंत सूचीबद्ध होने को कहा, लाइसेंस लौटाने का आवेदन ख़ारिज

11 सितंबर 2026 की तारीख़ वाली एक चिट्ठी में रिज़र्व बैंक ने टाटा समूह की मालिक कंपनी से कहा कि कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का पंजीकरण लौटाने का उसका आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता, और उसे तुरंत शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने की तैयारी करनी चाहिए। चिट्ठी सार्वजनिक नहीं है; उसके होने की ख़बर 12 सितंबर की शाम दो अख़बारों से आई।

मुंबई के फ़ोर्ट इलाक़े में होमी मोदी स्ट्रीट पर बॉम्बे हाउस, टाटा संस का पंजीकृत दफ़्तर, सड़क से ली गई तस्वीर; रिज़र्व बैंक की 11 सितंबर वाली चिट्ठी इसी कंपनी के नाम है
तस्वीर: AroundTheGlobe, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड के कुल 4,04,146 शेयर हैं। हर शेयर का अंकित मूल्य एक हज़ार रुपये है, और 2024-25 के लिए कंपनी ने हर शेयर पर 64,900 रुपये लाभांश की सिफ़ारिश की। यानी अंकित मूल्य का 6,490 फ़ीसदी। आप इनमें से एक शेयर भी नहीं ख़रीद सकते, किसी भी क़ीमत पर।

यह अब बदलने को कहा गया है। 11 सितंबर 2026 की तारीख़ वाली एक चिट्ठी में, बिज़नेस स्टैंडर्ड और द हिंदू दोनों के मुताबिक़, रिज़र्व बैंक ने कंपनी से कहा है कि कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण स्वेच्छा से लौटाने का उसका आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता, और अब उसे शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने की तैयारी करनी चाहिए।

टाटा संस उन कंपनियों की मालिक है जिनके शेयर आपकी म्यूचुअल फ़ंड की क़िस्त में, आपके एनपीएस के खाते में और आपके सूचकांक फ़ंड में पहले से पड़े हैं। टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाइटन, ट्रेंट, टाटा कंज़्यूमर, टाटा पावर, इंडियन होटल्स। 31 मार्च 2025 को टाटा समूह का कुल बाज़ार पूँजीकरण 27,84,753 करोड़ रुपये था, जो साल भर पहले 30,36,905 करोड़ रुपये था। यह आँकड़ा कंपनी ने ख़ुद अपनी वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज किया है।

पूरे समूह के ऊपर बैठी यही कंपनी अकेली है जिसे कोई बाहरी ख़रीद नहीं सकता, और जिसके तिमाही नतीजे कहीं नहीं छपते।

चिट्ठी की तारीख़, उसका एक वाक्य, और दो अख़बार

चिट्ठी ख़ुद सार्वजनिक नहीं है। रिज़र्व बैंक ने उस पर कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की और टाटा संस ने भी कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया। जो कुछ मालूम है, वह शुक्रवार, 11 सितंबर के अगले दिन छपी दो अख़बारी रिपोर्टों से मालूम है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड में निवेदिता मुखर्जी की रिपोर्ट शनिवार, 12 सितंबर की शाम 5 बजकर 22 मिनट पर छपी। उसमें लिखा है कि चिट्ठी 11 सितंबर 2026 की तारीख़ की है, और उसमें रिज़र्व बैंक ने कहा है कि टाटा संस के आवेदन के सभी पहलुओं की जाँच के बाद पाया गया कि उसे "स्वीकार नहीं किया जा सकता"। यह बात रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से है जिसने चिट्ठी देखी थी। अख़बार ने सूत्र का नाम नहीं दिया।

द हिंदू में ललातेंदु मिश्रा की रिपोर्ट उसी शाम 7 बजकर 44 मिनट पर छपी। उसमें भी वही अंग्रेज़ी वाक्यांश दर्ज है, और लिखा है कि रिज़र्व बैंक ने कंपनी से तत्काल सार्वजनिक सूचीबद्धता की "तैयारी करने" को कहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड की भाषा में रिज़र्व बैंक ने "तुरंत सूचीबद्ध होने के लिए आगे बढ़ने" को कहा है। किसी समयसीमा का ज़िक्र दोनों में से किसी रिपोर्ट में नहीं है। चिट्ठी में कोई तारीख़ दी गई हो, ऐसा भी दोनों में से कोई नहीं लिखता।

तीसरी बात जो दोनों रिपोर्टों में नहीं है, वह यह कि अब पंजीकरण का क्या होगा। आवेदन ख़ारिज होने का सीधा अर्थ यही है कि टाटा संस रिज़र्व बैंक के रजिस्टर में कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी बनी रहती है। और उसी रजिस्टर पर टँगी हुई है वह शर्त जिसकी वजह से यह पूरा मामला 2022 से चल रहा है।

कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी क्या होती है और टाटा संस क्यों है

रिज़र्व बैंक का नियमन बैंकों तक सीमित नहीं है। जो कंपनी मुख्य रूप से दूसरी कंपनियों के शेयर रखती है, वह भी क़ानूनी परिभाषा में ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी यानी एनबीएफ़सी मानी जाती है। उसकी कमाई वित्तीय परिसंपत्तियों से आती है, और रिज़र्व बैंक अधिनियम की भाषा में वही उसका मुख्य कारोबार है। ऐसी कंपनियों में एक ख़ास क़िस्म है कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी, यानी सीआईसी।

रिज़र्व बैंक (कोर इन्वेस्टमेंट कंपनियाँ) निदेश, 2025 के पैरा 3 में इसकी दो कसौटियाँ लिखी हैं। पहली, कंपनी की शुद्ध परिसंपत्तियों का कम से कम 90 फ़ीसदी हिस्सा समूह की कंपनियों के शेयरों, बॉन्ड, क़र्ज़ या डिबेंचर में लगा हो। दूसरी, इनमें से कम से कम 60 फ़ीसदी सीधे इक्विटी शेयरों में हो। साथ ही वह अपने निवेश का कारोबार न करे, और समूह के बाहर कोई वित्तीय गतिविधि न चलाए।

टाटा संस अपनी वार्षिक रिपोर्ट में ख़ुद को इसी भाषा में बताती है। 2024-25 की रिपोर्ट कहती है कि कंपनी की शुद्ध परिसंपत्तियों का 90 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा टाटा कंपनियों में निवेश और उन्हें दिए क़र्ज़ के रूप में है, और आमदनी का मुख्य स्रोत उन कंपनियों से मिलने वाला लाभांश है। 31 मार्च 2025 को उसकी 323 सहायक कंपनियाँ थीं, और समूह के साथ मिलाकर 39 सहयोगी तथा 32 संयुक्त उपक्रम।

आँकड़ों में यह इस तरह दिखता है। 2024-25 में कंपनी की कुल आमदनी 38,834.58 करोड़ रुपये रही, जिसमें 36,149.05 करोड़ अकेले लाभांश से आए। टाटा ब्रांड इस्तेमाल करने की एवज़ में समूह की कंपनियों से मिलने वाली ब्रांड सब्सक्रिप्शन आय 1,855.62 करोड़ रुपये थी। बाक़ी सब मिलाकर भी दो हज़ार करोड़ से कम।

रिज़र्व बैंक के रजिस्टर में कंपनी का पूरा वर्ग-नाम है "प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण, जमा स्वीकार न करने वाली कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी"। लेखा-परीक्षकों ने 2024-25 की सीएआरओ रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया कि समूह में पाँच सीआईसी रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत हैं और एक ऐसी है जिसे पंजीकरण की ज़रूरत नहीं।

बेस, मिडल, अपर और वह परत जो ख़ाली रहनी चाहिए

22 अक्टूबर 2021 को रिज़र्व बैंक ने परिपत्र RBI/2021-22/112 जारी किया, जिस पर मुख्य महाप्रबंधक मनोरंजन मिश्र के दस्तख़त हैं। इसी में एनबीएफ़सी को चार परतों में बाँटा गया, और ये नियम 1 अक्टूबर 2022 से लागू हुए।

नई दिल्ली के संसद मार्ग पर भारतीय रिज़र्व बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय का गेट, अगस्त 2022 की तस्वीर; चार परतों वाला वह ढाँचा और उसका पैरा 3.2.3 (l) इसी बैंक के परिपत्र से आते हैं
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सबसे नीचे बेस लेयर, जिसमें एक हज़ार करोड़ रुपये से कम परिसंपत्ति वाली कंपनियाँ हैं। उसके ऊपर मिडल लेयर, जिसमें जमा लेने वाली सारी एनबीएफ़सी, एक हज़ार करोड़ से बड़ी कंपनियाँ, और हर हाल में हाउसिंग फ़ाइनेंस तथा कोर इन्वेस्टमेंट कंपनियाँ। उसके ऊपर अपर लेयर, जिसमें रिज़र्व बैंक ख़ुद चुनकर नाम डालता है। और सबसे ऊपर टॉप लेयर, जिसके बारे में परिपत्र का वाक्य है कि वह "आदर्श रूप से ख़ाली रहने की उम्मीद है"। वह आज तक ख़ाली है।

ऊपरी परत में आने पर क्या-क्या बाध्य हो जाता है, यह परिपत्र के पैरा 3.2 में है। जोखिम-भारित परिसंपत्तियों का कम से कम 9 फ़ीसदी कॉमन इक्विटी टियर-1 पूँजी के रूप में रखना। एक ही उधारकर्ता पर टियर-1 पूँजी के 25 फ़ीसदी और एक समूह पर 40 फ़ीसदी की हद। बड़ी उधारी का अलग ढाँचा। बोर्ड के सदस्यों की योग्यता पर शर्त। कोई स्वतंत्र निदेशक एक साथ तीन से ज़्यादा ऐसी कंपनियों के बोर्ड में न रहे। मुख्य अनुपालन अधिकारी की नियुक्ति। और किसी स्वतंत्र निदेशक के कार्यकाल से पहले हटने या इस्तीफ़ा देने पर पर्यवेक्षकों को सूचना।

इसी सूची में परिपत्र का पैरा 3.2.3 (l) है, जो सबसे छोटा और सबसे भारी है: "एनबीएफ़सी-यूएल को ऊपरी परत में पहचान के तीन साल के भीतर अनिवार्य रूप से सूचीबद्ध होना होगा।"

नवंबर 2025 में रिज़र्व बैंक ने अपने सारे एनबीएफ़सी परिपत्रों को नए मास्टर निदेशों में समेट दिया। यह शर्त अब भारतीय रिज़र्व बैंक (ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ — अभिशासन) निदेश, 2025 के पैरा 43 में है, और शब्द लगभग वही हैं। उसी पैरा में यह भी लिखा है कि सूचीबद्ध होने से पहले ही कंपनी को सूचीबद्ध कंपनियों जैसी प्रकटीकरण व्यवस्था लागू करनी होगी।

24 जून 2026 को रिज़र्व बैंक ने इसी पैरा 43 में एक परंतुक जोड़ा: यह शर्त उन एनबीएफ़सी-यूएल पर लागू नहीं होगी जो पूरी तरह सरकार के स्वामित्व और नियंत्रण में हैं। छूट बनी, और वह सरकारी मिल्कियत के लिए बनी।

30 सितंबर 2022 से 30 सितंबर 2025 तक

30 सितंबर 2022 को रिज़र्व बैंक ने प्रेस विज्ञप्ति संख्या 2022-2023/975 जारी की, जिस पर मुख्य महाप्रबंधक योगेश दयाल के दस्तख़त हैं। उसमें सोलह एनबीएफ़सी के नाम थे। चौथे क्रमांक पर टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड, और उसके आगे वर्ग के ख़ाने में सिर्फ़ तीन अक्षर: सीआईसी। पूरी सूची में वह अकेली कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी थी। विज्ञप्ति में यह भी दर्ज है कि परिसंपत्ति के लिहाज़ से शीर्ष दस में होने के बावजूद एचडीएफ़सी लिमिटेड को चालू समीक्षा में शामिल नहीं किया जा रहा, क्योंकि उसका विलय चल रहा है।

विज्ञप्ति के पैरा 4 में दो समयसीमाएँ हैं। तीन महीने में बोर्ड से मंज़ूर नीति बनानी थी, और चौबीस महीने में ऊपरी परत की सारी शर्तें पूरी करनी थीं। सूचीबद्ध होने की तीन साल वाली घड़ी उसी दिन से चली, और 30 सितंबर 2025 पर आकर रुक गई।

बीच के तीन साल में कंपनी ने जो किया, वह उसके अपने खातों में है। 31 मार्च 2023 को उसका सकल क़र्ज़ 22,176.27 करोड़ रुपये था। एक साल बाद वह घटकर 363.18 करोड़ रह गया, यानी 21,813.09 करोड़ रुपये चुका दिए गए। 2024-25 में बची हुई उधारी भी चुक गई। कंपनी की प्रबंधन चर्चा रिपोर्ट का वाक्य है: "समीक्षाधीन वर्ष में कंपनी ने सारी उधारी चुका दी।" असर ब्याज के ख़ाने में सबसे साफ़ दिखता है। 2023-24 में वित्त लागत 1,474.72 करोड़ रुपये थी; 2024-25 में 6.18 करोड़।

यह पैसा आया कहाँ से, यह भी उन्हीं खातों में है। 2023-24 में कंपनी की ‘अन्य आय’ 20,036.20 करोड़ रुपये रही, जिसमें 19,910.05 करोड़ अकेले निवेश बेचने, प्रतिभूतियों के बायबैक और डिबेंचर भुनाने से आए। अगले साल यही ख़ाना घटकर 124.88 करोड़ रह गया। दोनों आँकड़े एक ही बरस के हैं: बीस हज़ार करोड़ की यह आमदनी, और 21,813 करोड़ रुपये का क़र्ज़-भुगतान।

इसी बीच, वित्त वर्ष 2023-24 में, कंपनी ने रिज़र्व बैंक के पास आवेदन कर दिया। निदेशक रिपोर्ट, वित्तीय विवरणों की पहली टिप्पणी और लेखा-परीक्षकों की सीएआरओ रिपोर्ट, तीनों में एक ही वाक्य है: कंपनी ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सीआईसी के पंजीकरण प्रमाणपत्र को स्वेच्छा से लौटाने और ‘अपंजीकृत सीआईसी’ के रूप में चलते रहने के लिए आवेदन किया है, जो रिज़र्व बैंक के पास विचाराधीन है।

एक बात जो इन दस्तावेज़ों की तुलना से निकलती है: 2023-24 की प्रबंधन चर्चा रिपोर्ट, जो एक सौ छठी सालाना आम बैठक में रखी गई, इस आवेदन का ज़िक्र तक नहीं करती। पहली बार यह 2024-25 की रिपोर्ट में आता है, और तब पिछले वर्ष की घटना के रूप में आता है।

जनवरी 2025 की सूची में टाटा संस फिर था, इस टिप्पणी के साथ कि उसका शामिल होना पंजीकरण रद्द कराने के आवेदन के नतीजे पर असर डाले बिना है। 2025-26 की सूची जारी ही नहीं हुई। 5 अगस्त 2026 को मौद्रिक नीति के बाद की प्रेस वार्ता में गवर्नर संजय मल्होत्रा से यही पूछा गया; बिज़नेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि टाटा संस ऊपरी परत में बना हुआ है और अब वर्गीकरण सिद्धांत-आधारित है, जबकि डिप्टी गवर्नर शिरीष मुर्मू ने कहा कि नई सूची जल्द आएगी। वह अगले ही दिन आ गई।

अपंजीकृत सीआईसी बनने का रास्ता, और नियम का पाठ

टाटा संस जो बनना चाहती थी, उसकी परिभाषा सीआईसी निदेशों के पैरा 16 में है। उसके मुताबिक़ दो तरह की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनियों को रिज़र्व बैंक के पास पंजीकरण कराने की ज़रूरत नहीं और उन्हें ‘अपंजीकृत सीआईसी’ कहा जाता है: पहली, जिनकी परिसंपत्ति सौ करोड़ रुपये से कम हो; दूसरी, जिनकी परिसंपत्ति सौ करोड़ या उससे ज़्यादा हो पर जो पब्लिक फ़ंड न लेती हों।

पब्लिक फ़ंड का मतलब नियमों में साफ़ लिखा है: जनता से ली गई जमा, बैंकों से लिया क़र्ज़, कमर्शियल पेपर, डिबेंचर, अंतर-कंपनी जमा, यानी बाहर से जुटाया गया हर पैसा। सीधे या घुमाकर।

टाटा संस की परिसंपत्ति सौ करोड़ से कम होने का सवाल ही नहीं था। 31 मार्च 2025 को उसकी कुल परिसंपत्तियाँ 1,75,356.64 करोड़ रुपये थीं और नेट वर्थ, यानी सारी देनदारियाँ घटाने के बाद बची शुद्ध मिल्कियत, 1,49,680.13 करोड़। दूसरी कसौटी ही काम की थी। क़र्ज़ शून्य हो जाने पर कंपनी का तर्क यह बनता था कि वह अब पब्लिक फ़ंड नहीं ले रही, इसलिए उसे पंजीकरण की ज़रूरत नहीं रही।

नियम इस रास्ते को मानता भी है। पैरा 17 के नीचे टिप्पणी (4) में लिखा है कि रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत ऐसी सीआईसी, जो अपंजीकृत सीआईसी की कसौटी पूरी करती हों, स्वैच्छिक पंजीकरण-निरसन माँग सकती हैं, और इसके लिए लेखा-परीक्षित तुलन-पत्र तथा लेखा-परीक्षक का प्रमाणपत्र दोनों देने होंगे।

जिस सवाल का जवाब किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में नहीं है, वह अगला है। मान लीजिए पंजीकरण लौट गया। क्या ऊपरी परत का वर्गीकरण भी उसके साथ चला जाता है, और उसके साथ सूचीबद्ध होने की शर्त? अभिशासन निदेशों का पैरा 43 यह शर्त ‘एनबीएफ़सी-यूएल’ पर डालता है। तीनों प्रासंगिक मास्टर निदेशों में, आवेदन की प्रक्रिया लिखी है पर आवेदन ठुकराए जाने के ख़िलाफ़ अपील का कोई प्रावधान नहीं है। रिज़र्व बैंक को इस सवाल का जवाब देना नहीं पड़ा, क्योंकि उसने आवेदन ही नहीं माना।

चार लाख शेयरों का बँटवारा

कंपनी के खातों में शेयरधारकों का हिसाब शेयर-दर-शेयर दर्ज है, और सूचीबद्ध होने पर क्या बदलेगा यह समझने के लिए वही शुरुआत है।

प्रवर्तक के ख़ाने में सात ट्रस्ट हैं। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के पास 1,13,067 शेयर यानी 27.98 फ़ीसदी, सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास 95,211 यानी 23.56 फ़ीसदी, जेआरडी टाटा ट्रस्ट के पास 16,200 यानी 4.01 फ़ीसदी, टाटा एजुकेशन ट्रस्ट और टाटा सोशल वेलफ़ेयर ट्रस्ट के पास 15,075-15,075 यानी 3.73-3.73 फ़ीसदी, आरडी टाटा ट्रस्ट के पास 8,838 यानी 2.19 फ़ीसदी और सार्वजनिक सेवा ट्रस्ट के पास 396 यानी 0.10 फ़ीसदी। जोड़ने पर 2,63,862 शेयर बनते हैं, और कंपनी की तालिका में छपे प्रतिशत जोड़ें तो 65.30 फ़ीसदी।

लगभग हर रिपोर्ट में यह हिस्सेदारी "क़रीब 66 फ़ीसदी" लिखी जाती है। कंपनी की लेखा-परीक्षित तालिका में दर्ज सात प्रवर्तक ट्रस्ट इससे कम पर रुकते हैं।

पाँच फ़ीसदी से ऊपर वाले शेयरधारकों की अलग तालिका में दो और नाम हैं: स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड और साइरस इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड, दोनों के पास 37,122-37,122 शेयर। ये शापूरजी पालोनजी समूह की कंपनियाँ हैं। दोनों को जोड़ने पर 74,244 शेयर, यानी ठीक 18.37 फ़ीसदी। बाक़ी 66,040 शेयर, 16.34 फ़ीसदी, दूसरे शेयरधारकों के पास हैं।

सूचीबद्ध होने का मतलब सिर्फ़ बाज़ार में नाम लिखवाना नहीं है। प्रतिभूति संविदा (विनियमन) नियम, 1957 का नियम 19(2)(ख) तय करता है कि आईपीओ में कम से कम कितना हिस्सा जनता को देना होगा, और नियम 19क तय करता है कि आगे चलकर कम से कम 25 फ़ीसदी जनता के पास रहना चाहिए। 13 मार्च 2026 को वित्त मंत्रालय ने अधिसूचना जी.एस.आर. 184(अ) से नियम 19(2)(ख) को पूरा बदल दिया और बहुत बड़ी कंपनियों के लिए यह अनुपात छह ख़ानों में बाँट दिया। एज़ेडबी एंड पार्टनर्स की विधि टिप्पणी के मुताबिक़ एक लाख करोड़ से पाँच लाख करोड़ रुपये के बीच की कंपनी के लिए न्यूनतम सार्वजनिक निर्गम 2.75 फ़ीसदी और 6,250 करोड़ रुपये है, और पाँच लाख करोड़ से ऊपर की कंपनी के लिए 1 फ़ीसदी तथा 15,000 करोड़ रुपये; 25 फ़ीसदी तक पहुँचने के लिए दस साल तक मिलते हैं।

टाटा संस के पास सूचीबद्ध कंपनियों के जिन शेयरों का बाज़ार भाव 31 मार्च 2025 को 14,28,228 करोड़ रुपये था, उन्हीं के आधार पर उसका अपना मूल्यांकन तय होगा। यानी कंपनी किस ख़ाने में गिरेगी, यह लगभग तय है: सबसे ऊपर वाले में, जहाँ न्यूनतम सार्वजनिक निर्गम 15,000 करोड़ रुपये का बैठता है और उसमें से कम से कम 2.5 फ़ीसदी हिस्सा जनता को देना होता है।

मुंबई की दलाल स्ट्रीट पर बीएसई का भवन और उसके पट्ट पर चलते टाटा मोटर्स तथा टाटा पावर के भाव, जनवरी 2013 की तस्वीर; टाटा संस का अपना मूल्यांकन इन्हीं सूचीबद्ध कंपनियों के बाज़ार भाव पर टिकेगा
तस्वीर: BSEINDIA, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

बोर्ड की बनावट और फ़रवरी 2027 की तारीख़

31 मार्च 2025 को टाटा संस के बोर्ड में नौ निदेशक थे। एन. चंद्रशेखरन कार्यकारी अध्यक्ष, सौरभ अग्रवाल कार्यकारी निदेशक; वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह, नोएल एन. टाटा और डॉ. राल्फ़ स्पेथ ग़ैर-कार्यकारी निदेशक; और अजय पिरामल, हरीश मानवानी तथा अनीता मारंगोली जॉर्ज स्वतंत्र निदेशक।

नोएल टाटा को 22 अक्टूबर 2024 को बोर्ड में लाया गया। कंपनी का अपना वाक्य है कि "कंपनी के संस्थापन-अनुच्छेदों के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स ने श्री नोएल एन. टाटा को बोर्ड में नामित किया"। नामांकन का यह अधिकार कंपनी के निजी दस्तावेज़ में लिखा है, बाज़ार के नियम में नहीं।

सेबी के सूचीबद्धता दायित्व नियमों का विनियम 17(1)(ख) कहता है कि जिस कंपनी में नियमित ग़ैर-कार्यकारी अध्यक्ष न हो, उसके बोर्ड में कम से कम आधे निदेशक स्वतंत्र होने चाहिए। टाटा संस के अध्यक्ष कार्यकारी हैं। नौ में तीन स्वतंत्र निदेशकों को कम से कम पाँच करना होगा।

चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फ़रवरी 2027 को ख़त्म हो रहा है और बिज़नेस स्टैंडर्ड के मुताबिक़ उन्होंने बोर्ड को लिखकर बता दिया है कि वे तीसरे कार्यकाल के लिए ख़ुद को प्रस्तुत नहीं करेंगे।

टाटा का एक भी शेयर न रखने वाले पाठक का हिसाब

लाभांश वह रक़म है जो कंपनी अपने मुनाफ़े में से शेयरधारकों को बाँटती है। 2024-25 के लिए टाटा संस के निदेशकों ने हर ऑर्डिनरी शेयर पर 64,900 रुपये की सिफ़ारिश की, कुल नक़द निकासी 2,622.91 करोड़ रुपये। पिछले साल यह 35,000 रुपये प्रति शेयर और कुल 1,414.51 करोड़ थी।

इस रक़म का बड़ा हिस्सा कहाँ जाता है, यह अब गिना जा सकता है। सात प्रवर्तक ट्रस्टों के 2,63,862 शेयरों पर 64,900 रुपये के हिसाब से 1,712.46 करोड़ रुपये बनते हैं। एक साल पहले उन्हीं शेयरों पर 923.52 करोड़ बने थे। ये सातों धर्मार्थ ट्रस्ट हैं, और इस हिस्सेदारी पर मिलने वाला लाभांश टाटा समूह से उनके पास पहुँचने वाला पैसा है। लाभांश बढ़ने पर अगले बरस बाँटने को ज़्यादा होता है, घटने पर कम। ट्रस्टों के अपने लेखे सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए किसी बरस में इसमें से कितना अनुदान में गया, यह इन दस्तावेज़ों से नहीं निकलता।

शापूरजी पालोनजी समूह के 74,244 शेयरों पर इसी दर से 481.84 करोड़ रुपये बनते हैं। वह समूह अपने क़र्ज़ के बोझ में इस हिस्सेदारी को नक़दी में बदलना चाहता है, पर बिना सूचीबद्धता के उसे बेचने की कोई खुली मंडी नहीं है।

अब वह हिस्सा जो हर पाठक का है। सूचीबद्ध होने पर कंपनी को हर तिमाही नतीजे छापने होंगे, हर तिमाही शेयरधारिता का ढाँचा देना होगा, अपने बड़े संबंधित-पक्ष लेन-देन की मंज़ूरी शेयरधारकों से लेनी होगी और हर अहम घटना की सूचना तय समय-सीमा में देनी होगी। अभी टाटा संस अपनी वार्षिक रिपोर्ट स्वेच्छा से अपनी वेबसाइट पर डालती है, जो निजी कंपनी के लिए बाध्यता नहीं है। सूचीबद्ध होने पर यह चुनाव नहीं रह जाएगा।

मुंबई के अपोलो बंदर पर ताजमहल पैलेस होटल, जनवरी 2011 की तस्वीर; इसे चलाने वाली इंडियन होटल्स कंपनी उन्हीं सूचीबद्ध टाटा कंपनियों में है जिनके शेयर म्यूचुअल फ़ंड के रास्ते पाठक तक पहुँचते हैं
तस्वीर: Joe Ravi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

और एक चीज़ रोज़ बनेगी जो आज नहीं है: भाव। समूह की पूरी संरचना पर बाज़ार का दैनिक आँकड़ा, जिसे कोई भी देख सकेगा।

बचे हुए चार रास्ते

पहला रास्ता रिज़र्व बैंक के पास वापस जाना है। जिन तीन मास्टर निदेशों में यह पूरा ढाँचा लिखा है, उनमें से किसी में अपील का प्रावधान नहीं है, इसलिए यह नए सिरे से अभ्यावेदन देने या अदालत जाने का रास्ता होगा, न कि किसी तय अपीलीय प्रक्रिया का।

दूसरा छूट का है। सीआईसी निदेशों के पैरा 5 में रिज़र्व बैंक के पास यह अधिकार है कि वह "किसी कठिनाई से बचने के लिए या किसी अन्य उचित एवं पर्याप्त कारण से" किसी भी सीआईसी को इन निदेशों के किसी भी प्रावधान से छूट दे सकता है। पर सूचीबद्ध होने की शर्त सीआईसी निदेशों में नहीं, अभिशासन निदेशों के पैरा 43 में है। उस पैरा में जो इकलौता परंतुक जुड़ा, वह 24 जून 2026 को जुड़ा और सरकारी कंपनियों के लिए जुड़ा।

तीसरा ऊपरी परत से बाहर निकलना है। यहाँ दो पेच हैं। ढाँचे के पैरा 28 के मुताबिक़ एक बार ऊपरी परत में आने के बाद कंपनी कम से कम पाँच साल तक उसी परत में रहती है, चाहे वह बाद के बरसों में कसौटी पूरी करे या न करे; बाहर निकलने के लिए लगातार पाँच साल कसौटी से नीचे रहना होता है। पैरा 29 में इससे पहले निकलने का एक ही दरवाज़ा है, बोर्ड से मंज़ूर नीति के तहत कारोबार का सोचा-समझा पुनर्गठन। दूसरा पेच कसौटी ख़ुद है। 24 जून 2026 के दूसरे संशोधन निदेशों ने पुरानी अंक-आधारित प्रणाली हटाकर पैरा 24 में एक सीधी रेखा खींच दी: एक लाख करोड़ रुपये या उससे ज़्यादा परिसंपत्ति वाली एनबीएफ़सी ऊपरी परत में। 31 मार्च 2025 को टाटा संस की स्टैंडअलोन परिसंपत्तियाँ इस रेखा से पौने दो गुना थीं, और 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं है। इस रेखा के नीचे आने का मतलब समूह की मालिकाना संरचना तोड़ना होगा।

चौथा रास्ता सूचीबद्ध होना है, और चिट्ठी ने यही कहा है।

6 अगस्त की सूची में टाटा संस के नाम के नीचे जो फ़ुटनोट था, वह अब बेमानी हो चुका है। पर उसी सूची ने पहचान की तारीख़ भी नई कर दी है, और पैरा 43 की तीन साल वाली घड़ी उसी तारीख़ से नापी जाएगी या 2022 वाली से, यह किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में तय नहीं है। रिज़र्व बैंक ने अब तक कोई विज्ञप्ति जारी नहीं की है और कंपनी ने कुछ नहीं कहा है।

स्रोतभारतीय रिज़र्व बैंक, RBI/2021-22/112, DOR.CRE.REC.No.60/03.10.001/2021-22, 22 अक्टूबर 2021: Scale Based Regulation (SBR) — एनबीएफ़सी के लिए संशोधित नियामक ढाँचा; पैरा 3.2.3(l) में सूचीबद्ध होने की शर्त, भारतीय रिज़र्व बैंक, प्रेस विज्ञप्ति 2022-2023/975, 30 सितंबर 2022: ऊपरी परत की सोलह एनबीएफ़सी की सूची, जिसमें टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड चौथे क्रमांक पर, भारतीय रिज़र्व बैंक, प्रेस विज्ञप्ति 2026-2027/823, 6 अगस्त 2026: 2026-27 की ऊपरी परत सूची, सत्रह नाम, 31 मार्च 2026 के खातों के आधार पर; टाटा संस के नाम पर फ़ुटनोट, भारतीय रिज़र्व बैंक (ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ — अभिशासन) निदेश, 2025, 24 जून 2026 तक अद्यतन: पैरा 43 और उसमें जोड़ा गया परंतुक, भारतीय रिज़र्व बैंक (कोर इन्वेस्टमेंट कंपनियाँ) निदेश, 2025, 10 मार्च 2026 तक अद्यतन: पैरा 3 की परिभाषा, पैरा 5 की छूट, पैरा 16 की अपंजीकृत सीआईसी और पैरा 17 के नीचे टिप्पणी (4), भारतीय रिज़र्व बैंक (ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ — पंजीकरण, छूट और परतों वाले नियमन का ढाँचा) निदेश, 2025, 1 जुलाई 2026 तक अद्यतन: पैरा 24, 28, 29 और 31, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड, एक सौ सातवीं वार्षिक रिपोर्ट 2024-25: निदेशक रिपोर्ट, लेखा-परीक्षकों की सीएआरओ रिपोर्ट का खंड xvi, शेयर पूँजी की टिप्पणी और लाभांश, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड, 2023-24 की प्रबंधन चर्चा एवं विश्लेषण रिपोर्ट: क़र्ज़ 22,176.27 करोड़ से 363.18 करोड़ रुपये पर, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड, 2024-25 की प्रबंधन चर्चा एवं विश्लेषण रिपोर्ट: ‘सारी उधारी चुका दी’, नेट वर्थ, और समूह का बाज़ार पूँजीकरण, बिज़नेस स्टैंडर्ड, निवेदिता मुखर्जी, 12 सितंबर 2026 शाम 5:22 बजे: चिट्ठी देख चुके एक सूत्र के हवाले से उसकी भाषा, बिज़नेस स्टैंडर्ड, ऋषभ शर्मा, 13 सितंबर 2026: 2017 से 2026 तक की तारीख़वार कड़ी, द हिंदू, ललातेंदु मिश्रा, 12 सितंबर 2026 शाम 7:44 बजे: ‘cannot be acceded to’ और सूचीबद्ध होने की तैयारी, बिज़नेस टुडे, 6 अगस्त 2026: मौद्रिक नीति के बाद की प्रेस वार्ता में गवर्नर संजय मल्होत्रा और डिप्टी गवर्नर शिरीष मुर्मू, सेबी की विधि सूची में प्रतिभूति संविदा (विनियमन) संशोधन नियम, 2026, अधिसूचना जी.एस.आर. 184(अ), 13 मार्च 2026, एज़ेडबी एंड पार्टनर्स की विधि टिप्पणी: संशोधित नियम 19(2)(ख) के छह ख़ाने और 15 तथा 25 फ़ीसदी तक पहुँचने की समयसीमाएँ

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।