भारत पन्ना
काम की बात

ग़लत बेची गई बीमा पॉलिसी पर शिकायत का असल रास्ता: तीस दिन, चौदह दिन और पचास लाख की तीन सीमाएँ

मिस-सेलिंग की परिभाषा नियामक के 2024 के विनियम में लिखी है और उसके चार हिस्से हैं। पॉलिसी लौटाने की अवधि अब तीस दिन की है, कंपनी को जवाब चौदह दिन में देना है, और बीमा लोकपाल पचास लाख रुपये तक का मुआवज़ा तय कर सकता है। नियामक की अपनी वेबसाइट पर यह आख़िरी आँकड़ा आज भी तीस लाख लिखा मिलता है।

कोलकाता के चित्तरंजन एवेन्यू पर हिंदुस्तान बिल्डिंग्स, जुलाई 2023 की तस्वीर। इससे लगे एनेक्स में कोलकाता के बीमा लोकपाल का दफ़्तर है, देश के अठारह में से एक
तस्वीर: ABose1989, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

नागपुर की सदर बाज़ार शाखा के एक पुराने ग्राहक को अट्ठासी बरस की उम्र में पेंशन पॉलिसी बेची गई: सालाना दो लाख रुपये, चार साल तक। उस उत्पाद के मंज़ूर ब्रोशर में दाख़िले की उम्र तीस से अस्सी साल लिखी थी।

यह ब्योरा किसी शिकायत-पत्र का नहीं है। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण ने अपने आदेश (संदर्भ IRDAI/PP&GR/ORD/MISC/118/9/2026) में केनरा एचएसबीसी लाइफ़ इंश्योरेंस पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया और सत्रह पन्नों में लिखा कि यह मिस-सेलिंग थी।

जुर्माने से ख़रीदार को कुछ नहीं मिलता; आदेश के मुताबिक़ वह रक़म नियामक के पास जमा होती है। ख़रीदार को जो मिल सकता है वह दूसरे रास्तों से आता है, और उन रास्तों की घड़ियाँ आपके जाने बिना भी चलती रहती हैं।

मिस-सेलिंग की परिभाषा क़ानून में चार हिस्सों की है

रोज़मर्रा की बातचीत में मिस-सेलिंग का मतलब "एजेंट ने झूठ बोला" रह जाता है। क़ानून में यह उससे चौड़ा है। आईआरडीएआई (पॉलिसीधारकों के हितों का संरक्षण, बीमाकर्ताओं के परिचालन और संबद्ध कार्य) विनियम, 2024 का विनियम 5(9) इसे चार हिस्सों में बाँटता है, और किसी एक का होना पर्याप्त है।

पहला, अनुचित प्रभाव डालना या अपनी प्रभावी हैसियत का इस्तेमाल करना। बैंक के काउंटर पर बैठा वह व्यक्ति जिसके पास आपकी जमा राशि, आपका कर्ज़ और आपका लॉकर सब है, आपके सामने बराबरी पर नहीं खड़ा होता। दूसरा, झूठा या भ्रामक बयान देना, या तथ्यों और लाभों को ग़लत ढंग से पेश करना। तीसरा, उत्पाद की विशेषताएँ, लाभ या अपवर्जन छिपाना। चौथा, और यही सबसे कम जाना जाता है, पॉलिसी आपके लिए उपयुक्त है या नहीं, यह देखने में सावधानी न बरतना।

चौथे हिस्से में झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती, और केनरा एचएसबीसी के मामले में प्राधिकरण ने यही पकड़ा। आदेश के पैरा 5.5 में लिखा है कि अट्ठासी साल के व्यक्ति को चार साल में आठ लाख रुपये की प्रतिबद्धता वाला उत्पाद बेचना, जब वह रक़म उनकी अपनी बताई दस लाख की सालाना आय का लगभग बीस फ़ीसदी थी और आर्थिक क्षमता का एक भी काग़ज़ नहीं देखा गया, उपयुक्तता जाँचने में विफलता का पाठ्यपुस्तक उदाहरण है।

इसे क्लेम ख़ारिज होने से अलग रखिए: अस्वीकृति में सवाल होता है कि पॉलिसी की शर्त आपके इलाज या नुक़सान पर लागू होती है या नहीं, मिस-सेलिंग में यह कि पॉलिसी आपके हाथ में आई ही क्यों। दोनों अलग सबूत माँगती हैं।

बीमा लोकपालों ने 2023-24 की रिपोर्ट में उन पाँच रास्तों की सूची दी है जहाँ जीवन बीमा की मिस-सेलिंग सबसे ज़्यादा दिखती है: बैंकएश्योरेंस; कर्ज़ के साथ बेचा गया जीवन या दुर्घटना कवर; बैंक खाताधारकों को बेची गई समूह पॉलिसी; जहाँ बैंक अपने ही समूह की बीमा कंपनी के लिए बिचौलिए का काम करे; और परिपक्व पॉलिसी की रक़म से ख़रीदी गई नई पॉलिसी।

तीस दिन की फ़्री-लुक अवधि और उसकी गिनती

सबसे सस्ता रास्ता सबसे पहले बंद होता है। उन्हीं विनियमों का विनियम 20 कहता है कि जीवन बीमा और नई व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के हर पॉलिसीधारक को तीस दिन की फ़्री-लुक अवधि मिलेगी, और यह पॉलिसी दस्तावेज़ मिलने के दिन से शुरू होती है, चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक रूप से मिला हो या काग़ज़ पर।

यह संख्या हाल में बदली है, इसलिए पुरानी सामग्री पर भरोसा मत कीजिए। लोकपालों ने 2023-24 की रिपोर्ट में "पंद्रह दिन की फ़्री-लुक अवधि" लागू करने की सिफ़ारिश की थी; वह रिपोर्ट 31 मार्च 2024 तक की है और विनियम 2024 अगले दिन से लागू हुए। पुराने ब्रोशर और ब्लॉग अब भी पंद्रह दिन बताते मिलेंगे।

एक साल से कम अवधि की पॉलिसी इस सुविधा से बाहर है। मोटर, घर या दुकान की सालाना पॉलिसी पर यह अधिकार नहीं मिलता, और यह अंतर तब चुभता है जब कर्ज़ के साथ कोई सामान्य बीमा जोड़ दिया गया हो।

लौटाने पर क्या मिलता है, यह विनियम 20(4) में गिना हुआ है। भरा हुआ प्रीमियम पूरा लौटता है, उसमें से सिर्फ़ तीन चीज़ें कटती हैं: जितने दिन जोखिम कवर रहा उतने दिन का आनुपातिक जोखिम प्रीमियम, प्रस्तावक की चिकित्सा जाँच पर हुआ ख़र्च, और स्टांप ड्यूटी। यूलिप में इनके अलावा यूनिट रद्दीकरण की तारीख़ के एनएवी पर वापस ख़रीदी जाती हैं। रक़म सात दिन में लौटनी है, और देर होने पर मास्टर परिपत्र के मुताबिक़ बैंक दर से दो फ़ीसदी ऊपर की दर से ब्याज देना है, वह भी माँगे बिना।

फ़्री-लुक का दरवाज़ा बंद हो जाना आपका मामला ख़त्म नहीं करता। केनरा एचएसबीसी ने यही दलील रखी थी कि पॉलिसीधारक ने सत्यापन कॉल में समझ की पुष्टि की और रद्दीकरण का विकल्प इस्तेमाल नहीं किया। आदेश ने इसे बचाव नहीं माना, क्योंकि जिस कॉल के भरोसे यह दलील थी वही दोषपूर्ण पाई गई।

कंपनी की शिकायत इकाई और चौदह दिन की घड़ी

पहला औपचारिक क़दम कंपनी है, और उसे छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। मास्टर परिपत्र, 5 सितंबर 2024, कहता है कि शिकायत मिलते ही पावती देनी होगी, चौदह दिन में समाधान देना होगा, और शिकायत स्वीकार न करने पर पॉलिसी की किन शर्तों के हवाले से नहीं की जा रही, यह भी उसी जवाब में लिखना होगा। विनियम 25 दो बातें जोड़ता है: कोई कंपनी या वितरण चैनल पॉलिसीधारक को नियामक तक जाने से रोक नहीं सकता, और लोकपाल के विकल्प का प्रचार कंपनी को ख़ुद करना है।

शिकायत कंपनी की शाखा में, चिट्ठी या ईमेल से, उसकी वेबसाइट पर या कॉल सेंटर पर दर्ज हो सकती है। इसके समांतर आईआरडीएआई का बीमा भरोसा पोर्टल है, जो अप्रैल 2011 में एकीकृत शिकायत प्रबंधन प्रणाली के नाम से शुरू हुआ। वहाँ दर्ज शिकायत कंपनी की व्यवस्था और नियामक के भंडार, दोनों में जाती है, और टोकन नंबर मिलता है। टोल-फ़्री नंबर 155255 और 1800 425 4732 सोमवार से शनिवार सुबह आठ से रात आठ बजे तक चलते हैं।

पोर्टल की सीमा भी उसी पन्ने पर लिखी है। नियामक कहता है कि वह शिकायत कंपनी के साथ उठाएगा और उसकी पुनर्समीक्षा तथा समाधान को सुगम बनाएगा। वह आपके पक्ष में भुगतान का आदेश नहीं देता। बीमा भरोसा निगरानी और रिकॉर्ड का औज़ार है, फ़ैसले का मंच नहीं।

इसी पन्ने पर एक शर्त है जो बहुतों की शिकायत चुपचाप मार देती है। कंपनी के कार्रवाई दर्ज कर देने के आठ हफ़्ते में अगर शिकायतकर्ता वापस नहीं आता, तो शिकायत बंद कर दी जाती है। असंतोष को भी लिखकर दर्ज करना पड़ता है, और समय पर।

यह व्यवस्था काग़ज़ पर होने और काम करने में कितना फ़र्क़ हो सकता है, इसका माप नियामक के एक दूसरे आदेश में है। इंडसइंड बैंक (कॉर्पोरेट एजेंट) के मामले में, संदर्भ IRDAI/E&C/ORD/MISC/119/9/2026, प्राधिकरण ने पाया कि बैंक के आईवीआर में बीमा शिकायत दर्ज कराने का विकल्प ही नहीं था, और वेबसाइट की शिकायत नीति सिर्फ़ बैंकिंग ग्राहकों के लिए बनी थी। सुनवाई के बाद बैंक ने लिखित में भरोसा दिया कि व्यवस्था दुरुस्त है। प्राधिकरण ने उसी पोर्टल पर परीक्षण शिकायत दर्ज की और पाया कि न संदर्भ संख्या बनी, न एसएमएस आया, न ईमेल। एक करोड़ का जुर्माना इसी पर लगा।

खड़गपुर में इंडसइंड बैंक की एक शाखा, जिसके ऊपरी तल पर एक साधारण बीमा कंपनी का बोर्ड लगा है। कॉर्पोरेट एजेंट बनकर बीमा बेचने वाले बैंक को शिकायत लेने की व्यवस्था भी उतनी ही रखनी होती है
तस्वीर: Anupamdutta73, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

बीमा लोकपाल: अठारह दफ़्तर, एक साल और पचास लाख

कंपनी के बाद का मंच बीमा लोकपाल है, और यह अकेली जगह है जहाँ बिना एक रुपया ख़र्च किए आपके पक्ष में बाध्यकारी आदेश हो सकता है। लोकपाल नियम, 2017 के तहत अहमदाबाद से ठाणे तक अठारह दफ़्तर हैं, और परिषद की वेबसाइट पर हरेक का पता और फ़ोन दिया है।

कौन-सा दफ़्तर आपका है, यह नियम 14(1) तय करता है, और उसमें एक सुविधा छिपी है: शिकायत उस लोकपाल के पास जा सकती है जिसके क्षेत्राधिकार में या तो जिस कंपनी की शिकायत है उसकी शाखा हो, या आपका अपना निवास हो। ये रेखाएँ राज्य की सीमा पर हमेशा नहीं रुकतीं। चंडीगढ़ के लोकपाल के पास पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और चंडीगढ़ आते हैं, पर हरियाणा के गुरुग्राम, फ़रीदाबाद, सोनीपत और बहादुरगढ़ दिल्ली के लोकपाल के साथ जोड़े गए हैं। परिषद की सूची से पता मिलाकर ही भेजिए।

नियम 14(3) तीन शर्तें लगाता है और तीनों एक साथ पूरी होनी चाहिए। पहली, आपने कंपनी या बीमा ब्रोकर को लिखित में, ईमेल से या उसकी वेबसाइट पर शिकायत दी हो। दूसरी, या तो कंपनी ने उसे ख़ारिज किया हो, या एक महीने तक जवाब न आया हो, या जवाब से आप संतुष्ट न हों। तीसरी, जो भी हुआ हो, उसके एक साल के भीतर आप लोकपाल के पास पहुँचे हों। नियम 14(4) देरी माफ़ करने का अधिकार देता है, पर उसके लिए कंपनी की आपत्तियाँ माँगी जाती हैं और कारण लिखे जाते हैं।

मिस-सेलिंग किस खाने में जाती है, यह नियम 13(1) में देखिए। उपखंड (d) पॉलिसी की शर्तों के ग़लत प्रस्तुतीकरण को, और उपखंड (g) प्रस्ताव फ़ॉर्म से मेल न खाती पॉलिसी जारी होने को लोकपाल के दायरे में रखता है। परिषद की 2023-24 की रिपोर्ट के मुताबिक़ जीवन बीमा में निपटाई गई स्वीकार्य शिकायतों का 59 फ़ीसदी अकेले उपखंड (d) का था।

आगे दो रास्ते हैं। नियम 16 के तहत दोनों पक्ष लिखित सहमति दें तो लोकपाल मध्यस्थता करता है और एक महीने में सिफ़ारिश देता है; शिकायतकर्ता को पंद्रह दिन में उसे "पूर्ण और अंतिम" मानकर स्वीकृति भेजनी होती है; कंपनी को पंद्रह दिन में पालन करना होता है। बात न बने तो नियम 17 के तहत अवार्ड आता है। मुआवज़ा असल नुक़सान से ज़्यादा नहीं हो सकता और ऊपरी सीमा संबंधित ख़र्च सहित पचास लाख रुपये है। लोकपाल को सारी अपेक्षित जानकारी मिलने के तीन महीने में अवार्ड देना है, कंपनी को तीस दिन में पालन करना है। अवार्ड सिर्फ़ बीमा कंपनी या ब्रोकर पर बाध्यकारी है, आप पर नहीं।

तीस दिन में पालन न हुआ तो मास्टर परिपत्र एक अलग दंड जोड़ता है: देरी के हर दिन के पाँच हज़ार रुपये, शिकायतकर्ता को देय, और यह दंडात्मक ब्याज के ऊपर। यह तब लागू नहीं होता जब कंपनी तीस दिन में अपील का रास्ता चुने और आपको सूचना दे।

अब वह विसंगति, जिस पर एक पाठक फिसल सकता है। लोकपाल नियमों में मुआवज़े की सीमा 9 नवंबर 2023 की अधिसूचना G.S.R. 828(E) से तीस लाख से बढ़ाकर पचास लाख की गई। नियामक का मास्टर परिपत्र पचास लाख कहता है, और आईआरडीएआई की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 ख़ुद दर्ज करती है कि सीमा बढ़ी और अठारह लोकपाल केंद्र हैं। इसके बावजूद आईआरडीएआई के शिकायत प्रकोष्ठ के पन्ने पर आज भी लिखा है कि लोकपाल तीस लाख से अधिक मुआवज़ा नहीं दे सकता, और देश में सत्रह लोकपाल हैं। दोनों पाठ एक ही नियामक की वेबसाइट पर हैं। क़ानून संशोधित नियम हैं, प्रश्नोत्तर का पन्ना नहीं।

पॉलिसी के साथ आने वाले छह काग़ज़

मिस-सेलिंग का सबूत ज़्यादातर उन काग़ज़ों में होता है जो आपको मिलने ही चाहिए थे। मास्टर परिपत्र के खंड 1, भाग क, पैराग्राफ़ II का खंड 8 कहता है कि प्रस्ताव स्वीकार होने के पंद्रह दिन में बीमाकर्ता बिना शुल्क छह चीज़ें देगा: फ़्री-लुक अवधि बताने वाला कवरिंग लेटर, पॉलिसी दस्तावेज़, भरे हुए प्रस्ताव फ़ॉर्म की प्रति, लाभ चित्रण की प्रति, ग्राहक सूचना पत्र, और उपयुक्तता आकलन के तहत बनी आवश्यकता विश्लेषण की प्रति।

इनमें से दो सबसे ज़्यादा काम आते हैं। लाभ चित्रण पर प्रस्तावक और अधिकृत विक्रय व्यक्ति, दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए, और उसके बाद वह पॉलिसी दस्तावेज़ का हिस्सा बन जाता है। केनरा एचएसबीसी के मामले में यह न हस्ताक्षरित था, न ओटीपी से सत्यापित, और कंपनी ने इसे तकनीकी गड़बड़ी बताया। आदेश ने लिखा कि उस पर पॉलिसीधारक की पुष्टि लेना ग़ैर-परक्राम्य दायित्व है और सिस्टम की ख़राबी उसका बचाव नहीं। उसी चित्रण ने एक असंगति भी खोली: कंपनी कह रही थी कि पेंशन फ़रवरी 2030 से शुरू होगी, चित्रण में वह पाँचवें पॉलिसी वर्ष से दिख रही थी।

दूसरा काग़ज़ ग्राहक सूचना पत्र है, जिसमें बीमा का प्रकार, बीमा राशि, लाभ, अपवर्जनों का सार, फ़्री-लुक अवधि, और लोकपाल के संपर्क सहित शिकायत निवारण व्यवस्था, सब एक जगह होनी चाहिए। इसकी पावती लेना अनिवार्य है, और माँगने पर यह क्षेत्रीय भाषा में मिलेगा। इसी आदेश में इसे और प्रस्ताव फ़ॉर्म की प्रति बिक्री के समय न देना अलग उल्लंघन गिना गया।

जो कंपनी की फ़ाइल में होना चाहिए, वह भी माँगा जा सकता है। मास्टर परिपत्र का खंड 2, अध्याय II, उपखंड 5.1(iii) कहता है कि प्रस्तावक से ली गई उपयुक्तता जानकारी और विक्रय व्यक्ति की सिफ़ारिश, दोनों बीमाकर्ता पॉलिसी रिकॉर्ड में रखेगा, और उस पर सहमति केवल प्रस्तावक के पंजीकृत मोबाइल या ईमेल पर आए ओटीपी से ली जा सकती है। सत्यापन कॉल की रिकॉर्डिंग भी दस्तावेज़ है: केनरा एचएसबीसी के आदेश में प्राधिकरण ने उस कॉल के प्रतिलेख में 01:57 पर दर्ज किया कि कॉल करने वाले ने कहा, सालाना 50,791 रुपये "आपको दिया जाएगा", जबकि पेंशन बेटी को मिलनी थी।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में युवा बीपीओ का कॉल फ़्लोर, फ़रवरी 2018 की तस्वीर। यह किसी बीमा कंपनी का केंद्र नहीं है, पर सत्यापन कॉल ऐसे ही फ़्लोर से की जाती है और उसका प्रतिलेख मिनट-सेकंड तक पढ़ा जाता है
तस्वीर: Samuel.Wsx, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

प्रीमियम तभी देना है जब कंपनी प्रस्ताव स्वीकार करने का फ़ैसला बता दे; फ़ॉर्म के साथ प्रीमियम जमा लेना मना है; वितरण चैनल उसे अपने खाते में नहीं ले सकता।

उपभोक्ता आयोग और लोकपाल के बीच का चुनाव

दोनों दरवाज़े एक साथ नहीं खुलते। लोकपाल नियमों का नियम 14(5) कहता है कि जिस विषय पर किसी अदालत, उपभोक्ता मंच या मध्यस्थ के सामने कार्यवाही लंबित है या निपट चुकी है, उसी विषय पर लोकपाल के सामने शिकायत नहीं चलेगी। आयोग में मुक़दमा दायर करते ही लोकपाल का रास्ता उसी मामले के लिए बंद हो जाता है। उल्टी दिशा खुली रहती है, क्योंकि नियम 17(8) अवार्ड को सिर्फ़ बीमा कंपनी या ब्रोकर पर बाध्यकारी बनाता है, आप पर नहीं।

इसलिए क्रम मायने रखता है: पहले कंपनी, फिर लोकपाल, फिर ज़रूरत पर आयोग। लोकपाल में शुल्क नहीं लगता और वकील की ज़रूरत नहीं होती, पर मुआवज़ा पचास लाख तक ही मिल सकता है। आयोग में यह सीमा तीन परतों में बँटी है: 30 दिसंबर 2021 की अधिसूचना G.S.R. 912(E) के मुताबिक़ जहाँ सेवा के बदले चुकाई गई रक़म पचास लाख रुपये तक हो वहाँ ज़िला आयोग, पचास लाख से दो करोड़ तक राज्य आयोग, और उससे ऊपर राष्ट्रीय आयोग। समय भी अलग है: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 69 वाद-कारण उठने से दो साल देती है, लोकपाल के नियम एक साल।

जहाँ रक़म बड़ी हो या दस्तावेज़ जटिल हों, वहाँ मंच चुनने से पहले वकील से राय लेना समझदारी है, क्योंकि यह चुनाव एक बार करने के बाद पलटता नहीं।

शिकायतें कहाँ और क्यों मरती हैं

सबसे उपयोगी आँकड़ा वह है जो बताता है कि लोग कहाँ चूकते हैं। बीमा लोकपाल परिषद की 2023-24 की रिपोर्ट के विवरण L7G7H7 में उस साल आई 52,313 शिकायतों में से 12,642 स्वीकार्य ही नहीं पाई गईं।

इस 12,642 का ब्योरा पढ़ने लायक़ है। 6,552 शिकायतें सिर्फ़ इसलिए बाहर हुईं कि शिकायतकर्ता ने पहले बीमा कंपनी के सामने अपनी बात रखी ही नहीं थी, जो नियम 14(3)(a) की शर्त है। 2,851 इसलिए कि वे उस लोकपाल के क्षेत्राधिकार में नहीं आती थीं। 2,382 इसलिए कि उनका विषय नियम 13(1) की सूची से बाहर था। 740 इसलिए कि एक साल की अवधि निकल चुकी थी। और 117 इसलिए कि वही मामला पहले से अदालत या उपभोक्ता मंच के सामने था।

यानी हर चार में से लगभग एक शिकायत गुण-दोष पर हारी नहीं, दरवाज़े पर ही लौटा दी गई। इनमें से तीन कारण, कंपनी को पहले न लिखना, एक साल पार कर जाना और दो मंचों पर एक साथ जाना, पूरी तरह शिकायतकर्ता के हाथ में थे।

जो भीतर पहुँचती हैं, उनका हिसाब अलग है। उसी रिपोर्ट के विवरण L1G1H1 के मुताबिक़ 2023-24 में लोकपाल दफ़्तरों को 52,575 शिकायतें मिलीं और 49,705 निपटीं: 15,528 मध्यस्थता की सिफ़ारिश से, 9,287 में अवार्ड शिकायतकर्ता के पक्ष में, 8,638 में बीमा कंपनी के पक्ष में, और 3,397 वापस ले ली गईं।

कंपनी के स्तर का चित्र आईआरडीएआई की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 की तालिका II.16 में है। जीवन बीमा कंपनियों के ख़िलाफ़ अनुचित व्यापार व्यवहार की शिकायतें 23,335 से बढ़कर 26,667 हुईं, जबकि कुल शिकायतें 1,20,726 से 1,20,429 पर ठहरी रहीं। निपटी 26,495 में 9,613 पॉलिसीधारक के पक्ष में गईं, 1,797 आंशिक रूप से, और 15,085 उनके ख़िलाफ़।

बुज़ुर्ग ख़रीदार पर क़ायदे की अलग शर्तें

क़ानून में बुज़ुर्गों के लिए अलग अध्याय नहीं है, पर तीन शर्तें उनके मामले में सबसे भारी पड़ती हैं। पहली, मास्टर परिपत्र के खंड 2, अध्याय I का खंड 2 कहता है कि हर प्रस्तावक और पॉलिसीधारक से समान, ईमानदार और निष्पक्ष व्यवहार होगा, और कमज़ोर समूहों की ज़रूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

दूसरी, बचत से जुड़े जीवन बीमा और एन्युइटी उत्पादों पर उपयुक्तता आकलन अनिवार्य है, जिसमें उम्र, आय, पारिवारिक स्थिति, जीवन-चरण, लक्ष्य और पहले से मौजूद बीमा दर्ज होना चाहिए। एनपीएस या नियोक्ता की अधिवर्षिता निधि से ख़रीदी गई एन्युइटी इससे बाहर है।

तीसरी, मास्टर परिपत्र का उपखंड 7.6 वित्तीय अंडरराइटिंग पर एक वाक्य रखता है जो बुज़ुर्ग ख़रीदार के लिए निर्णायक है: बीमाकर्ता को आकलन करना है कि प्रस्तावक पूरे प्रीमियम भुगतान काल तक प्रीमियम भरने की क्षमता बनाए रख पाएगा या नहीं, और उसके पास कौन-से स्रोत हैं।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले के पोटका गाँव में वृद्धावस्था पेंशन पाने वाले दो लोग अपनी डाकघर बचत पासबुक दिखाते हुए, जून 2013 की तस्वीर। इनका बीमा से कोई संबंध नहीं है, पर बुज़ुर्ग प्रस्तावक की आमदनी का सबूत ऐसी ही पासबुक होती है
तस्वीर: Ruraldev, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

केनरा एचएसबीसी ने दलील दी थी कि दाख़िले की उम्र की सीमा सिर्फ़ एन्युइटैंट पर लागू होती है, प्रस्तावक पर नहीं, क्योंकि जोखिम एन्युइटैंट के जीवन पर लिया जाता है। प्राधिकरण ने इसे बाद में गढ़ा गया तर्क बताया और लिखा कि मंज़ूर ब्रोशर में "प्रवेश आयु" के नीचे तीस से अस्सी साल बिना किसी शर्त के लिखा है, बीमाकर्ता मंज़ूरी के बाद उत्पाद की शर्तों की अपनी सुविधा से व्याख्या नहीं कर सकता, और चार साल के प्रीमियम दायित्व वाले अट्ठासी साल के प्रस्तावक का मामला व्यावसायिक रूप से अंतःकरण-विरुद्ध है, ख़ासकर उस उत्पाद में जिसमें प्रीमियम भरते-भरते प्रस्तावक की मृत्यु पर क्या होगा, इसका प्रावधान ही नहीं था। कारण बताओ नोटिस के बाद कंपनी ने ख़ुद प्रस्तावक की अधिकतम उम्र पचहत्तर साल पर बाँध दी।

एजेंट बीमा कंपनी का है: धारा 45 और अदालतों का रिकॉर्ड

बैंकएश्योरेंस का सवाल पहले नियामक के स्तर पर देखिए। विनियम 21(7) और मास्टर परिपत्र का खंड 7 बीमाकर्ता और वितरण चैनल, दोनों पर बिक्री प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी डालते हैं। केनरा एचएसबीसी की पॉलिसी बेची केनरा बैंक ने थी, पर जुर्माना बीमा कंपनी पर लगा, क्योंकि अपने एजेंट को अधिकतम आयु से बाहर के व्यक्ति को बेचने देकर वह मंज़ूर उत्पाद विशेषताओं से हटी।

नियामक से आगे यह सवाल क़ानून की भाषा में तय है। बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 45 को 2015 के संशोधन ने बदला, और उपधारा (3) के स्पष्टीकरण में 26 दिसंबर 2014 से प्रभावी एक वाक्य जुड़ा: जो व्यक्ति बीमा अनुबंध के लिए याचना और बातचीत करता है, उसे अनुबंध बनने के प्रयोजन से बीमाकर्ता का एजेंट माना जाएगा। जिसने आपको बेचा, वह क़ानून की नज़र में कंपनी की तरफ़ है।

इसका दूसरा पहलू छिपाना ठीक नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस लाइफ़ इंश्योरेंस बनाम रेखाबेन नरेशभाई राठौड़ (24 अप्रैल 2019) में यह पुराना कथन अपनाया कि प्रस्ताव फ़ॉर्म भरते समय एजेंट बीमित का लेखक बन जाता है, और दस्तखत करके बीमित उन जवाबों को अपना बना लेता है; वहाँ उपभोक्ता शिकायत ख़ारिज हुई। पर वह पॉलिसी सितंबर 2009 की थी और अदालत ने धारा 45 का संशोधन-पूर्व पाठ लगाया। मिस-सेलिंग पर सीधे सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अब तक नहीं है।

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का रिकॉर्ड ज़्यादा काम का है। रिलायंस निप्पॉन लाइफ़ इंश्योरेंस बनाम बालकृष्ण शर्मा और उससे जुड़ी पंद्रह अपीलों में 22 जनवरी 2026 को आयोग ने माना कि 51 से 83 साल के लोगों को बारह साल की पॉलिसी सावधि जमा बताकर बेची गई, ख़ाली फ़ॉर्म पर दस्तखत लिए गए, और एक सेवानिवृत्त लेखाकार की आय पंद्रह लाख तथा पेशा "प्रोफ़ेशनल इंजीनियर" लिख दिया गया। पूरा प्रीमियम साठ दिन में लौटाने का आदेश हुआ, देर पर बारह फ़ीसदी ब्याज के साथ। पर पंद्रह हज़ार का मुआवज़ा और दस हज़ार का ख़र्च रद्द हो गया, इस आधार पर कि शिकायतकर्ता ने फ़्री-लुक का उपलब्ध विकल्प इस्तेमाल नहीं किया।

फ़्री-लुक की घड़ी कब शुरू होती है, इस पर उसी आयोग का एक और फ़ैसला काम आता है। एचडीएफ़सी स्टैंडर्ड लाइफ़ बनाम मनमोहन सिंह शाही (31 जनवरी 2024) में आयोग ने लिखा कि दस्तावेज़ भेजे जाने का सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है, और दस्तावेज़ मिले बिना न फ़्री-लुक शुरू हुई, न परिसीमा। प्रीमियम ब्याज सहित लौटा।

वे चूकें जो अपने आप को महँगी पड़ती हैं

पॉलिसी सरेंडर कर देना या प्रीमियम रोककर उसे लैप्स होने देना सबसे आम चूक है। इससे विवाद ख़त्म नहीं होता, पर आपकी बात कमज़ोर होती है, क्योंकि अनुबंध पर आपकी अपनी कार्रवाई रिकॉर्ड में आ जाती है। शिकायत पहले, फ़ैसला बाद में।

शाखा में जाकर कह आना शिकायत नहीं है। नियम 14(3)(a) लिखित प्रतिनिधित्व माँगता है, चिट्ठी, ईमेल या वेबसाइट पर दर्ज शिकायत, और 2023-24 में 6,552 लोग इसी चूक पर लौटाए गए। पावती संख्या सँभालकर रखिए, क्योंकि एक महीने की गिनती उसी तारीख़ से शुरू होती है।

एक ही मामला आयोग और लोकपाल, दोनों जगह ले जाना अपने हाथ से एक दरवाज़ा बंद करना है। मध्यस्थता की सिफ़ारिश पर हस्ताक्षर से पहले उसे पूरा पढ़िए, क्योंकि नियम 16(2) के तहत स्वीकृति "पूर्ण और अंतिम" मानी जाती है। कंपनी के जवाब के बाद चुप मत रहिए, क्योंकि आठ हफ़्ते की चुप्पी शिकायत बंद करा देती है।

प्रस्ताव फ़ॉर्म ख़ाली या अधूरा छोड़कर किसी और से भरवाना अपने ही सबूत को कमज़ोर करना है। केनरा एचएसबीसी के आदेश में फ़ॉर्म की दो गड़बड़ियों को गंभीरता से लिया गया: शहर बेंगलुरु और राज्य महाराष्ट्र लिखा होना, और "एन्युइटैंट के बैंक विवरण" के नीचे बेटी की जगह पिता का खाता दर्ज होना। आदेश में लिखा है कि ये लिपिकीय भूलें नहीं, इस बात का संकेत हैं कि फ़ॉर्म बिना ध्यान दिए भरा गया।

आपके पास सबसे मज़बूत चीज़ तारीख़ों की एक साफ़ फ़ाइल है: पॉलिसी दस्तावेज़ किस दिन मिला, आपने किस दिन लिखा, कंपनी का जवाब किस दिन आया। तीस दिन, चौदह दिन, एक महीना और एक साल, चारों घड़ियाँ इन्हीं तारीख़ों से चलती हैं।

स्रोतआईआरडीएआई का आदेश, संदर्भ IRDAI/PP&GR/ORD/MISC/118/9/2026: केनरा एचएसबीसी लाइफ़ इंश्योरेंस के मामले में पूरा आदेश, 17 पन्ने, आईआरडीएआई का आदेश, संदर्भ IRDAI/E&C/ORD/MISC/119/9/2026: इंडसइंड बैंक (कॉर्पोरेट एजेंट) के मामले में पूरा आदेश, 14 पन्ने, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 3 खंड 4: आईआरडीएआई (पॉलिसीधारकों के हितों का संरक्षण, बीमाकर्ताओं के परिचालन और संबद्ध कार्य) विनियम, 2024, विनियम 5(9), 6, 7, 20, 21 और 25, आईआरडीएआई का मास्टर परिपत्र, संदर्भ IRDAI/PP&GR/CIR/MISC/117/9/2024, 5 सितंबर 2024: पॉलिसीधारकों के हितों का संरक्षण, मूल परिपत्र की प्रति, बीमा लोकपाल नियम, 2017, 9 नवंबर 2023 तक संशोधित पाठ: नियम 11, 13, 14, 16 और 17; बीमा लोकपाल परिषद की वेबसाइट, बीमा लोकपाल परिषद: अठारह लोकपाल दफ़्तरों के पते, फ़ोन, ईमेल और हर दफ़्तर का क्षेत्राधिकार, बीमा लोकपाल परिषद की वार्षिक रिपोर्ट 2023-24: विवरण L1G1H1 और L7G7H7, तथा लोकपालों की अपनी टिप्पणियाँ (पन्ना 76), आईआरडीएआई की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25: तालिका II.16 (अनुचित व्यापार व्यवहार की शिकायतें) और खंड II.8 (लोकपाल व्यवस्था, अठारह केंद्र, पचास लाख की बढ़ी हुई सीमा), आईआरडीएआई का शिकायत प्रकोष्ठ पन्ना: शिकायत दर्ज करने के तरीक़े, टोल-फ़्री नंबर, आठ हफ़्ते वाली शर्त, और वह पुराना पाठ जो आज भी तीस लाख और सत्रह लोकपाल बताता है, बीमा भरोसा: आईआरडीएआई का शिकायत पोर्टल, जो अप्रैल 2011 में आईजीएमएस के नाम से शुरू हुआ था, बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 45 का वर्तमान पाठ, जो बीमा विधि (संशोधन) अधिनियम, 2015 की धारा 55 से 26 दिसंबर 2014 से प्रभावी हुआ; उपधारा (3) का स्पष्टीकरण इसी में है, उच्चतम न्यायालय, 24 अप्रैल 2019: रिलायंस लाइफ़ इंश्योरेंस बनाम रेखाबेन नरेशभाई राठौड़, सिविल अपील संख्या 4261/2019 का पूरा पाठ, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, 22 जनवरी 2026: रिलायंस निप्पोन लाइफ़ इंश्योरेंस बनाम बालकृष्ण शर्मा, द्वितीय अपील 31/2025 सहित पंद्रह मामले, राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग, 31 जनवरी 2024: एचडीएफ़सी स्टैंडर्ड लाइफ़ बनाम मनमोहन सिंह शाही, प्रथम अपील 296/2018 और 407/2018, भारत का राजपत्र: उपभोक्ता संरक्षण (जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता) नियम, 2021, G.S.R. 912(E), 30 दिसंबर 2021, भारत का राजपत्र: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (2019 का 35) का पूरा पाठ, धारा 69 सहित

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।