बायोकॉन के पेब्रिल्ज़ो को सीएचएमपी की सिफ़ारिश 17 सितंबर को मिली, भारतीय एक्सचेंजों को बताया 21 को, यूरोपीय आयोग की मंज़ूरी अभी बाक़ी है
सोमवार सुबह 8 बजकर 25 मिनट 40 सेकंड पर बायोकॉन के कंपनी सचिव ने बीएसई और एनएसई को भेजी चिट्ठी पर दस्तख़त किए: कंपनी का पर्टुज़ुमैब बायोसिमिलर पेब्रिल्ज़ो, बिना तुलनात्मक परीक्षण वाले यूरोप के एक नए रास्ते से सिफ़ारिश पाने वाली दुनिया की पहली दवा बन गया है। रिलीज़ की अपनी आख़िरी पंक्तियाँ कहती हैं कि जब तक यूरोपीय आयोग मंज़ूरी नहीं देता, दवा यूरोपीय संघ में बिकने के लिए अधिकृत नहीं है।

सुबह 8 बजकर 25 मिनट 40 सेकंड पर बायोकॉन लिमिटेड के कंपनी सचिव राजेश यू. शानॉय ने बीएसई और एनएसई, दोनों को भेजी चिट्ठी पर डिजिटल दस्तख़त किए। चिट्ठी का नंबर BIO/SECL/TG/2026-27/67 है, तारीख़ 21 सितंबर 2026। साथ नत्थी प्रेस विज्ञप्ति का शीर्षक कहता है कि कंपनी का पर्टुज़ुमैब बायोसिमिलर, ब्रांड नाम पेब्रिल्ज़ो, यूरोप के एक नए रास्ते से सिफ़ारिश पाने वाली दुनिया की पहली बायोसिमिलर दवा बन गया है। यह दावा सही है। यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी, यानी ईएमए, की दवा-समिति सीएचएमपी ने वाक़ई ऐसी सिफ़ारिश दी है, और वाक़ई पहली बार।
फिर भी एक पंक्ति हर जगह छूट रही है।
उसी रिलीज़ की आख़िरी पंक्तियों में कंपनी ख़ुद लिखती है: "Until marketing authorisation is granted by the European Commission, the product is not authorised for use in the European Union." सिफ़ारिश एक बात है। अनुमति दूसरी। दोनों के बीच का फ़ासला अभी बाक़ी है, और उसे पाटने वाली संस्था कोई और है।
एनएसई के अपने रिकॉर्ड में यह फ़ाइलिंग सुबह 8 बजकर 26 मिनट 47 सेकंड पर दर्ज हुई। इस डेस्क ने एक्सचेंज की अपनी फ़ाइलिंग सूची 21 सितंबर की देर शाम तक दोबारा जाँची। उस सुबह के बाद बायोकॉन की तरफ़ से कोई और सूचना दर्ज नहीं थी। पेब्रिल्ज़ो एचईआर2-पॉज़िटिव ब्रेस्ट कैंसर के लिए है, ट्रैस्टुज़ुमैब के साथ दी जाने वाली दवा। मंज़ूरी की प्रक्रिया यूरोपीय है। बीमारी भारत में भी उतनी ही असली है।
सीएचएमपी की सकारात्मक राय, और यूरोपीय आयोग का बाक़ी फ़ैसला
यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी की समिति सीएचएमपी दवाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन करती है और सिफ़ारिश देती है। ईएमए अपने पन्ने पर सीएचएमपी के इसी काम को यूँ बताती है: यह समिति "carry out a scientific assessment of the application and give a recommendation on whether the medicine should be marketed or not"। मंज़ूरी देने या न देने का अधिकार उसके पास नहीं है। ईएमए अपने पन्ने पर यह साफ़ लिखती है: "EMA has no authority to actually permit marketing in the different EU countries." यह ताक़त यूरोपीय आयोग के पास है। वही तय करता है। वही आख़िरी दस्तख़त करता है। ईएमए का यही पन्ना आगे कहता है: "The European Commission is the authorising body for all centrally authorised product, who takes a legally binding decision based on EMA's recommendation." और उस फ़ैसले की एक तय समयसीमा भी है: "This decision is issued within 67 days of receipt of EMA's recommendation." यानी सीएचएमपी की सिफ़ारिश के बाद आयोग के पास फ़ैसला करने के लिए सड़सठ दिन हैं। आयोग का फ़ैसला यूरोपीय संघ के मेडिसिनल प्रोडक्ट्स के सामुदायिक रजिस्टर में दर्ज होता है, यानी एक अलग, सार्वजनिक काग़ज़ जो अभी मौजूद नहीं है। एक बार मिल जाए तो यह मंज़ूरी यूरोपीय संघ के सभी सदस्य देशों में एक साथ लागू होती है, और नॉर्वे, आइसलैंड व लीष्टेंश्टाइन में भी, ईएमए के अपने पन्ने के मुताबिक़। इतने बड़े दायरे का फ़ैसला एक कंपनी की चिट्ठी से नहीं होता।
पेब्रिल्ज़ो को यह लंबा रास्ता चलना ही था, एक और वजह से। ईएमए का अपना नियम बताता है कि केंद्रीकृत प्रक्रिया, यानी सीधे यूरोपीय आयोग तक जाने वाला यही रास्ता, "medicines derived from biotechnology processes, such as genetic engineering" के लिए अनिवार्य है, वैकल्पिक नहीं। पेब्रिल्ज़ो ठीक इसी दायरे में आता है, जीवित कोशिकाओं से बनी जैव-औषधि। इसीलिए किसी एक यूरोपीय देश के अपने नियामक से मंज़ूरी लेने का कोई छोटा रास्ता इस दवा के लिए सिरे से मौजूद ही नहीं था।
बायोकॉन की अपनी रिलीज़ इसी प्रक्रिया को दोहराती है, अपने शब्दों में: "The European Commission will now proceed with the final review of the application and issue its decision." यह वाक्य रिलीज़ के मुख्य दावे के ठीक बाद आता है, हेडलाइन के नीचे, न कि किसी काग़ज़ के पिछले पन्ने पर छुपा हुआ। कोई तारीख़ तय नहीं है। जो तय है, वह सिर्फ़ इतना: फ़ैसला अभी हुआ नहीं। यह बात कंपनी के अपने कहे में भी है, और ईएमए के अपने पन्ने पर भी।
यह फ़र्क़ भारत के अपने प्रशासनिक ढाँचे से मिलता-जुलता है। कैबिनेट किसी योजना को मंज़ूरी देती है, पर उसका लागू होना उस योजना की अधिसूचना छपने पर टिका रहता है। सिफ़ारिश और आदेश के बीच वही खाई यहाँ भी है। बस संस्थाएँ यूरोपीय हैं, और भाषा अंग्रेज़ी।
बायोसिमिलर जेनेरिक नहीं है, ज़िंदा कोशिकाओं की नक़ल है
एक आम दवा, जैसे पैरासिटामोल, एक तय रासायनिक अणु है। इसकी जेनेरिक नक़ल प्रयोगशाला में उसी अणु को दोबारा जोड़कर बनती है, परमाणु दर परमाणु वही। एक जेनेरिक दवा को असली से अलग साबित करने के लिए मरीज़ों पर बड़ा परीक्षण नहीं करना पड़ता। रसायन शास्त्र ख़ुद यह गारंटी देता है।
बायोसिमिलर इस तरह नहीं बनता। पर्टुज़ुमैब जैसी दवा एक प्रोटीन है। यह प्रोटीन जीवित कोशिकाओं में उगाया जाता है, संवर्धित कोशिका-लाइनों में, किसी रासायनिक भट्टी में नहीं। हर बैच थोड़ा अलग होता है, ख़ुद असली दवा के अपने बैचों में भी। इसीलिए ईएमए का रिफ़्लेक्शन पेपर बायोसिमिलर को यूँ परिभाषित करता है: "A biosimilar is a biological medicinal product that contains a version of the active substance of an already authorised original biological medicinal product (Reference Medicinal Product, RMP), where similarity to the reference medicinal product based on a comprehensive comparability exercise has been established." शब्द "वर्ज़न" और "समानता" ध्यान देने लायक़ हैं। न "प्रतिलिपि", न "बराबर"।

इसी परिभाषा से नियामक की पूरी जाँच-प्रणाली तीन हिस्सों में बँटती है। पहला हिस्सा प्रयोगशाला में होता है: प्रोटीन की बनावट, उसकी तह, उसकी शुद्धता, कोशिकाओं पर उसका जैविक असर। यह सब बार-बार, कई तरीक़ों से मापा जाता है। दूसरा हिस्सा मरीज़ों या स्वस्थ लोगों पर होता है: दवा शरीर में कैसे टिकती है, कितनी देर टिकती है। तीसरा हिस्सा वह है जिसे अब तक हर बायोसिमिलर से माँगा जाता था, कैंसर मरीज़ों के दो समूहों पर सीधी तुलना, यह देखने के लिए कि नतीजे एक जैसे आते हैं या नहीं। पेब्रिल्ज़ो के मामले में यही तीसरा हिस्सा हटा दिया गया है। अगले हिस्से में यही बदलाव है।
तुलनात्मक परीक्षण की जगह प्रयोगशाला का सबूत
जिसे "कैंपेरेटिव एफ़िकेसी स्टडी" कहा जाता है, वह अब तक बायोसिमिलर मंज़ूरी की सबसे भारी शर्त थी: मरीज़ों के दो समूह, एक असली दवा पर, दूसरा नक़ल पर, नतीजों की तुलना। सीएचएमपी ने 27 मार्च 2026 को एक रिफ़्लेक्शन पेपर अपनाया, दस्तावेज़ संख्या EMA/CHMP/BMWP/60916/2025, जिसका मसौदा 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2025 तक सार्वजनिक टिप्पणी के लिए खुला रहा था। पेपर का हल वाक्य यह है: "Comparative Efficacy Studies (CES) may not be required for well characterised biological substances where the analytical comparability exercise provides a more sensitive determination of biosimilarity, in conjunction with PK and appropriate safety studies." शब्द ग़ौर करने लायक़ है: "may not be required", "will not be required" नहीं। यह छूट अपने आप किसी को नहीं मिलती। हर दवा के लिए अलग से तय होती है, "well characterised" होने की शर्त पर।
नियामक का अपना तर्क यह है कि प्रयोगशाला की तुलना अब मरीज़ों पर परीक्षण से ज़्यादा बारीक़ फ़र्क़ पकड़ सकती है, कम-से-कम कुछ दवाओं के लिए। यह दावा पहली नज़र में उलटा लगता है। एक क्लिनिकल परीक्षण असली मरीज़ों पर असली नतीजे दिखाता है, जबकि विश्लेषण सिर्फ़ अणु को माप रहा होता है। पर पेपर का अपना कारण भी दर्ज है: विश्लेषण की तकनीकें बीते बरसों में बहुत संवेदनशील हो गई हैं, और नियामकों के पास अब उतने बरसों का अनुभव भी जमा है। नतीजतन, कई मामलों में मरीज़ों पर सीधी तुलना कुछ नया नहीं जोड़ती। वह सिर्फ़ जोखिम जोड़ती है, बिना नई जानकारी दिए।

नियम 27 मार्च 2026 से लागू है। पेब्रिल्ज़ो पर सीएचएमपी का फ़ैसला 17 सितंबर को आया। दोनों तारीख़ों के बीच छह महीने से कम का फ़ासला है, एक ही बरस के भीतर। एक नियम बनता है। उसी बरस पहली दवा उससे गुज़र जाती है। यह रफ़्तार ख़ुद एक तथ्य है, चाहे उसका मूल्यांकन जो भी हो।
एक कंपनी के दो नाम, एक ख़बर की तीन तारीख़ें
ईएमए के अपने पन्ने पर आवेदक कंपनी का नाम "Biosimilar Collaborations Ireland Limited" दर्ज है। बायोकॉन की 21 सितंबर की रिलीज़ में वही कंपनी "Biocon Biologics Ireland Limited (formerly Biosimilar Collaborations Ireland Limited)" लिखी गई है। दोनों नाम एक ही इकाई के हो सकते हैं, अगर बदलाव आवेदन और राय के बीच कभी हुआ हो। यह डेस्क वह तारीख़ पता नहीं कर सकी। दोनों दस्तावेज़ जस के तस दर्ज हैं, फ़ैसला पाठक पर।
कंपनी का ढाँचा ख़ुद तीन परतों में है। बायोकॉन लिमिटेड एक्सचेंजों में सूचीबद्ध है और चिट्ठी उसी के लेटरहेड पर है। रिलीज़ के मुताबिक़ "announced" करने वाली इकाई बायोकॉन बायोलॉजिक्स लिमिटेड है, बायोकॉन लिमिटेड की पूर्ण अनुषंगी। और आयरलैंड की जिस कंपनी ने ईएमए के पास असली आवेदन दिया, वह इस दूसरी कंपनी की भी अनुषंगी है, यानी परदादी, दादी और पोती जैसी तीन इकाइयाँ, एक ही समूह में।
तारीख़ों का फ़ासला भी उतना ही साफ़ है। समिति ने फ़ैसला 17 सितंबर को लिया। ईएमए ने अपने पन्ने पर यह ख़बर 18 सितंबर को छापी। बायोकॉन ने भारतीय एक्सचेंजों को 21 सितंबर की सुबह बताया। भारतीय पाठक के लिए यह आज की ख़बर है। यूरोप के दस्तावेज़ में यह तीन दिन पुरानी है।
बायोकॉन: बारह बायोसिमिलर, और ब्राज़ील में पहले से एक क़रार
बायोकॉन अपनी रिलीज़ में ख़ुद को यूँ बताती है: दुनिया भर में "12 biosimilar products and 30+ generic formulations", और आगे "20+ biosimilar assets" विकास की कतार में। कंपनी अपने बारे में यह भी लिखती है कि वह "more than 120 countries" में काम करती है, सात विनिर्माण इकाइयों और तीन शोध केंद्रों के साथ। ये सारे आँकड़े कंपनी के अपने हैं। किसी नियामक ने इनकी पुष्टि नहीं की है। कंपनी के सीईओ श्रीहास तांबे का बयान भी रिलीज़ में दर्ज है, और उसका एक हिस्सा उद्धरण लायक़ है: "the first monoclonal antibody biosimilar to receive a positive CHMP opinion under EMA's tailored clinical development approach"। ईएमए का अपना पन्ना इतना बड़ा दावा नहीं करता। वह सिर्फ़ इतना कहता है कि पेब्रिल्ज़ो "the first biosimilar medicine recommended for approval following the tailored clinical approach" है, बिना "मोनोक्लोनल एंटीबॉडी" शब्द जोड़े। दोनों वाक्य एक-दूसरे को ग़लत नहीं ठहराते, पर दायरा अलग है, और फ़र्क़ लिखने लायक़ है।
पर्टुज़ुमैब पर बायोकॉन का यह पहला क़दम नहीं है। 8 सितंबर 2026 को कंपनी ने अपनी अलग रिलीज़ में बताया था कि उसने ब्राज़ीलियाई कंपनियों बायाफ़ार्मा और बायोनोविस के साथ मिलकर ब्राज़ील के दस-बरसी "प्रोडक्टिव डेवलपमेंट पार्टनरशिप" कार्यक्रम में पर्टुज़ुमैब की पूरी हिस्सेदारी हासिल की। रिलीज़ के अपने शब्दों में, यह हिस्सेदारी उस बाज़ार तक पहुँच देती है "which accounts for approximately 70% of the country's demand for Pertuzumab"। यह ब्राज़ील का अलग नियामक ढाँचा है, यूरोप से जुड़ा नहीं। दोनों प्रक्रियाओं को गड्डमड्ड करने की ज़रूरत नहीं। पर यह दिखाता है कि पर्टुज़ुमैब बायोकॉन के लिए नया अणु नहीं है। कंपनी इसे पहले से, अलग-अलग बाज़ारों में, बना और बेच रही है।
भारत के मरीज़ के लिए जवाब सीडीएससीओ के पास नहीं मिला
इस रिपोर्ट में पढ़े गए सारे दस्तावेज़ (बायोकॉन की चिट्ठी, ईएमए की दोनों वेबसाइटें) भारत की बात कहीं नहीं करते। यह यूरोपीय संघ की प्रक्रिया है, यूरोपीय संघ के लिए। भारत में पर्टुज़ुमैब का कोई बायोसिमिलर सीडीएससीओ से मंज़ूर है या नहीं, इस डेस्क ने दवा नियंत्रक की सार्वजनिक सूचियों में यह तलाशा और तय जवाब नहीं मिला। नई दवाओं की जो सूचियाँ वेबसाइट पर हैं, वे किसी एक अणु के नाम से खोजी जा सकने लायक़ रूप में नहीं हैं।
इसलिए यह लिखना ग़लत होगा कि यूरोप की सिफ़ारिश का किसी भारतीय मरीज़ पर कोई सीधा असर है। यूरोपीय मंज़ूरी भारतीय मंज़ूरी नहीं है। दोनों अलग नियामक हैं, अलग आवेदन, अलग समयरेखा। बायोकॉन भारत में यही दवा बेचना चाहे तो उसे सीडीएससीओ के पास अलग से आवेदन करना होगा, यूरोप की फ़ाइल से बिल्कुल अलग। ऐसा कोई आवेदन आज दर्ज है या नहीं, यह भी पता नहीं चल सका। जो पता है, वह इतना: आज किसी भारतीय मरीज़ के इलाज में कुछ नहीं बदला।
एचईआर2, वह रिसेप्टर जो कोशिका को बढ़ने का इशारा देता है
एचईआर2 एक प्रोटीन है जो कुछ कोशिकाओं की सतह पर बैठता है और कोशिका को बढ़ते रहने का संकेत भेजता है। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के पीडीक्यू कैंसर-उपचार सारांश के मुताबिक़, "Approximately 20% to 25% of patients with breast cancer have tumors that overexpress HER2." यानी हर चार में क़रीब एक मरीज़ की गाँठ में यह प्रोटीन ज़रूरत से ज़्यादा बनता है, और कोशिका को रुकने का मौक़ा नहीं मिलता।
ट्रैस्टुज़ुमैब वह पहली दवा थी जिसने इसी प्रोटीन को निशाना बनाया, 1990 के दशक से। उसके बाद और दवाएँ जुड़ती गईं। वही सारांश दर्ज करता है: "Several HER2-targeted agents (e.g., trastuzumab, pertuzumab, trastuzumab emtansine, lapatinib) have been approved for treatment of this disease." पर्टुज़ुमैब इसी सूची में है, ट्रैस्टुज़ुमैब के साथ जोड़ी में इस्तेमाल होने वाली दवा। दोनों एचईआर2 को अलग-अलग जगह से पकड़ती हैं। यह लेख इलाज की सलाह नहीं देता। यह सिर्फ़ इतना बताता है कि जिस बायोसिमिलर की बात हो रही है, वह किस असली दवा की जगह लेने के लिए बनी है।

पेब्रिल्ज़ो की सिफ़ारिश तीन हालात के लिए है, बायोकॉन की रिलीज़ के मुताबिक़: सर्जरी से पहले, ट्रैस्टुज़ुमैब और कीमोथेरेपी के साथ, ऐसे मरीज़ों में जिनकी बीमारी बढ़ने का जोखिम ज़्यादा है; सर्जरी के बाद, उसी जोखिम-समूह में; और उस हालत में जहाँ बीमारी शरीर में फैल चुकी है या दोबारा लौट आई है, और पहले कोई एचईआर2-केंद्रित इलाज या कीमोथेरेपी नहीं हुई हो। यह ब्यौरा सीएचएमपी की सिफ़ारिश के दायरे का है। किसी मरीज़ के लिए निर्देश नहीं।
स्रोतबायोकॉन लिमिटेड का पत्र BIO/SECL/TG/2026-27/67, 21 सितंबर 2026, बीएसई (532523) और एनएसई (BIOCON) को भेजा गया, कंपनी सचिव राजेश यू. शानॉय के डिजिटल दस्तख़त सुबह 8:25:40 बजे, साथ नत्थी प्रेस विज्ञप्ति, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज: बायोकॉन लिमिटेड की कॉर्पोरेट फ़ाइलिंग सूची, 21 सितंबर 2026 को शाम तक पढ़ी गई; 21 सितंबर की इकलौती प्रविष्टि सुबह 8:26:47 बजे की है, यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (ईएमए): सीएचएमपी की 14-17 सितंबर 2026 की बैठक की हाइलाइट्स, पन्ने पर दर्ज तारीख़ 18 सितंबर 2026, यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी: 'रिफ़्लेक्शन पेपर ऑन अ टेलर्ड क्लिनिकल अप्रोच इन बायोसिमिलर डेवलपमेंट', EMA/CHMP/BMWP/60916/2025, अपनाया गया 27 मार्च 2026, मसौदे पर टिप्पणी की अवधि 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2025, यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी: 'ऑथराइज़ेशन ऑफ़ मेडिसिन्स', केंद्रीकृत प्रक्रिया और यूरोपीय आयोग की भूमिका पर ईएमए का अपना स्पष्टीकरण पन्ना, बायोकॉन लिमिटेड: प्रेस विज्ञप्ति, 8 सितंबर 2026, 'Biocon Secures 10-Year Supply Contract for Pertuzumab in Brazil', अमेरिका का नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट: पीडीक्यू कैंसर सूचना सारांश, 'ब्रेस्ट कैंसर ट्रीटमेंट' (हेल्थ प्रोफ़ेशनल वर्ज़न), 21 सितंबर 2026 को पढ़ा गया