भारत पन्ना
समझिए

सीडीएससीओ ने डेंगू टीके को 4 से 60 बरस के लिए मंज़ूरी दी, डब्ल्यूएचओ की सिफ़ारिश 6 से 16 बरस तक सीमित है

भारत के दवा नियामक की विषय विशेषज्ञ समिति ने 19 मार्च 2026 को टाकेडा के डेंगू टेट्रावैलेंट टीके के आयात की संस्तुति 4 से 60 बरस की उम्र के लिए की। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 3 मई 2024 के अपने पोज़ीशन पेपर में इसी टीके की सिफ़ारिश 6 से 16 बरस के बच्चों के लिए की है, और सिर्फ़ तेज़ संक्रमण वाले इलाक़ों में। ये एक ही फ़ैसले के दो रूप नहीं, दो अलग संस्थाओं के दो अलग फ़ैसले हैं।

हिमाचल प्रदेश के कसौली में केंद्रीय अनुसंधान संस्थान का परिसर, दिसंबर 2007 की तस्वीर; इसी क़स्बे की केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला देश में टीकों की सरकारी जाँच करती है
तस्वीर: Varun Kutty, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

डेंगू का टीका भारत में किस उम्र के लोगों के लिए है? इस सवाल के दो जवाब हैं। दोनों काग़ज़ पर लिखे हैं, दोनों सही हैं, और दोनों एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते।

पहला जवाब भारत के दवा नियामक का है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ की विषय विशेषज्ञ समिति (टीका) ने 19 मार्च 2026 की बैठक में टाकेडा बायोफ़ार्मास्युटिकल्स इंडिया के डेंगू टेट्रावैलेंट टीके के आयात की संस्तुति 4 से 60 बरस की उम्र के लोगों के लिए की। दूसरा जवाब विश्व स्वास्थ्य संगठन का है। डब्ल्यूएचओ के 3 मई 2024 के पोज़ीशन पेपर में इसी टीके की सिफ़ारिश 6 से 16 बरस के बच्चों के लिए है, और वह भी सिर्फ़ उन जगहों के लिए जहाँ डेंगू का संचरण तेज़ है।

फ़र्क़ संख्या का नहीं, फ़ैसले की क़िस्म का है। नियामक यह तय करता है कि कोई उत्पाद बाज़ार में बेचा जा सकता है या नहीं, किस लेबल के साथ और किन शर्तों पर। सलाहकार निकाय यह तय करता है कि सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम में किस आबादी को टीका लगाने से कितना फ़ायदा होगा। पहला दरवाज़ा खोलता है, दूसरा रास्ता बताता है। दोनों अलग सबूत देखते हैं।

18 सितंबर, शुक्रवार को यह फ़र्क़ ख़बर बन गया। डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीज़ ने उसी सुबह 8:53 बजे बीएसई, एनएसई, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज और एनएसई आईएफ़एससी को सेबी विनियम 30 के तहत बताया कि उसने टाकेडा के साथ क्यूडेंगा के लिए भारत के निजी बाज़ार का विशेष वितरण और विपणन समझौता किया है। काग़ज़ में एक वाक्य है जिस पर कम ध्यान गया: समझौते में कोई अग्रिम राशि या पड़ाव भुगतान नहीं है, और बाक़ी व्यावसायिक शर्तें गोपनीय हैं। टीका बाज़ार में 2027 की पहली छमाही में आने का अनुमान है।

19 मार्च की बैठक और उसकी छह महीने वाली शर्त

समिति की कार्यवृत्ति छह पन्नों की है और पाँच प्रस्तावों पर है। डेंगू का टीका उसमें पहली मद है, फ़ाइल संख्या BIO/IMP/24/000037 के साथ। काग़ज़ बताता है कि 28 अगस्त 2025 की पिछली बैठक की संस्तुति के बाद कंपनी ने तीसरे चरण के भारतीय परीक्षण की पूरी नैदानिक अध्ययन रिपोर्ट जमा की। उस परीक्षण का शीर्षक भी दर्ज है, और शीर्षक में ही उसका दायरा लिखा है: भारत में 4 से 60 बरस के स्वस्थ प्रतिभागियों में टीके की सुरक्षा और प्रतिरक्षाजनकता की जाँच।

प्रतिरक्षाजनकता यानी इम्यूनोजेनिसिटी का मतलब है, टीके के बाद शरीर में एंटीबॉडी कितनी बनीं। यह असरदारी नहीं है। असरदारी तब नापी जाती है जब टीका लगे और न लगे, दोनों समूहों में बीमारी की गिनती की जाए और अंतर निकाला जाए। भारतीय परीक्षण में यह नहीं हुआ। समिति ने ख़ुद दर्ज किया कि यह अध्ययन 480 स्वस्थ वयस्कों, किशोरों और बच्चों पर दो समूहों में हुआ, और उसका मक़सद सुरक्षा और प्रतिरक्षाजनकता आँकना था।

समिति ने दस बिंदु नोट किए। टीका 41 देशों में मंज़ूर है, यूरोपीय संघ में चार बरस की उम्र से ऊपर के लिए संकेतित है, डब्ल्यूएचओ की पूर्व-योग्यता सूची में है, वैश्विक परीक्षण डेन-301 में 20,099 प्रतिभागी थे, और शुरुआत से अब तक क़रीब 2 करोड़ 44 लाख ख़ुराकें बाँटी जा चुकी हैं। छह महीने बाद, 18 सितंबर की विज्ञप्ति में यही गिनती 43 देशों और 3 करोड़ 20 लाख से ज़्यादा ख़ुराकों की है, और इन 43 में भारत भी जुड़ चुका है। दसवाँ बिंदु सबसे अहम है। उसमें समिति ने ख़ुद लिखा कि डब्ल्यूएचओ के पोज़ीशन पेपर के मुताबिक़ संगठन 6 से 16 बरस की उम्र में, तेज़ संचरण वाले इलाक़ों में, नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में टीका शामिल करने की सिफ़ारिश करता है।

अगला पैराग्राफ़ इसी के तुरंत बाद आता है और 4 से 60 की संस्तुति करता है। यानी वह उम्र-सीमा जानकारी के अभाव में तय नहीं हुई। समिति ने डब्ल्यूएचओ की संकरी सिफ़ारिश अपने ही काग़ज़ में दर्ज की और फिर चौड़ा लाइसेंस सुझाया, जो नियामक का अधिकार है।

संस्तुति के साथ एक शर्त भी है, और भारत में छपी किसी ख़बर में वह नहीं मिली। समिति ने कहा कि कंपनी को भारतीय बाज़ार में टीका आने के छह महीने के भीतर भारतीय आबादी में विपणन-पश्चात सुरक्षा और प्रभाव अध्ययन कराना होगा। घड़ी बाज़ार में उतरने की तारीख़ से चलेगी। कंपनी का अनुमान 2027 की पहली छमाही का है, इसलिए यह अध्ययन 2027 के आख़िर तक होना चाहिए।

डब्ल्यूएचओ 6 से 16 बरस पर क्यों रुका

डब्ल्यूएचओ का पोज़ीशन पेपर वीकली एपिडेमियोलॉजिकल रिकॉर्ड के अंक 18 में, 3 मई 2024 को छपा। उसमें संगठन की स्थिति तीन हिस्सों में है, और तीनों अलग बात कहते हैं।

पहला हिस्सा कहता है कि देश इस टीके को अपने नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में उन भौगोलिक जगहों पर शामिल करने पर विचार करें जहाँ डेंगू के संचरण की तीव्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी समस्या बनी हुई है। दूसरा हिस्सा उसी पैराग्राफ़ में है और उसे सीमित करता है। उसका अनुवाद: जब तक सीरोनेगेटिव लोगों में डेंगू-3 और डेंगू-4 का असर-जोखिम प्रोफ़ाइल और अच्छी तरह आँक नहीं लिया जाता, डब्ल्यूएचओ कम से मध्यम डेंगू संचरण वाली जगहों पर टीएके-003 के कार्यक्रम-आधारित इस्तेमाल की सिफ़ारिश नहीं करता।

सीरोनेगेटिव का मतलब है वह व्यक्ति जिसे पहले कभी डेंगू नहीं हुआ, यानी जिसके ख़ून में डेंगू के ख़िलाफ़ एंटीबॉडी नहीं हैं। सीरोपॉज़िटिव उसका उल्टा है। डेंगू के हर टीके का सबसे कठिन सवाल यही है, क्योंकि पहला संक्रमण आम तौर पर हल्का होता है और दूसरा गंभीर।

तीसरा हिस्सा उम्र पर है और सबसे सीधा है। डब्ल्यूएचओ 6 से 16 बरस के बच्चों में, तेज़ संचरण वाली जगहों पर, टीके के इस्तेमाल की सिफ़ारिश करता है। इसके ठीक बाद एक वाक्य और है, जिसका अनुवाद: डब्ल्यूएचओ फ़िलहाल 6 बरस से छोटे बच्चों में टीएके-003 के कार्यक्रम-आधारित इस्तेमाल की सिफ़ारिश नहीं करता, क्योंकि इस आयु वर्ग में टीके की असरदारी कम है। इसके साथ यह भी दर्ज है कि इस उम्र में डेंगू की सीरोपॉज़िटिविटी दर आम तौर पर कम रहती है, तेज़ संचरण वाली जगहों पर भी।

जेनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन का मुख्यालय, दीवार पर संगठन का चिह्न, मई 2007 की तस्वीर; उम्र वाली सिफ़ारिश इसी संगठन के पोज़ीशन पेपर से आती है
तस्वीर: Yann Forget, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

कितना तेज़ संचरण? दस्तावेज़ कहता है कि कोई सटीक सीमा नहीं है, पर नौ बरस की उम्र में 60 फ़ीसदी से ऊपर सीरोप्रिवैलेंस को तेज़ संचरण का संकेत माना जा सकता है, और यह भी कि डेंगू से होने वाले अस्पताल-भर्तियों की औसत उम्र 16 बरस से कम हो। इन दोनों पैमानों पर भारत का कोई आँकड़ा न समिति की कार्यवृत्ति में दर्ज है, न संसदीय समिति की प्रकाशित सिफ़ारिशों में।

टीका लगाने से पहले जाँच कराने पर भी संगठन की राय दर्ज है। उसका अनुवाद: तेज़ डेंगू संचरण वाली जगहों पर टीकाकरण को सीरोपॉज़िटिव लोगों तक सीमित रखने की पूर्व-जाँच रणनीति की सिफ़ारिश नहीं की जाती, क्योंकि इससे टीकाकरण का सार्वजनिक स्वास्थ्य असर बहुत घट जाएगा और कार्यक्रम की लागत बढ़ेगी।

चार और पाँच बरस की उम्र में असर 44 फ़ीसदी

डब्ल्यूएचओ का 6 बरस वाला वाक्य हवा में नहीं है। उसके नीचे डेन-301 परीक्षण का उम्र-वार विश्लेषण है, और वह पोज़ीशन पेपर में छपा है।

शुरुआती सीरोस्टेटस को अलग रखकर देखें तो वायरस-पुष्ट डेंगू के ख़िलाफ़ टीके की असरदारी 4 से 5 बरस के बच्चों में सबसे कम रही, 44 फ़ीसदी, जिसका 95 फ़ीसदी विश्वास अंतराल 25 से 57 है। यही आँकड़ा 6 से 11 बरस में 64 फ़ीसदी (57 से 69) और 12 से 16 बरस में 68 फ़ीसदी (58 से 75) है। विश्वास अंतराल यानी वह दायरा जिसमें असली मूल्य होने की संभावना 95 फ़ीसदी है; दायरा जितना चौड़ा, अनुमान उतना कमज़ोर।

दस्तावेज़ अपनी ही संख्या पर एक चेतावनी भी लगाता है। 4 से 5 बरस वाले समूह में सीरोपॉज़िटिव और सीरोनेगेटिव, दोनों में अनुमान बड़ी उम्र के मुक़ाबले नीचे थे, पर इस पर डेंगू-3 के मामलों के ऊँचे अनुपात और इस समूह के छोटे आकार का असर पड़ा हो सकता है।

पोज़ीशन पेपर में इंपीरियल कॉलेज के गणितीय मॉडल के नतीजे भी हैं। मॉडल ने अनुमान लगाया कि 4 से 5 बरस के बच्चों में हर सीरोटाइप के लिए असरदारी 6 से 16 बरस वालों से कम रहेगी, और इसी आयु वर्ग में डेंगू-3 तथा डेंगू-4 से जुड़े प्रतिकूल नतीजों का जोखिम ज़्यादा रहेगा। मॉडल के अपने नतीजों की सीमा भी दर्ज है: 6 से 12 बरस में 80 फ़ीसदी कवरेज मानकर चलें तो आबादी के स्तर पर टले हुए मामलों का औसत अनुपात 15 फ़ीसदी और अस्पताल-भर्तियों का 20 फ़ीसदी से ऊपर नहीं जाता।

भारत ने मंज़ूरी 4 बरस से दी है। यही वह आयु-पट्टी है जिस पर परीक्षण के भीतर असर सबसे कमज़ोर निकला।

सत्रह से साठ बरस के लिए असरदारी का कोई परीक्षण नहीं हुआ

उम्र के दूसरे सिरे पर सवाल और बड़ा है, और इसका जवाब डब्ल्यूएचओ की ग्रेड तालिकाओं में है। ग्रेड वह ढाँचा है जिससे विशेषज्ञ किसी सबूत की मज़बूती को चार से एक तक अंक देते हैं।

तालिका 7a वयस्कों पर है। उसका निष्कर्ष इन शब्दों में लिखा है, अंग्रेज़ी मूल से अनुवाद: अठारह बरस और उससे ऊपर के किशोरों और वयस्कों में किसी भी सीरोटाइप से होने वाले वायरस-पुष्ट डेंगू के ख़िलाफ़ टीएके-003 की असरदारी आँकने वाले अध्ययन अभी तक नहीं हुए हैं। सिर्फ़ प्रतिरक्षाजनकता के नतीजे उपलब्ध हैं। असरदारी का अनुमान वयस्कों में बनी न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडी के स्तर की उन बच्चों से तुलना करके लगाया गया है जिनमें असरदारी के आँकड़े मौजूद हैं।

यह तुलना कहाँ से आई, यह भी दर्ज है। बच्चों का आँकड़ा डेन-301 से है, जो एशिया और लैटिन अमेरिका के डेंगू-स्थानिक इलाक़ों में हुआ। वयस्कों का आँकड़ा अमेरिका के ग़ैर-स्थानिक इलाक़ों में 18 से 60 बरस के लोगों पर हुए लॉट-टू-लॉट संगति अध्ययन से है। दोनों में सिर्फ़ शुरुआत में सीरोनेगेटिव रहे लोगों को लिया गया ताकि तुलना बेहतर हो, फिर भी दस्तावेज़ ने आमने-सामने की तुलना न होने पर एक अंक काटा।

दो अंक और कटे। कारण दर्ज है: एंटीबॉडी स्तर पर आधारित यह अनुमान इसलिए कमज़ोर है क्योंकि सुरक्षा का कोई अच्छा सहसंबंधी नहीं है, यानी यह ज्ञात नहीं है कि एंटीबॉडी कितनी हों तो बीमारी रुक जाती है।

चार में से एक अंक बचा।

भारतीय आँकड़ा इस खाई को नहीं भरता। 480 लोगों वाला भारतीय परीक्षण सुरक्षा और प्रतिरक्षाजनकता का था, असरदारी का नहीं। तुलना के लिए: डेन-301 में 20,099 प्रतिभागी थे और 57 महीने में 1,007 वायरस-पुष्ट डेंगू के मामले दर्ज हुए।

डेंगू-3 और डेंगू-4 पर आँकड़ा शून्य से नीचे चला जाता है

डेंगू के चार सीरोटाइप हैं और यह टीका डेंगू-2 की रीढ़ पर बना है, जिसमें बाक़ी तीन के संरचनात्मक प्रोटीन जोड़े गए हैं। दो ख़ुराकें, तीन महीने के अंतर पर, त्वचा के नीचे। परीक्षण के 57 महीने के आँकड़ों में चारों सीरोटाइप पर नतीजे एक जैसे नहीं हैं।

सीरोटाइपसीरोपॉज़िटिव बच्चों में असरदारी, फ़ीसदीसीरोनेगेटिव बच्चों में असरदारी, फ़ीसदी
डेंगू-156.1 (44.6 से 65.2)45.4 (26.1 से 59.7)
डेंगू-280.4 (73.1 से 85.7)88.1 (78.6 से 93.3)
डेंगू-352.3 (36.7 से 64.0)−15.5 (−108.2 से 35.9)
डेंगू-470.6 (39.9 से 85.6)−105.6 (−628.7 से 42.0)

इस तालिका के बारे में पहली बात यह है कि ऋणात्मक अनुमान नुक़सान का सबूत नहीं है। डेंगू-3 के सीरोनेगेटिव खाने में विश्वास अंतराल −108 से 36 तक फैला है, यानी आँकड़ा बड़े नुक़सान और ठीक-ठाक फ़ायदे, दोनों से मेल खाता है। डेंगू-4 में यह और चौड़ा है। डब्ल्यूएचओ ने दोनों खानों को अपने पैमाने पर सबसे नीचे रखा है, चार में से एक अंक, यानी बहुत कम भरोसा।

वजह मामलों की गिनती है। 57 महीने में सीरोनेगेटिव प्रतिभागियों में डेंगू-3 के कुल 52 मामले हुए, और इनका बड़ा हिस्सा फ़िलीपींस से आया, जहाँ छोटी उम्र वालों का अनुपात ऊँचा था। डेंगू-4 के ऐसे मामले उसी अवधि में 15 थे। इतनी कम संख्या पर कोई भी अनुपात बहुत दूर तक हिलता है। दस्तावेज़ की अपनी दो पादटिप्पणियाँ आपस में भी नहीं मिलतीं: एक में डेंगू-3 के मामले 52 हैं, अगली में 54।

अस्पताल में भर्ती होने वाले डेंगू-3 पर एक और चीज़ दिखती है, और वह तरीक़े की है। श्रीलंका के केंद्रों पर जिस भी प्रतिभागी की एनएस1 जाँच सकारात्मक आई, उसे निगरानी के लिए भर्ती कर लिया गया। वहाँ 103 में से 70 मामले भर्ती हुए, जबकि बाक़ी सब जगहों पर 457 में से 72। भर्ती की दर चार गुना से ऊपर थी। सीरोनेगेटिव बच्चों में अस्पताल-भर्ती वाले डेंगू-3 के ख़िलाफ़ असरदारी श्रीलंका के आँकड़े समेत −87.9 फ़ीसदी (−573.4 से 47.6) है, और श्रीलंका को हटा दें तो वही आँकड़ा 15.3 फ़ीसदी (−254.4 से 79.9) हो जाता है। कुल मामले 14 थे। एक देश के भर्ती करने के नियम ने चिह्न बदल दिया।

डेंगू की एनएस1 त्वरित जाँच, नतीजा सकारात्मक, मार्च 2020 की तस्वीर; यह परीक्षण केंद्रों की तस्वीर नहीं है, पर भर्ती का पैमाना यही जाँच थी
तस्वीर: Ajay Kumar Chaurasiya, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

गंभीर डेंगू और डेंगू रक्तस्रावी बुखार की गिनती भी छोटी है और उसे पूरा पढ़ना ज़रूरी है। सीरोनेगेटिव प्रतिभागियों में गंभीर डेंगू का एक भी मामला प्लेसीबो समूह में नहीं था और टीका समूह में दो थे, दोनों डेंगू-3 के; संख्या इतनी कम है कि असरदारी निकाली ही नहीं जा सकी। डब्ल्यूएचओ के 1997 के मानकों पर डेंगू रक्तस्रावी बुखार के मामले सीरोनेगेटिव में प्लेसीबो के दो थे और टीके के चार, चारों डेंगू-3 के, जिससे निकला अनुमान −3 फ़ीसदी है और उसका अंतराल −464 से 81 तक जाता है। सीरोपॉज़िटिव प्रतिभागियों में वही आँकड़ा 81 फ़ीसदी (46 से 93) है।

डब्ल्यूएचओ ने अपने निष्कर्ष में यह लिखा है, अंग्रेज़ी मूल से अनुवाद: डेंगू-3 के संपर्क में आए सीरोनेगेटिव टीकाकृत लोगों में असरदारी की अनुपस्थिति है। अनुमान ऋणात्मक हैं और विश्वास अंतराल चौड़े। सुरक्षा के जोखिम से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह सावधानी बिना इतिहास के नहीं है। इसी पोज़ीशन पेपर में डेंगू के पहले लाइसेंस वाले टीके सीवाईडी-टीडीवी, यानी सनोफ़ी के डेंगवैक्सिया, के बारे में दर्ज है कि नैदानिक परीक्षणों में वह उन लोगों में असरदार और सुरक्षित पाया गया जिन्हें पहले डेंगू हो चुका था, पर जो टीके के बाद अपना पहला प्राकृतिक संक्रमण झेलते हैं, उनमें वह गंभीर डेंगू का जोखिम बढ़ा देता है। उस टीके के लिए डब्ल्यूएचओ की सिफ़ारिश पूर्व-जाँच की है।

टाकेडा ने टीआईडीईएस के लेखकों के साथ लांसेट ग्लोबल हेल्थ में फ़रवरी 2024 में जो छपवाया, उसमें यही बात उनके अपने शब्दों में है: शुरुआत में सीरोनेगेटिव प्रतिभागियों में डेंगू-1 और डेंगू-2 के ख़िलाफ़ असरदारी दिखी, पर डेंगू-3 के ख़िलाफ़ नहीं दिखी, और डेंगू-4 के लिए मामलों की कम संख्या ने आकलन ही नहीं होने दिया। इस अनिश्चितता को पाटने के लिए अध्ययन नियोजित है: दक्षिण-पूर्व एशिया के उन इलाक़ों में, जहाँ डेंगू-3 और डेंगू-4 घूमते हैं, 70,000 प्रतिभागियों का समूह, हर एक का शुरुआती सीरोस्टेटस दर्ज, कम से कम 36 महीने।

आईसीएमआर की जाँच: 6,889 नमूनों में डेंगू-2 सबसे आगे

अगर भारत में मुख्य रूप से डेंगू-2 घूमता है तो यह तालिका एक तरह से पढ़ी जाएगी, और अगर डेंगू-3 तथा डेंगू-4 भी हैं तो दूसरी तरह। इसका जवाब भारत के अपने आँकड़े में है।

आईसीएमआर के वायरस अनुसंधान एवं नैदानिक प्रयोगशाला नेटवर्क ने 2023 से 2025 के बीच 165 में से 45 प्रयोगशालाओं में, 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में, डेंगू के 6,889 सकारात्मक सीरम नमूनों की रियल-टाइम पीसीआर जाँच की। नतीजे सितंबर 2026 के इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ इन्फ़ेक्शियस डिज़ीज़ेज़ में छपे। हर क्षेत्र में एक से ज़्यादा सीरोटाइप साथ-साथ घूमते मिले, आठ राज्यों में चारों मिले, और पूरे अध्ययन काल में डेंगू-2 सबसे आगे रहा।

नई दिल्ली के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र में लगी स्वचालित रियल-टाइम पीसीआर मशीन, मई 2020 की तस्वीर; सीरोटाइप की पहचान इसी तकनीक से निकलती है
तस्वीर: Press Information Bureau, Government of India, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

यानी भारत में इस वक़्त सबसे ज़्यादा वही सीरोटाइप है जिस पर यह टीका सबसे मज़बूत है, और वे दो भी मौजूद हैं जिन पर आँकड़ा सबसे कमज़ोर है। दोनों बातें एक साथ सच हैं। अध्ययन ने एक बात और दर्ज की: एक से ज़्यादा सीरोटाइप के एक साथ संक्रमण में प्लेटलेट गिरने, जोड़ों के दर्द और रक्तस्राव की आशंका एकल-सीरोटाइप संक्रमण के मुक़ाबले ज़्यादा पाई गई।

डॉ. रेड्डीज़ की विज्ञप्ति ने इसी अध्ययन का हवाला देकर लिखा है कि हर 14 में से एक मरीज़ एक साथ कई सीरोटाइप से संक्रमित मिला। शोधपत्र के प्रकाशित सार में यह अनुपात नहीं है और पूरा पाठ इस मशीन से नहीं खुला, इसलिए यह लेख उस संख्या को कंपनी की विज्ञप्ति का दावा मानकर छोड़ रहा है।

सीडीएससीओ की अपनी सूची में यह मंज़ूरी दर्ज नहीं है

अब तक इस लेख में जो कुछ है, वह समिति की संस्तुति है। संस्तुति मंज़ूरी नहीं होती। मंज़ूरी भारत के औषधि महानियंत्रक देते हैं, और उसका अपना क्रमांक, अपनी तारीख़ और अपनी शर्तें होती हैं। वह काग़ज़ सार्वजनिक नहीं है।

सीडीएससीओ अपनी वेबसाइट पर हर साल मंज़ूर हुई नई दवाओं की सूची छापता है। 2026 की सूची एक पन्ने की है, वेबसाइट पर उसकी जारी तिथि 12 मार्च 2026 दर्ज है, और उसमें तीन प्रविष्टियाँ हैं: ब्रेक्सपिप्राज़ोल की गोलियाँ (16 फ़रवरी 2026), ब्रेक्सपिप्राज़ोल का थोक औषधि रूप (24 फ़रवरी 2026) और सोटोरासिब की गोलियाँ (10 मार्च 2026)। सूची की तिथि समिति की बैठक से सात दिन पहले की है। भारत के पहले डेंगू टीके की मंज़ूरी इस पन्ने पर नहीं है, और सितंबर तक इस पन्ने का कोई नया संस्करण भी नहीं आया।

यह चुप्पी वेबसाइट की आदत नहीं है। उसी वेबसाइट के टीका खंड पर 23 अप्रैल 2026 को चढ़ी सूची है, जिसका शीर्षक है देश में 22 अप्रैल 2026 तक मंज़ूर कोविड-19 टीके। समिति की 19 मार्च वाली कार्यवृत्ति 20 मार्च को, यानी अगले ही दिन, वेबसाइट पर आ गई थी। सिफ़ारिश 24 घंटे में छपती है, लाइसेंस छह महीने में भी नहीं।

मंज़ूरी का महीना दो जगह से मिलता है, और दोनों नियामक के बाहर से। डॉ. रेड्डीज़ और टाकेडा की संयुक्त विज्ञप्ति कहती है कि सीडीएससीओ ने विपणन अनुमति जुलाई 2026 में 4 से 60 बरस की उम्र के लिए दी। दूसरा स्रोत संसद है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 175वीं रिपोर्ट, जो 7 अगस्त 2026 को राज्यसभा में पेश हुई और लोकसभा के पटल पर रखी गई, अपनी सिफ़ारिश 28 में दर्ज करती है कि सीडीएससीओ और डीसीजीआई ने 4 से 60 बरस की उम्र के लोगों के लिए आधिकारिक मंज़ूरी दे दी है, और तीन महीने के अंतर पर दो ख़ुराकें लगेंगी। तारीख़ वहाँ भी नहीं है।

उसी सिफ़ारिश का शीर्षक और उसका पाठ एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। शीर्षक है, तेज़ संचरण वाली जगहों पर क्यूडेंगा टीके की तैनाती। पाठ में तेज़ संचरण की शर्त दोबारा नहीं आती; वह सीधे यह सिफ़ारिश करता है कि क्यूडेंगा को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में तेज़ी के साथ शामिल किया जाए। उसी पैराग्राफ़ में समिति का आधार भी दर्ज है: क्यूडेंगा डेंगू के चारों सीरोटाइप पर असरदार है। डब्ल्यूएचओ की ग्रेड तालिकाएँ यही बात सीरोनेगेटिव लोगों के लिए नहीं कहतीं।

बाज़ार तक पहुँचने से पहले के बाक़ी फ़ैसले

बाज़ार में आने का समय दो काग़ज़ों में दो तरह लिखा है। कंपनी की 18 सितंबर वाली विज्ञप्ति 2027 की पहली छमाही कहती है, और 7 अगस्त की संसदीय रिपोर्ट 2027 के मध्य। दोनों काग़ज़ों के बीच छह हफ़्ते का फ़ासला है। कंपनी अपनी तारीख़ को स्थानीय अधिकारियों के साथ लागू प्रक्रियाएँ पूरी होने पर निर्भर भी बताती है।

क़ीमत कहीं दर्ज नहीं है। सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल करने पर सरकार का कोई फ़ैसला भी नहीं आया है; संसदीय समिति की सिफ़ारिश सिफ़ारिश है, और टाकेडा इसे अपनी विज्ञप्ति में अहम दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा कहता है। समझौते के मुताबिक़ सार्वजनिक बाज़ार टाकेडा के पास ही है, साथ ही निर्माण, आयात और भारत में क्यूडेंगा का क़ानूनी स्वामित्व तथा समग्र चिकित्सा और ब्रांड निगरानी के अधिकार।

भारत के अपने दो टीके अभी परीक्षण में हैं। डेंगीऑल पर आईसीएमआर और पैनेशिया बायोटेक का तीसरे चरण का परीक्षण 14 अगस्त 2024 को रोहतक के पीजीआईएमएस में पहले प्रतिभागी के साथ शुरू हुआ, 18 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 19 जगहों पर, 10,335 से ज़्यादा वयस्कों के साथ और दो साल की अनुवर्ती अवधि के साथ। नतीजे अभी सार्वजनिक नहीं हैं। इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स के टीके का संशोधित दूसरे चरण का प्रोटोकॉल उसी विषय विशेषज्ञ समिति ने 28 अप्रैल 2026 को मंज़ूर किया।

बीमारी के बढ़ने के पैमाने पर भी दो अलग दावे चल रहे हैं। डॉ. रेड्डीज़ और टाकेडा की विज्ञप्ति कहती है कि पिछले दो दशकों में भारत में दर्ज मामले ग्यारह गुना बढ़े हैं। इसके लिए वह कल्पना बरुआ के 2021 के पर्चे का हवाला देती है, जिसका पता विज्ञप्ति के संदर्भों में रिसर्चगेट का दिया गया है, किसी सरकारी श्रृंखला का नहीं। सरकार की अपनी श्रृंखला इतनी पीछे जाती ही नहीं।

एनसीवीबीडीसी की डेंगू तालिका इस बीच रुकी हुई है। पन्ने पर आख़िरी बार बदलने की तिथि 16 सितंबर 2026 दर्ज है, पर आँकड़े 28 फ़रवरी 2026 तक ही हैं और अनंतिम हैं। उसमें 2023 के 2,89,235 मामले और 485 मौतें हैं, 2024 के 2,33,519 और 297, और 2025 के 1,21,824 और 131। पश्चिम बंगाल के 2025 और 2026 के खाने ख़ाली हैं, जबकि 2023 में उस राज्य के 30,683 मामले दर्ज थे। राष्ट्रीय गिरावट कितनी बीमारी की है और कितनी रिपोर्टिंग की, यह तालिका नहीं बताती।

स्रोतकेंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ): विषय विशेषज्ञ समिति (टीका) की 19.03.2026 की बैठक का कार्यवृत्त, 6 पन्ने, मद 1, फ़ाइल BIO/IMP/24/000037 (वेबसाइट पर 20 मार्च 2026 को चढ़ाया गया), विश्व स्वास्थ्य संगठन: डेंगू टीकों पर पोज़ीशन पेपर, वीकली एपिडेमियोलॉजिकल रिकॉर्ड अंक 18, 3 मई 2024, वर्ष 99, पन्ने 203 से 224, विश्व स्वास्थ्य संगठन: टीएके-003 पर ग्रेड तालिकाएँ, 54 पन्ने, तालिका 1a से 8b, डेन-301 परीक्षण के 57 महीने के आँकड़ों पर, विश्व स्वास्थ्य संगठन: टीएके-003 पर सबूत-से-सिफ़ारिश तालिका, 11 पन्ने, डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीज़ लिमिटेड: सेबी (एलओडीआर) विनियम 30 के तहत बीएसई, एनएसई, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज और एनएसई आईएफ़एससी को 18 सितंबर 2026 को दी गई सूचना, संलग्न प्रेस विज्ञप्ति समेत, बिस्वाल और अन्य, न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन, 21 नवंबर 2019, अंक 381(21), पन्ने 2009 से 2019: टीआईडीईएस परीक्षण का प्राथमिक असरदारी विश्लेषण, त्रिकू और अन्य, लांसेट ग्लोबल हेल्थ, फ़रवरी 2024, अंक 12(2), पन्ने e257 से e270: टीएके-003 के साढ़े चार साल के नतीजे, राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीवीबीडीसी), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय: देश में डेंगू के मामले और मौतें, 2021 से 2026, पन्ने पर दर्ज तिथि 16 सितंबर 2026, तालिका 28 फ़रवरी 2026 तक अनंतिम, राज्यसभा सचिवालय, पत्र सूचना कार्यालय, 7 अगस्त 2026, शाम 7:16: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 175वीं, 176वीं और 177वीं रिपोर्ट पर विज्ञप्ति; 175वीं रिपोर्ट की सिफ़ारिश 28, पैरा 8.12, पत्र सूचना कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, 14 अगस्त 2024: आईसीएमआर और पैनेशिया बायोटेक ने डेंगीऑल का तीसरे चरण का परीक्षण शुरू किया, सीडीएससीओ: वर्ष 2026 में अब तक मंज़ूर नई दवाओं की सूची, 1 पन्ना, तीन प्रविष्टियाँ, वेबसाइट पर जारी होने की तिथि 12 मार्च 2026, सीडीएससीओ: विषय विशेषज्ञ समिति (टीका) की 28.04.2026 की बैठक का कार्यवृत्त, मद 2, इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स का संशोधित द्वितीय चरण प्रोटोकॉल, फ़ाइल BIO/CT/25/000131, देशपांडे और अन्य, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ इन्फ़ेक्शियस डिज़ीज़ेज़, सितंबर 2026, अंक 170, लेख 108897: 2023 से 2025 तक 45 वीआरडीएल में 6,889 नमूनों की सीरोटाइप जाँच, टाकेडा फ़ार्मास्युटिकल कंपनी, 3 नवंबर 2025, ओसाका और कैम्ब्रिज: टीआईडीईएस परीक्षण के सात साल के नतीजों की घोषणा, यूरोपीय औषधि एजेंसी: क्यूडेंगा का यूरोपीय सार्वजनिक मूल्यांकन प्रतिवेदन, विपणन अनुमति 5 दिसंबर 2022, संकेत चार बरस की उम्र से ऊपर, ऊपरी सीमा के बिना, विश्व स्वास्थ्य संगठन, 15 मई 2024: टीएके-003 को 10 मई 2024 को पूर्व-योग्यता सूची में शामिल किया गया

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।