भारत पन्ना
समझिए

एम्स के बोर्ड पर आबादी हर सेकंड बदलती है, और भारत की आख़िरी गिनती 2011 में हुई थी

दिल्ली के एम्स में लगा डिजिटल बोर्ड 4 सितंबर को 1,47,92,39,016 दिखा रहा था। यह संख्या किसी बच्चे के जन्म से नहीं बदलती। यह एक सूत्र से बदलती है, जो पंद्रह साल पुरानी गिनती पर टिका है।

दिल्ली का एक सरकारी अस्पताल
तस्वीर: Ministry of Health and Family Welfare, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एक डिजिटल बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है: भारत की जनसंख्या।

नीचे एक संख्या है जो रुकती नहीं। 4 सितंबर को किसी ने उसका वीडियो बनाया तो वह 1,47,92,39,016 पर थी, और उसके आख़िरी अंक लगातार बदल रहे थे।

वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया और उसके साथ एक सवाल भी: संस्थान को पता कैसे चलता है कि अभी-अभी कहीं कोई बच्चा पैदा हुआ।

जवाब यह है कि उसे पता नहीं चलता।

घड़ी क्या दिखा रही है

आबादी की घड़ी घटनाएँ नहीं गिनती, दर चलाती है।

उसमें एक सूत्र भरा होता है जिसमें तीन चीज़ें होती हैं: जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवासन। इन तीनों से यह निकलता है कि एक साल में आबादी कितनी बढ़ेगी। उस सालाना बढ़त को सेकंडों में बाँट दिया जाता है, और घड़ी उसी हिसाब से आगे सरकती रहती है।

तो जब बोर्ड पर अंक बदलता है, तब कोई बच्चा पैदा हुआ हो यह ज़रूरी नहीं। यह उतना ही तय है जितना घड़ी की सुई का आगे बढ़ना, और उतना ही किसी असल घटना से जुड़ा हुआ।

अंकों का बदलना सटीकता जैसा दिखता है। है वह उसका उल्टा।

यह तरीक़ा एम्स ने ईजाद नहीं किया। अमेरिका का जनगणना ब्यूरो अपनी वेबसाइट पर ऐसी ही घड़ी चलाता है और उसके साथ साफ़ लिखता है कि यह प्रक्षेपण है। कई देशों में ऐसी घड़ियाँ सार्वजनिक जगहों पर लगी हैं। उनका मक़सद जानकारी देना कम, पैमाने का अहसास कराना ज़्यादा होता है।

फ़र्क़ इस बात में है कि साथ में क्या लिखा है।

जो असल संख्या है, वह कहाँ से आती है

बोर्ड जिस बुनियाद पर खड़ा है, वह 2011 की जनगणना है।

उस साल भारत की आबादी 121.08 करोड़ गिनी गई थी। यह गिनती लाखों गणकों ने घर-घर जाकर की थी और यही आख़िरी बार था जब भारत ने अपने लोगों को सचमुच गिना।

2021 में अगली जनगणना होनी थी। कोविड के कारण वह टल गई।

तब से जो भी संख्या आप सुनते हैं, वह प्रक्षेपण है। राष्ट्रीय जनसंख्या प्रक्षेपण रिपोर्ट के मुताबिक़ आबादी 2011 की 121.1 करोड़ से बढ़कर 2036 तक 152.2 करोड़ होगी। संयुक्त राष्ट्र अपने विश्व जनसंख्या संभावनाएँ अध्ययन में इसी तरह का हिसाब लगाता है।

प्रक्षेपण का मतलब यह है कि आप पुरानी गिनती लेते हैं, उस पर दरें चलाते हैं, और आगे का अंदाज़ा निकालते हैं।

अंदाज़ा जितना पुराना आधार होगा, उतना कमज़ोर होगा। और भारत का आधार अब पंद्रह साल पुराना है।

प्रक्षेपण में जो दरें चलाई जाती हैं, वे भी बदलती रहती हैं। भारत की प्रजनन दर पिछले दो दशकों में तेज़ी से गिरी है और अब प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आँकी जाती है। जब आधार पुराना हो और दरें बदल रही हों, तो दोनों की ग़लतियाँ जुड़ती हैं, कटती नहीं।

इसीलिए अलग-अलग संस्थाओं के प्रक्षेपण एक-दूसरे से करोड़ों में फ़र्क़ रखते हैं, और वह फ़र्क़ किसी बोर्ड पर नहीं दिखता।

एक बात जो अक्सर छूट जाती है

गाँव में एक बैठक। जनगणना की गिनती घर-घर जाकर की जाती है
तस्वीर: Rohan Pinto, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अप्रैल 2023 में ख़बर आई थी कि भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश बन गया है।

वह ख़बर किसी भारतीय गिनती पर नहीं टिकी थी। वह संयुक्त राष्ट्र के अनुमान पर टिकी थी।

यानी जिस दिन भारत ने यह दर्जा हासिल किया, उस दिन भारत के पास अपनी आबादी का कोई ताज़ा आँकड़ा नहीं था। दो देशों की तुलना दो अनुमानों की तुलना थी।

यह कहना नहीं है कि अनुमान ग़लत था। यह कहना है कि उसे गिनती की तरह पढ़ा गया, जबकि वह गिनती नहीं थी।

भारत में गिनती की परंपरा पुरानी है। पहली आधुनिक जनगणना 1872 में हुई, और 1881 से वह हर दस साल पर एक ही तय तारीख़ को पूरे देश में एक साथ होने लगी। उसके बाद विश्व युद्ध, विभाजन और आपातकाल में भी यह सिलसिला नहीं टूटा।

2021 पहला मौक़ा था जब यह चक्र टूटा। और वह टूट अब तक जुड़ी नहीं है।

पर कुछ तो असल में गिना जाता है

अभी-अभी जन्मा एक बच्चा। हर जन्म का पंजीकरण अनिवार्य है, पर वह किसी राष्ट्रीय संख्या में उसी दिन नहीं जुड़ता
तस्वीर: Avdhesh, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

भारत में हर जन्म और हर मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है। यह काम नागरिक पंजीकरण प्रणाली करती है, और यही वह जगह है जहाँ असली घटनाएँ दर्ज होती हैं।

इस प्रणाली की 2024 की रिपोर्ट कहती है कि उस साल अनुमानित जन्मों में से 99.1 फ़ीसदी पंजीकृत हुए और मृत्युओं में से 99.4 फ़ीसदी।

यह बड़ी उपलब्धि है। सन 2000 तक भारत में सिर्फ़ 56 फ़ीसदी जन्म पंजीकृत होते थे।

तो सवाल बनता है: अगर निन्यानबे फ़ीसदी जन्म दर्ज हो रहे हैं, तो घड़ी उन्हीं से क्यों नहीं चलती।

दो कारण, और दूसरा ज़्यादा दिलचस्प है

पहला कारण समय का है। पंजीकरण की जानकारी तुरंत ऊपर नहीं पहुँचती। रिपोर्ट सालाना बनती है और सालों की देरी से छपती है। जिस दिन बच्चा पैदा होता है, उस दिन वह किसी राष्ट्रीय संख्या में नहीं जुड़ता।

दूसरा कारण गहरा है।

वह 99.1 फ़ीसदी वाला आँकड़ा ख़ुद एक अनुमान है।

पंजीकरण की पूर्णता नापने के लिए दर्ज जन्मों की तुलना अनुमानित जन्मों से की जाती है, और वे अनुमानित जन्म नमूना पंजीकरण प्रणाली से आते हैं। नमूना पंजीकरण प्रणाली देश भर के चुने हुए इलाक़ों में लगातार चलने वाला एक सर्वेक्षण है।

और अध्ययन कहते हैं कि यह सर्वेक्षण ख़ुद जन्म और मृत्यु कम गिन सकता है।

अगर हर की गिनती कम है, तो जो अनुपात उससे निकलेगा वह ज़्यादा दिखेगा। यानी पंजीकरण की पूर्णता जितनी बताई जा रही है, वह उससे कम हो सकती है।

एक संख्या यह बताती है कि दूसरी संख्या कितनी पूरी है, और पहली संख्या ख़ुद एक नमूने से आती है।

जहाँ यह सबसे ज़्यादा दिखता है

पंजीकरण प्रणाली की रिपोर्ट में एक आँकड़ा है जो इस दिक़्क़त को साफ़ दिखा देता है।

दर्ज हुई शिशु मृत्युओं में से 84.2 फ़ीसदी शहरी इलाक़ों से आईं और 15.8 फ़ीसदी ग्रामीण इलाक़ों से।

भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा गाँवों में रहता है, और शिशु मृत्यु दर गाँवों में शहरों से ज़्यादा रही है। इस आँकड़े को उसी हिसाब से पढ़िए तो साफ़ है कि गाँवों में शिशु मृत्यु का बड़ा हिस्सा दर्ज ही नहीं हो रहा।

निन्यानबे फ़ीसदी वाला वाक्य और यह वाक्य एक ही रिपोर्ट में हैं।

नमूना पंजीकरण प्रणाली ख़ुद 1964-65 में इसी कमी को पाटने के लिए शुरू हुई थी। उस वक़्त पंजीकरण इतना अधूरा था कि जन्म और मृत्यु दर का कोई भरोसेमंद अंदाज़ा नहीं मिलता था, इसलिए तय हुआ कि देश भर के चुने हुए नमूना इलाक़ों में लगातार निगरानी रखी जाए और वहाँ की हर घटना दर्ज की जाए।

साठ साल बाद स्थिति उलट गई है। पंजीकरण लगभग पूरा बताया जाता है, और उसकी पूर्णता जाँचने के लिए अब भी वही नमूना प्रणाली इस्तेमाल होती है जो उसकी कमी पाटने बनी थी।

एक और बात इसी रिपोर्ट में है। मृत्यु का दर्ज हो जाना यह नहीं बताता कि मौत किस वजह से हुई। बड़ी संख्या में मौतों का चिकित्सकीय प्रमाणन नहीं होता, इसलिए बीमारी और मृत्यु के कारणों के विश्लेषण में यह डेटा उतना काम नहीं आता जितना दिखता है।

असली गिनती इसी वक़्त चल रही है

पंचायत का दफ़्तर। मकान सूचीकरण का काम इसी स्तर से चलता है
तस्वीर: रोहन पिंटो, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यह सब पढ़ते हुए एक बात ध्यान में रखने लायक़ है।

भारत अभी अपनी अगली जनगणना कर रहा है।

गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक़ जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 है। उससे पहले का चरण, मकान सूचीकरण, 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच होना है, और हर राज्य उसमें अपने तीस दिन तय करता है।

यानी जिस महीने वह बोर्ड वायरल हुआ, उसी महीने देश भर में गणक घरों की सूची बना रहे थे।

लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल तथा उत्तराखंड के बर्फ़ से ढके इलाक़ों के लिए संदर्भ तिथि अलग रखी गई है, क्योंकि वहाँ मार्च में पहुँचना मुश्किल होता है।

जनगणना दो चरणों में होती है और दोनों अलग काम करते हैं। पहले चरण में हर मकान की सूची बनती है और उसकी बनावट, सुविधाएँ तथा उसमें रहने वाले परिवारों का ब्योरा दर्ज होता है। दूसरे चरण में, संदर्भ तिथि के आसपास, हर व्यक्ति की गिनती होती है।

यानी अभी जो चल रहा है वह लोगों की गिनती नहीं, उन घरों की सूची है जिनमें जाकर बाद में गिनती की जाएगी।

इस जनगणना में दो चीज़ें पहली बार हैं

पहली, यह पूरी तरह डिजिटल होगी। गणक मोबाइल ऐप से जानकारी भरेंगे, नागरिकों के लिए ख़ुद अपनी जानकारी भरने का विकल्प होगा, और निगरानी वास्तविक समय में होगी।

दूसरी, इसमें जाति की गिनती होगी।

आज़ाद भारत की किसी जनगणना में जाति की पूरी गिनती नहीं हुई है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति हमेशा गिनी गईं, बाक़ी नहीं। पूरी जाति गणना आख़िरी बार 1931 में हुई थी, अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में।

पंचानबे साल का अंतराल है, और उन पंचानबे सालों में देश की हर आरक्षण नीति, हर कल्याण योजना और हर राजनीतिक हिसाब उसी पुराने आँकड़े या उसके अनुमानों पर चलता रहा है।

इस जनगणना का एक और नतीजा है जिस पर इस वक़्त संसद में झगड़ा चल रहा है। लोकसभा की सीटें राज्यों के बीच आबादी के अनुपात से बँटती हैं, और वह बँटवारा 1971 की जनगणना पर जमा हुआ है। नई गिनती आने पर उसे फिर से करना होगा।

जिन राज्यों ने आबादी तेज़ी से रोकी, उनका हिस्सा उस हिसाब में घटेगा। यही वजह है कि दक्षिण के राज्य इस सवाल पर सतर्क हैं, और यही वजह है कि जनगणना कब होगी यह सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं रह गया।

घड़ी की अपनी गणित

बोर्ड को थोड़ी देर देखिए तो उसकी रफ़्तार का अंदाज़ा लग जाता है, और वह रफ़्तार ख़ुद एक जानकारी है।

भारत की आबादी में सालाना शुद्ध बढ़ोतरी इस समय क़रीब डेढ़ करोड़ आँकी जाती है। एक साल में सेकंड होते हैं तीन करोड़ पंद्रह लाख से कुछ ज़्यादा। डेढ़ करोड़ को उससे भाग दीजिए तो हर दो सेकंड में एक व्यक्ति आता है।

यानी बोर्ड पर इकाई का अंक हर दो सेकंड में एक बार बढ़ना चाहिए, न इससे तेज़ न धीमा। वह किसी अस्पताल से जुड़ा नहीं है, किसी रजिस्टर से नहीं, किसी ख़बर से नहीं।

और यह शुद्ध बढ़ोतरी है, जन्मों की संख्या नहीं। जन्म इससे कहीं ज़्यादा होते हैं, मृत्युएँ उनमें से घटती हैं, और जो बचता है वही घड़ी में दिखता है। किसी एक सेकंड में देश में कई बच्चे पैदा हो रहे होते हैं और कई लोग मर रहे होते हैं। बोर्ड इनमें से कुछ नहीं दिखाता, सिर्फ़ इनका अंतर दिखाता है।

घड़ी में असल में ग़लत क्या है

घड़ी का अनुमान होना ग़लत नहीं है। अनुमान लगाना पड़ता है, और आबादी का अनुमान लगाने के तरीक़े गंभीर और परखे हुए हैं।

ग़लत यह है कि घड़ी अनुमान को गिनती की शक्ल में पेश करती है।

अगर बोर्ड पर लिखा होता कि यह प्रक्षेपित आबादी है, आधार वर्ष 2011, तो कोई दिक़्क़त नहीं थी। दिक़्क़त उन आख़िरी तीन अंकों से है जो बदलते रहते हैं और देखने वाले को यक़ीन दिलाते हैं कि कहीं कोई गिन रहा है।

आँकड़ों में इसे झूठी सटीकता कहते हैं। जब आप किसी अनुमान को उससे ज़्यादा दशमलव तक लिखते हैं जितने की गारंटी आपका तरीक़ा देता है, तो आप जानकारी नहीं बढ़ाते, भरोसा बढ़ा देते हैं। और वह भरोसा बेबुनियाद होता है।

एक करोड़ की ग़लती भी उस बोर्ड पर वैसी ही दिखेगी। इकाई का अंक फिर भी हर सेकंड बदलता रहेगा।

और यही बात बाक़ी जगह भी लागू होती है

यह अकेले एक बोर्ड की बात नहीं है।

देश की कितनी योजनाएँ आबादी के हिस्से पर बँटती हैं, कितने आवंटन प्रति व्यक्ति के हिसाब से तय होते हैं, कितनी सीटें आबादी के अनुपात से जुड़ी हैं। इन सबका आधार वही 2011 की गिनती है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत कितने लोग सस्ते अनाज के हक़दार हैं, यह भी उसी जनगणना के अनुपात से निकलता है। पंद्रह साल में आबादी बढ़ी है, पर वह अनुपात नहीं बदला।

तो एम्स का बोर्ड एक छोटी सी चीज़ है, पर वह जिस चीज़ पर खड़ा है वह छोटी नहीं है।

शिक्षा का बजट, स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या, आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की तैनाती, संसदीय क्षेत्रों की सीमाएँ, वित्त आयोग का राज्यों के बीच बँटवारा। इन सबमें आबादी कहीं न कहीं एक गुणक है।

जब वह गुणक पंद्रह साल पुराना हो, तो ग़लती एक जगह नहीं रहती। वह हर उस हिसाब में चली जाती है जिसमें वह लगा है, और सबमें एक ही दिशा में जाती है।

अगले साल मार्च में देश गिना जाएगा। उसके बाद बोर्ड पर वही अंक उसी रफ़्तार से चलते रहेंगे, पर उनके नीचे की ज़मीन बदल जाएगी। और तब पहली बार यह पता चलेगा कि पंद्रह साल के अनुमान असल से कितने दूर थे।

स्रोतजनगणना 2011, भारत के महारजिस्ट्रार का कार्यालय, गृह मंत्रालय, जनगणना 2027 की अधिसूचना, संयुक्त राष्ट्र, विश्व जनसंख्या संभावनाएँ 2024, नागरिक पंजीकरण प्रणाली, भारत के महारजिस्ट्रार का कार्यालय

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।