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एचपीवी टीके की 80 लाख ख़ुराकें लगीं, और एक ख़ुराक वाले कार्यक्रम में यह 80 लाख लड़कियाँ भी हैं

स्वास्थ्य मंत्रालय ने 11 सितंबर को राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान का आँकड़ा ख़ुराकों में दिया। कार्यक्रम एक ख़ुराक का है और पहले टीका लगवा चुकी लड़कियाँ इससे बाहर हैं, इसलिए ख़ुराक और लड़की एक ही संख्या हैं। साल भर का लक्ष्य 1.15 करोड़ का है।

एक स्कूली छात्रा को नर्स बाँह में टीका लगा रही है और पीछे नीला टीका-वाहक रखा है, मार्च 2022 की तस्वीर, जब 12 से 14 साल के बच्चों को कोविड का टीका लग रहा था। यह एचपीवी अभियान की तस्वीर नहीं है
तस्वीर: Suyash Dwivedi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान के आँकड़े को स्वास्थ्य मंत्रालय ने 11 सितंबर को ख़ुराकों में गिना: 80 लाख से ज़्यादा।

इस कार्यक्रम में एक लड़की को एक ही ख़ुराक लगती है, और जिन लड़कियों को पहले कोई एचपीवी टीका लग चुका है उन्हें अभियान से बाहर रखा गया है। दोनों बातें स्वास्थ्य मंत्रालय के अपने काग़ज़ों में दर्ज हैं। इनसे 80 लाख ख़ुराकों का अर्थ 80 लाख लड़कियाँ निकलता है, न कम, न ज़्यादा।

साल भर का लक्ष्य 1.15 करोड़ का है।

80 लाख ख़ुराकें, और उतनी ही लड़कियाँ

11 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति (आईडी 2309173) में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने लिखा कि फ़रवरी 2026 में शुरू हुए राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान के तहत 80 लाख से अधिक ख़ुराकें दी जा चुकी हैं। अभियान 28 फ़रवरी 2026 को अजमेर से शुरू हुआ था, और 11 सितंबर तक उसके 195 दिन बीत चुके थे।

दो या तीन ख़ुराक वाले कार्यक्रम में दस लाख ख़ुराकें पाँच या तीन लाख लोगों तक ही पहुँचती हैं। यहाँ वह दिक़्क़त नहीं है। 27 फ़रवरी 2026 की विज्ञप्ति और 17 मार्च 2026 के राज्यसभा उत्तर, दोनों में ब्योरा एक ही है: चौदह साल की लड़कियों को गार्डासिल-4 की एक ख़ुराक, सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर, मुफ़्त, स्वैच्छिक और माता-पिता की सहमति से। पीआईबी रिसर्च यूनिट के 28 फ़रवरी के दस्तावेज़ में टीकाकरण से बाहर रखी गई श्रेणियों में वे लड़कियाँ भी हैं जिन्हें पहले कोई एचपीवी टीका लग चुका है, चाहे वह गार्डासिल हो, गार्डासिल-9, सर्वारिक्स या सर्ववैक। एक लड़की को इस अभियान में एक से ज़्यादा ख़ुराक लग ही नहीं सकती।

मंत्रालय ख़ुद भी दोनों शब्दों को एक ही मान कर चलता है। उसी 11 सितंबर की विज्ञप्ति में शीर्षक ख़ुराकों का है, पर उत्तर प्रदेश का आँकड़ा लड़कियों में दिया गया है: "22 लाख से अधिक किशोरियों को टीका लगाया गया है।"

अब हर का हिसाब। 27 फ़रवरी की विज्ञप्ति और पीआईबी रिसर्च यूनिट का दस्तावेज़, दोनों सालाना लक्ष्य 1.15 करोड़ लड़कियों का बताते हैं। 17 मार्च के राज्यसभा उत्तर और 11 सितंबर की विज्ञप्ति में यही संख्या "लगभग 1.2 करोड़" है, जो भारत के महारजिस्ट्रार के 2021 के अनुमान से निकले चौदह वर्षीय समूह का आकार है। पहला कार्यक्रम का परिचालन लक्ष्य है, दूसरा जनसंख्या अनुमान। किसी भी हर से गिनिए, 80 लाख दो-तिहाई से कुछ ऊपर बैठता है: 1.15 करोड़ पर लगभग 70 प्रतिशत, 1.2 करोड़ पर लगभग 67 प्रतिशत।

समय का हिसाब भी विज्ञप्तियों को साथ रखने पर खुलता है। 27 फ़रवरी की घोषणा में अभियान तीन महीने का था, लॉन्च के 90 दिन के भीतर पंद्रह साल की होने वाली लड़कियाँ भी पात्र थीं, और उसके बाद टीका नियमित टीकाकरण के दिनों पर मिलता रहना था। 90 दिन मई के अंत में पूरे हो गए। 11 सितंबर की विज्ञप्ति कहती है कि अभियान "अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है"।

चौदह साल की उम्र, एक ही ख़ुराक

कार्यक्रम की शर्तें ढीली नहीं हैं। टीका सिर्फ़ उन सरकारी केंद्रों पर लगता है जहाँ चालू कोल्ड चेन पॉइंट हो, टीकाकरण के बाद की प्रतिकूल घटनाओं (एईएफ़आई) के प्रबंधन के लिए तैनात चिकित्सा अधिकारी हो, और इंटरनेट कनेक्टिविटी हो। आयुष्मान आरोग्य मंदिर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, उप-ज़िला और ज़िला अस्पताल तथा सरकारी मेडिकल कॉलेज इसमें आते हैं। हर केंद्र निकटतम 24×7 सरकारी सुविधा से जुड़ा होता है, लड़की को ख़ाली पेट नहीं आना है, और टीके के बाद तीस मिनट निगरानी में रखा जाता है। तीन महीने के अभियान में हर लड़की की बाईं तर्जनी पर निशान लगाया गया।

ओडिशा के एक गाँव में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता शीशी से टीके की ख़ुराक भर रही हैं और पीछे माएँ अपनी बारी का इंतज़ार कर रही हैं, दिसंबर 2011 की तस्वीर। सत्र वहीं लगता है जहाँ चालू कोल्ड चेन पॉइंट हो
तस्वीर: DFID - UK Department for International Development, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

रिकॉर्ड यू-विन पर बनता है, स्टॉक और लॉजिस्टिक्स ईविन पर। प्रमाणपत्र यू-विन से डाउनलोड होता है और उस पर निकटतम 24×7 एईएफ़आई सुविधा का पता तथा हेल्पलाइन नंबर छपा रहता है।

एक ख़ुराक का फ़ैसला नया है। 27 फ़रवरी की विज्ञप्ति इसका आधार गिनाती है: जून 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के टीकाकरण पर रणनीतिक सलाहकार विशेषज्ञ समूह (SAGE) ने निष्कर्ष निकाला कि एक ख़ुराक की सुरक्षा दो ख़ुराक जैसी ही है, और दिसंबर 2022 के डब्ल्यूएचओ स्थिति-पत्र ने 9 से 20 साल की लड़कियों के लिए एक ख़ुराक को प्रभावी तथा कार्यक्रम की दृष्टि से सुविधाजनक विकल्प माना। भारत के राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (NTAGI) की राय भी यही रही। नब्बे से ज़्यादा देश अब एक ख़ुराक पर हैं।

यह बदलाव सरकार के भीतर एक साथ नहीं पहुँचा। 17 दिसंबर 2024 को दिल्ली की एक परिचर्चा में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने एचपीवी टीके की वकालत करते हुए बताया था कि पंद्रह साल से कम की लड़कियों के लिए दो ख़ुराक और उससे ऊपर की लड़कियों के लिए तीन ख़ुराक की सिफ़ारिश है। यह पीआईबी की विज्ञप्ति में दर्ज है। चौदह महीने बाद शुरू हुआ राष्ट्रीय कार्यक्रम एक ख़ुराक पर गया।

उम्र पर एक संकुचन भी हुआ है। डब्ल्यूएचओ का तथ्य-पत्र 9 से 14 साल की सभी लड़कियों को प्राथमिकता मानता है, और 1 फ़रवरी 2024 के अंतरिम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी यही आयु वर्ग गिनाया था। जो कार्यक्रम शुरू हुआ, वह सिर्फ़ चौदह साल की लड़कियों का है।

विज्ञप्ति में तेरह राज्यों के नाम हैं, छत्तीस के नहीं

11 सितंबर की विज्ञप्ति में राज्यवार तस्वीर इस तरह दी गई है। गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और मिज़ोरम ने अपने-अपने लक्षित क्षेत्रों में सौ प्रतिशत कवरेज हासिल किया। बिहार, आंध्र प्रदेश और असम ने नब्बे प्रतिशत से ऊपर, कर्नाटक ने पचासी प्रतिशत से ऊपर, और छत्तीसगढ़, सिक्किम, केरल, तेलंगाना तथा ओडिशा ने साठ प्रतिशत से ऊपर। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उसी दिन यही सूची छापी।

गिनती तेरह की है। 17 मार्च 2026 के राज्यसभा उत्तर के मुताबिक़ अभियान सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रहा है। तेईस के नाम विज्ञप्ति में नहीं हैं, और उनमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड जैसे बड़े नाम हैं। राजस्थान वह राज्य है जहाँ के अजमेर से प्रधानमंत्री ने यह अभियान शुरू किया था।

"सौ प्रतिशत" का पैमाना भी पढ़ने लायक़ है। विज्ञप्ति की भाषा "अपने-अपने लक्षित क्षेत्रों" और "लक्षित समूहों" की है, जनगणना के चौदह वर्षीय समूह की नहीं। 27 फ़रवरी की विज्ञप्ति में लिखा है कि हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के लक्षित समूह के अनुरूप ख़ुराकें पहले ही भेजी जा चुकी हैं। राज्य ने अपने लिए जो लक्ष्य पहचाना और जितनी ख़ुराकें उसे मिलीं, सौ प्रतिशत उसी के सापेक्ष है।

उत्तर प्रदेश अकेले 22 लाख से ज़्यादा है, यानी 80 लाख के राष्ट्रीय जोड़ का 27 प्रतिशत से ऊपर। नामित तेरह में आठ राज्य ऐसे हैं जिनका कवरेज पचासी प्रतिशत से ऊपर बताया गया है, और उनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा गुजरात जैसे सबसे बड़े समूह वाले राज्य हैं। राष्ट्रीय औसत लगभग सत्तर प्रतिशत बैठता है, इसलिए जो तेईस नाम विज्ञप्ति में नहीं आए वे कुल मिला कर औसत से नीचे ही होंगे।

राज्यवार संख्याओं की पूरी तालिका सरकार ने प्रकाशित नहीं की है। 11 सितंबर की विज्ञप्ति ख़ुद कहती है कि यू-विन से कार्यक्रम प्रबंधक ज़िला स्तर पर कवरेज की निगरानी करते हैं और छूटे हुए लाभार्थियों की पहचान करते हैं। जो आँकड़ा ज़िले के स्तर तक मौजूद है, वह राज्य के स्तर पर सार्वजनिक नहीं हुआ।

अभियान और सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम अलग चीज़ें हैं

यह फ़र्क़ सिर्फ़ शब्दों का नहीं है। सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम में टीका आने का अर्थ है एक तय अनुसूची, हर साल का बजट, और मीज़ल्स-रूबेला की तरह गिना जाने वाला कवरेज। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के पन्ने पर यह कार्यक्रम सालाना क़रीब 2.67 करोड़ नवजातों और 2.9 करोड़ गर्भवती महिलाओं को लक्ष्य करता है और बारह बीमारियों से बचाव देता है, नौ राष्ट्रीय स्तर पर तथा तीन उप-राष्ट्रीय स्तर पर। एचपीवी उस सूची में नहीं है। पन्ना ख़ुद पुराना है, क्योंकि उस पर 2019-20 के विस्तार की योजनाएँ भविष्य काल में लिखी हैं।

कर्नाटक के तुमकुर ज़िले में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की दीवार पर कन्नड़ में पुती टीकाकरण की अनुसूची, 2010 की तस्वीर। चार्ट गर्भवती महिलाओं और शिशुओं का है, और एचपीवी उस सूची में आज भी नहीं है
तस्वीर: Prashanthns, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

पिछले साल तक सरकार का जवाब सीधा था। 4 फ़रवरी 2025 को राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि एचपीवी टीका सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है, और साथ में बताया कि सिक्किम ने 2018 में 9 से 14 साल की लड़कियों के लिए इसे शुरू किया था तथा बिहार ने 6 अक्टूबर 2024 से एक राज्य योजना के तहत। द प्रिंट ने उसी दिन यह उत्तर छापा।

उससे पहले की कहानी राज्यों की है। गावी के विवरण के मुताबिक़ पहला बड़े पैमाने का टीकाकरण 2016 में पंजाब के दो ज़िलों में हुआ, जहाँ छठी कक्षा की लड़कियों को टीका लगा। सिक्किम ने 2018 में अपनी राज्य अनुसूची में एचपीवी जोड़ा और स्कूल के ज़रिए चारों ज़िलों में 9 से 14 साल की लड़कियों तक पहुँचा; आईसीएमआर-एनसीडीआईआर के प्रशांत माथुर के हवाले से गावी लिखता है कि कवरेज 97 प्रतिशत रहा। दिल्ली में 11 से 13 साल की लड़कियों के लिए अवसर-आधारित कार्यक्रम चला। यह सब राज्यों के अपने पैसे और अपने फ़ैसले से हुआ।

फ़रवरी 2026 में जो शुरू हुआ, सरकार के अपने काग़ज़ उसे लगातार "अभियान" कहते हैं। 27 फ़रवरी और 17 मार्च, दोनों विज्ञप्तियाँ एक ही वाक्य दोहराती हैं: तीन महीने की अवधि के बाद टीका नियमित टीकाकरण के दिनों पर उपलब्ध रहेगा। पीआईबी के दस्तावेज़ में गावी के साथ फ़रवरी 2023 की तीन-वर्षीय साझेदारी का ज़िक्र है, जिसमें 25 करोड़ डॉलर का उद्देश्य ही यह था कि भारत एचपीवी और टाइफ़ॉइड कॉन्जुगेट टीके को "राष्ट्रीय नियमित टीकाकरण अनुसूची में शामिल" करने में मदद पाए।

पर 11 सितंबर 2026 तक भी मंत्रालय की भाषा अभियान की है, अनुसूची की नहीं, और औपचारिक रूप से शामिल किए जाने की कोई अधिसूचना इस लेख के लिए पढ़ी गई विज्ञप्तियों में नहीं मिली।

सर्वाइकल कैंसर के बोझ के दो सरकारी हिसाब

अब उस सवाल पर, जिसका जवाब सरकार के पास एक नहीं, चार है।

पहला हिसाब आईसीएमआर के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम का है। इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च में छपे सतीशकुमार और साथियों के अध्ययन में 2022 के लिए गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के 79,103 मामलों का अनुमान है और 2025 के लिए 85,241 का प्रक्षेपण। यह 28 जनसंख्या-आधारित कैंसर रजिस्ट्रियों के 2012 से 2016 के आँकड़ों को जनगणना से निकली आबादी पर लगा कर बनता है। मौतों की संख्या 4 फ़रवरी 2025 को राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने लिखित उत्तर में दी: 2019 में 32,246, 2020 में 33,095, 2021 में 33,938, 2022 में 34,806 और 2023 में 35,691।

दूसरा हिसाब आईएआरसी के ग्लोबोकैन का है। स्वास्थ्य मंत्रालय की 27 फ़रवरी 2026 की विज्ञप्ति में लिखा है कि ग्लोबोकैन 2022 के अनुसार भारत में हर साल एक लाख बीस हज़ार से ज़्यादा नए मामले और क़रीब अस्सी हज़ार मौतें होती हैं। आईसीओ/आईएआरसी के भारत तथ्य-पत्र 2023 में यही आँकड़े 1,23,907 मामले और 77,348 मौतें हैं।

मौतों के दोनों आँकड़ों में दोगुने से ज़्यादा का फ़र्क़ है, मामलों में लगभग पचपन प्रतिशत का। दोनों को एक ही सरकार एक ही साल में उद्धृत करती है, और कहीं यह नहीं लिखती कि वे मेल नहीं खाते।

फ़र्क़ की वजह एनसीआरपी की अपनी 2020 रिपोर्ट में लिखी मिलती है: "रजिस्ट्रियों के मौजूदा नेटवर्क के साथ एनसीआरपी देश की लगभग दस प्रतिशत आबादी को कवर करता है। इसलिए देश में होने वाले सारे कैंसर के मामले रजिस्ट्रियों में दर्ज नहीं होते।" उसी रिपोर्ट में यह भी है कि डब्ल्यूएचओ की आईएआरसी इन्हीं आँकड़ों से क्षेत्र के उन देशों के लिए अनुमान बनाती है जिनके पास मज़बूत रजिस्ट्री नहीं है। एक ही कच्चे माल पर दो अलग विधियाँ, और दो अलग नतीजे।

तीसरा आँकड़ा 17 दिसंबर 2024 की पीआईबी विज्ञप्ति में है, जहाँ डॉ. जितेंद्र सिंह के हवाले से कहा गया कि भारत में सर्वाइकल कैंसर से महिलाओं की मृत्यु "सालाना क़रीब एक लाख" बताई जाती है।

चौथा सबसे मुश्किल है। 5 मार्च 2026 को डब्ल्यूएचओ मुख्यालय की प्रेस वार्ता पर जारी पीआईबी विज्ञप्ति में महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस के हवाले से लिखा है कि भारत में हर साल अस्सी हज़ार से ज़्यादा महिलाएँ सर्वाइकल कैंसर से जान गँवाती हैं और सालाना लगभग बयालीस हज़ार नए मामले सामने आते हैं। ये दोनों संख्याएँ इस क्रम में एक साथ सही नहीं हो सकतीं, क्योंकि कोई बीमारी हर साल जितने नए मरीज़ बनाती है उससे दोगुने लोगों को नहीं मार सकती। उसी मंत्रालय की एक हफ़्ते पहले की विज्ञप्ति में मामले सवा लाख से ऊपर और मौतें अस्सी हज़ार के आसपास हैं। दोनों विज्ञप्तियाँ अब भी पीआईबी की वेबसाइट पर हैं।

जिन बातों पर विवाद नहीं है, वे भी दर्ज होनी चाहिए। सर्वाइकल कैंसर भारतीय महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है। एचपीवी के 16 और 18 प्रकार भारत के अस्सी प्रतिशत से ज़्यादा मामलों के पीछे हैं, और आईसीओ/आईएआरसी का तथ्य-पत्र यह हिस्सा 83.2 प्रतिशत बताता है। दुनिया की सर्वाइकल कैंसर मौतों में भारत का हिस्सा एक चौथाई के आसपास है।

स्वदेशी सर्ववैक की जगह मर्क का गार्डासिल-4

1 सितंबर 2022 को डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के पहले स्वदेशी एचपीवी टीके सर्ववैक की घोषणा की थी। यह चतुर्संयोजक टीका जैव प्रौद्योगिकी विभाग और बीआईआरएसी की बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन के साथ साझेदारी से, ग्रैंड चैलेंजेज़ इंडिया कार्यक्रम के तहत, सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के सहयोग से बना। बाज़ार में यह 24 जनवरी 2023 को उतरा।

क़ीमत के आँकड़े उसी दौर के हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 1 सितंबर 2022 को छापा कि सीरम इंस्टिट्यूट के मुख्य कार्यकारी अदार पूनावाला के अनुसार सरकारी कार्यक्रम के लिए क़ीमत 200 से 400 रुपये प्रति ख़ुराक रहेगी। द क्विंट ने 25 जनवरी 2023 की रिपोर्ट में लॉन्च के समय की क़ीमत 2,000 रुपये प्रति ख़ुराक बताई, और उस वक़्त आयातित गार्डासिल 4,000 रुपये तक जाता था। गावी के विवरण में निजी बाज़ार की क़ीमत क़रीब 3,000 रुपये दर्ज है।

दिसंबर 2024 की परिचर्चा में मंत्री ने स्वदेशी टीके को "सस्ता और ज़्यादा प्रभावी" बताया, और आयोजन का समापन इस माँग के साथ हुआ कि एचपीवी टीकाकरण को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल किया जाए।

फ़रवरी 2026 में जो राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू हुआ, उसमें मर्क का गार्डासिल-4 लगता है, सर्ववैक नहीं। पीआईबी के दस्तावेज़ में ख़रीद का रास्ता भी लिखा है: "निर्बाध आपूर्ति और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए टीका गावी, द वैक्सीन अलायंस के साथ साझेदारी में एक पारदर्शी तंत्र से ख़रीदा जा रहा है।" और जिन लड़कियों को पहले सर्ववैक लग चुका है, वे सरकार की अपनी सूची में अभियान से बाहर हैं।

इसकी वजह डब्ल्यूएचओ की सूची में मिलती है। पूर्व-योग्यता (प्रीक्वालिफ़िकेशन) प्राप्त टीकों की डब्ल्यूएचओ सूची में एचपीवी के पाँच उत्पाद हैं: सेकोलिन, सर्वारिक्स, गार्डासिल, गार्डासिल 9 और वालरिनवैक्स। सर्ववैक उस सूची में नहीं है। डब्ल्यूएचओ का तथ्य-पत्र भी यही कहता है कि 2025 तक आठ एचपीवी टीके लाइसेंसशुदा हैं और उनमें से पाँच को पूर्व-योग्यता मिली है। गावी पूर्व-योग्यता प्राप्त टीके ही ख़रीदता है।

प्रति ख़ुराक सरकार ने क्या क़ीमत चुकाई और उसमें गावी का हिस्सा कितना है, यह किसी विज्ञप्ति में नहीं है।

स्वदेशी काम अब जाँच की तरफ़ बढ़ा है। 23 अप्रैल 2025 को डॉ. जितेंद्र सिंह ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग, एम्स, बीआईआरएसी और आईसीएमआर की संयुक्त बैठक में उन आरटी-पीसीआर आधारित स्वदेशी एचपीवी जाँच किटों की समीक्षा की जो GCI-BIRAC-DBT के कार्यक्रम के तहत मान्य ठहराई गईं।

टीका लग रहा है, जाँच एसिटिक एसिड से हो रही है

टीका चौदह साल की लड़कियों को बचाता है। जो महिलाएँ आज तीस, चालीस या पचास की हैं, उनके लिए एक ही रास्ता है, जाँच।

यह जाँच ग़ैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD) के तहत होती है। 5 मार्च 2026 को डब्ल्यूएचओ मुख्यालय की प्रेस वार्ता में स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बताया कि 30 से 65 साल की महिलाओं के लिए एसिटिक एसिड से दृश्य निरीक्षण (VIA) के ज़रिए जाँच आयुष्मान आरोग्य मंदिरों पर उपलब्ध है, और अब तक 8.6 करोड़ से ज़्यादा महिलाओं की जाँच हो चुकी है।

त्रिशूर नगर निगम के कुट्टुमुक्कु डिवीज़न का शहरी स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र, जिसका बोर्ड अब आयुष्मान आरोग्य मंदिर कहता है, नवंबर 2025 की तस्वीर। एसिटिक एसिड वाली जाँच इन्हीं केंद्रों पर मिलती है
तस्वीर: Krishnachandranvn, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

कुल जोड़ के आँकड़े आपस में नहीं मिलते। पाँच दिन बाद, 10 मार्च 2026 को राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने यही संख्या 8.73 करोड़ बताई, जो प्रसार भारती की न्यूज़ ऑन एयर सेवा ने छापी। उससे तेरह महीने पहले, 4 फ़रवरी 2025 को, उन्हीं मंत्री ने राष्ट्रीय एनसीडी पोर्टल के हवाले से 9,00,80,292 महिलाओं की जाँच, 96,747 के निदान और 86,196 के इलाज पर होने का आँकड़ा दिया था, जो द प्रिंट ने उसी दिन छापा। संचयी संख्या तेरह महीने में नौ करोड़ से घट कर साढ़े आठ करोड़ के आसपास कैसे आई, इसका स्पष्टीकरण तीनों में से कहीं नहीं है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पाँचवें दौर (2019-21) में देश भर में 1.9 प्रतिशत महिलाओं ने कभी सर्वाइकल कैंसर की जाँच कराई थी।

जाँच का स्वरूप भी लक्ष्य से मेल नहीं खाता। आईसीओ/आईएआरसी के भारत तथ्य-पत्र में दर्ज है कि राष्ट्रीय सिफ़ारिश 2016 से मौजूद है, उम्र 30 से 65 है, प्राथमिक जाँच VIA है, अंतराल पाँच साल का है, और महिलाओं को जाँच के लिए सक्रिय रूप से बुलाया नहीं जाता। डब्ल्यूएचओ की सिफ़ारिश इससे अलग है: तीस की उम्र से हर पाँच से दस साल में "उच्च-क्षमता जाँच", और जीवन में कम से कम दो बार, 35 और 45 की उम्र तक। एचपीवी डीएनए जाँच उस श्रेणी में आती है, एसिटिक एसिड से दृश्य निरीक्षण नहीं।

समय इस मामले में साथ देता है। डब्ल्यूएचओ के तथ्य-पत्र के मुताबिक़ असामान्य कोशिकाओं को कैंसर बनने में पंद्रह से बीस साल लगते हैं, और कैंसर-पूर्व घावों का इलाज सरल तथा असरदार प्रक्रिया है।

90-70-90 में भारत का पहला खंभा

डब्ल्यूएचओ की वैश्विक रणनीति उन्मूलन की परिभाषा संख्या में देती है: प्रति एक लाख महिलाओं पर सालाना चार या उससे कम नए मामले। वहाँ तक पहुँचने के लिए 2030 के तीन लक्ष्य हैं। पंद्रह साल की उम्र तक नब्बे प्रतिशत लड़कियों का पूर्ण टीकाकरण। 35 और फिर 45 की उम्र तक सत्तर प्रतिशत महिलाओं की उच्च-क्षमता जाँच। और कैंसर-पूर्व या कैंसर से ग्रस्त पाई गईं नब्बे प्रतिशत महिलाओं का इलाज। नड्डा ने 5 मार्च 2026 को कहा कि भारत इस रणनीति और इन लक्ष्यों का पूरा समर्थन करता है।

तीनों खंभों पर भारत की स्थिति एक जैसी नहीं है। पहले पर सरकार का अपना आँकड़ा एक समूह के लगभग सत्तर प्रतिशत का है, और चौदह की उम्र में लगी एक ख़ुराक डब्ल्यूएचओ के नियम के हिसाब से "पंद्रह तक पूर्ण टीकाकरण" में गिनी जाती है। दूसरे पर भारत की नियमित जाँच वह नहीं है जो लक्ष्य माँगता है। तीसरे पर कोई राष्ट्रीय प्रतिशत प्रकाशित नहीं है।

आईसीओ/आईएआरसी के तथ्य-पत्र में भारत की आयु-मानकीकृत घटना दर 18.0 प्रति लाख है; आईसीएमआर-एनसीआरपी के अनुमान में यह 11.6 प्रति लाख बैठती है। उन्मूलन की सीमा चार है।

2010 का प्रोजेक्ट, और उस पर दो सरकारी फ़ैसले

2009 के मध्य में सिएटल की संस्था पाथ ने आईसीएमआर तथा आंध्र प्रदेश और गुजरात की सरकारों के साथ मिल कर एचपीवी टीके की "डेमॉन्स्ट्रेशन परियोजना" चलाई, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन के पैसे से। खम्मम ज़िले में गार्डासिल लगा और वडोदरा में सर्वारिक्स; सरकारी जाँच रिपोर्ट में प्राप्तकर्ताओं की संख्या क्रमशः 14,091 और 10,686 है। सात लड़कियों की मौत हुई, पाँच खम्मम में और दो वडोदरा में, और 2010 में परियोजना रोक दी गई।

पहला सरकारी फ़ैसला 15 फ़रवरी 2011 का है। स्वास्थ्य मंत्रालय की 15 अप्रैल 2010 की अधिसूचना V.25011/160/2010-HR से बनी समिति की अंतिम रिपोर्ट आज भी आईसीएमआर की वेबसाइट पर है। मौतों का ब्योरा उसमें है: दो लड़कियों की मौत ऑर्गेनोफ़ॉस्फ़ोरस कीटनाशक से हुई, जो पोस्टमॉर्टम में प्रमाणित है और एफ़आईआर में आत्महत्या के रूप में दर्ज है; एक लड़की ख़ुराक के 49 दिन बाद पानी भरी खदान में गिर कर डूबी; एक की मौत गंभीर मलेरिया से हुई। बाक़ी तीन के लिए साँप के काटने, वायरल बुख़ार और तीव्र तंत्रिका-तंत्र बीमारी का अनुमान रखा गया, पर रिपोर्ट ख़ुद लिखती है कि पोस्टमॉर्टम के अभाव में ये निदान पूरी तरह स्वीकार नहीं किए जा सकते। समिति का निष्कर्ष था कि मौतें "सबसे अधिक संभावना है कि टीके से असंबंधित" थीं, कोई साझा या समय-आधारित पैटर्न नहीं मिला, और दोनों ज़िलों में 10 से 14 साल की लड़कियों की पृष्ठभूमि मृत्यु दर नहीं बढ़ी। उसी रिपोर्ट में यह वाक्य भी है: "नियंत्रण समूह के अभाव में यह कहना संभव नहीं है कि टीका लगे समूह में अतिरिक्त मौतें हुईं या नहीं।" नैतिकता पर समिति ने लिखा कि "किसी नैतिक मानदंड का कोई बड़ा उल्लंघन नहीं हुआ"।

दूसरा सरकारी फ़ैसला ढाई साल बाद आया और उलटा था। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 72वीं रिपोर्ट 30 अगस्त 2013 को राज्यसभा में पेश हुई; इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल एथिक्स के अक्टूबर-दिसंबर 2013 अंक में एन. सरोजिनी और वी. दीपा ने उसे पृष्ठ-संख्या सहित उद्धृत किया है। समिति ने कहा कि "डेमॉन्स्ट्रेशन प्रोजेक्ट" असल में क्लिनिकल ट्रायल था, और पाथ ने उसे परियोजना के आवरण में चला कर "भारत सरकार के क्लिनिकल ट्रायल संबंधी सभी क़ानूनों और नियमों का उल्लंघन" किया। सहमति-पत्र अधूरे और ग़लत थे, आंध्र प्रदेश में छात्रावास के वार्डनों को माता-पिता की जगह हस्ताक्षर करने को कहा गया, लड़कियों का बीमा नहीं था, और औषधि महानियंत्रक "मूकदर्शक बना रहा"।

एक ही फ़ाइल पर भारतीय राज्य की दो शाखाओं के दो निष्कर्ष हैं, और आज तक न कोई वापस लिया गया है, न दोनों को मिलाने वाला कोई तीसरा दस्तावेज़ आया है।

2011 की रिपोर्ट की सबसे तीखी आलोचना एईएफ़आई दर्ज करने और अनुवर्ती निगरानी की व्यवस्था न होने पर थी, और 2026 का कार्यक्रम उसी जगह सबसे ज़्यादा बदला है।

11 सितंबर की विज्ञप्ति कहती है कि बाल रोग विशेषज्ञों, स्त्री रोग विशेषज्ञों, एम्स जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों, शिक्षकों, आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम की मदद से चिंताएँ दूर की गईं तथा "ग़लत सूचनाओं का मुक़ाबला" किया गया। ग़लत सूचना क्या थी, यह विज्ञप्ति में नहीं लिखा।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, 11 सितंबर 2026: राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान में 80 लाख ख़ुराकें, राज्यवार कवरेज और उत्तर प्रदेश का आँकड़ा, पीआईबी रिसर्च यूनिट, 28 फ़रवरी 2026: 'Cervical Cancer Vaccination Campaign Launched' पृष्ठभूमि दस्तावेज़, टीके का नाम, गावी से ख़रीद, सत्र की शर्तें और बाहर रखी गई श्रेणियाँ, पत्र सूचना कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, 27 फ़रवरी 2026: अभियान की घोषणा, 1.15 करोड़ का लक्ष्य, ग्लोबोकैन 2022 के आँकड़े, SAGE और NTAGI की सिफ़ारिश, पत्र सूचना कार्यालय, 17 मार्च 2026: राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल का लिखित उत्तर, 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1.2 करोड़ का लक्ष्य, पत्र सूचना कार्यालय, 5 मार्च 2026: डब्ल्यूएचओ मुख्यालय में जे.पी. नड्डा का संबोधन, NP-NCD के तहत 8.6 करोड़ जाँच, और डॉ. टेड्रोस के हवाले से मौतों तथा नए मामलों के आँकड़े, पत्र सूचना कार्यालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, 1 सितंबर 2022: सर्ववैक की घोषणा, डीबीटी-बीआईआरएसी और सीरम इंस्टिट्यूट की साझेदारी, पत्र सूचना कार्यालय, 17 दिसंबर 2024: 'Together Against HPV' परिचर्चा में डॉ. जितेंद्र सिंह के बयान, दो और तीन ख़ुराक की बात, सालाना क़रीब एक लाख मौतों का आँकड़ा, पत्र सूचना कार्यालय, 23 अप्रैल 2025: स्वदेशी एचपीवी जाँच किट की समीक्षा, GCI-BIRAC-DBT कार्यक्रम, पत्र सूचना कार्यालय, वित्त मंत्रालय, 1 फ़रवरी 2024: अंतरिम बजट 2024-25 में 9 से 14 वर्ष की लड़कियों के टीकाकरण की घोषणा, भारत सरकार की जाँच समिति की अंतिम रिपोर्ट, 15 फ़रवरी 2011, अधिसूचना V.25011/160/2010-HR: पाथ के एचपीवी अध्ययन में कथित अनियमितताएँ, सात मौतों का ब्योरा और निष्कर्ष, इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल एथिक्स, अक्टूबर-दिसंबर 2013, एन. सरोजिनी और वी. दीपा: राज्यसभा की 72वीं स्थायी समिति रिपोर्ट के पृष्ठ-सहित उद्धरण, इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च: सतीशकुमार आदि, राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के 2022 के अनुमान और 2025 का प्रक्षेपण, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर 79,103 और 85,241, आईसीएमआर-एनसीडीआईआर, राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम रिपोर्ट 2020: रजिस्ट्री नेटवर्क देश की क़रीब 10 प्रतिशत आबादी को कवर करता है, आईसीओ/आईएआरसी एचपीवी इन्फ़ॉर्मेशन सेंटर, भारत तथ्य-पत्र 2023: सालाना 1,23,907 मामले और 77,348 मौतें, जाँच की राष्ट्रीय सिफ़ारिश और उसका स्वरूप, विश्व स्वास्थ्य संगठन, सर्वाइकल कैंसर तथ्य-पत्र, 3 जुलाई 2026: 2024 के वैश्विक आँकड़े, 90-70-90 लक्ष्य, उन्मूलन की सीमा और जाँच की सिफ़ारिश, विश्व स्वास्थ्य संगठन, पूर्व-योग्यता प्राप्त टीकों की सूची: सेकोलिन, सर्वारिक्स, गार्डासिल, गार्डासिल 9 और वालरिनवैक्स, द प्रिंट, 4 फ़रवरी 2025: राज्यसभा में प्रतापराव जाधव और अनुप्रिया पटेल के लिखित उत्तर, ICMR-NCRP की 2019 से 2023 की मृत्यु संख्या और सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम पर जवाब, प्रसार भारती, न्यूज़ ऑन एयर, 10 मार्च 2026: राज्यसभा में 8.73 करोड़ महिलाओं की जाँच का आँकड़ा, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 11 सितंबर 2026: अभियान के सात महीने और सौ प्रतिशत कवरेज वाले राज्यों की सूची, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 1 सितंबर 2022: अदार पूनावाला के हवाले से सर्ववैक की सरकारी क़ीमत 200 से 400 रुपये प्रति ख़ुराक, द क्विंट, 25 जनवरी 2023: सर्ववैक के बाज़ार में उतरने की तारीख़, लॉन्च क़ीमत 2,000 रुपये और आयातित गार्डासिल की तुलनात्मक क़ीमत, गावी, वैक्सीन्सवर्क: भारत के राष्ट्रीय कार्यक्रम पर रिपोर्ट, निजी बाज़ार का आकार और आईएआरसी के पार्थ बसु का बयान, गावी, वैक्सीन्सवर्क: पंजाब और सिक्किम के राज्य कार्यक्रमों का ब्योरा और प्रशांत माथुर का बयान, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन: सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम का पृष्ठ, बारह बीमारियों की सूची और सालाना लक्षित समूह, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन: 2009-10 के पाथ प्रकरण और उसकी लंबी छाया पर टिप्पणी

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