यूरोपीय आयोग ने 11 सितंबर को काउंसिल से दस्तख़त की इजाज़त माँगी है, जो न दस्तख़त है न मंज़ूरी, और जिस पाठ को जनवरी में पूरा बताया गया था उसका इस्पात वाला अनुलग्नक जून की एक नई यूरोपीय विनियमावली का हवाला देता है
भारत और यूरोपीय संघ की बातचीत 2007 में शुरू हुई, 2013 में टूटी, 2022 में तीन अलग पटरियों पर फिर चली और 27 जनवरी 2026 को पूरी घोषित हुई। साढ़े सात महीने बाद यूरोपीय आयोग ने काउंसिल को दो प्रस्ताव भेजे हैं। इसके बाद भी तीन पड़ाव बाक़ी हैं, और उनमें से एक पर यूरोपीय संसद के पास इनकार का अधिकार है।

ब्रसेल्स में शुक्रवार, 11 सितंबर को दोपहर बारह बजकर बारह मिनट पर यूरोपीय आयोग ने दो काग़ज़ जारी किए। पहला काउंसिल के उस फ़ैसले का प्रस्ताव है जिससे भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तख़त हो सकें। दूसरा उस फ़ैसले का प्रस्ताव है जिससे वही समझौता निष्पन्न हो। आयोग के दस्तावेज़ रजिस्टर में इनके नंबर COM(2026) 483 और COM(2026) 482 हैं।
आयोग की विज्ञप्ति में सबसे ऊपर यह वाक्य है कि काउंसिल की इजाज़त मिली तो यह दोनों पक्षों का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा। उसी विज्ञप्ति के चौथे पैराग्राफ़ में जो लिखा है वह सुर्ख़ियों में कम पहुँचा: आयोग काउंसिल से दस्तख़त की मंज़ूरी माँग रहा है, उसके बाद यूरोपीय संसद की सहमति चाहिए, फिर निष्पादन और अमल में आना, और भारतीय अधिकारी अपनी आंतरिक अनुसमर्थन प्रक्रिया समानांतर चला रहे हैं।
यानी 11 सितंबर को जो हुआ, वह एक सिफ़ारिश थी।
बातचीत तो 27 जनवरी 2026 को ही पूरी घोषित हो चुकी थी, नई दिल्ली में सोलहवें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में। उसके बाद के साढ़े सात महीने क़ानूनी जाँच और यूरोपीय संघ की सभी आधिकारिक भाषाओं में अनुवाद में गए। इस बीच पाठ भी पूरी तरह जमा नहीं रहा, और उसका सबूत ख़ुद आयोग के प्रकाशित अनुलग्नकों में पड़ा है।
आयोग की विज्ञप्ति के चार आँकड़े और अमल की शर्त
आयोग की विज्ञप्ति चार संख्याएँ गिनाती है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच हर साल 180 अरब यूरो से ज़्यादा का वस्तु और सेवा व्यापार होता है। यह व्यापार यूरोपीय संघ में लगभग आठ लाख नौकरियों को सहारा देता है। समझौता यूरोपीय संघ के 96 प्रतिशत वस्तु निर्यात पर शुल्क ख़त्म या कम करेगा। और शुल्क में यह कटौती यूरोपीय उत्पादों पर हर साल लगभग 4 अरब यूरो के शुल्क की बचत कराएगी।
जनवरी की विज्ञप्ति में यही आँकड़ा 96.6 प्रतिशत था, मूल्य के हिसाब से। सितंबर वाली विज्ञप्ति ने उसे गोल करके 96 लिख दिया।
व्यापार और आर्थिक सुरक्षा आयुक्त मारोश शेफ़चोविच का बयान इस प्रस्ताव के साथ जारी हुआ। उन्होंने कहा कि समय मायने रखता है, इसलिए प्रस्ताव रिकॉर्ड समय में काउंसिल को भेजे जा रहे हैं, और यह समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ता है, दो अरब लोगों का बाज़ार और वैश्विक जीडीपी का लगभग एक चौथाई। शेफ़चोविच ने इसी साल मुक्त व्यापार समझौतों के अमल के लिए एक त्वरित प्रक्रिया तय की थी, और आयोग का कहना है कि यह प्रस्ताव उसी प्रक्रिया के तहत भेजा गया है।
अमल कब से शुरू होगा, इसका जवाब समझौते के अपने पाठ में है और वह तारीख़ों में नहीं, शर्त में लिखा है। वाणिज्य मंत्रालय की प्रश्नोत्तरी का 58वाँ जवाब उसे दोहराता है: भारत और यूरोपीय संघ एक-दूसरे को लिखित सूचना देंगे कि उनकी आंतरिक क़ानूनी प्रक्रियाएँ पूरी हो गईं, और समझौता उस आदान-प्रदान के बाद वाले दूसरे महीने की पहली तारीख़ से लागू होगा। यही प्रश्नोत्तरी यह भी दर्ज करती है कि समझौते की कोई समाप्ति तिथि नहीं है, और कोई भी पक्ष लिखित सूचना देकर उसे ख़त्म कर सकता है।
2007 में शुरू, 2013 में ठहराव, 2022 में तीन अलग पटरियाँ
अक्टूबर 2006 के हेलसिंकी शिखर सम्मेलन में दोनों पक्षों ने एक व्यापक व्यापार और निवेश समझौते की बात तय की थी, और औपचारिक बातचीत 28 जून 2007 को शुरू हुई। यूरोपीय संसद का लेजिस्लेटिव ट्रेन रिकॉर्ड कहता है कि पंद्रह दौर के बाद 2013 में बात अटक गई। बाज़ार पहुँच, शुल्क और नियामक मानकों पर मतभेद थे।
जून 2022 में जो चीज़ बदली, वह सिर्फ़ माहौल नहीं था। उस दिन एक नहीं, तीन बातचीतें शुरू हुईं: मुक्त व्यापार समझौता, निवेश संरक्षण समझौता, और भौगोलिक संकेतकों का समझौता। निवेश को अलग पटरी पर डालने का असर आगे मंज़ूरी के रास्ते पर पड़ा, और उस पर इस लेख के आख़िरी हिस्से में बात है।
व्यापार समझौते के चौदह औपचारिक दौर जुलाई 2022 से अक्टूबर 2025 के बीच हुए। निवेश संरक्षण के आठ दौर हुए, आख़िरी मई 2026 में, और वह बातचीत अब भी चल रही है। भौगोलिक संकेतकों की आख़िरी दौर रिपोर्ट मार्च 2024 की है।
दोनों सरकारें व्यापार का आकार अलग-अलग गिनती हैं
यूरोपीय आयोग का अध्यायवार ज्ञापन 2024 के आँकड़े देता है: वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार 120 अरब यूरो, जिसमें यूरोपीय संघ का आयात 71 अरब और निर्यात 49 अरब यूरो। सेवाओं का व्यापार 59.8 अरब यूरो, जिसमें यूरोपीय संघ का निर्यात 26 अरब और आयात 33.8 अरब। दोनों जोड़कर वही 180 अरब यूरो बनते हैं जो विज्ञप्तियों में दोहराए जाते हैं।
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय का तथ्यपत्र दूसरी किताब से पढ़ता है। 2024-25 में वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार 11.5 लाख करोड़ रुपये यानी 136.54 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत का निर्यात 6.4 लाख करोड़ रुपये यानी 75.85 अरब डॉलर और आयात 5.1 लाख करोड़ रुपये यानी 60.68 अरब डॉलर। सेवाओं का व्यापार 2024 में 7.2 लाख करोड़ रुपये यानी 83.10 अरब डॉलर रहा।
दोनों आँकड़े एक ही व्यापार के हैं और मेल नहीं खाते, क्योंकि गिनने का तरीक़ा एक नहीं है। यूरोपीय संघ कैलेंडर वर्ष पर चलता है और भारत अप्रैल से मार्च के वित्त वर्ष पर। भारत आयात को बीमा और भाड़ा जोड़कर दर्ज करता है, यूरोपीय संघ निर्यात को जहाज़ पर चढ़ने की क़ीमत पर। यूरोपीय संघ ने भारत से 71 अरब यूरो का आयात दर्ज किया और भारत ने यूरोपीय संघ को 75.85 अरब डॉलर का निर्यात, जो मौजूदा विनिमय दर पर क़रीब-क़रीब एक ही संख्या है। दूसरी दिशा में फ़ासला बड़ा है।
असल असंतुलन आँकड़ों में नहीं, हिस्सेदारी में है। आयोग के भारत वाले पन्ने के मुताबिक़ यूरोपीय संघ भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है और भारत के कुल व्यापार का 11.1 प्रतिशत उसके साथ होता है। भारत यूरोपीय संघ का नौवाँ साझेदार है, उसके कुल वस्तु व्यापार का 2.3 प्रतिशत, जबकि अमेरिका 17.6, चीन 14.7 और ब्रिटेन 9.8 प्रतिशत पर हैं। मेज़ के दोनों तरफ़ बैठे लोगों के लिए यह सौदा एक जैसा भारी नहीं था।
भारत को पहले दिन 33 अरब डॉलर, और झींगा उसमें नहीं
वाणिज्य मंत्रालय के तथ्यपत्र में भारत की तरफ़ का हिसाब तीन हिस्सों में है। यूरोपीय संघ की 97 प्रतिशत शुल्क लाइनों पर भारत को तरजीही पहुँच मिली है, जो व्यापार मूल्य के 99.5 प्रतिशत को ढकती है। इनमें 70.4 प्रतिशत लाइनें, जो भारत के 90.7 प्रतिशत निर्यात को ढोती हैं, समझौता लागू होते ही शुल्क-मुक्त हो जाएँगी। 20.3 प्रतिशत लाइनें, जो 2.9 प्रतिशत निर्यात ढोती हैं, तीन और पाँच साल में शून्य पर आएँगी। बाक़ी 6.1 प्रतिशत लाइनें, जो 6 प्रतिशत निर्यात ढोती हैं, या तो शुल्क में कटौती पाएँगी या कोटे में रहेंगी, और तथ्यपत्र उन कोटों में कार, इस्पात तथा झींगे और प्रॉन के कुछ उत्पादों का नाम लेता है।
पहले दिन शून्य होने वाला हिस्सा 33 अरब डॉलर से ज़्यादा का है। तथ्यपत्र के शब्दों में ये वे श्रम-गहन क्षेत्र हैं जिन पर यूरोपीय संघ में अभी 4 से 26 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगता है। मंत्रालय की 78 सवालों वाली प्रश्नोत्तरी के दूसरे जवाब में बारह क्षेत्रों की पूरी तालिका है, कैलेंडर वर्ष 2024 के निर्यात मूल्य के साथ। नीचे उनमें से आठ सबसे बड़े हैं, और जोड़ बारहों का।
| क्षेत्र | अभी तक शुल्क | पहले दिन शून्य होने वाला निर्यात | तीन से पाँच साल में शून्य |
|---|---|---|---|
| रसायन | 12.8% तक | 1,368.36 करोड़ डॉलर | 35.40 करोड़ डॉलर |
| तैयार कपड़े | 12.0% तक | 570.63 करोड़ डॉलर | शून्य |
| मूल धातुएँ | 10.0% तक | 335.06 करोड़ डॉलर | 16.47 करोड़ डॉलर |
| रत्न और आभूषण | 4.0% तक | 266.13 करोड़ डॉलर | 0.11 करोड़ डॉलर |
| प्लास्टिक और रबर | 6.5% तक | 255.64 करोड़ डॉलर | 10.95 करोड़ डॉलर |
| चमड़ा और जूते | 17.0% तक | 251.14 करोड़ डॉलर | शून्य |
| वस्त्र | 12.0% तक | 163.60 करोड़ डॉलर | शून्य |
| समुद्री उत्पाद | 26.0% तक | 23.90 करोड़ डॉलर | 67.32 करोड़ डॉलर |
| कुल, बारहों क्षेत्र | 3,349.76 करोड़ डॉलर | 130.78 करोड़ डॉलर |
तालिका की समुद्री वाली पंक्ति सबसे ज़्यादा बताती है। समुद्री उत्पादों की 94.4 प्रतिशत शुल्क लाइनें पहले दिन शून्य पर आती हैं, पर उन लाइनों पर 2024 में भारत का निर्यात सिर्फ़ 23.90 करोड़ डॉलर था। सिर्फ़ 1.9 प्रतिशत लाइनें तीन से पाँच साल की सीढ़ी पर हैं, और उन पर 67.32 करोड़ डॉलर का निर्यात टिका है, यानी इस मद में भारत के निर्यात का लगभग तीन-चौथाई। बची हुई लाइनें कोटे में हैं, और तथ्यपत्र के मुताबिक़ वे झींगे और प्रॉन की हैं। आंध्र प्रदेश, गुजरात और केरल के तटों से जो चीज़ सबसे ज़्यादा जाती है, वही इस सूची में सबसे पीछे खड़ी है।

एक और ग़ैरमौजूदगी ध्यान खींचती है। तालिका में दवाओं की कोई अलग पंक्ति नहीं है। यूरोपीय आयोग की अपनी प्रश्नोत्तरी में दवाएँ दूसरी तरफ़ दर्ज हैं: 2024 में यूरोपीय संघ ने भारत को 1.1 अरब यूरो की दवाएँ भेजीं, जिन पर भारत का 11 प्रतिशत शुल्क लगता है और अब लगभग सभी उत्पादों पर शून्य हो जाएगा। दवा के मामले में शुल्क की हलचल यूरोप से भारत की ओर है, उलटी नहीं।
कार, शराब और सरकारी ख़रीद: यूरोपीय संघ की माँगें और उनका नतीजा
आयोग की प्रश्नोत्तरी में यूरोपीय उद्योग के लिए मिली रियायतें उत्पादवार गिनी गई हैं, 2024 के निर्यात मूल्य के साथ। मशीनरी और बिजली के उपकरण, 16.3 अरब यूरो, जिन पर भारत का 44 प्रतिशत तक शुल्क लगता था, लगभग सभी उत्पादों पर शून्य। विमान और अंतरिक्ष यान, 6.4 अरब यूरो, 11 प्रतिशत तक से शून्य। ऑप्टिकल तथा चिकित्सा उपकरण, 3.4 अरब यूरो, 27.5 प्रतिशत तक से 90 प्रतिशत उत्पादों पर शून्य। रसायन 3.2 अरब यूरो, प्लास्टिक 2.2 अरब, मोती और बहुमूल्य पत्थर 2.1 अरब, लोहा और इस्पात 1.5 अरब यूरो।
कार वाली पंक्ति अलग से लिखी गई है। 2024 में यूरोपीय संघ ने भारत को 1.6 अरब यूरो के मोटर वाहन भेजे थे, और उन पर 110 प्रतिशत शुल्क लगता था। समझौते में यह धीरे-धीरे घटकर 10 प्रतिशत तक आएगा, पर सालाना 2,50,000 वाहनों के कोटे के भीतर। पुर्ज़ों पर शुल्क पाँच से दस साल में पूरी तरह हटेंगे। वाणिज्य मंत्रालय की विज्ञप्ति इसी को अलग शब्दों में लिखती है: कोटा आधारित और सोच-समझकर बनाया गया पैकेज, जिससे यूरोपीय कंपनियाँ ऊँचे दाम वाले मॉडल भारत में ला सकेंगी।

कृषि और खाद्य पर दरें सबसे ऊँची जगह से गिरी हैं। शराब पर भारत का शुल्क 150 प्रतिशत था; आयोग की जनवरी वाली विज्ञप्ति के मुताबिक़ वह लागू होते ही 75 प्रतिशत पर आएगा और सीढ़ी पूरी होने पर प्रीमियम श्रेणी में 20 तथा मध्यम श्रेणी में 30 प्रतिशत तक। स्पिरिट पर 150 प्रतिशत तक से घटकर 40, बीयर पर 110 से 50। जैतून का तेल 45 प्रतिशत से शून्य पर, फलों के रस और ग़ैर-अल्कोहली बीयर 55 प्रतिशत तक से शून्य पर, और ब्रेड, बिस्किट, पास्ता तथा चॉकलेट जैसे प्रसंस्कृत खाद्य 50 प्रतिशत तक से शून्य पर।
डेयरी पर दोनों तरफ़ एक ही जवाब है। वाणिज्य मंत्रालय की विज्ञप्ति की शीर्ष पंक्तियों में लिखा है कि भारत ने संवेदनशील कृषि उत्पादों और डेयरी क्षेत्र की रक्षा की है, बाज़ार पहुँच नहीं दी। कृषि तथा खाद्य आयुक्त क्रिस्तोफ़ हांसेन ने अपने बयान में उलटी दिशा से वही बात कही, कि गोमांस, चीनी, एथेनॉल, चावल और मुर्गी पर शुल्क बने रहेंगे। आयोग की प्रश्नोत्तरी में यूरोपीय संघ की बाहर रखी गई सूची में दूध पाउडर, शहद और तंबाकू भी हैं।
और एक माँग ऐसी है जिसका ज़िक्र अंतिम पाठ में मिलता ही नहीं। आयोग के अपने दस्तावेज़ पन्ने पर बातचीत के दौरान यूरोपीय संघ की तरफ़ से रखे गए चौबीस प्रस्तावित अध्याय प्रकाशित हैं, और उनमें सरकारी ख़रीद, सरकारी उपक्रम तथा ऊर्जा और कच्चा माल तीनों शामिल हैं। आयोग के ही पाठ वाले पन्ने पर जो समझौता छपा है उसमें बीस अध्याय हैं, और इन तीनों में से एक भी उनमें नहीं है। यूरोपीय संसद का लेजिस्लेटिव ट्रेन रिकॉर्ड सरकारी ख़रीद तक सिमटती पहुँच को यूरोपीय संघ की लंबित शिकायतों में गिनता आया था। वह शिकायत लंबित ही रह गई।
CBAM समझौते में चार पन्ने का अनुलग्नक है
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र समझौते से बाहर की चीज़ है। वह विनियमावली (EU) 2023/956 है, जिस पर 10 मई 2023 को स्ट्रासबर्ग में दस्तख़त हुए। उसका अनुलग्नक I छह मदें गिनाता है: सीमेंट, बिजली, उर्वरक, लोहा और इस्पात, एल्युमिनियम, और हाइड्रोजन। 1 अक्टूबर 2023 से 31 दिसंबर 2025 तक संक्रमण काल था, जिसमें आयातक पर सिर्फ़ रिपोर्टिंग का दायित्व था। अनुच्छेद 36 के मुताबिक़ असली दायित्व 1 जनवरी 2026 से लागू हैं। प्रमाणपत्रों की बिक्री 1 फ़रवरी 2027 से शुरू होगी, और पहला समर्पण 2026 के वर्ष के लिए 30 सितंबर 2027 तक करना होगा। अक्टूबर 2025 में जोड़ा गया अनुच्छेद 2a उन आयातकों को छूट देता है जिनका सालाना आयात 50 टन से कम रहता है, पर वह छूट यूरोपीय आयातक की है, भारतीय निर्यातक की नहीं।
समझौते के भीतर इस विषय पर जो कुछ है, वह अनुलग्नक 14-A है। वह अध्याय 14 से जुड़ा है, जिसका नाम अच्छी नियामक पद्धतियाँ है, वस्तु व्यापार वाले अध्याय 2 से नहीं। चार पन्ने, पाँच अनुच्छेद। पहला उद्देश्य गिनाता है, जिनमें नियामक सहयोग, तकनीकी मदद और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों को कार्बन संबंधी अनुपालन में सहारा शामिल है।
दूसरा अनुच्छेद पूरा एक पैराग्राफ़ है, और वही भारत की सबसे ठोस प्राप्ति है। उसमें लिखा है कि कार्बन सीमा समायोजन उपायों के अमल में जो भी रियायतें दी जाएँ, उनके मामले में कोई पक्ष दूसरे पक्ष की वस्तुओं पर किसी तीसरे देश की समान वस्तुओं से कम अनुकूल शर्तें नहीं लगाएगा। तीसरा अनुच्छेद तकनीकी संवाद की बात करता है, जिसमें उत्पाद का दायरा, निगरानी और सत्यापन, तथा दूसरे पक्ष में वास्तव में चुकाई गई कार्बन क़ीमत को गणना में लेने की संभावना शामिल है। संभावना शब्द पाठ में ही लिखा है। चौथा अनुच्छेद कहता है कि यूरोपीय संघ भारत के उत्सर्जन घटाने के प्रयासों को सहारा देने की कोशिश करेगा, और उस समझौता ज्ञापन को याद दिलाता है जिसके तहत जनवरी की विज्ञप्ति में दो साल में 50 करोड़ यूरो की मदद की बात कही गई थी।
इस अनुलग्नक में जो नहीं है, वह भारतीय इस्पात या एल्युमिनियम के लिए कोई छूट, कोई मोहलत, या CBAM की किसी तारीख़ में कोई बदलाव है।
इस्पात का हिसाब अलग अनुलग्नक 2-B में है, और वही पाठ के हिलते रहने का सबूत भी है। वह अनुलग्नक विनियमावली (EU) 2026/1384 का हवाला देता है, जो 17 जून 2026 की है और यूरोपीय इस्पात बाज़ार पर वैश्विक अतिरिक्त क्षमता के असर से निपटने के लिए बनी है। यानी जिस पाठ की बातचीत 27 जनवरी को पूरी बताई गई थी, उसका यह हिस्सा उसके पाँच महीने बाद की एक विनियमावली को जानता है। अनुलग्नक भारत के लिए सोलह उत्पाद श्रेणियों में देश-विशिष्ट कोटे तय करता है, कुल 16,41,470 टन, जिसमें 9,46,616 टन सामान्य शुल्क वाले हिस्से का है और 6,94,853 टन समझौते वाले हिस्से का। सबसे बड़ी श्रेणी गर्म बेलित चादरों और पट्टियों की है, 5,09,605 टन। कोटे से बाहर के आयात पर यूरोपीय संघ की अनुसूची की आधार दरें लगेंगी, और उस पर CBAM का हिसाब अलग से चलेगा।

अध्याय 16 मंत्री-स्तरीय बातचीत पर ख़त्म होता है
श्रम और पर्यावरण की शर्तें अध्याय 16 में हैं, जिसका नाम व्यापार और सतत विकास है। उसका श्रम वाला अनुच्छेद ILO के 1998 के घोषणापत्र का हवाला देकर पाँच बुनियादी सिद्धांत गिनाता है: संगठन बनाने की आज़ादी और सामूहिक सौदेबाज़ी की मान्यता, बलात श्रम का ख़ात्मा, बाल श्रम का उन्मूलन, रोज़गार में भेदभाव की समाप्ति, और सुरक्षित तथा स्वस्थ कार्य वातावरण।
अगली दो उपधाराओं का शब्द-चयन ध्यान से पढ़ने लायक़ है। तीसरी उपधारा कहती है कि हर पक्ष उन मूल ILO अभिसमयों के अनुसमर्थन की दिशा में सद्भावपूर्वक प्रयास करेगा जिनका वह अभी पक्षकार नहीं है, और वह भी प्रोत्साहनपरक तथा लचीले तरीक़े से और अपने घरेलू क़ानून के अनुसार। पाँचवीं उपधारा कहती है कि हर पक्ष उन्हीं अभिसमयों को लागू करेगा जिनका भारत और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने अनुसमर्थन किया है। श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय की अपनी विज्ञप्ति के मुताबिक़ भारत ने मूल अभिसमय 87 और 98 का अनुसमर्थन नहीं किया है, यानी संगठन बनाने की आज़ादी और सामूहिक सौदेबाज़ी वाले दोनों। सिद्धांत समझौते में हैं, अभिसमय भारत की सूची में नहीं।
पर्यावरण की तरफ़ पाठ पेरिस समझौता, जैव विविधता अभिसमय और लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यापार वाला अभिसमय गिनाता है, और जंगल, मत्स्य पालन तथा अवैध लकड़ी पर अलग प्रावधान रखता है। अध्याय विकास के अलग स्तरों को भी दर्ज करता है और साझा पर विभेदित ज़िम्मेदारी का सिद्धांत अपनाता है।
असली सवाल यह है कि इन शर्तों के उल्लंघन पर होगा क्या। अध्याय का जवाब उसके आख़िरी पाँच अनुच्छेदों में है। अनुच्छेद 16.16 के तहत एक पक्ष लिखित अनुरोध भेजकर परामर्श माँग सकता है; दूसरे पक्ष को 50 दिन में लिखित जवाब देना है और 90 दिन के भीतर TSD समिति में बैठना है। अनुच्छेद 16.17 कहता है कि बात न बने तो मामला संयुक्त समिति के पास जाएगा। अनुच्छेद 16.18 कहता है कि वहाँ भी न बने तो मामला दोनों पक्षों के मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधियों को भेजा जा सकता है। अनुच्छेद 16.19 परामर्श की प्रक्रिया बताता है और 16.20 अध्याय की समीक्षा की बात करता है। पंचाट का ज़िक्र कहीं नहीं है, रियायतें रोकने का भी नहीं।
इसीलिए दोनों सरकारें एक ही अध्याय का वर्णन उलटे शब्दों में करती हैं। आयोग की प्रश्नोत्तरी कहती है कि सतत विकास की कई प्रतिबद्धताएँ क़ानूनी रूप से बाध्यकारी हैं और एक समर्पित परामर्श तंत्र से प्रवर्तनीय हैं। वाणिज्य मंत्रालय की प्रश्नोत्तरी का 49वाँ जवाब कहता है कि यह अध्याय समझौते के सामान्य विवाद निपटान तंत्र के अधीन नहीं है और तीन स्तरों की सरकारी बातचीत के बाद अंतिम उपाय मंत्री-स्तरीय परामर्श है। अध्याय का पाठ पढ़ने पर दूसरा वर्णन ज़्यादा सटीक बैठता है।
मंज़ूरी का रास्ता: काउंसिल, यूरोपीय संसद, और भारत में मंत्रिमंडल
समझौता यूरोपीय संघ की संधि के अनुच्छेद 207 के दायरे में बना है, जो साझा वाणिज्य नीति को संघ का विशेष अधिकार क्षेत्र बताता है, और प्रक्रिया अनुच्छेद 218 से चलती है। इसका सीधा असर यह है कि सत्ताईस सदस्य देश इस पर काउंसिल के रूप में फ़ैसला लेते हैं, अपनी-अपनी संसदों के रूप में नहीं। निवेश संरक्षण को 2022 में अलग पटरी पर डाल देने का यही व्यावहारिक फल था, क्योंकि निवेश संरक्षण वाला समझौता मिश्रित होता और उसे सदस्य देशों के अनुसमर्थन की ज़रूरत पड़ती।
काउंसिल की मंज़ूरी के बाद दस्तख़त होंगे। उसके बाद यूरोपीय संसद की सहमति चाहिए, और वही इस पूरे रास्ते का इकलौता ऐसा पड़ाव है जहाँ इनकार संभव है। संसद अनुच्छेद 218 के तहत सहमति दे भी सकती है और रोक भी सकती है, और चाहे तो यूरोपीय न्यायालय से यह राय माँग सकती है कि समझौता संघ के क़ानून के अनुरूप है या नहीं। फ़ाइल अंतरराष्ट्रीय व्यापार समिति के पास है। उसी समिति का एक प्रतिनिधिमंडल 29 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से मिला था, और उसका नेतृत्व भारत पर समिति की स्थायी प्रतिवेदक क्रिस्तीना मेस्त्रे ने किया था। संसद जनवरी 2024 में एक सिफ़ारिश पास कर चुकी है जिसमें मानवाधिकार आकलन, नागरिक समाज से परामर्श और पेरिस समझौते के अनुरूप सतत विकास प्रावधानों पर ज़ोर था। अध्याय 16 की जो सीढ़ी ऊपर गिनाई गई, वह उसी समिति के सामने जाएगी।
भारत की तरफ़ का रास्ता छोटा है। व्यापार समझौतों पर भारत में संसद का अनुसमर्थन प्रस्ताव नहीं आता; वाणिज्य विभाग अंतर-मंत्रालयी विचार-विमर्श के बाद फ़ाइल बढ़ाता है और केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंज़ूरी अंतिम होती है। दोनों तरफ़ की आंतरिक प्रक्रियाएँ पूरी होने पर लिखित सूचनाओं का आदान-प्रदान होगा, और समझौता उसके बाद वाले दूसरे महीने की पहली तारीख़ से लागू होगा।
यही पैमाना कनाडा वाली ख़बर पर रखा जा सकता है। भारत और कनाडा ने व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते की बातचीत 23 नवंबर 2025 को शुरू करने का ऐलान किया, विचारार्थ विषय 2 मार्च 2026 को तय हुए, दूसरा दौर 4 से 8 मई 2026 तक नई दिल्ली में चला और तीसरा दौर जुलाई 2026 में ओटावा में तय हुआ। द हिंदू ने 11 सितंबर को कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस्टोफ़र कूटर के हवाले से लिखा कि समझौता प्रधानमंत्री की दिसंबर वाली यात्रा तक तैयार हो जाएगा। यूरोपीय संघ के साथ बातचीत 27 जनवरी को पूरी हो गई थी और 11 सितंबर को उस पर दस्तख़त की सिफ़ारिश भर हुई है।
स्रोतयूरोपीय आयोग, विज्ञप्ति IP/26/1842, 11 सितंबर 2026: काउंसिल को दस्तख़त और निष्पादन के प्रस्ताव, COM(2026) 483 और COM(2026) 482, तथा शेफ़चोविच का बयान, यूरोपीय आयोग, विज्ञप्ति IP/26/184, 27 जनवरी 2026: बातचीत पूरी होने की घोषणा, फ़ॉन डेय लाएन और हांसेन के बयान, 50 करोड़ यूरो की जलवायु मदद, और 2007-2013-2022 का घटनाक्रम, यूरोपीय आयोग, प्रश्नोत्तर QANDA/26/185, 27 जनवरी 2026: क्षेत्रवार शुल्क तालिकाएँ, कार का 250,000 का कोटा, शराब और जैतून तेल की दरें, और मंज़ूरी के चरण, यूरोपीय आयोग, व्यापार महानिदेशालय: भारत-यूरोपीय संघ समझौते का प्रकाशित पाठ, बीस अध्यायों और अनुलग्नकों की सूची, यूरोपीय आयोग, व्यापार महानिदेशालय: चौदह दौर की रिपोर्टें और यूरोपीय संघ के चौबीस प्रस्तावित अध्यायों की सूची, जिनमें सरकारी ख़रीद, सरकारी उपक्रम तथा ऊर्जा और कच्चा माल शामिल हैं, भारत-यूरोपीय संघ समझौता, अनुलग्नक 14-A, कार्बन सीमा समायोजन उपाय: पाँच अनुच्छेदों का पूरा पाठ (यूरोपीय आयोग द्वारा प्रकाशित), भारत-यूरोपीय संघ समझौता, अनुलग्नक 2-B, इस्पात के शुल्क-दर कोटे: 16,41,470 टन का देश-विशिष्ट कोटा और विनियमावली (EU) 2026/1384 का हवाला, भारत-यूरोपीय संघ समझौता, अध्याय 16, व्यापार और सतत विकास: ILO के 1998 घोषणापत्र के सिद्धांत तथा अनुच्छेद 16.16 से 16.20 तक विवाद की सीढ़ी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति 2219146, 27 जनवरी 2026: तथ्यपत्र, शुल्क लाइनों का विभाजन और क्षेत्रवार निर्यात के आँकड़े, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति 2219065, 27 जनवरी 2026: द्विपक्षीय व्यापार के आँकड़े, डेयरी पर बाज़ार पहुँच न देने की बात और CBAM पर भारत का विवरण, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति 2220413: 78 सवालों की प्रश्नोत्तरी, जिसमें क्षेत्रवार तालिका, ठहरने की अवधि और अध्याय 16 के प्रवर्तन का जवाब 49 है, विनियमावली (EU) 2023/956, 10 मई 2023, 20 अक्टूबर 2025 तक संशोधित समेकित पाठ: CBAM का दायरा, अनुलग्नक I की वस्तुएँ, अनुच्छेद 2a की 50 टन छूट और अनुच्छेद 36 की तारीख़ें, यूरोपीय संसद, लेजिस्लेटिव ट्रेन: 2007 में बातचीत की शुरुआत, 2013 में पंद्रह दौर के बाद ठहराव, और संसद की सहमति की प्रक्रिया, श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय, पीआईबी: भारत ने ILO के मूल अभिसमय 87 और 98 का अनुसमर्थन नहीं किया है, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति 2259188, 8 मई 2026: भारत-कनाडा CEPA की दूसरे दौर की बातचीत का संयुक्त वक्तव्य, द हिंदू, 11 सितंबर 2026: कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस्टोफ़र कूटर का बयान कि CEPA दिसंबर की यात्रा तक तैयार होगा, द हिंदू बिज़नेसलाइन, 11 सितंबर 2026: आयोग के प्रस्ताव की ख़बर और प्रक्रिया का विवरण, द ट्रिब्यून (ANI), 29 अक्टूबर 2025: यूरोपीय संसद की अंतरराष्ट्रीय व्यापार समिति के प्रतिनिधिमंडल की दिल्ली यात्रा और क्रिस्तीना मेस्त्रे का प्रतिवेदक होना, यूरोपीय आयोग, भारत के साथ व्यापार का पन्ना: 2025 में 118 अरब यूरो का वस्तु व्यापार, साझेदारों में भारत का नौवाँ स्थान और यूरोपीय संघ का तीसरा