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बंगाल में 252 मदरसे बंद करने का आदेश, सौ को कारण बताओ नोटिस

रविवार, 13 सितंबर को पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा विभाग ने 252 मदरसों को बंद करने का आदेश दिया और क़रीब सौ को कारण बताओ नोटिस भेजा। मंत्री क्षुदीराम टुडू ने कहा कि जिनके पास मंज़ूरी है, वे चलते रहेंगे। आदेश किस क़ानून या नियम के तहत निकला, यह अब तक सार्वजनिक नहीं है, और उन मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की गिनती भी नहीं।

पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में राजग्राम के पास अंभुआ गाँव का एक दोमंज़िला मदरसा, बरामदे के ऊपर बांग्ला, अंग्रेज़ी और उर्दू के तीन बोर्ड और सामने ख़ाली अहाता, यह तस्वीर 2019 की है; बंद होने वाले 252 की जो ज़िलेवार सूची अब तक छपी है, उसमें बीरभूम का नाम नहीं है
तस्वीर: English Eden GM, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पश्चिम बंगाल सरकार ने 252 मदरसे बंद करने का आदेश दिया है और क़रीब सौ को कारण बताओ नोटिस भेजा है। उन 252 संस्थाओं में कितने बच्चे पढ़ते हैं, यह आँकड़ा अब तक कहीं नहीं आया।

आदेश रविवार, 13 सितंबर को सामने आया। राज्य के अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा मंत्री क्षुदीराम टुडू ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि जिन मदरसों के पास ज़रूरी मंज़ूरी है, वे चलते रहेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि यह पूरी क़वायद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के निर्देश पर शुरू हुई थी, ताकि यह पता चल सके कि अलग-अलग ज़िलों में कितने मदरसे अधिकृत हैं और कितने नहीं।

रविवार का ऐलान और उसके आँकड़े

पीटीआई की जो कॉपी रविवार दोपहर 12 बजकर 5 मिनट पर डेक्कन हेराल्ड में छपी और शाम तक द ट्रिब्यून तथा सियासत डेली में, उसमें चार बातें हैं। 252 मदरसों को बंद करने का आदेश दिया गया है। क़रीब सौ को कारण बताओ नोटिस गया है, इस आधार पर कि उनके पास न ज़रूरी मंज़ूरी थी और न बुनियादी ढाँचा। विभाग ने जून की शुरुआत से राज्य के सभी ज़िलों में ज़मीनी स्तर का सर्वे कराया, जिसमें सरकारी और निजी मदरसों का ढाँचा, मंज़ूरी की स्थिति और प्रबंधन व्यवस्था देखी गई। और नोटिस पाने वाले सौ मदरसों के जवाब देखने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

टुडू का बयान बांग्ला अख़बारों में इन शब्दों में है: "कोलकाता के साथ-साथ 22 ज़िलों के सभी मदरसों से दस्तावेज़ इकट्ठा किए गए हैं। जिन मदरसों के पास मंज़ूरी है, वे चालू हैं।" पश्चिम बंगाल में कोलकाता समेत कुल 23 ज़िले हैं, यानी यह गिनती पूरे राज्य की है।

कोलकाता के दो बांग्ला अख़बारों, संबाद प्रतिदिन और पुबेर कलम, ने उसी दिन एक ब्योरा जोड़ा जो अंग्रेज़ी एजेंसी कॉपी में नहीं है: बंद करने के नोटिस की प्रतियाँ संबंधित ज़िलों के ज़िलाधिकारियों के पास भेजी गई हैं। यानी कार्रवाई का रास्ता विभाग से ज़िलाधिकारी तक जाता है, बोर्ड से होकर नहीं।

कन्नड़ अख़बार वार्ताभारती और तेलुगु चैनल एनटीवी ने टुडू के हवाले से दो और आँकड़े छापे, जो पीटीआई की कॉपी में नहीं हैं: राज्य में इस समय 2,132 मदरसे वैध सरकारी मंज़ूरी के साथ चल रहे हैं और 2,396 बिना किसी मंज़ूरी के। बांग्ला पोर्टल इंडिया हुड ने बिना मंज़ूरी वालों की संख्या 2,036 लिखी है। इनमें से कोई आँकड़ा विभाग की अपनी विज्ञप्ति से नहीं आया, क्योंकि ऐसी कोई विज्ञप्ति सार्वजनिक नहीं हुई है।

बंद होने वाले 252 में से ज़्यादातर ख़ारिजी मदरसे बताए गए हैं। यह बात संबाद प्रतिदिन, पुबेर कलम, वार्ताभारती और एनटीवी चारों ने लिखी है, और चारों ने इसका स्रोत सरकारी सूत्रों को बताया है, किसी प्रकाशित दस्तावेज़ को नहीं।

जून की चिट्ठी से सितंबर के आदेश तक

इस आदेश की शुरुआत मई 2026 में हुई। आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक़ पश्चिम बंगाल की नई भारतीय जनता पार्टी सरकार में अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा मंत्री का कार्यभार सँभालते ही क्षुदीराम टुडू ने ऐलान किया था कि ग़ैर-क़ानूनी ढंग से चल रहे मदरसों पर कार्रवाई होगी, उन्हें चिह्नित कर बंद किया जाएगा, और मदरसे के नाम पर ऐसी गतिविधियों में शामिल लोगों को सज़ा मिलेगी।

5 जून 2026 को विभाग की अधिसूचना निकली। मिलेनियम पोस्ट ने उस निर्देश का पाठ छापा है। प्रधान सचिव की तरफ़ से सभी ज़िलाधिकारियों को भेजे गए पत्र में ब्लॉक और नगरपालिका स्तर पर सर्वे कराने को कहा गया, और उसके दायरे में हर तरह की संस्था रखी गई: संबद्ध, मान्यता प्राप्त, पंजीकृत, सहायता प्राप्त, बिना सहायता वाली, अपंजीकृत, समुदाय द्वारा संचालित, निजी प्रबंधन वाली, और किसी भी दूसरी शैक्षिक या प्रशासनिक व्यवस्था के तहत चलने वाली। ज़िलाधिकारियों को रिपोर्ट 5 जुलाई तक भेजनी थी।

पत्र में जो ब्योरे माँगे गए थे, वे ये थे: मदरसे की स्थापना की तारीख़, वह विभाग में पंजीकृत है या नहीं, पंजीकरण का विवरण, वहाँ पढ़ने वाले छात्रों तथा शिक्षक और ग़ैर-शिक्षक कर्मचारियों का ब्योरा, संस्था आवासीय है या नहीं, और वहाँ पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम।

उसी पत्र का एक वाक्य अब दोबारा पढ़ने लायक़ है। मिलेनियम पोस्ट के उद्धरण में विभाग लिखता है कि यह क़वायद सिर्फ़ सूचना जुटाने और उसे जाँचने के प्रशासनिक मक़सद तक सीमित है, और इसके बाद: "इस पत्र के आधार पर फ़िलहाल न कोई दंडात्मक या बंद करने की कार्रवाई शुरू की जाएगी और न छात्रों को हटाने से जुड़ी कोई कार्रवाई। संबंधित संस्थाओं को मौजूदा शैक्षिक सत्र में बिना किसी बाधा के अपनी शैक्षणिक गतिविधियाँ जारी रखने दी जाएँगी।" उसी पत्र में यह भी लिखा था कि यह क़वायद सरकार को अनियमितताएँ या ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ, यदि मिलें, चिह्नित करने और सुधारात्मक क़दम उठाने में मदद कर सकती है।

फिर 8 जुलाई को विभाग ने दूसरा आदेश निकाला, जिसमें बारह ज़िलों में एक हफ़्ते के भीतर संस्थाओं का भौतिक निरीक्षण पूरा करने को कहा गया। ये बारह ज़िले हैं कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, पश्चिम मेदिनीपुर, पूर्व मेदिनीपुर, नदिया, हुगली, हावड़ा, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना। 12 जुलाई को विभाग ने अठारह सदस्यों की एक समीक्षा समिति बनाई, जो 15 जुलाई से ज़िलों में जाने लगी और जिसे 21 जुलाई तक विस्तृत रिपोर्ट देनी थी।

यहाँ तारीख़ों में एक फ़र्क़ है जिसे दर्ज कर देना चाहिए। पीटीआई लिखती है कि सर्वे जून की शुरुआत से सभी ज़िलों में चला। संबाद प्रतिदिन और पुबेर कलम, दोनों, 22 जुलाई को वह तारीख़ बताते हैं जब विभाग ने कोलकाता समेत ज़िलों में यह सर्वे कराया। दोनों विवरण एक ही बहु-चरणीय प्रक्रिया के अलग-अलग हिस्से हो सकते हैं, पर किस चरण की रिपोर्ट पर 252 का आदेश टिका है, यह किसी रिपोर्ट में नहीं है।

मान्यता प्राप्त, ग़ैर-मान्यता प्राप्त और ख़ारिजी मदरसे

ख़बरें अक्सर तीन अलग चीज़ों को एक ही शब्द में समेट देती हैं। पश्चिम बंगाल में उन तीनों की क़ानूनी हैसियत अलग-अलग है।

पहली श्रेणी मान्यता प्राप्त मदरसों की है। ये पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 1994 के तहत आते हैं। यह अधिनियम पश्चिम बंगाल विधानमंडल ने पारित किया और राज्यपाल की स्वीकृति 8 अगस्त 1994 के कलकत्ता गजट असाधारण में पहली बार प्रकाशित हुई। अधिनियम की धारा 2(छ) में "मदरसा शिक्षा" की परिभाषा है: वह शिक्षा प्रणाली जिसमें अरबी, इस्लामी इतिहास और संस्कृति तथा धर्मशास्त्र की शिक्षा दी जाती है, और जिसमें हाई मदरसा शिक्षा प्रणाली तथा सीनियर मदरसा शिक्षा प्रणाली शामिल हैं। हाई मदरसा प्रणाली में अरबी और इस्लामी इतिहास के साथ प्राथमिक स्तर से ऊपर की सामान्य शिक्षा भी दी जाती है, इस मक़सद से कि छात्र किसी विश्वविद्यालय, सरकार या वैधानिक प्राधिकरण के प्रमाणपत्र, डिप्लोमा या डिग्री पाठ्यक्रम में दाख़िले के योग्य हो जाएँ।

बर्दवान ज़िले में ओरग्राम चतुष्पल्ली हाई मदरसा, इमारत पर बांग्ला में नाम और संबद्धता का बोर्ड, फाटक पर वही नाम और दीवार पर सर्व शिक्षा मिशन की पुताई, यह तस्वीर 2011 की है; बोर्ड से मान्यता पाने वाली पहली श्रेणी इसी शक्ल में दिखती है
तस्वीर: mainuddinhaque, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

बोर्ड की अपनी वेबसाइट पर दर्ज है कि राज्य में इस समय 614 मान्यता प्राप्त मदरसे हैं: 423 हाई मदरसा, 89 जूनियर हाई मदरसा और 102 सीनियर मदरसा। इनमें 265 हाई मदरसे उच्चतर माध्यमिक स्तर तक और 77 सीनियर मदरसे फ़ाज़िल स्तर तक उन्नत किए जा चुके हैं, और 183 में कौशल विकास के व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलते हैं। उसी पन्ने पर तीन पैराग्राफ़ नीचे कुल संख्या 597 लिखी है, जहाँ बोर्ड बताता है कि 597 में से 536 सह-शिक्षा वाले हैं। दो आँकड़े एक ही दस्तावेज़ में हैं और पन्ने पर कोई तारीख़ नहीं है, इसलिए इनमें नया कौन-सा है, यह पन्ना ख़ुद नहीं बताता।

बोर्ड जो सूचियाँ नाम और पते के साथ छापता है, उनमें गिनती इस तरह है। सहायता प्राप्त संबद्ध मदरसों की सूची में 372 प्रविष्टियाँ हैं, चार तालिकाओं में बँटी हुईं: 55 फ़ाज़िल, 188 हायर सेकंडरी, 112 जूनियर हाई और 17 उर्दू माध्यम। बिना सहायता वाले संबद्ध मदरसों की अलग सूची में 251 पंक्तियाँ हैं, हर एक अपने कोड, ब्लॉक और माध्यम के साथ। तीसरी सूची नई संबद्धता पाने वालों की है, जिसमें 110 संस्थाएँ हैं।

दूसरी श्रेणी उन मदरसों की है जिन्हें बोर्ड की मान्यता नहीं मिली। तीसरी श्रेणी ख़ारिजी मदरसों की है। ऑर्गनाइज़र ने 13 जुलाई की अपनी रिपोर्ट में इनकी परिभाषा इस तरह दी है: निजी लोग, धार्मिक संगठन, ट्रस्ट या स्थानीय समुदाय इन्हें खोलते और चलाते हैं, इन्हें आम तौर पर राज्य से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती, और ये औपचारिक मदरसा शिक्षा प्रणाली से बाहर हैं। उसी रिपोर्ट में यह भी है कि इसी वजह से उनके पाठ्यक्रम, छात्र संख्या, शिक्षक व्यवस्था और धन के स्रोतों के बारे में सरकारी आँकड़े सीमित हैं।

देश के स्कूली आँकड़ों में यह भेद दर्ज होता है। शिक्षा मंत्रालय की यूडायस प्लस 2024-25 पुस्तिका में प्रबंधन के कोड 97, 98 और 99 अलग-अलग हैं: मदरसा बोर्ड या वक़्फ़ बोर्ड से मान्यता प्राप्त, मदरसा ग़ैर-मान्यता प्राप्त, और मदरसा सहायता प्राप्त। उसी पुस्तिका के राष्ट्रीय पन्ने पर देश भर के मान्यता प्राप्त मदरसों की संख्या 19,690 है, जबकि ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसे "अन्य विद्यालय" की श्रेणी में ग़ैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों और वेद विद्यालयों के साथ गिने जाते हैं।

बोर्ड की ज़िलेवार सूची के सामने बंद होने का ज़िलेवार आँकड़ा

बंद होने वाले मदरसों का ज़िलेवार बँटवारा एजेंसी रिपोर्टों से आया है, विभाग के आदेश से नहीं। वार्ताभारती, एनटीवी और कई हिंदी-बांग्ला पोर्टलों ने एक ही आँकड़ा छापा है: मालदा में कम से कम 44, उत्तर दिनाजपुर में 37, दक्षिण 24 परगना में 32, और नदिया तथा मुर्शिदाबाद में 25-25।

ये पाँच ज़िले मिलकर 163 बनते हैं। आदेश 252 पर है। बाक़ी 89 मदरसे किन ज़िलों में हैं, यह किसी रिपोर्ट में नहीं है।

उत्तर दिनाजपुर ज़िले में रेल पटरी के किनारे फैले चाय के बाग़ान और उनके पीछे खेत, यह तस्वीर जुलाई 2023 की है; बंद होने वाले 252 में से 37 इसी ज़िले के बताए गए हैं
तस्वीर: শরদিন্দু ভট্টাচার্য্য, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यही आँकड़ा बोर्ड की अपनी सूचियों के सामने रखने पर दूसरी तस्वीर बनती है। सहायता प्राप्त संबद्ध मदरसों की ज़िलेवार सूची में मुर्शिदाबाद के 88 मदरसे हैं, मालदा के 54, उत्तर 24 परगना के 35, उत्तर दिनाजपुर के 27, हावड़ा और दक्षिण 24 परगना के 24-24, हुगली के 23, बीरभूम के 18 और नदिया के 13। बिना सहायता वाली सूची में मुर्शिदाबाद की 49 पंक्तियाँ हैं, उत्तर दिनाजपुर की 44, मालदा की 10, दक्षिण 24 परगना की 4 और नदिया की 2।

नदिया का जोड़ ध्यान खींचता है। बोर्ड की दोनों प्रकाशित सूचियों में उस ज़िले के कुल 15 मदरसे दर्ज हैं। बंद करने का आदेश उसी ज़िले के 25 मदरसों पर है। दक्षिण 24 परगना में बोर्ड की सूचियों में 28 हैं और आदेश 32 पर है। यह विरोधाभास नहीं है, क्योंकि आदेश ग़ैर-मान्यता प्राप्त संस्थाओं पर बताया गया है और वे बोर्ड की किसी सूची में होती ही नहीं। पर यह उस पैमाने का अंदाज़ा देता है जिसकी बात हो रही है: नदिया में सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज मदरसों से ज़्यादा संख्या में ऐसी संस्थाएँ बंद हो रही हैं जो किसी दस्तावेज़ में नहीं थीं।

मुर्शिदाबाद इसका उल्टा उदाहरण है। बोर्ड की सूचियों में वहाँ 137 मदरसे हैं, राज्य में सबसे ज़्यादा, और बंद होने वालों की संख्या वहाँ 25 है, नदिया के बराबर। जिन बारह ज़िलों में जुलाई का निरीक्षण हुआ, उनमें ये पाँचों शामिल थे।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 18, और उसी क़ानून की धारा 1(5)

जब कोई स्कूल मान्यता के बिना चलता पाया जाता है, तो देश में उस पर कार्रवाई का रास्ता निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 तय करता है। यह अधिनियम संख्या 35 है और 26 अगस्त 2009 को अधिनियमित हुआ।

उसकी धारा 18(1) कहती है कि सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा स्थापित, स्वामित्व वाले या नियंत्रित स्कूल को छोड़कर कोई भी स्कूल इस अधिनियम के लागू होने के बाद मान्यता प्रमाणपत्र लिए बिना न स्थापित होगा और न चलेगा। धारा 18(3) कहती है कि मान्यता की शर्तों के उल्लंघन पर निर्धारित प्राधिकारी लिखित आदेश से मान्यता वापस लेगा। इसी उपधारा से जुड़ा परंतुक इस मामले के केंद्र में है: "ऐसे आदेश में यह निर्देश शामिल होगा कि मान्यता वापस लिए गए स्कूल में पढ़ रहे बच्चों को किस पड़ोसी स्कूल में दाख़िल किया जाएगा।" दूसरा परंतुक कहता है कि स्कूल को सुनवाई का मौक़ा दिए बिना मान्यता वापस नहीं ली जाएगी। धारा 18(4) के मुताबिक़ मान्यता वापस लेने की तारीख़ से वह स्कूल चल नहीं सकता, और धारा 18(5) में बिना मान्यता स्कूल चलाने पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना है, और उल्लंघन जारी रहने पर हर दिन दस हज़ार रुपये।

यानी इस अधिनियम में तीन चीज़ें एक साथ बँधी हैं: मान्यता की शर्त, सुनवाई का हक़, और यह ज़िम्मेदारी कि बंद करने वाला आदेश ख़ुद बताए कि बच्चे अब कहाँ जाएँगे।

उसी अधिनियम की पहली धारा दूसरी दिशा में जाती है। धारा 1(5) कहती है: "इस अधिनियम में निहित कोई भी बात मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देने वाली शैक्षिक संस्थाओं पर लागू नहीं होगी।" धारा 1(4) कहती है कि संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के प्रावधान बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देने पर लागू होंगे। ये दोनों उपधाराएँ मूल क़ानून में नहीं थीं; इन्हें 2012 के संशोधन अधिनियम (अधिनियम संख्या 30, 2012) ने जोड़ा।

तो धारा 18 का वह परंतुक, जो बंद करने वाले आदेश को बच्चों का ठिकाना बताने के लिए बाध्य करता है, मदरसों पर अपने-आप लागू नहीं होता। यह पेच किसी की व्याख्या नहीं है, संसद के लिखे पाठ में है, और उसी पाठ के कारण देश में मदरसों को बंद करने की कोई एक तयशुदा क़ानूनी प्रक्रिया नहीं है जैसी स्कूलों के लिए है।

इसी धारा 1(4) और 1(5) को अब उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है। लाइव लॉ की 13 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक़ महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक समिति के अध्यक्ष प्यारे ज़िया ख़ान की जनहित याचिका, रिट याचिका (सिविल) संख्या 924/2026, पर न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने विचार करना स्वीकार किया और मामले को अंजुमन इशाअत-ए-तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र राज्य के साथ नत्थी करने को कहा। अंजुमन वाले मामले में पीठ ने प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ के उस निष्कर्ष पर संदेह जताया था कि यह अधिनियम अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं पर लागू नहीं होता। मामला मुख्य न्यायाधीश की पीठ के सामने रखा जाना है।

1994 के क़ानून में मान्यता वापस लेने की शक्ति बोर्ड के पास है

मान्यता प्राप्त मदरसों के लिए पश्चिम बंगाल में रास्ता साफ़ लिखा हुआ है, और वह विभाग से नहीं गुज़रता।

1994 के अधिनियम की धारा 20(2)(क) बोर्ड को यह शक्ति देती है कि वह मदरसों को मान्यता दे या देने से इनकार करे, और ज़रूरी तथा उचित समझे तो वापस भी ले। शर्त यह है कि ऐसा करने से पहले वह मान्यता समिति की सिफ़ारिशों पर विचार करे और इस बारे में बने विनियमों के मुताबिक़ चले। धारा 19(1) उस समिति का काम तय करती है: मान्यता से जुड़े सभी मामलों पर बोर्ड को सलाह देना उसका कर्तव्य है। धारा 20(2)(ख) बोर्ड को मान्यता प्राप्त मदरसों का रजिस्टर रखने को कहती है।

बोर्ड ख़ुद किससे बनता है, यह धारा 4 में है। अध्यक्ष की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। उसके अलावा पदेन सदस्य के तौर पर उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष, विद्यालय शिक्षा निदेशक, कलकत्ता विश्वविद्यालय के अरबी विभाग के प्रमुख और कलकत्ता मदरसा के प्रधानाचार्य हैं। दस सदस्य मान्यता प्राप्त मदरसों के स्थायी शिक्षकों में से चुने जाते हैं, पाँच हाई मदरसों से, तीन सीनियर से और दो जूनियर हाई से। धारा 20(4) के मुताबिक़ बोर्ड का बनाया कोई विनियम तब तक वैध नहीं जब तक राज्य सरकार उसे मंज़ूर न कर दे।

जिन 252 मदरसों पर आदेश है, वे बताए गए विवरण के मुताबिक़ मान्यता प्राप्त नहीं थे, इसलिए धारा 20(2)(क) का रास्ता उन पर लागू नहीं होता। अब तक जो भी सार्वजनिक है, उसमें विभाग ने किसी अधिनियम, नियम या विनियम का नाम नहीं लिया है। विभाग की वेबसाइट खुलती नहीं, और 13 सितंबर का आदेश इस रिपोर्ट के लिए नहीं मिल सका। ऊपर के सभी आँकड़े समाचार एजेंसियों और अख़बारों की रिपोर्टों से हैं, और हर आँकड़े के साथ उसका स्रोत नाम से दर्ज है।

सुप्रीम कोर्ट का 2024 का फ़ैसला और एनसीपीसीआर पर लगी रोक

5 नवंबर 2024 को उच्चतम न्यायालय ने अंजुम क़ादरी बनाम भारत संघ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का 22 मार्च 2024 का वह फ़ैसला रद्द कर दिया जिसने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 को पूरी तरह असंवैधानिक ठहराया था। पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश धनंजय वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा थे।

फ़ैसले के अंतिम हिस्से में चार निष्कर्ष हैं। पहला यह कि मदरसा अधिनियम बोर्ड से मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षा के स्तर का नियमन करता है। दूसरा यह कि यह राज्य के उस सकारात्मक दायित्व के अनुरूप है कि मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ने वाले छात्र ऐसी दक्षता हासिल करें जिससे वे समाज में प्रभावी ढंग से हिस्सा ले सकें और आजीविका कमा सकें। तीसरा निष्कर्ष अनुच्छेद 21क और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बारे में है: इन्हें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने और चलाने के अधिकार के अनुरूप पढ़ा जाना चाहिए, और बोर्ड राज्य सरकार की मंज़ूरी से ऐसे विनियम बना सकता है जो यह सुनिश्चित करें कि अल्पसंख्यक संस्थाएँ अपेक्षित स्तर की धर्मनिरपेक्ष शिक्षा दें, बिना उनका अल्पसंख्यक चरित्र नष्ट किए। चौथे निष्कर्ष में अदालत ने फ़ाज़िल और कामिल जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियों का नियमन करने वाले प्रावधान असंवैधानिक ठहराए, क्योंकि वे यूजीसी अधिनियम से टकराते हैं।

इस फ़ैसले की सीमा ध्यान में रखने लायक़ है: उसका हर निष्कर्ष मान्यता प्राप्त मदरसों और उनके नियमन के बारे में है। जो संस्थाएँ किसी बोर्ड से मान्यता लेती ही नहीं, उन पर यह फ़ैसला सीधे कुछ नहीं कहता।

बच्चों के हस्तांतरण पर अदालत का अलग आदेश है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने 7 जून और 25 जून 2024 को राज्यों को पत्र लिखे थे कि ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ रहे बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजा जाए। 21 अक्टूबर 2024 को उच्चतम न्यायालय ने उन पत्रों पर रोक लगाई और उत्तर प्रदेश तथा त्रिपुरा समेत राज्यों को उनके आधार पर कोई कार्रवाई करने से रोका। अगस्त 2025 में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटीश्वर सिंह की पीठ ने वह अंतरिम संरक्षण बढ़ा दिया और याचिकाकर्ता जमीयत उलमा-ए-हिंद से कहा कि वह संबंधित उच्च न्यायालयों में जाए। यह रोक आयोग के उन पत्रों और उनसे निकली कार्रवाई पर है; पश्चिम बंगाल का यह आदेश उन पत्रों के आधार पर नहीं बताया गया है।

बच्चों के दाख़िले पर सार्वजनिक रिकॉर्ड चुप है

252 मदरसों में कितने बच्चे पढ़ते थे, यह संख्या न मंत्री के बयान में है, न एजेंसी की कॉपी में, न किसी अख़बार की रिपोर्ट में। जून के पत्र में ज़िलाधिकारियों से छात्रों का ब्योरा माँगा गया था, इसलिए यह आँकड़ा विभाग के पास होना चाहिए।

पश्चिम बंगाल के बैद्यपाड़ा बालिका उच्च विद्यालय का एक ख़ाली कक्ष, लकड़ी की बेंचें क़तार में और दीवार पर एक ट्यूबलाइट, यह तस्वीर दिसंबर 2020 की है जब महामारी में स्कूल बंद थे; 252 मदरसों की बेंचों पर कितने बच्चे बैठते थे, यह आँकड़ा कहीं दर्ज नहीं है
तस्वीर: Sumita Roy Dutta, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बच्चे अब कहाँ पढ़ेंगे, इस पर भी कोई सार्वजनिक निर्देश नहीं है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 18(3) का जो परंतुक ऐसे हर आदेश को पड़ोसी स्कूल का नाम लिखने पर मजबूर करता, वह धारा 1(5) के कारण यहाँ अपने-आप लागू नहीं होता। बच्चे का अपना हक़ इससे ख़त्म नहीं होता: अनुच्छेद 21क संविधान में है, और उसी अधिनियम की धारा 3(1) छह से चौदह साल के हर बच्चे को पड़ोस के स्कूल में निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देती है। वह हक़ बच्चे पर टिका है, संस्था पर नहीं।

बोर्ड की मान्यता वाली व्यवस्था से निकलने वाले बच्चों के बारे में आँकड़े हैं, और वे इस बहस में कम आते हैं। बोर्ड की वेबसाइट के मुताबिक़ उसके मदरसों में दाख़िल छात्रों में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा लड़कियाँ हैं। हाई मदरसों के 17 फ़ीसदी छात्र और 11 फ़ीसदी शिक्षक तथा ग़ैर-शिक्षक कर्मचारी ग़ैर-मुस्लिम हैं। बोर्ड पाँच ऐसे मदरसों के नाम भी गिनाता है जहाँ मुस्लिम छात्र अल्पसंख्यक हैं: ओरग्राम चतुष्पल्ली हाई मदरसा (बर्दवान), कसबा एमएम हाई मदरसा (उत्तर दिनाजपुर), चंद्रकोना इस्लामिया हाई मदरसा (पश्चिम मेदिनीपुर), डाबरा हाई मदरसा (हुगली) और सागर मनीरुद्दीन हाई मदरसा (दक्षिण 24 परगना)। हाई मदरसा परीक्षा का प्रमाणपत्र माध्यमिक परीक्षा के समकक्ष है, और सीनियर मदरसा प्रणाली की आलिम परीक्षा भी, इसलिए इस व्यवस्था से निकला छात्र किसी भी धारा में उच्चतर माध्यमिक में जा सकता है।

कारण बताओ नोटिस पाने वाले सौ मदरसों के लिए प्रक्रिया भी अधूरी दर्ज है। पीटीआई के मुताबिक़ उनके जवाब देखने के बाद आगे की कार्रवाई होगी। वार्ताभारती के मुताबिक़ टुडू ने चेतावनी दी कि उन्हें तुरंत वैध सरकारी दस्तावेज़ जमा करने होंगे, वरना उन्हें भी बंद कर दिया जाएगा। जवाब देने की तयशुदा समयसीमा किसी रिपोर्ट में नहीं है।

दोनों तरफ़ के बयान

राज्य के पंचायती राज मंत्री दिलीप घोष ने पीटीआई से कहा कि चरमपंथी गतिविधियों में कथित संलिप्तता के आरोप में गिरफ़्तार कई लोग ऐसी संस्थाओं में शिक्षक पाए गए। उनके शब्द थे, "मदरसों के ख़िलाफ़ बार-बार शिकायतें आती रही हैं। ऐसे उदाहरण रहे हैं जहाँ मदरसों से राष्ट्र-विरोधी गतिविधियाँ चलाई गईं।" सरकारी अनुमति से चलने वाले मदरसे चलते रहेंगे, पर सरकार जहाँ-तहाँ मदरसा खोलने की इजाज़त नहीं देगी, यह भी उन्हीं का कहना है।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने वार्ताभारती और एनटीवी के मुताबिक़ कहा कि सीमावर्ती इलाक़ों में मदरसा शिक्षा के नाम पर बढ़ रही कट्टरपंथी गतिविधियों पर रोक लगाना सरकार की ज़िम्मेदारी है। मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि बांग्लादेश से आए चरमपंथी ऐसी ग़ैर-मान्यता प्राप्त संस्थाओं में शरण लेते रहे हैं। ये आरोप हैं, और इनके समर्थन में कोई जाँच रिपोर्ट या आदेश सार्वजनिक नहीं है।

तृणमूल कांग्रेस के विधायक कुणाल घोष ने कहा कि सभी मदरसों को एक ही चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, और मदरसे शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं, उन्हें आतंकवाद से जोड़ना ठीक नहीं। रविवार तक किसी मदरसा संगठन या अल्पसंख्यक संस्था का बयान रिकॉर्ड पर नहीं आया था।

स्रोतपीटीआई / द ट्रिब्यून, 13 सितंबर 2026: 252 मदरसे बंद करने का आदेश, सौ को कारण बताओ नोटिस, मंत्री क्षुदीराम टुडू और दिलीप घोष के बयान, कुणाल घोष की प्रतिक्रिया, पीटीआई / सियासत डेली, 13 सितंबर 2026, शाम 5:02: वही रिपोर्ट, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के निर्देश के उल्लेख के साथ, पीटीआई / डेक्कन हेराल्ड, 13 सितंबर 2026, दोपहर 12:05: एजेंसी कॉपी का सबसे पहला प्रकाशन समय, मिलेनियम पोस्ट, कोलकाता: 5 जून 2026 के विभागीय निर्देश का पाठ, जिसमें बंद करने और छात्रों को हटाने पर रोक की शर्त दर्ज है, ऑर्गनाइज़र, 13 जुलाई 2026: 8 जुलाई के विभागीय आदेश और बारह ज़िलों की सूची, ख़ारिजी मदरसों की परिभाषा, सुकांत मजूमदार और अग्निमित्रा पॉल के बयान, आईएएनएस / द शिलॉन्ग टाइम्स, 12 जुलाई 2026: अठारह सदस्यों की समीक्षा समिति, 15 से 21 जुलाई की समयसीमा, जून के पत्र में माँगे गए ब्योरे, संबाद प्रतिदिन, कोलकाता, 13 सितंबर 2026, दोपहर 1:22: बंद करने के नोटिस की प्रतियाँ ज़िलाधिकारियों को भेजी गईं; 2,396 का आँकड़ा; टुडू और दिलीप घोष के बांग्ला उद्धरण, पुबेर कलम, कोलकाता, 13 सितंबर 2026, सुबह 10:19, मोक्तार होसेन मंडल: वही ब्योरा, कारण बताओ नोटिस पाने वाले मदरसों की स्थिति, वार्ताभारती, 13 सितंबर 2026: टुडू के हवाले से 2,132 मंज़ूरी प्राप्त और 2,396 बिना मंज़ूरी वाले मदरसे; ज़िलेवार बँटवारा; शमीक भट्टाचार्य, अग्निमित्रा पॉल और कुणाल घोष के बयान, एनटीवी तेलुगु, 13 सितंबर 2026, शाम 7:24: वही आँकड़े स्वतंत्र रूप से, कोलकाता और 22 ज़िलों के सर्वे का उल्लेख, द इंडियन एक्सप्रेस, 13 सितंबर 2026: एजेंसी रिपोर्ट का संक्षिप्त संस्करण, पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड की वेबसाइट, 'मदरसा शिक्षा की स्थिति': 614 मान्यता प्राप्त मदरसे, श्रेणीवार बँटवारा, लड़कियों का अनुपात, ग़ैर-मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत, समकक्षता, बोर्ड की सहायता प्राप्त संबद्ध मदरसों की ज़िलेवार सूची: फ़ाज़िल, हायर सेकंडरी, जूनियर हाई और उर्दू माध्यम की चार तालिकाएँ, कुल 372 प्रविष्टियाँ, बोर्ड की बिना सहायता वाले संबद्ध मदरसों की ज़िलेवार सूची: 251 पंक्तियाँ, हर संस्था का कोड, ब्लॉक और माध्यम, बोर्ड की नई संबद्धता पाने वाले मदरसों की सूची, 110 संस्थाएँ, पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 1994 (पश्चिम बंगाल अधिनियम 39, 1994), बोर्ड की वेबसाइट पर प्रकाशित पूर्ण पाठ: धारा 2, 19 और 20, इंडिया कोड, विधि एवं न्याय मंत्रालय: निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का अद्यतन पाठ, धारा 1(4), 1(5), 3, 18 और 19, अंजुम क़ादरी बनाम भारत संघ, उच्चतम न्यायालय, 5 नवंबर 2024: उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2004 पर फ़ैसले का पूरा पाठ और निष्कर्ष (क) से (घ), लाइव लॉ, 13 अगस्त 2026: धारा 1(4) और 1(5) को चुनौती देने वाली याचिका, प्यारे ज़िया ख़ान बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) 924/2026, द लीफ़लेट, 5 अगस्त 2025: एनसीपीसीआर के 7 और 25 जून 2024 के पत्रों पर 21 अक्टूबर 2024 की अंतरिम रोक और उसका विस्तार, शिक्षा मंत्रालय, यूडायस प्लस 2024-25 पुस्तिका: देश में मान्यता प्राप्त मदरसों की संख्या और प्रबंधन कोड 97, 98, 99 की परिभाषा

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