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सत्य निकेतन की उस इमारत पर कोई क़ानून नहीं चलता था, और यह 1993 से सबको पता है

दिल्ली में पीजी न होटल है, न छात्रावास, न गेस्टहाउस। नगर निगम उसका लाइसेंस नहीं देता। तैंतीस साल में छह बार 'योजना' बनी। 6 सितंबर को एक इमारत ढही, सात छात्र मारे गए, और अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को भी पीछे कर दिया है।

दुर्गाबाई देशमुख मेट्रो स्टेशन से दिखता सत्य निकेतन। डीयू के दक्षिणी परिसर से सटा यह मोहल्ला छात्रों के पीजी से भरा है।
तस्वीर: HARSH RAWAT, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

P-14, सत्य निकेतन, दक्षिण-पश्चिम दिल्ली। 55 वर्ग गज का प्लॉट, एक बेसमेंट और ऊपर चार मंज़िलें; लड़कों का एक पीजी, नाम "हॉस्टल डेज़"। रविवार 6 सितंबर को दोपहर के क़रीब डेढ़ बजे यह इमारत बैठ गई।

सात लोग मारे गए। बारह लोगों को मलबे से निकाला गया।

तीसरे दिन, मंगलवार 8 सितंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले को ख़ुद देखेगा, और यह काम "पूरे देश के स्तर पर" होगा। एक दिन पहले दिल्ली हाई कोर्ट नगर निगम और दिल्ली विश्वविद्यालय को ज़िम्मेदार ठहरा चुका था।

इन दो अदालती दिनों के बीच एक सवाल है जिसका जवाब किसी काग़ज़ में नहीं मिलता: उस इमारत को देखने की ज़िम्मेदारी किसकी थी?

इमारत क्या थी

सत्य निकेतन के पास रिंग रोड। P-14 नंबर की इमारत इसी मोहल्ले की भीतरी गली में थी, डीयू के दक्षिणी परिसर से कुछ सौ मीटर पर।
तस्वीर: ArmouredCyborg, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अमाइकस क्यूरी यानी अदालत के सहायक वकील अजीत कुमार सिन्हा की स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक़, इमारत 55 वर्ग गज के प्लॉट पर थी: एक बेसमेंट और उसके ऊपर चार मंज़िलें।

अख़बारों ने इसे "पाँच मंज़िला" लिखा है; द प्रिंट ने "छह मंज़िला"। इमारत की उम्र भी दो तरह से छपी है: द प्रिंट में लगभग 30 साल, ट्रिब्यून में लगभग 40। ये विरोध जैसे के तैसे यहाँ दर्ज हैं, क्योंकि जाँच पूरी होने तक इनमें से किसी को सही मानने का आधार नहीं है।

जो सब स्रोतों में एक जैसा है: बेसमेंट या भूतल में मरम्मत या फेरबदल का काम चल रहा था, और ढहने से ठीक पहले वहाँ पानी भर गया था। अमाइकस ने अदालत को यही बताया, यह जोड़ते हुए कि असली कारण अभी जाँच में है।

किराया, कमरे और कॉलेज

ट्रिब्यून के अनुसार इमारत में लगभग 15 कमरे थे, हर कमरे में दो से तीन छात्र, और किराया 12,000 से 20,000 रुपये प्रति बिस्तर। द प्रिंट ने 75 बिस्तरों की क्षमता और 15,000 रुपये महीना, खाना समेत, लिखा है।

रहने वाले छात्र मोतीलाल नेहरू कॉलेज, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज और श्री वेंकटेश्वर कॉलेज के थे; केरल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से आए हुए। द प्रिंट ने एम्स के ट्रॉमा सेंटर से रविवार शाम की गिनती दी: 11 लोग लाए गए, 5 मृत लाए गए, 1 की बाद में मौत, 3 भर्ती।

एक छात्र ने द प्रिंट से कहा कि इमारत का ढाँचा "टूट रहा था" और उन्होंने बार-बार शिकायत की थी; फिर भी वहाँ रहे, क्योंकि सस्ता था।

वह श्रेणी जो किसी क़ानून में नहीं है

यहीं से इस कहानी का असली हिस्सा शुरू होता है।

द पायनियर ने 8 सितंबर को दिल्ली सरकार के अधिकारियों के हवाले से जो स्थिति लिखी है, वह इस तरह है: आवासीय इलाक़े में पीजी चलाने के लिए कोई विशिष्ट मानदंड नहीं हैं। नगर निगम पीजी को लाइसेंस जारी नहीं करता। भवन उपनियम, भू-उपयोग के नियम और अग्नि-सुरक्षा के नियम लागू होते हैं, पर ऐसा कोई वैधानिक निकाय नहीं है जो पीजी को पीजी मानकर उसकी निगरानी करे।

होटल का लाइसेंस होता है। गेस्टहाउस का पंजीकरण होता है। विश्वविद्यालय के छात्रावास पर विश्वविद्यालय का नियम चलता है। एक निजी मकान में बीस बिस्तर लगाकर छात्रों को किराये पर देना इन तीनों में से कुछ नहीं है।

इसीलिए जब हाई कोर्ट ने सोमवार को पूछा कि अनुमति किसने दी थी, तो जवाब "किसी ने नहीं" से ज़्यादा "किसी को देनी ही नहीं थी" के क़रीब है।

1993 से 2023: छह कोशिशें

यह ख़ालीपन नया नहीं है। द पायनियर का इतिहास इस तरह चलता है।

1993 में पहली "पेइंग गेस्ट रेज़िडेंशियल एकोमोडेशन" योजना बनी। 2000 में शीला दीक्षित की सरकार ने अपनी अलग पीजी योजना मंज़ूर की। 2019 में दिल्ली विधानसभा की एक समिति ने पीजी नियमों के दस्तावेज़ माँगे; वे कभी नहीं मिले। 2021 में उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने व्यावसायिक पीजी का सर्वे और पंजीकरण प्रस्तावित किया। 2022 में लगभग 700 पीजी को दिल्ली पुलिस के लाइसेंस के तहत लाने का प्रस्ताव आया। 2023 में मुखर्जी नगर की आग के बाद निगम ने सर्वे किया और सौ से ज़्यादा पीजी उपनियम तोड़ते पाए गए।

छह पड़ाव, तैंतीस साल, और सत्य निकेतन की इमारत तब भी बिना किसी श्रेणी के खड़ी रही, जब तक खड़ी रही।

हाई कोर्ट ने सोमवार को क्या कहा

दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर का एक कॉलेज। हाई कोर्ट ने कहा कि छात्रावासों की "पूरी तरह अपर्याप्त" संख्या ही छात्रों को पीजी की ओर धकेलती है।
तस्वीर: Direct M, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

7 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने मामला सुना। पीटीआई की रिपोर्ट में पीठ के शब्द इस तरह हैं।

छात्रावासों पर: "यह पूरी तरह अपर्याप्त छात्रावासों की वजह से है।" और: "छात्रावासों की संख्या के लिहाज़ से यह बहुत दयनीय स्थिति है।"

सरकार पर: "आप अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते।"

निर्माण पर: "अगर अनुमति दो मंज़िल की है, तो निर्माण छह का किया जाता है।"

पीठ ने पीजी मालिक को अकेला दोषी मानने से मना कर दिया। उसने कहा कि ज़िम्मेदारी विश्वविद्यालय की भी है, जिसे अपने छात्रों के रहने का इंतज़ाम देखना है, और नगर निगम की भी, जिसे यह देखना है कि दिल्ली में हर निर्माण उपनियमों के हिसाब से हो।

हाई कोर्ट के तीन आदेश

पहला: नगर निगम इस हादसे की उच्चतम स्तर की जाँच करे और बताए कि इमारत की वैध अनुमति थी या नहीं।

दूसरा: निगम एक हफ़्ते के भीतर अपने अधिकार-क्षेत्र के सभी पीजी और छात्रावासों का ऑडिट करे और रिपोर्ट दे कि पीजी किन नियमों से चलते हैं और उनमें कितने छात्र रहते हैं।

तीसरा: दिल्ली विश्वविद्यालय बताए कि उसके कितने छात्र बाहर से आते हैं और छात्रावासों में कितनी जगह है।

पीठ ने बचाव-कार्य दोगुना करने और मलबे के संवेदनशील वीडियो सोशल मीडिया पर न फैलाने का निर्देश भी दिया। अगली सुनवाई 25 सितंबर को है। याचिका में मृतकों के परिवारों के लिए एक करोड़ रुपये, घायलों के इलाज और सभी पीजी के संरचना-ऑडिट की माँग है।

और मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को रोक दिया

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट। 10 सितंबर को यहीं तय होगा कि दिल्ली की याचिका हाई कोर्ट से यहाँ आएगी या नहीं।
तस्वीर: सुभाशीष पाणिग्रही, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अगले ही दिन मामला सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ के सामने आया।

केंद्र, नगर निगम और दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मौखिक अनुरोध किया कि दिल्ली हाई कोर्ट को अपनी याचिका अलग से सुनने दी जाए, क्योंकि वह इसे "पूरी गंभीरता से" ले चुका है और दोषी अधिकारी निलंबित हो चुके हैं।

पीठ ने मना कर दिया। द हिंदू के मुताबिक़ न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा: "नहीं। इसे सही भावना से उठाया गया होगा, पर यह ओवरलैप कर रहा है। हम इसे लेंगे। हमारे मन में पहले से कुछ है... इसे पूरे देश के स्तर पर होना होगा।"

सुनवाई गुरुवार 10 सितंबर को है, और पीठ ने संकेत दिया कि उसके बाद वह हाई कोर्ट की कार्यवाही अपने पास ले सकती है।

यह मामला तमिलनाडु से चला था

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका सत्य निकेतन की नहीं है। वह *लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य* का मामला है, जो भू-उपयोग और भवन-उपनियमों के उल्लंघन से शुरू हुआ था।

इस साल मार्च में अदालत ने उसका दायरा बढ़ाया और दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, चेन्नई और कोलकाता के नगर निकायों से पूछा कि ऐसे उल्लंघनों पर क्या कार्रवाई हुई। दिल्ली के लिए अदालत ने एक समिति बनाई, जिसमें आईआईटी के दो वरिष्ठ प्रोफ़ेसर और दो ड्राफ़्ट्समैन थे, निगम के अधिकारी साथ में। उस समिति ने लाजपत नगर, साकेत और मालवीय नगर की जाँच 3 सितंबर को पूरी की।

सत्य निकेतन उस दायरे में नहीं था। अमाइकस की रिपोर्ट यही कहती है, और यही उसका तर्क है कि दायरा अब छात्रों के सभी मोहल्लों तक बढ़े।

उसी मोहल्ले में, अप्रैल 2022 में भी

अमाइकस की रिपोर्ट एक और बात याद दिलाती है। अप्रैल 2022 में सत्य निकेतन में ही एक इमारत गिरी थी; दो लोग मारे गए थे, चार घायल हुए थे।

एक ही मोहल्ले में चार साल के भीतर दो जानलेवा हादसे। रिपोर्ट के शब्दों में यह "मौजूदा निरीक्षण तंत्र की प्रभावशीलता" पर सवाल खड़ा करता है।

हादसे के दिन, 6 सितंबर को, निगम ने बगल की इमारत P-13 को ख़तरनाक पाकर उसे ढहाने का आदेश दिया। दक्षिण ज़ोन के पाँच अधिकारी निलंबित किए गए।

मालिक, गिरफ़्तारी और एक नाम का फ़र्क़

पुलिस ने दक्षिण कैंपस थाने में मालिक और अन्य के ख़िलाफ़ ग़ैर-इरादतन हत्या, ढाँचे की देखरेख में लापरवाही और सार्वजनिक सुरक्षा को ख़तरे में डालने की धाराओं में केस दर्ज किया। मालिक को सोमवार को राजस्थान के भिवाड़ी से पकड़ा गया।

नाम पर स्रोत बँटे हुए हैं। ट्रिब्यून ने गुड़गाँव के तीन भाइयों, हरि राम बंसल, आनंद बंसल और आज़ाद बंसल, का नाम लिया और हरि राम को मुख्य मालिक बताया; द प्रिंट में "हरिराम" है। लाइव लॉ ने अमाइकस की रिपोर्ट के हवाले से "हरि ओम बंसल" लिखा है।

हम इनमें से किसी को सही नहीं ठहरा रहे। पुलिस का आधिकारिक बयान आने तक दोनों नाम यहाँ हैं।

हर साल एक और नाम

दिल्ली के छात्र-मोहल्लों की यह सूची पिछले तीन साल से हर साल बढ़ी है।

15 जून 2023: मुखर्जी नगर के एक कोचिंग सेंटर में आग; 200 से 250 छात्र कक्षा में; रस्सियों और खिड़कियों से उतरे; दस-बारह घायल।

27 जुलाई 2024: पुराने राजेंद्र नगर में राऊ'ज़ आईएएस के बेसमेंट में पानी भरा; तीन अभ्यर्थी, श्रेया यादव, तान्या सोनी और नेविन डेल्विन, डूबकर मरे। बेसमेंट में व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति नहीं थी।

6 सितंबर 2026: सत्य निकेतन।

169 और 7,800

द हिंदू ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की "दुर्घटना से मौतें" रिपोर्टों का विश्लेषण किया है। 2020 से 2024 के बीच देश में इमारत गिरने से 7,800 से ज़्यादा लोग मरे। दिल्ली का हिस्सा 169।

पाँच साल में 169, यानी हर ग्यारह दिन में एक। ये सिर्फ़ वे मौतें हैं जो इमारत गिरने के खाते में दर्ज हुईं; आग और डूबने की अलग गिनती है।

गुड़गाँव में 453

सीमा के उस पार तस्वीर अलग नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के सर्वे में गुड़गाँव के आवासीय सेक्टरों में 453 पीजी और गेस्टहाउस मिले; 121 एक एस्टेट अधिकारी के क्षेत्र में, 332 दूसरे के।

हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने जनवरी में स्वतः संज्ञान लिया था। जुलाई के आदेश में उसने लिखा कि आवासीय परिसर में व्यावसायिक ठहराव भू-उपयोग का अनधिकृत बदलाव है, जिससे "भीड़, बिजली-पानी के ढाँचे का टूटना, सफ़ाई की समस्या, यातायात और गंभीर सुरक्षा जोखिम" पैदा होते हैं।

18 से 20 जून और 3 से 4 जुलाई के बीच नगर योजना विभाग ने डीएलएफ़ फ़ेज़-3 में 15 पीजी सील किए, जिनमें 476 कमरे थे, और तीन गेस्टहाउस, जिनमें 87 कमरे। कार्रवाई पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की नवंबर 2025 की रोक से अटकी थी; 29 मई 2026 को रोक सीमित हुई, तब सीलिंग शुरू हुई।

सिर्फ़ 218 अनुमतियाँ

गुड़गाँव के आँकड़े में सबसे बताने वाली संख्या छोटी है। हरियाणा की 2021 की गेस्टहाउस नीति के तहत अधिकारियों ने आयोग को बताया कि उनके वैधानिक दायरे में सिर्फ़ 218 अनुमतियाँ दी गई हैं।

453 मिले, 218 के पास अनुमति। और पुलिस आयुक्त की रिपोर्ट कहती है कि मार्च तक किसी अवैध पीजी की "कोई विशिष्ट शिकायत" नहीं आई थी। आयोग की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को है।

नीति का वादा: एक से दो महीने

मंगलवार को दिल्ली के शहरी विकास मंत्री आशीष सूद ने कहा: "हम अगले एक से दो महीनों में एक व्यापक पीजी नीति लाएँगे।" उसमें पीजी लाइसेंस, ज़ोन के हिसाब से किराये की सीमाएँ, संरचना और अग्नि-सुरक्षा ऑडिट, और एक केंद्रीय "गवपीजी" पोर्टल होगा जिस पर किराया, सुविधाएँ और सुरक्षा-अनुपालन दिखेंगे।

सूद ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय छात्रावासों के लिए फ़्लोर एरिया रेशियो बढ़ाया जाएगा और ख़ाली सरकारी संपत्तियाँ छात्रों के रहने में बदली जाएँगी। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि सार्वजनिक उपयोग की हर इमारत का समय-समय पर संरचना-ऑडिट होगा।

1993 के बाद यह सातवाँ वादा है। इस बार फ़र्क़ यह है कि दो अदालतें तारीख़ें दे चुकी हैं।

एनएसयूआई की याचिका और मुख्य न्यायाधीश का सवाल

मंगलवार को एक और जनहित याचिका आई, एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ की, जिसमें दिल्ली सरकार से समयबद्ध छात्रावास नीति और डीयू से हर कॉलेज में छात्रावास की माँग है।

हाई कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से मना किया। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने वकील से पूछा: "क्या यह निर्देश अंतरिम आदेश से दिया जा सकता है? ... क्या ऐसा निर्देश (अदालत से) जारी हो सकता है?"

यह सवाल छोटा नहीं है। अदालत नियम तोड़ने पर रोक लगा सकती है; छात्रावास बनवाना बजट और ज़मीन का काम है।

छात्रावास की कमी, जिस पर कल हम लिख चुके

हाई कोर्ट ने जिस "अपर्याप्त छात्रावासों" की बात कही, उस पर हमने कल ही लिखा था: डीयू के बिस्तरों और बाहर से आए छात्रों का हिसाब, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की नोटिस। वह लेख यहाँ है।

आज की कहानी उस कमी का दूसरा सिरा है। जहाँ विश्वविद्यालय बिस्तर नहीं देता, वहाँ बाज़ार देता है, और बाज़ार को देखने वाला कोई नहीं है।

आपके लिए इसका मतलब

अगर आप या आपका बच्चा दिल्ली के किसी पीजी में है, तो अगले कुछ दिनों में तीन चीज़ें होंगी।

नगर निगम को हाई कोर्ट के आदेश से एक हफ़्ते के भीतर, यानी 14 सितंबर तक, अपने क्षेत्र के पीजी और छात्रावासों का ऑडिट करना है। दक्षिण कैंपस और मुखर्जी नगर में संरचना-ऑडिट के आदेश पहले ही हो चुके हैं।

10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि पूरे देश के छात्र-आवासों की समयबद्ध जाँच का आदेश दे या नहीं, और दिल्ली की याचिका अपने पास ले या नहीं।

25 सितंबर को हाई कोर्ट में निगम और विश्वविद्यालय की रिपोर्टें आनी हैं, अगर तब तक मामला वहाँ रहा।

जो अभी तय नहीं है

ढहने का कारण। मंज़िलों की गिनती। इमारत की उम्र। मालिक का नाम। इनमें से हर एक पर स्रोत अलग-अलग कहते हैं, और इस लेख ने उन्हें अलग-अलग ही रखा है।

जो तय है, वह इतना है: उस इमारत को देखने की ज़िम्मेदारी किसी विभाग के काग़ज़ पर नहीं लिखी थी, और गुरुवार को देश की सबसे बड़ी अदालत यही लिखवाने बैठेगी।

स्रोतद हिंदू, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर रिपोर्ट, 8 सितंबर 2026, लाइव लॉ, अमाइकस की स्टेटस रिपोर्ट पर, पीटीआई, दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई, 7 सितंबर 2026, द पायनियर, पीजी नियमन का इतिहास, इंडियन एक्सप्रेस, गुड़गाँव के 453 पीजी, द प्रिंट, बचाव और गिरफ़्तारी

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।