भारत से एमबीबीएस करने वाला सीधे काम शुरू करता है, विदेश से करने वाले को एक और परीक्षा देनी पड़ती है
उस परीक्षा में तीन सौ में से डेढ़ सौ अंक चाहिए। पास होने वालों का अनुपात हर सत्र में आधे से नीचे रहा है और कई सत्रों में उससे भी बहुत नीचे।

हर साल हज़ारों भारतीय छात्र एमबीबीएस करने विदेश जाते हैं।
इसकी वजह सीधी है। भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें कम हैं और निजी कॉलेजों की फ़ीस बहुत ज़्यादा। विदेश के कई देशों में वही डिग्री कम पैसे में मिल जाती है।
फ़ैसला अक्सर इसी तुलना पर होता है: यहाँ कितना ख़र्च और वहाँ कितना।
जो चीज़ इस तुलना में नहीं आती, वह लौटने के बाद का रास्ता है।
यह लेख उसी रास्ते का नक़्शा है। इसमें कोई राय नहीं है कि विदेश जाना चाहिए या नहीं। इसमें सिर्फ़ यह है कि जाने का फ़ैसला करने से पहले कौन सी बातें मालूम होनी चाहिए, क्योंकि ये सब फ़ीस भर देने के बाद पता चलती हैं और तब कुछ नहीं किया जा सकता।
दो अलग रास्ते
भारत के किसी मान्यता प्राप्त कॉलेज से एमबीबीएस करने वाला छात्र पढ़ाई पूरी करता है, एक साल की इंटर्नशिप करता है, और पंजीकरण कराकर काम शुरू कर देता है।
विदेश से डिग्री लेकर लौटने वाले को यह सब करने से पहले एक परीक्षा पास करनी होती है।
उसका नाम विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा है, और वह इसी बात की जाँच के लिए है कि विदेश में मिली शिक्षा भारत में काम करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।
यह परीक्षा भारत से पढ़े छात्र को नहीं देनी होती।
परीक्षा कैसी होती है
परीक्षा दो पत्रों में होती है और उनमें कुल तीन सौ बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं।
पास होने के लिए डेढ़ सौ अंक चाहिए, यानी पचास फ़ीसदी।
ग़लत उत्तर पर अंक नहीं कटते।
यह साल में दो बार होती है और 2026 के जून सत्र की तारीख़ अट्ठाईस जून थी। दूसरा सत्र आम तौर पर दिसंबर में होता है।
परीक्षा राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड कराता है और वह देश भर के केंद्रों पर एक साथ होती है। इसमें बैठने की कोई ऊपरी सीमा नहीं है, यानी उम्मीदवार जितनी बार चाहे कोशिश कर सकता है।
प्रश्न वही विषय पूछते हैं जो भारत के एमबीबीएस पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाते हैं। यही इस परीक्षा की असली कठिनाई है, क्योंकि विदेश में पढ़ा छात्र वहाँ के पाठ्यक्रम से पढ़कर आया होता है और उसे यहाँ के हिसाब से दोबारा तैयारी करनी पड़ती है।
अब उस आँकड़े पर आइए जो सबसे ज़रूरी है।
कितने पास होते हैं
यहाँ स्रोत आपस में पूरी तरह नहीं मिलते, इसलिए दोनों दर्ज किए जा रहे हैं।
एक आकलन के मुताबिक़ पिछले पाँच साल में राष्ट्रीय औसत चालीस से पचास फ़ीसदी के बीच रहा है।
दूसरे आकलन के मुताबिक़ हाल के हर सत्र में यह तीस फ़ीसदी से नीचे रहा है।
दोनों में जो साझा है, वह यह है कि आधे से ज़्यादा उम्मीदवार हर बार नहीं निकल पाते।
इस संख्या को उलटकर पढ़िए। जो परिवार पाँच या छह साल की पढ़ाई का ख़र्च उठाकर बच्चे को विदेश भेजता है, उसके सामने यह संभावना रहती है कि डिग्री लेकर लौटने के बाद भी वह डॉक्टर के तौर पर काम शुरू न कर पाए।
यह जोखिम फ़ीस की तुलना में कहीं नहीं दिखता।
और एक बात इस आँकड़े को और भारी बनाती है। इस परीक्षा में बैठने वालों की संख्या पर कोई सीमा नहीं है, यानी कोई कितनी भी बार दे सकता है।
सुनने में यह राहत लगती है। व्यवहार में इसका मतलब यह होता है कि जो एक बार नहीं निकल पाता, वह हर छह महीने पर फिर कोशिश करता रहता है।
उन सालों में वह न डॉक्टर होता है न कुछ और, क्योंकि उसकी पूरी पढ़ाई एक ही पेशे के लिए थी।
पास होने के बाद क्या

परीक्षा पास कर लेना आख़िरी क़दम नहीं है।
उसके बाद इंटर्नशिप करनी होती है, और उसकी अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि पढ़ाई कैसे हुई थी।
जिन छात्रों की पढ़ाई ऑनलाइन कक्षाओं से हुई, उन्हें दो साल की इंटर्नशिप करनी होती है।
जिन्होंने ऑनलाइन पढ़ाई की भरपाई बाद में मौक़े पर जाकर व्यावहारिक प्रशिक्षण से की, उन्हें एक साल की।
यह नियम कोविड के दौर से निकला है, जब कई देशों में मेडिकल कक्षाएँ ऑनलाइन चलीं। चिकित्सा की पढ़ाई में मरीज़ को देखना और उसे छूना उसका हिस्सा है, और वह स्क्रीन पर नहीं हो सकता।
इसलिए यह अंतर तार्किक है। पर उसका मतलब यह भी है कि दो छात्र, जिनकी डिग्री एक ही कॉलेज की है, अलग-अलग अवधि की इंटर्नशिप कर सकते हैं।
इंटर्नशिप कहाँ कर सकते हैं
यह वह हिस्सा है जिसमें सबसे ज़्यादा उलझन होती है, इसलिए इसे ध्यान से पढ़िए।
विदेशी चिकित्सा स्नातक हर अस्पताल में इंटर्नशिप नहीं कर सकते। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने इसके लिए अस्पतालों की सूची जारी की है, और वह संख्या 675 बताई गई है।
इंटर्नशिप उसी सूची के किसी अस्पताल में करनी होगी।
समय की भी एक शर्त है। परीक्षा पास करने के दो साल के भीतर इंटर्नशिप शुरू करके पूरी करनी होती है, और विशेष परिस्थितियों में इसमें छूट मिलती है।
इसलिए परीक्षा पास होने के बाद बैठे रहना महँगा पड़ता है।
पैसे वाला हिस्सा
यहाँ एक बात हाल में बदली है और वह जानने लायक़ है।
पहले कई जगह विदेशी चिकित्सा स्नातकों को इंटर्नशिप के दौरान वेतन कम मिलता था, या मिलता ही नहीं था। कुछ जगह उनसे शुल्क तक लिया जाता था।
फ़रवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इन प्रशिक्षुओं को भी वही वेतन मिलना चाहिए जो भारत से पढ़े प्रशिक्षुओं को मिलता है।
अब नियम यह है कि वेतन बराबर होगा और इंटर्नशिप के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।
यह फ़ैसला ज़रूरी था, और उसकी ज़रूरत पड़ना अपने आप में बताता है कि पहले क्या हो रहा था।
अगर किसी प्रशिक्षु से अभी भी शुल्क माँगा जाए या वेतन कम दिया जाए, तो यह उस अदालती आदेश का उल्लंघन है और उसकी शिकायत की जा सकती है।
शिकायत पहले उसी अस्पताल के प्रशासन को, फिर राज्य के आयुर्विज्ञान परिषद को, और उसके बाद राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग को की जा सकती है।
यह जानकारी इसलिए दर्ज की जा रही है कि ऐसे मामलों में प्रशिक्षु अक्सर चुप रह जाता है, क्योंकि उसे डर होता है कि उसका प्रमाणपत्र अटक जाएगा।
तो कुल कितना समय लगता है
अब पूरा हिसाब जोड़िए, क्योंकि यही वह चीज़ है जो पहले से जान लेनी चाहिए।
विदेश में एमबीबीएस की पढ़ाई आम तौर पर पाँच से छह साल की होती है, और कई देशों में उसके साथ उसी देश की इंटर्नशिप भी जुड़ी होती है।
लौटकर परीक्षा की तैयारी में कुछ महीने। परीक्षा पहली बार में न निकले तो अगला सत्र छह महीने बाद।
फिर एक या दो साल की इंटर्नशिप।
उसके बाद पंजीकरण।
यानी सबसे अच्छी स्थिति में भी भारत से पढ़े साथी के मुक़ाबले एक से दो साल ज़्यादा। और अगर परीक्षा में एक-दो बार अटके, तो यह अंतर तीन-चार साल का हो जाता है।
छात्र जाते कहाँ हैं
भारतीय छात्र एमबीबीएस के लिए जिन देशों में सबसे ज़्यादा जाते हैं, उनकी सूची पिछले दो दशकों में बदलती रही है।
रूस और पूर्व सोवियत गणराज्य लंबे समय से इस सूची में हैं। चीन एक दौर में बड़ा ठिकाना रहा। फ़िलीपींस, नेपाल, बांग्लादेश और कैरिबियाई देशों में भी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र हैं।
इनमें से कुछ जगहों पर पढ़ाई की गुणवत्ता अच्छी है और कुछ जगह वह सवालों के घेरे में रही है।
इसीलिए सिर्फ़ देश देखकर फ़ैसला करना ठीक नहीं होता। एक ही देश में अच्छे और कमज़ोर, दोनों तरह के कॉलेज होते हैं।
एक और बात जो अक्सर देर से पता चलती है। युद्ध या राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति में छात्रों को बीच में पढ़ाई छोड़कर लौटना पड़ सकता है, और उनकी बाक़ी पढ़ाई कहाँ पूरी होगी, इसका कोई तयशुदा इंतज़ाम नहीं होता।
यह अटकल नहीं है। हाल के वर्षों में भारतीय छात्रों के साथ ऐसा हो चुका है, और उन मामलों का हल हर बार अलग तरीक़े से निकालना पड़ा।
नियम इतने अलग क्यों हैं
यह सवाल वाजिब है और उसका जवाब भी सीधा है।
भारत में मेडिकल कॉलेजों को आयोग मान्यता देता है और उनके पाठ्यक्रम, शिक्षकों तथा अस्पताल की सुविधाओं पर उसकी शर्तें लागू होती हैं।
विदेश के कॉलेजों पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है। उनकी पढ़ाई की भाषा, पाठ्यक्रम, और मरीज़ों के साथ व्यावहारिक काम का हिस्सा, तीनों अलग-अलग हो सकते हैं।
कुछ देशों में जिन बीमारियों का सामना डॉक्टर को होता है, वे भारत में आम बीमारियों से बहुत अलग हैं।
इसलिए एक जाँच का तर्क बनता है।
बहस इस बात पर होती रही है कि यह जाँच जितनी कठिन है, उतनी होनी चाहिए या नहीं, और यह जाँच शिक्षा की गुणवत्ता नाप रही है या सिर्फ़ परीक्षा देने का कौशल।
भारत में सीटें कितनी हैं

यह सवाल पूछे बिना बाक़ी बात अधूरी रहती है।
पिछले एक दशक में भारत में मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या बढ़ी है, और यह बढ़त तेज़ रही है। नए सरकारी कॉलेज खुले हैं और मौजूदा कॉलेजों में सीटें बढ़ी हैं।
फिर भी प्रवेश परीक्षा में बैठने वालों और सीटों के बीच का फ़ासला बना हुआ है, क्योंकि परीक्षा देने वालों की संख्या भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ी है।
दूसरी बात यह कि सीटों का बड़ा हिस्सा निजी कॉलेजों में है, और वहाँ की फ़ीस सरकारी कॉलेज से कई गुना ज़्यादा होती है।
इसलिए सीट होना और सीट पहुँच में होना, दो अलग बातें हैं।
जिस परिवार के लिए निजी कॉलेज की फ़ीस पहुँच से बाहर है, उसके सामने विकल्प यही बचता है कि बच्चा किसी ऐसे देश जाए जहाँ पूरी पढ़ाई का ख़र्च यहाँ की एक साल की फ़ीस के बराबर हो।
यह गणित ही हर साल हज़ारों छात्रों को हवाई जहाज़ पर बिठा देता है।
जाने से पहले क्या देखें
अगर कोई परिवार यह रास्ता चुन रहा है, तो कुछ चीज़ें दाख़िले से पहले जाँच लेनी चाहिए।
पहली, वह कॉलेज उस देश की अपनी नियामक सूची में है या नहीं, और उसकी डिग्री वहाँ प्रैक्टिस के लिए मान्य है या नहीं। भारत का नियम यह है कि जो डिग्री उस देश में प्रैक्टिस के लायक़ न हो, वह यहाँ भी काम नहीं आएगी।
दूसरी, पढ़ाई की माध्यम भाषा क्या है और मरीज़ों से बातचीत किस भाषा में होगी। कई जगह कक्षाएँ अंग्रेज़ी में होती हैं और अस्पताल का काम स्थानीय भाषा में चलता है, जिससे व्यावहारिक प्रशिक्षण अधूरा रह जाता है।
तीसरी, पाठ्यक्रम की अवधि। भारत का नियम पाठ्यक्रम की न्यूनतम अवधि और उसमें व्यावहारिक प्रशिक्षण के हिस्से को लेकर शर्तें रखता है।
चौथी, उस कॉलेज से पढ़े कितने छात्र पिछले सालों में यह परीक्षा पास कर सके। यह आँकड़ा कॉलेज नहीं बताएगा, पर उसे खोजा जा सकता है।
एक ग़लतफ़हमी जो महँगी पड़ती है
बहुत से एजेंट यह कहते हैं कि उनका कॉलेज आयोग की सूची में है, इसलिए डिग्री यहाँ मान्य होगी।
यह वाक्य आधा सच है।
कॉलेज का मान्य होना पहली शर्त है। उसके बाद भी परीक्षा और इंटर्नशिप वाला पूरा रास्ता वैसा ही रहता है।
कोई कॉलेज इस परीक्षा से छूट नहीं दिला सकता, और किसी एजेंट के पास इसे टालने का कोई रास्ता नहीं है।
अगर कोई ऐसा दावा करे, तो वह दावा ही उस एजेंट पर भरोसा न करने की वजह है।
और एक बड़ा सवाल
इस पूरी व्यवस्था के पीछे जो हालत है, उसे भी दर्ज कर देना चाहिए।
छात्र विदेश इसलिए जाते हैं कि यहाँ जगह नहीं है। हर साल मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में बैठने वालों की संख्या उपलब्ध सीटों से कई गुना ज़्यादा रहती है।
निजी कॉलेजों में सीट है, पर उसकी क़ीमत कई परिवारों की पहुँच से बाहर है।
तो जो छात्र विदेश जाता है, वह अक्सर वही होता है जिसके पास पैसे तो हैं पर उतने नहीं कि यहाँ निजी कॉलेज की फ़ीस भर सके।
और लौटने पर उसे वह परीक्षा देनी पड़ती है जो यहाँ पढ़े छात्र को नहीं देनी पड़ती, चाहे उसके अंक उससे अच्छे रहे हों।
यह अन्याय नहीं है, क्योंकि जाँच का तर्क अपनी जगह सही है। पर यह उस कमी का नतीजा ज़रूर है जो भारत में मेडिकल की सीटों की है, और उस कमी पर बात इस पूरे विषय में सबसे कम होती है।
एक विरोधाभास जो दर्ज होना चाहिए

अंत में एक बात जो इस पूरी व्यवस्था के बारे में सोचने लायक़ है।
भारत में डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण इलाक़ों में यह कमी और गहरी है, और वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के पद ख़ाली रहना आम बात है।
उसी देश में हर साल हज़ारों ऐसे लोग हैं जिनके पास चिकित्सा की डिग्री है और जो एक परीक्षा में अटके हुए हैं।
ये दोनों बातें एक ही समय में सच हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि परीक्षा हटा दी जाए। मरीज़ को जो डॉक्टर देखेगा, उसकी योग्यता जाँचना ज़रूरी है, और यह जाँच किसी की सहूलियत के लिए ढीली नहीं की जा सकती।
पर यह ज़रूर सोचा जा सकता है कि जो लोग बार-बार अटक रहे हैं, उनके लिए कोई तैयारी या पुनश्चर्या का ढाँचा हो, ताकि पाँच साल की पढ़ाई पूरी तरह बेकार न जाए।
अभी ऐसा कोई सरकारी ढाँचा नहीं है। जो है वह निजी कोचिंग है, और उसका ख़र्च उन्हीं परिवारों पर पड़ता है जो पहले ही एक बड़ा ख़र्च उठा चुके हैं।
स्रोतराष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन, विदेशी चिकित्सा स्नातकों पर टिप्पणी