झीरम घाटी के दस दोषियों को फांसी; अट्ठाईस आरोपियों पर मुक़दमा अब भी बाक़ी
बुधवार, 16 सितंबर को जगदलपुर की एनआईए विशेष अदालत ने 2013 के झीरम घाटी हमले के दसों दोषियों को मौत की सज़ा सुनाई। एनआईए ने कुल 39 लोगों के ख़िलाफ़ चालान पेश किया था, सुनवाई दस पर हुई, और अट्ठाईस अब भी फ़रार की सूची में हैं। उसी हमले पर बने जाँच आयोग की 4,184 पन्नों की रिपोर्ट 6 नवंबर 2021 को राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है और विधानसभा के पटल पर आज तक नहीं आई।

जगदलपुर की एनआईए विशेष अदालत ने बुधवार, 16 सितंबर को सज़ा सुना दी। दसों दोषियों को फांसी। यूएनआई के मुताबिक़ यह आदेश विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत ने सुनाया। जिस घटना का मुक़दमा है, उसे उस दिन तेरह साल, तीन महीने और बाईस दिन बीत चुके थे।
उसी हमले की एक और जाँच का काग़ज़ अदालत के बाहर पड़ा है। झीरम घाटी जाँच आयोग की रिपोर्ट 6 नवंबर 2021 को राज्यपाल अनुसुइया उइके को सौंपी गई थी, दस खंडों और 4,184 पन्नों में। वह आज तक छत्तीसगढ़ विधानसभा के पटल पर नहीं आई।
जाँच आयोग अधिनियम, 1952 इस बारे में छह महीने की मियाद तय करता है। वह मियाद 6 मई 2022 को बीत चुकी।
फ़ैसला यह तय करता है कि 25 मई 2013 को दरभा की सड़क पर गोली चलाने वाले कौन थे। आयोग जिन सवालों के लिए बना था, उनमें से एक भी विधानसभा के सामने नहीं है।
25 मई 2013, दरभा घाटी और परिवर्तन यात्रा का क़ाफ़िला
एनआईए की 16 सितंबर की विज्ञप्ति हमले को इन शब्दों में दर्ज करती है: प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के हथियारबंद कैडरों ने बस्तर ज़िले के दरभा में झीरम घाटी में राष्ट्रीय राजमार्ग 221 पर कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के क़ाफ़िले पर सुनियोजित हमला किया। विज्ञप्ति तीन चीज़ें अलग-अलग गिनाती है: एक आईईडी विस्फोट, अंधाधुंध गोलीबारी, और ग्रेनेड। हमलावर मृतकों और घायलों से हथियार, गोला-बारूद, वॉकी-टॉकी सेट, मोबाइल फ़ोन और दूसरा सामान लूट ले गए। लूट अलग से दर्ज है।
जाँच का निष्कर्ष विज्ञप्ति के आख़िरी पैराग्राफ़ में है। एजेंसी के मुताबिक़ कैडर स्थानीय समितियों और डिवीज़नों की मिलीभगत से उस आपराधिक साज़िश का हिस्सा थे जिसका मक़सद क़ाफ़िले में शामिल वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और सुरक्षाकर्मियों को मार डालना था। विज्ञप्ति इसे माओवादियों के टैक्टिकल काउंटर ऑफ़ेंसिव कैंपेन से जोड़ती है, यानी जवाबी हमले के उनके घोषित अभियान से।
एजेंसी के अपने वाक्यों में मौके पर 24 लोग मारे गए और 35 से ज़्यादा गंभीर रूप से घायल हुए। घायलों में से 3 ने बाद में दम तोड़ दिया। जोड़ने पर 27 बनता है। द हिंदू, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, ट्रिब्यून और फ़्री प्रेस जर्नल यही संख्या छापते हैं।
स्क्रॉल, लाइव लॉ और सुप्रीम कोर्ट की 2020 की कार्यवाही 29 लिखती हैं। अंतर की एक वजह विद्या चरण शुक्ल हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री को गुड़गांव के अस्पताल ले जाया गया था और उनकी मौत 11 जून 2013 को हुई, हमले के सत्रह दिन बाद। एनआईए के उन तीन घायलों में वे गिने गए या नहीं, विज्ञप्ति नहीं बताती। दोनों विज्ञप्तियाँ एक भी मृतक का नाम नहीं देतीं।

परिवारों की गिनती तीसरी है। महेंद्र कर्मा की बेटी तुलिका कर्मा ने 5 सितंबर को एएनआई से कहा कि न्याय तब माना जाएगा जब असली साज़िशकर्ताओं को सज़ा मिले, और तभी उन 32 लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी जो शहीद हुए। झीरम पीड़ित संघ के अध्यक्ष शिवनारायण द्विवेदी ने 25 मई 2026 को ईटीवी भारत से बातचीत में भी 32 का ही आँकड़ा दिया। द्विवेदी ख़ुद उस हमले में गोली से ज़ख़्मी हुए थे।
मारे गए लोगों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश, पूर्व विधायक उदय मुदलियार, और महेंद्र कर्मा शामिल थे, जिन्हें स्क्रॉल ने माओवाद-विरोधी और राज्य-समर्थित नागरिक सेना सलवा जुडूम खड़ी करने में अहम भूमिका निभाने वाला बताया है।
39 आरोपी, ग्यारह गिरफ़्तारियाँ, दस पर सुनवाई
मुक़दमे का नंबर RC-06/2013/NIA/DLI है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ मामला पहले बस्तर पुलिस ने दर्ज किया और हमले के कुछ ही दिन बाद एनआईए को सौंप दिया गया।
चालान दो हिस्सों में आया। एनआईए की 16 सितंबर की विज्ञप्ति में यह ब्योरा है कि पहला चालान 25 सितंबर 2014 को नौ आरोपियों के ख़िलाफ़ पेश हुआ और पूरक चालान 28 सितंबर 2015 को तीस के ख़िलाफ़। कुल उनतालीस। 5 सितंबर की विज्ञप्ति में यह विभाजन नहीं था, सिर्फ़ कुल संख्या थी। एक ही मुक़दमे की दो विज्ञप्तियाँ, ग्यारह दिन के फ़ासले पर, और ब्योरा दूसरी में ज़्यादा है।
गिरफ़्तारियाँ ग्यारह हुईं। सुनवाई दस पर चली, क्योंकि एक गिरफ़्तार और चालानशुदा आरोपी की न्यायिक हिरासत में मौत हो गई। यह वाक्य भी एजेंसी ने पहली बार 16 सितंबर की विज्ञप्ति में लिखा। उसकी मौत कब और किस वजह से हुई, विज्ञप्ति में नहीं है। अभियोजन ने 101 गवाह पेश किए।
बाक़ी अट्ठाईस फ़रार की सूची में हैं। एनआईए अपनी ही भाषा में इसे स्वीकार करती है: उसकी विज्ञप्ति कहती है कि दस चालानशुदा आरोपियों के ख़िलाफ़ शुरुआती मुक़दमा पूरा हुआ। शुरुआती, यानी अंतिम नहीं। इन अट्ठाईस में से किसी के भी मुक़दमे की कोई तारीख़ किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में नहीं है।
तारीख़ों का फ़ासला ख़ुद एक ब्योरा है। पहला चालान हमले के सोलह महीने बाद आया, पूरक चालान उसके एक साल बाद, और दोषसिद्धि पूरक चालान के लगभग ग्यारह साल बाद। 101 गवाहों की गवाही इसी अवधि में दर्ज हुई।
सज़ा पाने वाले दस लोग ये हैं: प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ़ मुन्ना, सुमिता उर्फ़ पुनेम मोडियम, मुक्का मंडावी, कोसा कवासी उर्फ़ कोसाराम, आयता मरकाम, मड़कामी देवा, जोगा मड़कामी, बंजामी सन्ना उर्फ़ चामरू और महादेव नाग। नामों की वर्तनी अलग-अलग रिपोर्टों में थोड़ी अलग है; एनआईए की दोनों विज्ञप्तियाँ किसी का नाम नहीं देतीं, सूची अख़बारों और समाचार एजेंसियों से आती है। बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी ने 5 सितंबर को एएनआई को बताया था कि सज़ा का सवाल 16 सितंबर के लिए सुरक्षित रखा गया है।
5 सितंबर की दोषसिद्धि, 16 सितंबर की सज़ा
दो तारीख़ों में फ़र्क़ है और उसे एजेंसी की अपनी सुर्ख़ी गड्डमड्ड कर देती है। एनआईए की 5 सितंबर की विज्ञप्ति का शीर्षक अंग्रेज़ी में यह कहता है कि जगदलपुर की विशेष अदालत ने दस आरोपियों को सज़ा सुनाई। उसी विज्ञप्ति के पहले ही वाक्य में लिखा है कि अदालत ने दसों को दोषी ठहराते हुए फ़ैसला सुनाया। सज़ा उस दिन हुई ही नहीं थी।
16 सितंबर की विज्ञप्ति यह साफ़ कर देती है। उसमें लिखा है कि 5 सितंबर को ट्रायल कोर्ट ने दसों को दोषी पाया और सज़ा की मात्रा तय करना सुरक्षित रख लिया था। मात्रा 16 सितंबर को तय हुई: दसों को मौत की सज़ा।
दोषसिद्धि की धाराएँ दोनों विज्ञप्तियों में एक जैसी हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 121, 121(क), 122, 341, 302, 307, 396, 397, 427 और 120(ख); आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27; विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3, 4 और 5; और ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम की धारा 16, 18, 20, 38, 39 और 40।
इनमें से किन धाराओं में फांसी दी गई है, यह कहीं दर्ज नहीं है। सज़ा का आदेश सार्वजनिक नहीं हुआ है। जुर्माना लगा या नहीं, वह भी नहीं पता। एनआईए की विज्ञप्ति सिर्फ़ इतना कहती है कि अदालत ने इन धाराओं में दोषी पाते हुए दसों को मौत की सज़ा दी।
सज़ा की ख़बर पर भी एक दिन भ्रम रहा। स्क्रॉल ने पहले उम्रक़ैद लिखा था और फिर अपने ही पन्ने के नीचे शुद्धिपत्र छापा कि पहले के संस्करण में दसों को उम्रक़ैद बताया जाना ग़लत था; उसकी वेब पते वाली कड़ी में अब भी पुराना शब्द रह गया है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने एक्स पर लिखी पोस्ट में सज़ा को न्याय की जीत कहा और एनआईए की जाँच की तारीफ़ की। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह क्षण आत्ममंथन का है, ख़ासकर उनके लिए जो आदिवासी समाज की लाशों पर राजनीति करते हैं।
दस खंड, 4,184 पन्ने और धारा 3(4) की छह महीने की मियाद
हमले के तीन दिन बाद, 28 मई 2013 को, राज्य सरकार ने झीरम घाटी जाँच आयोग बनाया। अध्यक्ष थे छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा। शुरुआती अवधि तीन महीने की थी। वह बार-बार बढ़ती रही और आयोग आठ साल चला।
आयोग का कार्यकाल 30 सितंबर 2021 को ख़त्म हुआ, जब जस्टिस मिश्रा का तबादला हुआ और वे आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। इसके पाँच हफ़्ते बाद, 6 नवंबर 2021 को, आयोग के सचिव और हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) संतोष कुमार तिवारी ने रिपोर्ट राज्यपाल अनुसुइया उइके को सौंपी। पीटीआई के मुताबिक़ तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उसी वक़्त आपत्ति जताई कि रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपना स्थापित परंपरा के ख़िलाफ़ है, और यह कि रिपोर्ट अधूरी जान पड़ती है, क्योंकि सितंबर में ही आयोग के सचिव ने जाँच पूरी न होने का हवाला देकर और समय माँगा था।
यहाँ जो क़ानून लागू होता है, उसका पाठ छोटा है। जाँच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 3(4) कहती है कि उपयुक्त सरकार आयोग की रिपोर्ट, उस पर की गई कार्रवाई के ज्ञापन के साथ, आयोग से रिपोर्ट मिलने के छह महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों या राज्य के विधानमंडल के सामने रखवाएगी। यह उपधारा 1971 के संशोधन से जुड़ी और 1990 के संशोधन से इसमें राज्य विधानमंडल के शब्द आए। इसमें कोई शर्त नहीं है। कोई छूट नहीं है। सरकार की मर्ज़ी पर कुछ नहीं छोड़ा गया।
छह महीने 6 मई 2022 को पूरे हो गए थे। 17 सितंबर 2026 को रिपोर्ट सौंपे चार साल दस महीने से ऊपर हो चुके हैं।
इस चूक की सज़ा अधिनियम में कहीं नहीं लिखी। धारा 3(4) दायित्व बनाती है और उसके टूटने पर कुछ नहीं होता; न जुर्माना, न समयसीमा फिर से शुरू, न रिपोर्ट अपने आप सार्वजनिक। उसी धारा की उपधारा 1 का दूसरा हिस्सा दिलचस्प है: अगर राज्य का विधानमंडल प्रस्ताव पारित कर दे तो सरकार को आयोग बनाना ही पड़ता है। सदन आयोग बनवा सकता है। जो आयोग बन चुका, उसकी रिपोर्ट मँगवाने का ऐसा ही कोई औज़ार अधिनियम उसे नहीं देता।
अधिनियम में राज्यपाल शब्द एक बार भी नहीं आता। उसकी धारा 2 में उपयुक्त सरकार की परिभाषा है, और राज्य के आयोग के लिए वह राज्य सरकार है। रिपोर्ट रखवाने का काम सरकार का है, सदन का नहीं और राजभवन का नहीं।

दो ब्योरे इस देरी को और नुकीला बनाते हैं। रिपोर्ट लिखने वाले जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा 19 मई 2023 से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं; अदालत की अपनी सूची में उनकी सेवानिवृत्ति 25 मई 2031 दर्ज है। और जिस विधानसभा में यह रिपोर्ट नहीं रखी गई, उसके अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह हैं, जो 2013 में मुख्यमंत्री थे और जिनकी सरकार ने यह आयोग बनाया था।
झीरम पीड़ित संघ के शिवनारायण द्विवेदी ने ईटीवी भारत से कहा कि उन्होंने उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, दोनों को चिट्ठियाँ लिखकर माँग की है कि रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। उसी बातचीत में उनका आरोप था कि एनआईए ने न उनका बयान लिया, न किसी और पीड़ित का।
दूसरा आयोग, तीन नए बिंदु और हाई कोर्ट की रोक
पहली रिपोर्ट सौंपे जाने के पाँच दिन बाद, 11 नवंबर 2021 को, राज्य सरकार ने दूसरा आयोग अधिसूचित कर दिया। अध्यक्ष जस्टिस सतीश के. अग्निहोत्री और सदस्य जस्टिस जी. मिन्हाजुद्दीन, दोनों छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश। समय छह महीने।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ जाँच के दायरे में तीन बिंदु जोड़े गए: हमले के बाद घायलों को पर्याप्त इलाज मिला या नहीं; ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए पर्याप्त क़दम उठाए गए या नहीं; और आयोग हालात के हिसाब से अपनी जाँच की दिशा ख़ुद तय कर सकेगा।
वह जाँच शुरू होकर रुक गई। 11 मई 2022 को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने, मुख्य न्यायाधीश अरूप कुमार गोस्वामी और जस्टिस आरसीएस सामंत ने, आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी और सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका भाजपा नेता और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की थी। 6 सितंबर को दुर्ग में एएनआई से बात करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यही सवाल दोहराया कि भाजपा के लोग जाकर रोक क्यों ले आए।
दूसरी एफ़आईआर और सुप्रीम कोर्ट के दो आदेश
इस मामले ने 2019 के बाद दो अलग-अलग अदालती सिलसिले पैदा किए। दोनों सुप्रीम कोर्ट तक गए। किसी में भी सवाल यह नहीं था कि गोली किसने चलाई।
पहला सिलसिला आयोग के गवाहों को लेकर था। राज्य सरकार चाहती थी कि आयोग कुछ और गवाहों को सुने। सितंबर 2019 में आयोग कह चुका था कि 1 अक्टूबर 2019 के बाद वह कोई नया गवाह नहीं सुनेगा। हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 12 दिसंबर 2019 को और खंडपीठ ने 29 जनवरी 2020 को राज्य की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी। लाइव लॉ के मुताबिक़ 29 सितंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण, आर. सुभाष रेड्डी और एम.आर. शाह की पीठ ने भी अपील ख़ारिज कर दी, यह दर्ज करते हुए कि आयोग कार्यवाही बंद कर चुका है और उसे सिर्फ़ रिपोर्ट देनी बाक़ी है। अर्ज़ी उसी राज्य सरकार की थी जिसने तेरह महीने बाद इसी आयोग की रिपोर्ट को अधूरा बताया।
दूसरा सिलसिला एक नई एफ़आईआर से शुरू हुआ। मारे गए कांग्रेस नेता उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार ने 2020 में दरभा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि हमला पूर्वनियोजित था और बड़ी राजनीतिक साज़िश का हिस्सा था। उसकी जाँच राज्य पुलिस की एसआईटी को मिली। एनआईए ने 16 जून 2020 को विशेष अदालत में अर्ज़ी देकर यह जाँच अपने पास माँगी और उसे वहाँ से राहत नहीं मिली।
फ़्री प्रेस जर्नल के मुताबिक़ 2 मार्च 2022 को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ, जस्टिस आरसीएस सामंत और जस्टिस अरविंद सिंह चंदेल ने, एनआईए की याचिका ख़ारिज कर दी। लॉबीट की रिपोर्ट के मुताबिक़ 22 नवंबर 2023 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने एजेंसी की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। नंद कुमार पटेल के बेटे और कांग्रेस नेता उमेश पटेल ने 5 सितंबर को एएनआई से कहा कि दोषसिद्धि का स्वागत है, पर साज़िश के पहलू पर वे फिर सुप्रीम कोर्ट जाएँगे।
देवजी, बारसे देवा और फ़रार की सूची
अट्ठाईस की सूची में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका पता अब सरकार को मालूम है।
22 फ़रवरी 2026 को उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने मीडिया से कहा कि थिप्पिरी तिरुपति उर्फ़ देवजी ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है, और यह कि संगठन के महासचिव रहे बसवराजू के बाद वही महासचिव बने थे। उनके साथ मल्ला राजी रेड्डी ने भी आत्मसमर्पण किया। शर्मा ने इसे नक्सलवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई का आख़िरी चरण बताया। माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी, यानी पीएलजीए, की पहली बटालियन के कमांडर रहे बारसे देवा ने 2 जनवरी 2026 को आत्मसमर्पण किया था। वह बटालियन पहले मड़वी हिड़मा के हाथ में थी। केंद्रीय समिति के सदस्य गणेश उइके 25 दिसंबर 2025 को ओडिशा में एक मुठभेड़ में मारे गए।
इनमें से कोई भी उन दस में नहीं है जिन्हें सज़ा हुई। दसों के नाम 2014 और 2015 के चालानों में थे, वे गिरफ़्तार होकर विचाराधीन क़ैदी थे, और उनका मुक़दमा जगदलपुर में चला। आत्मसमर्पण करने वाला कोई भी उन दस में नहीं है।
हमले के चश्मदीद और गवाह शिव सिंह ठाकुर ने 5 सितंबर को एएनआई से कहा कि उन्हें न्याय नहीं मिला। उनका कहना था कि जिन्हें सज़ा हुई वे छोटे नक्सली हैं, जबकि गणेश उइके और देवा जैसे नाम सामने आते रहे; उन्होंने पूछा कि उन लोगों को छोड़ क्यों दिया गया और पुनर्वास की सुविधाएँ क्यों दी जा रही हैं। ठाकुर ने यह भी कहा कि किसी जाँच एजेंसी ने आज तक उनका बयान दर्ज नहीं किया।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने उसी दिन कहा कि एनआईए के मानने के बावजूद कि दो सौ नक्सली इसमें शामिल थे और कई दर्जन के नाम आए, सज़ा सिर्फ़ दस को हुई। दो सौ का यह आँकड़ा एनआईए की किसी विज्ञप्ति में नहीं है। स्क्रॉल ने हमलावरों की संख्या डेढ़ सौ से ज़्यादा लिखी है, और एजेंसी के दोनों दस्तावेज़ों में हमलावरों की कोई गिनती नहीं दी गई।
विशेष अदालत से हाई कोर्ट तक: फांसी की पुष्टि की प्रक्रिया
16 सितंबर का आदेश आख़िरी शब्द नहीं है। इसकी वजह क़ानून की बनावट में है।
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 2(1)(ज) के मुताबिक़ विशेष अदालत वह सत्र न्यायालय है जिसे धारा 11 या धारा 22 के तहत विशेष अदालत नामित किया गया हो। 2019 के संशोधन से पहले यहाँ गठित शब्द था, अब नामित है। धारा 16(3) कहती है कि विशेष अदालत के पास मुक़दमा चलाने के लिए सत्र न्यायालय की सारी शक्तियाँ होंगी और वह मुक़दमा ऐसे चलाएगी मानो वह सत्र न्यायालय हो, दंड प्रक्रिया संहिता में सत्र न्यायालय के लिए तय प्रक्रिया के मुताबिक़। यही कड़ी आगे की पूरी प्रक्रिया तय करती है।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 366(1) का पाठ इस पर सीधा बैठता है: जब सत्र न्यायालय मौत की सज़ा सुनाता है, कार्यवाही हाई कोर्ट को भेजी जाएगी, और हाई कोर्ट की पुष्टि के बिना सज़ा पर अमल नहीं होगा। उसी धारा की उपधारा 2 अदालत से कहती है कि वह दोषी को वारंट के साथ जेल हिरासत में भेजे। धारा 368 हाई कोर्ट को चार रास्ते देती है: सज़ा की पुष्टि या क़ानून के मुताबिक़ कोई दूसरी सज़ा; दोषसिद्धि रद्द कर किसी और अपराध में दोषी ठहराना; नए सिरे से मुक़दमा चलाने का आदेश; या बरी कर देना। बरी करना भी उसी सूची में है। उसी धारा का परंतुक कहता है कि अपील की मियाद बीतने से पहले, और अपील दाख़िल हो जाने पर उसके निपटारे से पहले, पुष्टि का आदेश नहीं होगा।
यह पुरानी संहिता 2013 के इस मुक़दमे पर इसलिए लागू है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 531(2)(क) 1 जुलाई 2024 से पहले चल रही हर सुनवाई को पुरानी संहिता के तहत ही पूरा करने को कहती है। उस तारीख़ तक झीरम का पहला चालान पेश हुए नौ साल से ज़्यादा बीत चुके थे।
अपील का रास्ता अलग है। एनआईए अधिनियम की धारा 21(1) के तहत विशेष अदालत के फ़ैसले, सज़ा या आदेश के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील होती है, तथ्य और क़ानून दोनों पर। धारा 21(2) कहती है कि ऐसी अपील हाई कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ सुनेगी और उसे दाख़िले की तारीख़ से तीन महीने के भीतर निपटाने की कोशिश होगी। धारा 21(5) तीस दिन की मियाद देती है, जिसे कारण बताने पर बढ़ाया जा सकता है, पर नब्बे दिन के बाद अपील नहीं ली जाएगी।

यूएनआई ने 16 सितंबर को यही लिखा कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की पुष्टि के बिना इन सज़ाओं पर अमल नहीं हो सकता। जगदलपुर की अदालत का आदेश सार्वजनिक नहीं है, इसलिए यह अभी रिकॉर्ड पर नहीं है कि कार्यवाही हाई कोर्ट को भेजी जा चुकी है या नहीं। एनआईए की विज्ञप्तियों की अपनी सूची में 16 सितंबर के बाद इस मुक़दमे पर कुछ और नहीं है।
स्रोतराष्ट्रीय जाँच एजेंसी, प्रेस विज्ञप्ति, 16 सितंबर 2026: जगदलपुर की एनआईए विशेष अदालत ने दसों दोषियों को मौत की सज़ा दी, धाराओं की पूरी सूची और चालान का ब्योरा, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, प्रेस विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026: दसों अभियुक्तों को दोषी ठहराने का फ़ैसला, मुक़दमा RC-06/2013/NIA/DLI, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की प्रेस विज्ञप्तियों की तारीख़वार सूची, 19 सितंबर 2026 को पढ़ी गई, गृह मंत्रालय की प्रति: जाँच आयोग अधिनियम, 1952 (अधिनियम संख्या 60, 1952), धारा 3(4) सहित पूरा पाठ, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अधिनियम, 2008, एनआईए की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध पाठ: धारा 2(1)(ज), 16(3) और 21, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 366: मौत की सज़ा हाई कोर्ट की पुष्टि के लिए भेजी जाएगी, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 368: पुष्टि, सज़ा बदलने, दोषसिद्धि रद्द करने या बरी करने की हाई कोर्ट की शक्ति, छत्तीसगढ़ राज्य पोर्टल, 19 सितंबर 2026 को पढ़ा गया: राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, भारत का सुप्रीम कोर्ट, न्यायाधीशों की सूची: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, नियुक्ति 19 मई 2023, सेवानिवृत्ति 25 मई 2031, स्क्रॉल, 16 सितंबर 2026 (17 सितंबर को संशोधित): दसों को फांसी, दोषियों के नाम, और पन्ने के नीचे छपा शुद्धिपत्र, यूएनआई, 16 सितंबर 2026: विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत, दोषियों के नाम, और हाई कोर्ट की पुष्टि की शर्त, एएनआई, 16 सितंबर 2026: सज़ा की ख़बर और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की एक्स पोस्ट का पूरा पाठ, एएनआई, 5 सितंबर 2026: चश्मदीद शिव सिंह ठाकुर, तुलिका कर्मा, उमेश पटेल और दीपक बैज के बयान, एएनआई, दुर्ग, 6 सितंबर 2026: पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बयान और दूसरे आयोग पर रोक का सवाल, द प्रिंट/पीटीआई, 11 नवंबर 2021: दूसरे आयोग की अधिसूचना, जस्टिस सतीश के. अग्निहोत्री और जस्टिस जी. मिन्हाजुद्दीन, और जाँच के तीन नए बिंदु, द प्रिंट/पीटीआई, 11 मई 2022: मुख्य न्यायाधीश अरूप कुमार गोस्वामी और जस्टिस आरसीएस सामंत की पीठ ने दूसरे आयोग की कार्यवाही पर रोक लगाई, पीटीआई, नवंबर 2021: रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपे जाने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की आपत्ति, लाइव लॉ, 29 सितंबर 2020: जस्टिस अशोक भूषण, आर. सुभाष रेड्डी और एम.आर. शाह की पीठ ने अतिरिक्त गवाहों की अर्ज़ी ख़ारिज की, फ़्री प्रेस जर्नल, 2 मार्च 2022: जितेंद्र मुदलियार की एफ़आईआर और एनआईए की तबादला याचिका पर हाई कोर्ट का फ़ैसला, लॉबीट, 22 नवंबर 2023: सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी एफ़आईआर के ख़िलाफ़ एनआईए की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई से इनकार किया, ईटीवी भारत, 25 मई 2026 का साक्षात्कार, हमले के तेरह साल पूरे होने पर: झीरम पीड़ित संघ के शिवनारायण द्विवेदी, ईटीवी भारत, 22 फ़रवरी 2026: उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा का बयान कि देवजी और मल्ला राजी रेड्डी ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया, आकाशवाणी समाचार, 30 मार्च 2026: छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, और 14 मई 2026 की ख़बर में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा