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दिल्ली हाई कोर्ट में सोमवार सुबह सात जजों की शपथ है, कॉलेजियम ने आठ नाम भेजे थे; गुरविंदर पाल सिंह का नाम सरकार की विज्ञप्ति में नहीं है

10 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने चार हाई कोर्टों के लिए कुल पंद्रह न्यायिक अधिकारियों के नाम भेजे थे। 19 सितंबर को विधि एवं न्याय मंत्रालय ने चौदह नियुक्तियों की विज्ञप्ति जारी की। जो एक नाम छूटा, वह दिल्ली की आठ नामों वाली सूची में पहले नंबर पर था, और उसके रुकने की कोई वजह किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है।

यह तस्वीर दिल्ली हाई कोर्ट की नहीं, सुप्रीम कोर्ट की है; हाई कोर्ट की इमारत की कोई मुक्त लाइसेंस वाली तस्वीर नहीं मिली, और सोमवार की शपथ जिस सिफ़ारिश पर टिकी है वह इसी कॉलेजियम से चली थी
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सोमवार, 21 सितंबर को सुबह दस बजे दिल्ली हाई कोर्ट के परिसर में सात जिला जजों को हाई कोर्ट के जज की शपथ दिलाई जानी है। शपथ मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय दिलाएँगे। कार्यक्रम, समय और जगह पीटीआई की 20 सितंबर की ख़बर में दर्ज हैं, जो द पायनियर में "New Delhi, Sep 20 (PTI)" की डेटलाइन के साथ छपी है। नाम सात हैं।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दिल्ली के लिए आठ भेजे थे।

10 सितंबर की एक ही बैठक से कॉलेजियम के चार बयान निकले। चार हाई कोर्ट, कुल पंद्रह नाम। 19 सितंबर को विधि एवं न्याय मंत्रालय ने जो विज्ञप्ति जारी की, उसकी सुर्ख़ी में चौदह नियुक्तियाँ हैं और उसकी तालिका में चौदह नाम। जो नाम तालिका में नहीं है, वह दिल्ली की सूची में पहले नंबर पर था। गुरविंदर पाल सिंह।

चार बयानों में पंद्रह नाम, एक विज्ञप्ति में चौदह

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर कॉलेजियम के प्रस्तावों वाले पन्ने पर 10 सितंबर 2026 की तारीख़ वाले चार बयान हैं। चारों की इबारत एक जैसी है। दिल्ली वाले बयान में लिखा है कि 10 सितंबर 2026 को हुई बैठक में कॉलेजियम ने "has approved the proposal for appointment of the following Judicial Officers, as Judges of the High Court of Delhi", और उसके नीचे आठ नाम क्रम से छपे हैं: (i) श्री गुरविंदर पाल सिंह, (ii) श्रीमती निवेदिता अनिल शर्मा, (iii) श्रीमती निशा सहाय सक्सेना, (iv) श्री संजय शर्मा-I, (v) श्री भरत पराशर, (vi) डॉ. (श्रीमती) अदिति चौधरी, (vii) श्री दिनेश भट्ट, और (viii) श्री अरुण भारद्वाज।

बाक़ी तीन बयान इसी तारीख़ के हैं। झारखंड हाई कोर्ट के लिए तीन नाम: मनोज प्रसाद, अखिल कुमार और राम शर्मा। कर्नाटक हाई कोर्ट के लिए तीन: श्रीमती उषारानी, श्री के.एस. भरत कुमार और श्रीमती नेराले वीरभद्रैया भवानी। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के लिए एक, श्री यश पॉल बॉर्नी। आठ और तीन और तीन और एक। पंद्रह।

नौ दिन बाद, 19 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 42 मिनट पर, पत्र सूचना कार्यालय ने विधि एवं न्याय मंत्रालय की विज्ञप्ति जारी की। उसकी सुर्ख़ी में चौदह नियुक्तियों की बात है। विज्ञप्ति की पहली पंक्ति यह है: "राष्ट्रपति भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद निम्नलिखित न्यायिक अधिकारियों को उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश/अपर न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करती हैं"। उसके नीचे तीन ख़ानों की तालिका है, और बीच वाले ख़ाने का शीर्षक है "अनुशंसित व्यक्ति का नाम (श्री/श्रीमती)"।

तालिका ख़ुद कह रही है कि जो नाम उसमें हैं, वे अनुशंसित व्यक्तियों के नाम हैं। अनुशंसा पंद्रह की थी। तालिका में चौदह हैं। दिल्ली के सात, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का एक, झारखंड के तीन, कर्नाटक के तीन। गुरविंदर पाल सिंह का नाम उसमें कहीं नहीं है। यह घटाव पीटीआई, बार एंड बेंच और द पायनियर की उन ख़बरों में कहीं नहीं है जो डेस्क ने पढ़ीं। यह डेस्क ने कॉलेजियम के चार बयान और मंत्रालय की एक तालिका आमने-सामने रखकर किया है।

एक और फ़र्क़ है, छोटा पर दर्ज करने लायक़। कॉलेजियम के बयान में चौथा नाम "Shri Sanjay Sharma-I" है। दिल्ली की उच्च न्यायिक सेवा में एक से ज़्यादा संजय शर्मा हैं, और हाई कोर्ट अपने अफ़सरों के रजिस्टर में उन्हें संजय शर्मा-I और संजय शर्मा-II लिखकर अलग करता है। मंत्रालय की तालिका में वह पहचान-अंक नहीं है। वहाँ सिर्फ़ "संजय शर्मा" छपा है।

गुरविंदर पाल सिंह का नाम, और सरकारी काग़ज़ों की ख़ामोशी

रिकॉर्ड में उनके बारे में जो है, वह इतना ही है। वे 10 सितंबर के कॉलेजियम बयान में दिल्ली की सूची के पहले नाम हैं। 19 सितंबर की विज्ञप्ति की तालिका में वे नहीं हैं। इन दोनों तारीख़ों के बीच जो हुआ, उसका कोई सार्वजनिक काग़ज़ नहीं है।

डेस्क ने सोमवार सुबह 9 बजकर 10 मिनट पर सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम-प्रस्ताव सूची दोबारा खोली, और 9 बजकर 29 मिनट पर एक बार और। उस पर सबसे नया प्रस्ताव दोनों बार 10 सितंबर का ही निकला। उसके बाद का कोई बयान नहीं, किसी नाम को दोहराने का नहीं और किसी नाम को वापस लेने का भी नहीं। सरकार वजह नहीं छापती। कॉलेजियम के बयान में भी वजह जैसी कोई चीज़ नहीं है, क्योंकि उस बयान का काम सिफ़ारिश दर्ज करना है, उसे समझाना नहीं।

वारंट का असल पाठ डेस्क ने नहीं पढ़ा है, और यह कहना ज़रूरी है। नियुक्ति का वारंट न्याय विभाग जारी करता है और उसकी अधिसूचनाएँ doj.gov.in पर रहती हैं; वह वेबसाइट इस मशीन को सिर्फ़ एक जावास्क्रिप्ट का खोल लौटाती है, पन्ने का पाठ नहीं। पीआईबी की विज्ञप्ति वारंट नहीं है। वह सरकार का अपना बयान है कि वारंट किन नामों के लिए जारी हुए, और उस पर मंत्रालय के निदेशक नारायण प्रसाद के दस्तख़त हैं।

उस दिन का वक़्त भी रिकॉर्ड पर है। बार एंड बेंच ने सातों नियुक्तियों की ख़बर 19 सितंबर को छापी, और उसकी वेबसाइट के अपने कोड में प्रकाशन का समय 10 बजकर 59 मिनट दर्ज है। पीआईबी की विज्ञप्ति उसके एक घंटे 43 मिनट बाद, 12 बजकर 42 मिनट पर आई। यानी नियुक्ति की ख़बर क़ानूनी पत्रकारिता तक पीआईबी की विज्ञप्ति से पहले पहुँच चुकी थी।

अब उनके पद का सवाल। द पायनियर ने सोमवार, 21 सितंबर के अपने लेख में गुरविंदर पाल सिंह को रोहिणी की अदालतों का प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश बताया है। दिल्ली हाई कोर्ट अपने न्यायिक अधिकारियों का जो रजिस्टर dhcappl.nic.in पर रखता है, उसमें रोहिणी उत्तर का प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश प्रेम कुमार बड़थ्वाल दर्ज है और रोहिणी उत्तर-पश्चिम का निशा सहाय सक्सेना। दोनों में से कोई मेल नहीं खाता। उसी रजिस्टर में नाम से खोजने पर गुरविंदर पाल सिंह के लिए जवाब आता है, "Record Not Found"।

उस ख़ाली जवाब से कोई नतीजा निकालना ग़लत होगा, और इसकी वजह भी उसी रजिस्टर में है। निवेदिता अनिल शर्मा के लिए भी वही जवाब आता है, और उनकी नियुक्ति हो चुकी है। रजिस्टर की चुप्पी किसी के बारे में कुछ नहीं कहती। इसलिए यह रिपोर्ट गुरविंदर पाल सिंह का मौजूदा पद नहीं छाप रही, क्योंकि अदालत के अपने रिकॉर्ड से उसकी तस्दीक़ नहीं हो सकी।

नाम अलग करने की रिवायत और 1993 के फ़ैसले का पैराग्राफ़ 486

कॉलेजियम एक सूची भेजता है और सरकार उसमें से कुछ नामों पर वारंट जारी कर देती है, कुछ पर नहीं। अदालती बहस में इसे नामों का अलगाव कहा जाता है। यह नई बात नहीं है, और इस पर सुप्रीम कोर्ट का कहा हुआ रिकॉर्ड पर है।

बुनियादी पाठ 1993 के दूसरे जजेज़ केस में है, जिसकी रिपोर्ट 1993 (4) SCC 441 पर छपी है। उसके पैराग्राफ़ 486 का खंड 5 सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद अपने 8 दिसंबर 2022 के आदेश में दोबारा छापा। उसमें लिखा है: "In exceptional cases alone, for stated strong cogent reasons, disclosed to the Chief Justice of India, indicating that the recommendee is not suitable for appointment, that appointment recommended by the Chief Justice of India may not be made." उसी खंड की अगली पंक्ति कहती है कि अगर मुख्य न्यायाधीश और परामर्श में शामिल बाक़ी जज उन वजहों को न मानें और सिफ़ारिश दोहरा दें, तो "the appointment should be made as a healthy convention"।

सुप्रीम कोर्ट की इमारत, नई दिल्ली। नाम अलग करने की रिवायत पर अदालत का बुनियादी पाठ यहीं से, 1993 के दूसरे जजेज़ केस से निकलता है
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

8 दिसंबर 2022 का वह आदेश अवमानना याचिका (सिविल) 867/2021 में है, जो स्थानांतरण याचिका (सिविल) 2419/2019 के भीतर दायर हुई थी। शीर्षक है द एडवोकेट्स असोसिएशन बेंगलुरु बनाम बरुण मित्रा। पीठ में जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस विक्रम नाथ थे। उस दिन अदालत के सामने दस ऐसे नाम थे जिन्हें कॉलेजियम दोहरा चुका था और सरकार वापस भेज चुकी थी। आदेश में लिखा है कि दोहराए हुए नामों को दूसरी बार वापस भेजना उस निर्देश के ख़िलाफ़ है। sci.gov.in इस मशीन के लिए कैप्चा के पीछे है, इसलिए आदेश की जो प्रति पढ़ी गई वह लाइव लॉ की रखी हुई पीडीएफ़ है, जिसका हवाला 2022 LiveLaw (SC) 1013 है।

उसी आदेश में वरिष्ठता वाला हिस्सा भी है। अदालत ने दर्ज किया कि जब सुप्रीम कोर्ट सिफ़ारिशें मंज़ूर करता है तो उनमें तय क्रम का पालन होना चाहिए, और यह बात सरकार को देखनी है। दिल्ली की सूची इसी वजह से ध्यान खींचती है। जो नाम रुका, वह क्रम में पहला था।

जो इस आदेश में नहीं है, उसे भी ठीक-ठीक कहना चाहिए। अदालत ने यह नहीं ठहराया कि नाम अलग करना अपने आप ग़ैर-क़ानूनी है। उसने मसला दर्ज किया, अटॉर्नी जनरल से कहा कि वे सरकार से बात करके लौटें, और सुनवाई की अगली तारीख़ रख दी। पैराग्राफ़ 486 का खंड 5 भी सीधे तौर पर दोहराई गई सिफ़ारिश की बात करता है। पहली बार भेजी गई सिफ़ारिश पर सरकार कितने दिन चुप रह सकती है, इस पर कोई ऐसा फ़ैसला डेस्क को नहीं मिला जो सीधा और बाध्यकारी निर्देश देता हो।

सुप्रीम कोर्ट की तय की हुई मियादें और इस फ़ाइल के नौ दिन

मियादें 20 अप्रैल 2021 के आदेश में हैं। मुक़दमा है मेसर्स पीएलआर प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम महानदी कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, और पीठ में मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सूर्यकांत थे। सूर्यकांत अब भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं। आदेश ने तीन मियादें सुझाईं: आईबी की रिपोर्ट चार से छह हफ़्ते में, सरकार की तरफ़ से फ़ाइल सुप्रीम कोर्ट तक आठ से बारह हफ़्ते में, और कॉलेजियम के सर्वसम्मत दोहराव के बाद "such appointment should be processed and appointment should be made within 3 to 4 weeks"।

उसी आदेश के पैराग्राफ़ 9 में मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीजर की मियादें गिनाई गई हैं, और उनमें एक ख़ाली जगह है। राज्य सरकार को छह हफ़्ते, मुख्य न्यायाधीश को चार हफ़्ते, क़ानून मंत्री को तीन हफ़्ते। सिफ़ारिश आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की कोई मियाद उसमें तय नहीं है। आदेश यह बात इन्हीं शब्दों में दर्ज करता है।

इस फ़ाइल की रफ़्तार इसके उलट है। सिफ़ारिश 10 सितंबर की, वारंट 19 सितंबर के। नौ दिन। चौदह नामों के लिए यह फ़ाइल उन बाहरी मियादों के मुक़ाबले तेज़ चली, और एक नाम के लिए वह अभी तक चली ही नहीं।

अनुच्छेद 217 और अनुच्छेद 224: दो अलग दरवाज़े

कॉलेजियम ने पंद्रहों के लिए एक ही शब्द इस्तेमाल किया, "as Judges"। वारंट उस शब्द के साथ एक जैसा सलूक नहीं करते। पीआईबी की तालिका में दिल्ली के सात दो हिस्सों में बँटे हैं। निवेदिता अनिल शर्मा और निशा सहाय सक्सेना को "दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त" लिखा गया है। संजय शर्मा, भरत पराशर, अदिति चौधरी, दिनेश भट्ट और अरुण भारद्वाज को "दिल्ली उच्च न्यायालय के अपर न्यायाधीश के रूप में नियुक्त"।

यह बँटवारा संविधान के दो अलग अनुच्छेदों से निकलता है। अनुच्छेद 217(1) कहता है कि हाई कोर्ट का हर जज राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर वाले वारंट से नियुक्त होगा, और अपर या कार्यवाहक जज को छोड़कर बाक़ी बासठ बरस की उम्र तक पद पर रहेंगे। अनुच्छेद 224(1) अलग रास्ता है। वह कहता है कि अगर हाई कोर्ट के काम में अस्थायी बढ़ोतरी हो या वहाँ बकाया जमा हो जाए, तो राष्ट्रपति अपर जज नियुक्त कर सकते हैं, "for such period not exceeding two years as he may specify"। अनुच्छेद 224(3) जोड़ता है कि अपर या कार्यवाहक जज बासठ की उम्र के बाद पद पर नहीं रहेगा।

संविधान की छपी हुई प्रति में इन दोनों अनुच्छेदों पर एक निशान भी लगा है। 2014 के निन्यानबेवें संशोधन ने दोनों में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के शब्द जोड़ दिए थे। 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने वह संशोधन रद्द कर दिया। शब्द आज भी पाठ में छपे मिलते हैं और नीचे पाद-टिप्पणी में लिखा है कि वे रद्द हो चुके हैं। अमल में अनुच्छेद 217(1) का वही पुराना रूप है। उस रूप में परामर्श तीन से होना है: भारत के मुख्य न्यायाधीश से, राज्य के राज्यपाल से, और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी जज की नियुक्ति में उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से। 19 सितंबर की विज्ञप्ति की पहली पंक्ति इनमें से सिर्फ़ भारत के मुख्य न्यायाधीश का नाम लेती है। वह विज्ञप्ति वारंट नहीं, सरकार का सारांश है।

दोनों श्रेणियों के पद गिनती में तय हैं। दिल्ली हाई कोर्ट अपनी वेबसाइट के सवाल-जवाब वाले पन्ने पर लिखता है, "Presently, the sanctioned strength of Judges of the High Court of Delhi is 45 Permanent Judges and 15 Additional Judges." पैंतालीस और पंद्रह। कुल साठ।

चौदह में से छह को न्यायाधीश लिखा गया है और आठ को अपर न्यायाधीश। झारखंड के तीनों न्यायाधीश हैं, कर्नाटक के तीनों अपर न्यायाधीश, और यश पॉल बॉर्नी न्यायाधीश। किस नाम को किस श्रेणी में क्यों रखा गया, यह किसी सार्वजनिक काग़ज़ में नहीं है। वजह कहीं दर्ज नहीं। 19 सितंबर को दिल्ली में स्थायी पदों में से कितने ख़ाली थे, यह आँकड़ा भी डेस्क को नहीं मिला। नियुक्ति की प्रक्रिया का जो दस्तावेज़ इन सवालों के सबसे क़रीब बैठता है, वह मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसीजर है, और उसका पाठ इसी वजह से नहीं पढ़ा जा सका कि न्याय विभाग की वेबसाइट पन्ना नहीं देती। सुप्रीम कोर्ट के 8 दिसंबर 2022 के आदेश में इतना दर्ज है कि मौजूदा मेमोरेंडम 10 मार्च 2017 को कॉलेजियम ने अंतिम रूप दिया था और जब तक वह बदले नहीं, वही लागू है।

एक बात संविधान के पाठ से साफ़ है। अनुच्छेद 224 अपर जज की मियाद की ऊपरी हद बाँधता है और उसके ख़त्म होने पर क्या होगा, इस पर चुप है। दो बरस के बाद स्थायी होना, मियाद बढ़ना या न बढ़ना, तीनों के लिए कॉलेजियम की नई प्रक्रिया चाहिए। कॉलेजियम की अपनी सूची में इस तरह के बयान अलग से गिने जाते हैं। 18 अगस्त 2026 का एक बयान कलकत्ता हाई कोर्ट के एक अपर जज को स्थायी करने और वहाँ के दूसरे अपर जजों की मियाद बढ़ाने का है। उसी तारीख़ का दूसरा बयान पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक अपर जज को स्थायी करने का है।

सातों नाम ज़िला अदालत से आए हैं

योग्यता की शर्त संविधान में लिखी है। अनुच्छेद 217(2)(क) कहता है कि हाई कोर्ट के जज के लिए योग्य वही है जिसने भारत में कम से कम दस साल न्यायिक पद संभाला हो। अगला खंड दूसरा रास्ता खोलता है, कम से कम दस साल हाई कोर्ट की वकालत। हाई कोर्ट में ज़्यादातर नियुक्तियाँ बार वाले रास्ते से होती हैं। दिल्ली के ये सातों पहले रास्ते से आ रहे हैं। कॉलेजियम का बयान आठों को न्यायिक अधिकारी कहता है।

दिल्ली हाई कोर्ट का अपना अफ़सर-रजिस्टर सोमवार सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर 850 न्यायिक अधिकारियों के नाम दिखा रहा था। उस सूची में पहले आठ में से पाँच इसी बैच के हैं। निशा सहाय सक्सेना दूसरे नंबर पर हैं, पद प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश, रोहिणी उत्तर-पश्चिम। संजय शर्मा-I चौथे नंबर पर, प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश, कड़कड़डूमा उत्तर-पूर्व। भरत पराशर पाँचवें नंबर पर, और उनके सामने पद लिखा है सेक्रेटरी जनरल, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया। दिनेश भट्ट सातवें नंबर पर, राउज़ एवेन्यू कोर्ट परिसर में प्रधान ज़िला जज और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सीबीआई मुक़दमों के विशेष जज। अरुण भारद्वाज आठवें नंबर पर, पद रजिस्ट्रार जनरल, दिल्ली हाई कोर्ट।

पटियाला हाउस स्थित दिल्ली की ज़िला अदालतों का मुख्य द्वार। यह राउज़ एवेन्यू या तीस हज़ारी नहीं है, पर सातों नाम इसी स्तर की अदालतों से आए हैं
तस्वीर: Ramesh lalwani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

उसी सूची के बाक़ी तीन ऊपरी नाम इस बैच में नहीं हैं। पहले नंबर पर अंजु बजाज चांदना हैं, प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश, तीस हज़ारी मध्य। तीसरे नंबर पर अश्वनी कुमार सरपाल, कड़कड़डूमा पूर्व। छठे नंबर पर प्रेम कुमार बड़थ्वाल, रोहिणी उत्तर।

दोनों बड़े प्रशासनिक पद दूसरी जगहों से भी तस्दीक़ होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री अधिकारियों वाली सूची, जिस पर 20 सितंबर 2026 की तारीख़ दर्ज है, सेक्रेटरी जनरल के ख़ाने में श्री भरत पराशर का नाम छापती है। दिल्ली हाई कोर्ट के मौजूदा रजिस्ट्रारों वाले पन्ने पर पहली पंक्ति है, श्री अरुण भारद्वाज (रजिस्ट्रार जनरल), 1 मई 2025 से अब तक। सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा प्रशासनिक अफ़सर और दिल्ली हाई कोर्ट का सबसे बड़ा प्रशासनिक अफ़सर, दोनों इन्हीं सात में हैं।

कॉलेजियम के बयान में नामों के आगे जो संबोधन छपे हैं, उनसे एक और गिनती निकलती है। दिल्ली के सातों में तीन महिलाएँ हैं, और पंद्रह में पाँच। निवेदिता अनिल शर्मा और अदिति चौधरी के मौजूदा पद इस रिपोर्ट में नहीं हैं, क्योंकि हाई कोर्ट का रजिस्टर उन्हें नहीं दिखाता और डेस्क ने उन्हें कहीं और से तस्दीक़ नहीं किया।

साठ पद, तैंतालीस जज और सवा लाख से ऊपर मुक़दमे

अदालत कितनी बड़ी है, इस पर दो आँकड़े आपस में नहीं मिलते और डेस्क उन्हें मिला नहीं पाया। पीटीआई की 20 सितंबर की ख़बर कहती है कि शपथ के बाद दिल्ली हाई कोर्ट की मौजूदा संख्या पचास हो जाएगी। बार एंड बेंच ने 19 सितंबर को, अपनी ही वेबसाइट पर दर्ज समय के मुताबिक़ सुबह 10 बजकर 59 मिनट पर, लिखा था कि अदालत उस वक़्त 44 जजों के साथ काम कर रही है और सोलह पद ख़ाली हैं। 44 में सात जोड़ें तो 51 बनता है, 50 नहीं।

अदालत की अपनी सूची तीसरा आँकड़ा देती है। दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और मौजूदा जजों वाला पन्ना चार पन्नों में बँटा है, और सोमवार सुबह 9 बजकर 7 मिनट पर उन चारों पर कुल 43 नाम थे, मुख्य न्यायाधीश समेत। 22 मिनट बाद दोबारा गिनने पर भी वही 43 आए। नए सातों में से एक भी उस सूची पर नहीं था। 43 में सात जोड़िए तो 50 आता है। अदालत का अपना पन्ना पीटीआई के आँकड़े के साथ बैठता है। बार एंड बेंच का 44 कहाँ से आया, यह डेस्क तय नहीं कर सका, और इसलिए दोनों आँकड़े यहाँ छापे जा रहे हैं।

अदालत में आवाजाही लगी रहती है, और एक ताज़ा मिसाल रिकॉर्ड पर है। 6 अगस्त 2026 के कॉलेजियम बयान में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस वी. कामेश्वर राव को पटना हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफ़ारिश है, और दिल्ली हाई कोर्ट अब उन्हें अपने पूर्व जजों की सूची में रखता है।

अब बोझ की तरफ़। दिल्ली हाई कोर्ट ने 19 सितंबर को अपने सार्वजनिक सूचना पन्ने पर अगस्त 2026 के मुक़दमों का ब्योरा चढ़ाया। 1 अगस्त को अदालत में 1,26,608 मुक़दमे लंबित थे। महीने भर में 6,665 नए आए और 6,176 निपटे। 31 अगस्त को गिनती 1,27,097 थी। महीने भर के काम के बाद भी ढेर 489 मुक़दमे ऊँचा हो गया। उसी काग़ज़ पर एक नोट है कि मुक़दमों की भौतिक जाँच के बाद चार श्रेणियों में 34 मुक़दमे जोड़े और 13 घटाए गए हैं।

यह किसी भारतीय अदालत का नहीं, एक सामान्य अभिलेख कक्ष का दृश्य है। बंद अलमारियों में बँधी फ़ाइलों का यह ढेर सवा लाख से ऊपर लंबित मुक़दमों के भार को समझने का एक तरीक़ा भर है
तस्वीर: BORNTHISWAYMEDIA, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

उस ढेर की बनावट भी उसी काग़ज़ पर है। सिविल रिट याचिकाएँ 35,866, अपीलीय पक्ष के ग़ैर-कर वाले सिविल मुक़दमे 33,253, फ़ौजदारी पक्ष 33,578, मूल पक्ष 20,597, कर अपील 3,239 और कंपनी पक्ष 564। इन आँकड़ों को जजों की गिनती से बाँटिए तो तस्वीर हाथ आती है। 1,27,097 को 43 से बाँटें तो हर जज के हिस्से क़रीब 2,956 मुक़दमे आते हैं। सातों के आने के बाद, यानी 50 से बाँटें तो क़रीब 2,542। साठ का पूरा पद-बल भर जाए तब भी हर जज पर क़रीब 2,118 मुक़दमे रहेंगे।

झारखंड, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर के सात नाम

बाक़ी तीन अदालतों की सूचियाँ पूरी की पूरी मंज़ूर हुईं, और यही दिल्ली वाली बात को अलग बनाता है। झारखंड के तीनों नाम मंत्रालय की तालिका में झारखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में दर्ज हैं। कर्नाटक के तीनों अपर न्यायाधीश के रूप में। यश पॉल बॉर्नी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में। पंद्रह में से चौदह पार हुए। एक अटका।

यह ख़बर सोमवार सुबह 9 बजकर 29 मिनट की स्थिति पर बंद हो रही है। शपथ का तय समय उस वक़्त आधे घंटे आगे था, और तीन पन्ने ऐसे थे जिन पर तब तक कुछ नहीं आया था। दिल्ली हाई कोर्ट के सार्वजनिक सूचना पन्ने पर सबसे नई प्रविष्टि 19 सितंबर की थी, और 21 सितंबर की कोई अधिसूचना उस पर नहीं चढ़ी थी। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम-प्रस्ताव पन्ने पर 10 सितंबर के बाद कुछ नहीं। पीआईबी की सितंबर वाली हिंदी सूची में उस वक़्त 890 विज्ञप्तियाँ थीं और उनमें एक भी 21 सितंबर की नहीं। इनमें से पहला पन्ना ही वह जगह है जहाँ शपथ की तस्दीक़ अदालत के अपने रिकॉर्ड से हो सकेगी, और यह रिपोर्ट अभी वह तस्दीक़ नहीं कर पा रही।

गुरविंदर पाल सिंह का नाम अभी भी सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर, 10 सितंबर के बयान में, दिल्ली की सूची के पहले नंबर पर छपा हुआ है। सरकार के किसी काग़ज़ ने उसे न तो ख़ारिज किया है, न मंज़ूर। वह वहीं है।

स्रोतसुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का 10 सितंबर 2026 की बैठक का बयान: दिल्ली हाई कोर्ट के लिए आठ न्यायिक अधिकारियों के नाम, क्रम सहित, कॉलेजियम का 10 सितंबर 2026 का बयान: झारखंड हाई कोर्ट के लिए तीन नाम, कॉलेजियम का 10 सितंबर 2026 का बयान: कर्नाटक हाई कोर्ट के लिए तीन नाम, कॉलेजियम का 10 सितंबर 2026 का बयान: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के लिए एक नाम, सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम-प्रस्ताव अनुक्रमणिका, 21 सितंबर 2026 को सुबह 9:10 और 9:29 बजे पढ़ी गई: 10 सितंबर के बाद कोई नया बयान नहीं, पत्र सूचना कार्यालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, दोपहर 12:42: चौदह न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की तालिका, दिल्ली हाई कोर्ट: मुख्य न्यायाधीश और मौजूदा जज, चार पन्ने, 21 सितंबर 2026 सुबह 9:07 और 9:29 बजे गिने गए (43 नाम), दिल्ली हाई कोर्ट के सवाल-जवाब: स्वीकृत संख्या 45 स्थायी और 15 अपर जज, दिल्ली हाई कोर्ट, 19 सितंबर 2026 की सार्वजनिक सूचना: अगस्त 2026 में मुक़दमों का दाख़िला, निपटारा और लंबित संख्या, दिल्ली हाई कोर्ट की सार्वजनिक सूचनाएँ, 21 सितंबर 2026 सुबह 9:29 बजे पढ़ी गईं: सबसे नई प्रविष्टि 19 सितंबर की, दिल्ली हाई कोर्ट के मौजूदा रजिस्ट्रार: अरुण भारद्वाज, रजिस्ट्रार जनरल, 1 मई 2025 से, दिल्ली हाई कोर्ट का न्यायिक अधिकारी रजिस्टर, 21 सितंबर 2026 सुबह 9:12 बजे पढ़ा गया: 850 अधिकारी, पद और तैनाती सहित, सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री अधिकारी, पन्ने पर दर्ज तारीख़ 20 सितंबर 2026: सेक्रेटरी जनरल भरत पराशर, सुप्रीम कोर्ट: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, 24 नवंबर 2025 को शपथ, विधायी विभाग, भारत का संविधान, 11 नवंबर 2025 की स्थिति: अनुच्छेद 217 और 224 का पाठ और पाद-टिप्पणियाँ, सुप्रीम कोर्ट का 8 दिसंबर 2022 का आदेश, द एडवोकेट्स असोसिएशन बेंगलुरु बनाम बरुण मित्रा; लाइव लॉ की रखी प्रति, हवाला 2022 LiveLaw (SC) 1013, मेसर्स पीएलआर प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम महानदी कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, सुप्रीम कोर्ट, 20 अप्रैल 2021: नियुक्ति की मियादें, कॉलेजियम का 6 अगस्त 2026 का बयान: वी. कामेश्वर राव को दिल्ली से पटना हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफ़ारिश, बार एंड बेंच, 19 सितंबर 2026 (वेबसाइट के अपने कोड में प्रकाशन समय 05:29 यूटीसी): सात नियुक्तियाँ, स्वीकृत 60, कार्यरत 44, रिक्त 16, पीटीआई की ख़बर, द पायनियर में 20 सितंबर 2026 को, 'New Delhi, Sep 20 (PTI)' डेटलाइन के साथ: सोमवार सुबह दस बजे शपथ, संख्या पचास, द पायनियर, पायनियर न्यूज़ सर्विस, 21 सितंबर 2026: शपथ का ब्योरा और सातों के पदों का विवरण

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।