जिस क़ानून के सहारे कर्नाटक सिनेमा टिकटों पर दो फ़ीसदी उपकर वसूल रहा था, वह क़ानून कभी लागू ही नहीं हुआ
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 10 सितंबर को वे परिपत्र और नोटिस रद्द कर दिए जिनमें सिनेमाघरों से 1 सितंबर से दो फ़ीसदी कल्याण उपकर वसूलने को कहा गया था। राज्य ने ख़ुद अदालत में माना कि 2024 का अधिनियम अब तक चालू ही नहीं हुआ। जिन दिनों यह रक़म टिकट पर जुड़ी, उसका क्या हुआ, यह कोई दस्तावेज़ नहीं बताता।

कर्नाटक के राजपत्र में एक अधिसूचना कभी नहीं छपी।
उसमें कोई योजना नहीं थी, कोई दर नहीं थी। उसे सिर्फ़ एक तारीख़ बतानी थी: वह दिन, जिससे कर्नाटक सिने एवं सांस्कृतिक कर्मी (कल्याण) अधिनियम, 2024 चालू माना जाएगा। राज्यपाल थावरचंद गहलोत की मंज़ूरी 23 सितंबर 2024 को मिल गई थी और अगले दिन क़ानून कर्नाटक राजपत्र असाधारण अंक 450, भाग चार-क में छप गया। तारीख़ किसी ने तय नहीं की, और दो साल निकल गए।
10 सितंबर को कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एच.टी. नरेंद्र प्रसाद ने इसी ख़ाली जगह पर वे परिपत्र और नोटिस रद्द कर दिए, जिनके सहारे राज्य के सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्सों से 1 सितंबर से टिकट पर दो फ़ीसदी कल्याण उपकर वसूला जा रहा था। याचिका मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया और पीवीआर आईनॉक्स लिमिटेड की थी, क्रमांक डब्ल्यूपी 28571/2026।
सबसे भारी बात अदालत ने नहीं कही थी। वह राज्य ने ख़ुद कही।
श्रम विभाग ने 9 सितंबर को मेमो दाख़िल कर बताया कि वह 29 अगस्त 2026 का परिपत्र वापस ले रहा है, और यह भी माना कि 2024 का अधिनियम अब तक राजपत्र में लागू घोषित नहीं हुआ है। जिस क़ानून के हवाले से पैसा माँगा जा रहा था, वह उन दिनों काम ही नहीं कर रहा था।
धारा 1(2): 'सरकार अधिसूचना से जो तारीख़ तय करे'

अधिनियम की पहली धारा दो हिस्सों की है। पहला नाम देता है। दूसरा एक वाक्य है: यह अधिनियम उस तारीख़ से लागू होगा, जो राज्य सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना से नियत करे। भारतीय क़ानून-लेखन में यह वाक्य आम है, और उसका नतीजा भी आम है। विधानसभा से पारित हो जाने और राज्यपाल की मंज़ूरी मिल जाने के बाद भी क़ानून अपने आप चालू नहीं होता। विधेयक संख्या 28, 2024 के रूप में पेश यह अधिनियम फ़ाइल संख्या SAMVYASHAE 38 SHASANA 2024 पर दर्ज है, और उसकी चालू होने की तारीख़ का ख़ाना आज भी ख़ाली है।
29 अगस्त का परिपत्र, 1 सितंबर से वसूली, और अदालत में वापसी
29 अगस्त 2026 को श्रम विभाग ने एक परिपत्र या कार्यालय आदेश निकाला, जिसमें कहा गया कि 1 सितंबर 2026 से सिनेमा टिकटों पर दो फ़ीसदी उपकर की वसूली और जमा अनिवार्य है। याचिका दाख़िल हुई, 9 सितंबर की पहली सुनवाई में अदालत ने राज्य से जवाब माँगा, और उसी दिन श्रम विभाग ने आदेश वापस लेने का मेमो दे दिया। अगले दिन न्यायमूर्ति प्रसाद ने याचिका मंज़ूर करते हुए वसूली से जुड़े परिपत्र और नोटिस रद्द कर दिए। ग्यारह दिन में एक वसूली शुरू हुई और ख़त्म हो गई।
याचिका किसकी थी और उसमें क्या कहा गया
याचिकाकर्ताओं में मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया, पीवीआर आईनॉक्स लिमिटेड और उसके एक शेयरधारक शांतनु पई थे। पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता उदय होल्ला और वी. श्रीनिवास राघवन ने की। मुख्य दलील प्रारंभ-अधिसूचना के अभाव की थी। उसके साथ दो और रखी गईं: सिने कर्मियों की सामाजिक सुरक्षा का क्षेत्र संसद की सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 पहले ही घेर चुकी है, और मल्टीप्लेक्स उन लोगों को नौकरी देते ही नहीं जिनके नाम पर उपकर लिया जा रहा है। आख़िरी बात पैसे की थी, कि जीएसटी के ऊपर दो फ़ीसदी और जोड़ने से टिकट का गणित हिलता है।
अदालत ने क्या तय किया, और क्या छोड़ दिया
आदेश की परिधि छोटी है। न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि उपकर को चालू करने और वसूलने के क़दम धारा 1(2) के तहत वैध प्रारंभ-अधिसूचना के बिना टिक नहीं सकते। उन्होंने अधिनियम को असंवैधानिक नहीं ठहराया, न 2025 के नियमों को रद्द किया, न विधायी क्षमता के सवाल पर कुछ कहा। सामाजिक सुरक्षा संहिता से टकराव की दलील और जीएसटी के बाद टिकट पर राज्य की कर-शक्ति का सवाल, दोनों खुले पड़े हैं। मतलब यह भी है कि राज्य अगर कल अधिसूचना निकाल दे तो यह फ़ैसला उसके रास्ते में नहीं आएगा।
जिन दर्शकों ने वह दो फ़ीसदी दिया, उनका पैसा कहाँ गया
धारा 11(क) कहती है कि प्रतिष्ठान का मालिक हर कैलेंडर महीने की दस तारीख़ तक उपकर जमा कराएगा। सितंबर की वसूली की पहली जमा-तारीख़ 10 अक्टूबर बनती, और उससे पहले ही आदेश वापस हो गया। मसौदा नियमों के हिसाब से दो सौ रुपये के टिकट पर चार रुपये जुड़ते थे। 1 से 10 सितंबर के बीच बिके टिकटों पर यह रक़म ली गई या नहीं, कितनी ली गई, और जो ली गई वह कहाँ पड़ी है, इस पर न आदेश में कुछ है, न मेमो में, न राज्य की किसी सार्वजनिक सूचना में। वापसी की कोई प्रक्रिया अब तक नहीं बताई गई।
सिने कर्मियों का कल्याण कोष: पैसा कहाँ से आना था
धारा 8 एक कोष बनाती है, कर्नाटक सिने एवं सांस्कृतिक कर्मी सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण निधि, और उसमें छह तरह का पैसा गिनाती है। पहला, धारा 9 का उपकर। दूसरा, पंजीकृत कर्मियों का अपना अंशदान। तीसरा, राज्य, केंद्र या स्थानीय निकायों से मिली सहायता-अनुदान। चौथा, संस्थाओं या व्यक्तियों से मिला दान, उपहार या वसीयत। पाँचवाँ, बोर्ड के निवेश पर मिला ब्याज या लाभांश। छठा, नियमों में तय कोई और स्रोत। उपकर इनमें पहला है, अकेला नहीं, पर व्यवहार में पूरी योजना उसी पर खड़ी थी।
दो फ़ीसदी किस रक़म पर, यह एक 'स्पष्टीकरण' में लिखा है
धारा 9(2) दर की सीमा बाँधती है: दो फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं, एक फ़ीसदी से कम नहीं। इसके नीचे लगा स्पष्टीकरण वह बात कहता है जो ख़बरों में कहीं नहीं आई। उसके अनुसार सिनेमा टिकट के किराए में कोई भी चुकाया या देय कर शामिल नहीं माना जाएगा। यानी दो फ़ीसदी जीएसटी हटाकर बची क़ीमत पर लगना था, टिकट की छपी पूरी रक़म पर नहीं। धारा 9(4) एक और पेच रखती है: सरकार यह दर तीन साल में एक बार ही बदल सकती है।
टीवी और ओटीटी भी दायरे में थे, पर मसौदे ने ओटीटी छोड़ दिया
धारा 2(ण) 'संबंधित प्रतिष्ठान' की परिभाषा देती है, जिसमें अकेले सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स, ओवर-द-टॉप यानी ओटीटी मंच, टेलीविज़न चैनल और सरकार द्वारा अधिसूचित कोई भी दूसरा प्रतिष्ठान शामिल हैं। धारा 9(1) उपकर टिकट, सदस्यता शुल्क और इन प्रतिष्ठानों की समूची आमदनी पर लगाती है। 24 सितंबर 2025 की मसौदा अधिसूचना, संख्या एलडी 386 एलईटी 2023, ने दो फ़ीसदी सिनेमा टिकटों और टेलीविज़न मनोरंजन चैनलों के कुल लेनदेन मूल्य पर रखा। ओटीटी मंच मसौदे से बाहर रह गए, जबकि मूल अधिनियम में वे परिभाषा के भीतर हैं।
दो सौ रुपये की सीमा पर रोक, और ठीक अगले दिन उपकर का मसौदा
23 सितंबर 2025 को उसी हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति रवि वी. होसमनी ने कर्नाटक सिनेमा (विनियमन) संशोधन नियम, 2025 पर रोक लगाई थी। उन नियमों ने राज्य भर में टिकट की क़ीमत दो सौ रुपये पर बाँध दी थी। अदालत ने प्रथम दृष्टया कहा कि मूल कर्नाटक सिनेमा (विनियमन) अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान दिखता ही नहीं जो टिकट की क़ीमत तय करने की शक्ति देता हो। याचिकाकर्ता वही समूह था, साथ में होम्बले फ़िल्म्स, वीके फ़िल्म्स और कीस्टोन एंटरटेनमेंट्स। श्रम विभाग की उपकर वाली मसौदा अधिसूचना अगले दिन निकली।
जिनके लिए यह कोष बना: परिभाषा की चौड़ाई

धारा 2(ङ) 'सिने एवं सांस्कृतिक कर्मी' को इतना चौड़ा रखती है कि उसमें अभिनेता, संगीतकार और नर्तक से लेकर कुशल, अकुशल, शारीरिक, पर्यवेक्षी, तकनीकी और कलात्मक हर तरह का काम करने वाला आ जाता है। धारा 2(क) सात अकादमियों के नाम गिनाती है, चलनचित्र से लेकर यक्षगान और बयलाटा तक। पंजीकरण तीन साल चलता और समाप्ति के तीन महीने के भीतर नवीनीकरण ज़रूरी होता। 23 जुलाई 2024 को विधानसभा में श्रम मंत्री संतोष लाड ने कहा था कि सिनेमा उद्योग में लगभग पचास हज़ार लोग हैं, और सहायक क्षेत्रों को जोड़ लें तो लगभग सत्तर हज़ार।
बोर्ड, जो अभी बना ही नहीं
धारा 3 इक्कीस सदस्यों का एक बोर्ड बनाती है। श्रम मंत्री पदेन अध्यक्ष, श्रम विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रधान सचिव पदेन उपाध्यक्ष, श्रम आयुक्त पदेन सदस्य-सचिव, और सत्रह मनोनीत सदस्य: पाँच कर्मियों के प्रतिनिधि जिनमें दो महिलाएँ, सात अकादमियों के, पाँच सरकारी विभागों के। मनोनीत सदस्यों में कम से कम एक-तिहाई महिलाएँ रखनी थीं, मुख्यालय बेंगलुरु। इस बोर्ड के लिए भी धारा 3(1) एक अलग अधिसूचना माँगती है, जो जारी नहीं हुई। जिस निकाय को उपकर पहुँचना था, वह काग़ज़ पर भी अस्तित्व में नहीं आया।
2024 का अधिनियम अब भी किताब में है, बस चालू नहीं है
अदालत ने अधिनियम नहीं छुआ, इसलिए वह अपनी जगह क़ायम है। उसका क्रमांक है, राजपत्र में तारीख़ है, धाराएँ छपी हुई हैं, अनुवाद संविधान के अनुच्छेद 348(3) के तहत अंग्रेज़ी में प्रकाशित है। जो नहीं है, वह वह दिन है जिससे ये सब चीज़ें किसी पर लागू होती हों। धारा 16 में दस हज़ार रुपये और दोबारा उल्लंघन पर एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है, धारा 13 बक़ाया उपकर को भू-राजस्व की तरह वसूलने की शक्ति देती है, और अभी दोनों बेजान हैं।
एक संशोधन जो लागू है, उस क़ानून का जो लागू नहीं
7 जनवरी 2026 को राज्यपाल ने कर्नाटक सिने एवं सांस्कृतिक कर्मी (कल्याण) (संशोधन) अधिनियम को मंज़ूरी दी, जो कर्नाटक अधिनियम संख्या 13, 2026 के रूप में 8 जनवरी 2026 को राजपत्र में छपा। उसकी अपनी धारा 1(2) में लिखा है कि यह तत्काल प्रवृत्त होगा। उसने धारा 11 का शीर्षक 'नियोजक के कर्तव्य' से बदलकर 'प्रतिष्ठान-स्वामी के कर्तव्य' किया, खंड (ख) में 'महीने की दस तारीख़' की जगह 'अगले महीने की दस तारीख़' रखा, और धारा 18, यानी अपराधों के शमन का पूरा प्रावधान, हटा दिया। एक चालू संशोधन एक ठप अधिनियम की धाराएँ बदल रहा है।
'लागू न हुए क़ानून' का मतलब क्या होता है
राज्यपाल की मंज़ूरी से क़ानून का वजूद बनता है। प्रारंभ की अधिसूचना से उसका असर शुरू होता है। इन दो पड़ावों के बीच का अरसा वह जगह है जहाँ क़ानून पढ़ा जा सकता है, उद्धृत किया जा सकता है, संशोधित भी किया जा सकता है, पर उसके सहारे किसी से कुछ माँगा नहीं जा सकता। धारा 23 का परंतुक इसकी सबसे साफ़ मिसाल है: कठिनाई दूर करने का आदेश अधिनियम के प्रारंभ की तारीख़ से दो साल बाद नहीं निकाला जा सकता। यह घड़ी चली ही नहीं है, इसलिए वे दो साल शुरू नहीं हुए।
दूसरे राज्यों में सिने-कर्मियों पर यह उपकर कैसे लगता है
सबसे पहले केंद्र का ढाँचा देखिए, क्योंकि कर्नाटक जिस ख़ाली जगह में क़ानून बना रहा था वह उसी से बनी है। सिने-कर्मी कल्याण उपकर अधिनियम, 1981, यानी 11 सितंबर 1981 का अधिनियम संख्या 30, हर फ़ीचर फ़िल्म पर एक उत्पाद शुल्क लगाता था। दर एक हज़ार रुपये से कम और बीस हज़ार रुपये से ज़्यादा नहीं हो सकती थी। यह पैसा दर्शक से नहीं, निर्माता से लिया जाता था, और उस दिन लिया जाता था जिस दिन वह सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम, 1952 की धारा 4 के तहत प्रमाणपत्र के लिए अर्ज़ी देता था।
केंद्रीय उपकर की बनावट और उसका अंत
उस अधिनियम की धारा 5 कहती है कि उपकर की आय भारत की संचित निधि में जाएगी, सीधे कल्याण कोष में नहीं। धारा 7 में बक़ाया रहने पर हर महीने पचास रुपये तक का जुर्माना था। धारा 1(3) में वही वाक्य था जो कर्नाटक के अधिनियम में है, कि सरकार अधिसूचना से तारीख़ तय करेगी। वित्त मंत्रालय की 7 जून 2017 की विज्ञप्ति के मुताबिक़ केंद्र ने आम बजट 2016-17 में इसी 1981 के अधिनियम में संशोधन कर सिने कर्मी कल्याण उपकर हटा दिया।
संहिता ने कोष भी समेट लिया
21 नवंबर 2025 को अधिसूचना एस.ओ. 5319(ई) से सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधान लागू हुए। इनमें धारा 164(1) की मद 1 और 2, तथा मद 4 से 9 शामिल हैं। इस सूची की सातवीं मद सिने-कर्मी कल्याण निधि अधिनियम, 1981 है, जो इसी के साथ निरस्त हो गया। तीसरी मद, कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम, 1952, अभी निरस्त नहीं हुई। नतीजा यह कि सिने कर्मियों के लिए केंद्र का अलग उपकर 2016 में गया और उनका अलग कोष 2025 में।
जीएसटी के बाद टिकट पर राज्य क्या लगा सकता है
संविधान के एक सौ एकवें संशोधन अधिनियम, 2016 की धारा 17 ने राज्य सूची की प्रविष्टि 62 की जगह नई प्रविष्टि रखी। नया पाठ है: मनोरंजन और आमोद-प्रमोद पर कर, उस सीमा तक जहाँ तक वे किसी पंचायत, नगरपालिका, क्षेत्रीय परिषद या ज़िला परिषद द्वारा लगाए और वसूले जाएँ। राज्य ख़ुद इस मद में कर नहीं ले सकता, स्थानीय निकाय ले सकते हैं। कर्नाटक के अधिनियम में उद्देश्य और कारण का कथन प्रविष्टि 62 का नाम तक नहीं लेता। वह समवर्ती सूची की प्रविष्टि 23 और 24 का हवाला देता है, जो सामाजिक सुरक्षा और श्रम कल्याण की मदें हैं।
केरल: तीन रुपये प्रति टिकट, और वसूली नगरपालिका करती है

केरल स्थानीय निकाय मनोरंजन कर अधिनियम, 1961 की धारा 3सी, जो 2013 के अधिनियम 21 से जोड़ी गई और 25 नवंबर 2012 से प्रभावी है, सिनेमा के हर प्रवेश पर तीन रुपये से अनधिक उपकर लगाती है, बशर्ते टिकट पच्चीस रुपये से महँगा हो। वसूली स्थानीय निकाय करता है, और हर महीने की रक़म उसका सचिव अगले महीने के आख़िरी कार्य दिवस तक बोर्ड के खाते में भेजता है। देर होने पर निकाय डेढ़ फ़ीसदी प्रति माह का दंड भरता है। 17 फ़रवरी 2025 को मुख्य न्यायाधीश नितिन जामदार और न्यायमूर्ति एस. मनु की खंडपीठ ने अपील संख्या 2300/2015 में इसे वैध ठहराया, इस आधार पर कि लेवी सिनेमा देखने वाले पर है, मालिक पर नहीं।
केरल का कोष अपने सदस्यों से भी पैसा लेता है
जिस निधि में वे तीन रुपये जाते हैं, वह केरल सांस्कृतिक कर्मी कल्याण निधि अधिनियम, 2010 से बनी है, जो अधिनियम संख्या 6, 2011 के रूप में 1 जनवरी 2011 को प्रकाशित हुआ। उसमें 'सांस्कृतिक कर्मी' की परिभाषा सिनेमा, केबल और डीटीएच से शुरू होकर नाटक, कथकली, गानमेला, सर्कस, मार्गमकली, चवुट्टु नाटकम, जादू और मंच-सज्जा तक जाती है। कोष में उपकर के अलावा सदस्यों का अंशदान भी आता है: सामान्य सदस्य से पचास रुपये महीना, और सिनेमा-टेलीविज़न के पेशेवरों तथा थिएटर मालिकों से दो सौ रुपये महीना।
तमिलनाडु: कल्याण उपकर नहीं, स्थानीय निकाय का मनोरंजन कर
तमिलनाडु ने अलग रास्ता लिया। तमिलनाडु स्थानीय निकाय मनोरंजन कर अधिनियम, 2017, यानी तमिलनाडु अधिनियम संख्या 20, 2017, 1 जुलाई 2017 से लागू है। ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन की सूचना के मुताबिक़ 27 सितंबर 2017 से नई तमिल फ़िल्मों पर दस और दूसरी भाषाओं की फ़िल्मों पर बीस फ़ीसदी लगा। 16 अक्टूबर 2017 से छूट देकर दरें बदलीं: नई तमिल फ़िल्म पर आठ, दूसरी भारतीय भाषाओं की नई फ़िल्म पर पंद्रह, अंग्रेज़ी और विदेशी भाषाओं की नई फ़िल्म पर बीस फ़ीसदी। यह पैसा स्थानीय निकाय के पास जाता है, किसी सिने-कर्मी बोर्ड के पास नहीं।
महाराष्ट्र: टिकट पर कुछ नहीं, तनख़्वाह से साल में सौ रुपये
महाराष्ट्र में सिनेमा टिकट से जुड़ा कोई सिने-कर्मी उपकर नहीं मिलता। जो ढाँचा चलता है वह सबके लिए एक है: महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम, 1953। इसमें कर्मचारी पच्चीस रुपये और नियोक्ता पचहत्तर रुपये देता है, छमाही, कुल सौ रुपये। कटौती 30 जून और 31 दिसंबर को होती है, जमा 15 जुलाई तथा 15 जनवरी तक। यह निधि कारख़ाना अधिनियम और दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम के दायरे वाले प्रतिष्ठानों पर लगती है, और इसी से छात्रवृत्तियाँ तथा पुरानी बीमारियों के इलाज में मदद दी जाती है।
तेलंगाना: टिकट महँगा करने की इजाज़त की एक क़ीमत तय हुई
अगस्त 2026 में तेलंगाना ने न क़ानून बनाया, न नियम। गृह (सामान्य) विभाग ने एक पत्र निकाला। बड़ी फ़िल्मों को टिकट के दाम बढ़ाने की विशेष इजाज़त मिलती है, और अब शर्त यह है कि बढ़ी हुई क़ीमत से जो अतिरिक्त आमदनी हो, उसका बीस फ़ीसदी कर्मचारी कल्याण के लिए जमा कराना होगा। रक़म तेलंगाना फ़िल्म विकास निगम और तेलुगु फ़िल्म इंडस्ट्री एम्प्लॉइज़ फ़ेडरेशन के कल्याण खाते में जाती है, और वसूली निर्माता करेगा, सिनेमाघर मालिकों से। पत्र चार फ़िल्मों के नाम लेकर गया: अखंडा 2, द राजा साब, मन शंकर वर प्रसाद गारु और पेद्दी। तेलुगु फ़िल्म प्रोड्यूसर्स काउंसिल के सचिव टी. प्रसन्ना कुमार ने इसे बड़ा झटका बताया।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना: चार अलग खूँटियाँ
चार राज्यों में पैसा चार अलग जगहों से निकलता है। केरल में दर्शक देता है, वसूली नगरपालिका करती है, और खूँटी प्रविष्टि 62 है। तमिलनाडु में भी दर्शक देता है और निकाय वसूलता है, पर पैसा कल्याण कोष में नहीं, निकाय के ख़ज़ाने में जाता है। महाराष्ट्र में नियोक्ता और कर्मचारी मिलकर एक तयशुदा रक़म देते हैं, टिकट इसमें कहीं नहीं आता। तेलंगाना में निर्माता देता है, वह भी तभी जब वह ख़ुद दाम बढ़ाने की इजाज़त माँगे। कर्नाटक ने पाँचवाँ रास्ता चुना: दर्शक से, राज्य ख़ुद वसूले, और समवर्ती सूची की कल्याण मदों के सहारे।
अब सरकार के पास कौन-से रास्ते बचे हैं
पहला रास्ता सीधा है: धारा 1(2) के तहत प्रारंभ की अधिसूचना निकालो, धारा 3(1) के तहत बोर्ड बनाओ, नियम अंतिम करो, फिर नया परिपत्र निकालो। इस पर अदालत ने रोक नहीं लगाई। दूसरा रास्ता केरल वाला है, जिसमें उपकर स्थानीय निकाय की मनोरंजन-कर व्यवस्था के भीतर रखा जाता है और प्रविष्टि 62 की शर्त पूरी होती है। तीसरा तेलंगाना वाला है, जिसमें क़ानून की जगह इजाज़त की शर्त काम करती है। हर रास्ते पर वह सवाल खड़ा रहेगा जिसे 10 सितंबर के आदेश ने नहीं छुआ, कि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के रहते राज्य इस क्षेत्र में कहाँ तक जा सकता है।
जो काग़ज़ अब भी अधूरा है
24 सितंबर 2025 की मसौदा अधिसूचना ने राजपत्र में प्रकाशन से तीस दिन के भीतर आपत्तियाँ माँगी थीं, जो श्रम विभाग के सचिव, विकास सौध, बेंगलुरु के पते पर भेजनी थीं। उस तारीख़ को लगभग एक साल हो चुका है और नियम अब तक अंतिम रूप में अधिसूचित नहीं हुए। बीच में एक परिपत्र निकला, ग्यारह दिन चला, और 9 सितंबर के मेमो से वापस ले लिया गया। कर्नाटक सिने एवं सांस्कृतिक कर्मी कल्याण बोर्ड में अब भी शून्य सदस्य हैं, और कोष में इस उपकर से एक रुपया दर्ज नहीं हुआ।
स्रोतकर्नाटक अधिनियम संख्या 46, 2024 का पूरा पाठ और उसका संशोधन अधिनियम 13, 2026, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च का संकलन, लाइव लॉ, कर्नाटक हाई कोर्ट के 10 सितंबर 2026 के आदेश की रिपोर्ट, डब्ल्यूपी 28571/2026, द हिंदू, बेंगलुरु, 10 सितंबर 2026 की रिपोर्ट कि राज्य ने अदालत में क़ानून के लागू न होने की बात मानी, बार एंड बेंच, 10 सितंबर 2026, वकीलों के नाम और 9 सितंबर के मेमो का ब्योरा, लाइव लॉ बिज़, याचिकाकर्ताओं की दलीलें और धारा 9(2) की एक से दो फ़ीसदी की सीमा, बार एंड बेंच, 23 सितंबर 2025, कर्नाटक सिनेमा (विनियमन) संशोधन नियम, 2025 पर रोक का आदेश, टीमलीज़ रेगटेक, कर्नाटक श्रम विभाग की मसौदा अधिसूचना एलडी 386 एलईटी 2023, 24 सितंबर 2025, बेस्टमीडियाइन्फ़ो, मसौदा नियमों का दायरा और टीवी चैनलों पर असर, डेक्कन हेराल्ड, 24 जुलाई 2024, विधानसभा में श्रम मंत्री संतोष लाड का भाषण, श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय की वेबसाइट पर सिने-कर्मी कल्याण उपकर अधिनियम, 1981 का पाठ, पत्र सूचना कार्यालय, वित्त मंत्रालय, 7 जून 2017, जीएसटी से पहले हटाए गए उपकरों की सूची, एससीसी ऑनलाइन, चार श्रम संहिताओं के लागू होने की अधिसूचनाएँ, एस.ओ. 5319(ई) दिनांक 21 नवंबर 2025, जीएसटी परिषद की वेबसाइट पर संविधान का एक सौ एकवाँ संशोधन अधिनियम, 2016 का पाठ, केरल स्थानीय स्वशासन विभाग का पंचायतविकि, केरल स्थानीय निकाय मनोरंजन कर अधिनियम, 1961 की धारा 3सी, लाइव लॉ, केरल हाई कोर्ट का 17 फ़रवरी 2025 का फ़ैसला, केरल फ़िल्म एग्ज़िबिटर्स फ़ेडरेशन बनाम केरल राज्य, इंडियन कानून पर केरल सांस्कृतिक कर्मी कल्याण निधि अधिनियम, 2010 का पाठ, ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन, राजस्व विभाग, स्थानीय निकाय मनोरंजन कर की दरों की सूचना, डेक्कन क्रॉनिकल, 19 अगस्त 2026, तेलंगाना सरकार के बीस फ़ीसदी अंशदान आदेश पर उद्योग की प्रतिक्रिया, महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम, 1953 के तहत अंशदान की दरें और तारीख़ें