मुक़दमा लंबित हो तो पासपोर्ट अदालत की लिखित अनुमति और एक वचन-पत्र पर मिलता है
पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 6(2)(f) उसी पर लागू होती है जिसका मामला किसी आपराधिक अदालत के सामने लंबित है। 25 अगस्त 1993 की अधिसूचना उससे छूट देती है, बशर्ते आप उसी अदालत का आदेश और सादे काग़ज़ पर लिखा वचन-पत्र साथ लगाएँ। सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज हो और जाँच चल रही हो, तो विदेश मंत्रालय की अपनी हिदायत कहती है कि यह धारा लगती ही नहीं।

मुक़दमा चल रहा हो तब भी पासपोर्ट मिल सकता है। जिस आपराधिक अदालत में मामला लंबित है उससे लिखित अनुमति लीजिए, आवेदन के साथ लगाइए, और साथ में सादे काग़ज़ पर लिखकर दीजिए कि अदालत बुलाएगी तो हाज़िर होंगे। सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज हुई है और जाँच चल रही है, तो विदेश मंत्रालय की अपनी हिदायत के मुताबिक़ यह शर्त लगती ही नहीं।
पासपोर्ट हाथ में होना और विदेश जा पाना, क़ानून में दो अलग बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 के फ़ैसले में यही कहा: पासपोर्ट नागरिक दस्तावेज़ है जिसके सहारे वीज़ा माँगा जाता है, और ज़मानत पर चल रहा व्यक्ति सचमुच देश से बाहर जा सकता है या नहीं, यह आपराधिक अदालत तय करती है।
दोनों चीज़ें अलग-अलग माँगी जाती हैं, और आगे यही फ़र्क़ बार-बार लौटकर आएगा।
आवेदन का नाम, जगह और शुल्क
पहली गड़बड़ी नाम पर होती है। पासपोर्ट अधिनियम में "नवीनीकरण" जैसी कोई चीज़ नहीं है: धारा 5 पासपोर्ट जारी करने की बात करती है, और मियाद ख़त्म होने पर जो होता है उसे पासपोर्ट कार्यालय "पुनः जारी" यानी री-इशू कहता है। बॉम्बे हाई कोर्ट के 14 जनवरी 2025 के फ़ैसले में पुणे के पासपोर्ट कार्यालय की चिट्ठी दर्ज है: नवीनीकरण अब होता ही नहीं, सारे मौजूदा पासपोर्ट पुनः जारी किए जाते हैं।
आवेदन passportindia.gov.in पर होता है: पंजीकरण, फ़ॉर्म, शुल्क, फिर पासपोर्ट सेवा केंद्र या डाकघर सेवा केंद्र में मुलाक़ात का समय। फ़ॉर्म के स्तंभ 7 में लंबित आपराधिक मामले की जानकारी देनी होती है। विदेश मंत्रालय की निर्देश पुस्तिका उसी स्तंभ पर लिखती है कि मुक़दमा लंबित हो तो आवेदन हो सकता है, बशर्ते अदालत की लिखित अनुमति संलग्न हो, और यह भी कि आम तौर पर एक साल की सीमित वैधता वाला पासपोर्ट जारी होता है।
शुल्क 20 जून 2026 की अधिसूचना सा.का.नि. 516(अ) से तय होता है, जो 1 जुलाई 2026 से लागू हुई और जिसने पासपोर्ट नियम 1980 की पूरी अनुसूची IV बदल दी। 18 साल या उससे ऊपर के आवेदक के लिए 36 पन्नों की नई या पुनः जारी किताब का सामान्य शुल्क 2,500 रुपये है, 60 पन्नों की 3,500, और खोए या ख़राब पासपोर्ट के बदले 36 पन्नों की 5,000। अनुसूची में वैधता के हिसाब से कोई अलग दर नहीं है, इसलिए एक साल की किताब पर भी पूरा शुल्क लगता है, और अगली बार फिर लगेगा।
तत्काल का रास्ता इस श्रेणी में बंद है। पोर्टल पर तत्काल के लिए अपात्र श्रेणियों की जो सूची चढ़ी है, उसमें साफ़ लिखा है: वे आवेदक जिन पर धारा 6(2)(e) या 6(2)(f) लागू होती है। उसी सूची में प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट वाले आवेदक भी हैं।
धारा 6(2)(f) का पाठ और उसका दायरा
पूरा वाक्य इतना ही है: "कि आवेदक द्वारा कथित रूप से किए गए किसी अपराध के संबंध में कार्यवाही भारत की किसी आपराधिक अदालत के समक्ष लंबित है।"
यह धारा 6 की उपधारा (2) के नौ आधारों में छठा है, और उपधारा की शुरुआत का वाक्य उतना ही अहम है: पासपोर्ट अधिकारी इन्हीं में से किसी एक या अधिक आधार पर पासपोर्ट देने से इनकार करेगा, "और किसी अन्य आधार पर नहीं"। सूची बंद है। खंड (e) दोषसिद्धि की बात करता है: आवेदन से ठीक पहले के पाँच साल में नैतिक अधमता वाले किसी अपराध में भारत की अदालत से सज़ा हुई हो और वह दो साल से कम न हो। खंड (g) तब लगता है जब किसी अदालत ने सम्मन, वारंट या देश से बाहर जाने पर रोक का आदेश दिया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ में इन दोनों के बीच की रेखा खींची। फ़ैसले में लिखा है कि धारा 6(2)(f) "कथित रूप से किए गए अपराध" की कार्यवाही पर लक्षित है, यानी दोषसिद्धि से पहले के चरण पर; दोषसिद्धि के बाद मामला, अगर कहीं जाता है, तो धारा 6(2)(e) में जाता है, जिसकी कसौटी और भाषा अलग हैं।
जो पासपोर्ट पहले से आपके पास है, उसके लिए इसी बात का जोड़ धारा 10(3)(e) है। बुनियाद 1967 की है: सतवंत सिंह साहनी बनाम डी. रामरत्नम में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से कहा कि विदेश जाने का हक़ निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है और उससे वंचित करने का रास्ता अनुच्छेद 21 की प्रक्रिया ही है। मनेका गांधी बनाम भारत संघ ने उसे आगे बढ़ाया।
25 अगस्त 1993 की अधिसूचना और उसका वचन-पत्र
छूट का पूरा ढाँचा एक पन्ने की अधिसूचना में है। सा.का.नि. 570(अ), 25 अगस्त 1993, धारा 22 के खंड (क) के तहत जारी हुई और उसने 14 अप्रैल 1976 की सा.का.नि. 298(अ) की जगह ली। वह उन नागरिकों को धारा 6(2)(f) से छूट देती है जिनके ख़िलाफ़ आपराधिक अदालत में कार्यवाही लंबित है और जो उसी अदालत का, भारत से प्रस्थान की अनुमति वाला आदेश पेश करते हैं। छूट चार शर्तों के साथ आती है।

पहली शर्त अवधि की है, और उसकी चार सूरतें हैं। आदेश में पासपोर्ट की अवधि लिखी हो, तो पासपोर्ट उतने ही की। आदेश में न पासपोर्ट की अवधि लिखी हो न यात्रा की, तो एक साल। आदेश एक साल से कम की यात्रा की इजाज़त दे पर वैधता न बताए, तब भी एक साल। और एक साल से ज़्यादा की यात्रा की इजाज़त दे पर वैधता न बताए, तो पासपोर्ट उतने ही समय का जितनी यात्रा की इजाज़त है।
दूसरी शर्त कहती है कि इनमें से कुछ सूरतों में बना पासपोर्ट एक-एक साल करके बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते आवेदक ने मंज़ूर अवधि में विदेश यात्रा न की हो और बीच में आदेश रद्द या संशोधित न हुआ हो। यहाँ अधिसूचना की दो सरकारी प्रतियाँ आपस में नहीं मिलतीं: बॉम्बे हाई कोर्ट के 14 जनवरी 2025 के फ़ैसले में छपे पाठ में यह शर्त उपखंड (क)(i) और (क)(iii) पर लागू होती है, और मद्रास हाई कोर्ट की तीन जजों की पीठ के 9 फ़रवरी 2026 के फ़ैसले में छपे पाठ में (क)(ii) और (क)(iii) पर। तीसरी शर्त अलग से कहती है कि (क)(i) वाला पासपोर्ट सिर्फ़ अदालत के नए आदेश पर आगे बढ़ेगा। यह फ़र्क़ यहाँ जैसा है वैसा दर्ज किया जा रहा है।
चौथी शर्त वचन-पत्र की है, और उसका सादे काग़ज़ वाला प्रारूप पासपोर्ट सेवा पोर्टल पर पड़ा है। उसमें नाम, जन्मतिथि, माता-पिता का नाम, मौजूदा पता और फ़ाइल या एआरएन नंबर भरना होता है, और फिर हर लंबित मुक़दमे का ब्योरा: मामले की संख्या, अदालत का नाम, थाने और जाँच अधिकारी का विवरण, पिछली और अगली पेशी की तारीख़। एक से ज़्यादा मुक़दमे हों तो सबका, ज़रूरत पड़े तो अलग काग़ज़ लगाकर। इसके बाद तीन वाक्य: कि अदालत बुलाएगी तो वैधता के दौरान किसी भी समय हाज़िर होंगे; कि ग़लत जानकारी देना या अहम जानकारी छिपाना अधिनियम के तहत अपराध है; और कि दी गई जानकारी सही है।
अवधि छोटी रखने का अधिकार अधिनियम में पहले से है। धारा 7 का परंतुक कहता है कि पासपोर्ट अधिकारी निर्धारित अवधि से कम के लिए भी पासपोर्ट दे सकता है, पर कारण लिखित में बताने होंगे; धारा 8 उस छोटी अवधि को बढ़ाने का रास्ता देती है, और नियम 12 के मुताबिक़ निर्धारित अवधि दस साल है।
अदालत में अर्ज़ी: जगह, प्रारूप और समय-सीमा
अर्ज़ी उसी अदालत में जाती है जहाँ मुक़दमा लंबित है। जवाहर राजन के मामले में वह मदुरै की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत संख्या एक थी, पिलाजी जाधवराव के मामले में पुणे के सत्र न्यायाधीश। महेश कुमार अग्रवाल को दो जगह जाना पड़ा, राँची की एनआईए अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट, क्योंकि दो मुक़दमे दो अदालतों में थे।

अर्ज़ी में क्या माँगा गया है, यह पासपोर्ट की अवधि पर सीधे असर डालता है: आदेश में पासपोर्ट की वैधता लिखवाना और विदेश यात्रा की अवधि लिखवाना, दोनों के नतीजे अलग हैं, और कुछ भी न लिखा हो तो पासपोर्ट एक साल का बनता है।
अदालतें कितने दिन लेती हैं, इस पर हाई कोर्टों ने ख़ुद समय बाँधे हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 14 जनवरी 2025 को कहा कि अर्ज़ी दाख़िल होने के दस दिन में आपराधिक अदालत उस पर फ़ैसला करे; भीमेश नरेंद्र मेहता के मामले में उसी अदालत ने कहा था कि अर्ज़ी एक हफ़्ते में दाख़िल हो और आदेश दो हफ़्ते में। मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 26 अगस्त 2025 को कहा कि विविध याचिका दर्ज होने के तीन हफ़्ते में निपटे, और विचारण अदालत ध्यान रखे कि विदेश जाने का हक़ बुनियादी हक़ है और असाधारण परिस्थितियों के बिना राहत से इनकार न किया जाए। उसी आदेश में यह भी है कि अदालत चाहे तो आवेदक से विशेष वकालतनामे पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 228, यानी पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 205, के तहत अर्ज़ी दिलवा सकती है, ताकि उसकी ग़ैरहाज़िरी से मुक़दमा न रुके।
शर्तें क्या लग सकती हैं, इसका ठोस उदाहरण महेश कुमार अग्रवाल के फ़ैसले में है। राँची की एनआईए अदालत ने 10 जुलाई 2023 को पासपोर्ट सिर्फ़ नवीनीकरण के सीमित उद्देश्य से सौंपने को कहा, इस शर्त पर कि आवेदक 50,000 रुपये का क्षतिपूर्ति बंधपत्र और उतनी ही रक़म की दो ज़मानतें दे। एक से ज़्यादा मुक़दमे हों तो हर अदालत से अनुमति चाहिए, यह विदेश मंत्रालय के 10 अक्टूबर 2019 के कार्यालय ज्ञापन की हिदायत संख्या नौ में लिखा है।
दो अलग रुख़ और उनके बीच का फ़र्क़
पहला रुख़ यह है कि एफ़आईआर के स्तर पर रोक बनती ही नहीं, और यह सिर्फ़ अदालती व्याख्या नहीं, सरकार की अपनी लिखित हिदायत है। 10 अक्टूबर 2019 के ज्ञापन की हिदायत संख्या छह कहती है कि महज़ एफ़आईआर दर्ज होना और जाँच के अधीन मामले धारा 6(2)(f) के दायरे में नहीं आते, और कार्यवाही तभी लंबित मानी जाएगी जब अदालत ने मामले का संज्ञान ले लिया हो। यह ज्ञापन मद्रास हाई कोर्ट के 9 फ़रवरी 2026 के फ़ैसले में पूरा उद्धृत है।
केरल हाई कोर्ट यही कहता रहा है। मुहम्मद बनाम भारत संघ में उसने कहा कि "लंबित आपराधिक कार्यवाही" में महज़ एफ़आईआर दर्ज होना शामिल नहीं है, इसलिए न धारा 6(2)(f) लागू होती है न 10(3)(e)। जयन वी.एम. के मामले में उसी अदालत ने जोड़ा कि उसे न बताना अहम जानकारी छिपाना भी नहीं है, और पासपोर्ट अधिकारी को गंभीर अपराधों और पारिवारिक विवादों में फ़र्क़ करना चाहिए। सजेना सलाम के मामले में 23 सितंबर 2021 को इसी आधार पर दो कारण-बताओ नोटिस रद्द हुए।
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने 1 सितंबर 2026 के आदेश में यही दोहराया। उस याचिका में एक ट्रांस महिला का पासपोर्ट पुनः जारी होना अटका था; याचिका के मुताबिक़ उनके ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर कृषि क़र्ज़ माफ़ी के एक प्रदर्शन से जुड़ी थी, और सरकारी वकील ने बताया कि वह जाँच के अधीन है। अदालत ने कहा कि महज़ एफ़आईआर का लंबित होना आवेदन पर विचार में बाधा नहीं बन सकता, और पासपोर्ट अधिकारी से चार हफ़्ते में फ़ैसला करने को कहा, आपराधिक अदालत की अनुमति पर ज़ोर दिए बिना। विदेश जाने के लिए अनुमति फिर भी उसी अदालत से लेनी होगी। आरोप अभी आरोप हैं।
दूसरा रुख़ यह है कि पुनः जारी करना भी नया आवेदन है, इसलिए वहाँ भी अदालत की मंज़ूरी चाहिए। बॉम्बे हाई कोर्ट ने साइरस केकी बलसारा के मामले में 8 अप्रैल 2024 को कहा कि "नवीनीकरण" शब्द ही ग़लत है, क्योंकि अधिनियम और नियम पुनः जारी करने का प्रावधान करते हैं; 14 जनवरी 2025 को उसी अदालत ने पिलाजी जाधवराव की याचिका में यही दोहराया। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट कदर वल्ली शेख़ के फ़ैसले के पैरा 103 में सात निष्कर्ष गिनाता है; पहला यह कि धारा 5 के "जारी करना" में नवीनीकरण भी शामिल है, दूसरा यह कि धारा 6(2) नवीनीकरण पर भी लागू होती है।
इसके उलट तेलंगाना हाई कोर्ट ने कई फ़ैसलों में कहा है कि लंबित आपराधिक मामले के आधार पर नवीनीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता, और नारिगे रवींद्रनाथ के मामले में यह भी कि धारा 6(2)(e) नया पासपोर्ट जारी करने पर लागू होती है, नवीनीकरण पर नहीं। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 20 जनवरी 2025 को लिखा कि वह तेलंगाना हाई कोर्ट के उस रुख़ से सहमत नहीं है।
टकराव एक ही हाई कोर्ट के भीतर भी था। मद्रास हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने 2 जून 2023 को कहा था कि पुनः जारी करने के लिए अदालत की पूर्व अनुमति पर ज़ोर न दिया जाए, और दूसरी खंडपीठ ने 26 अगस्त 2025 को कहा कि वह अनिवार्य है। एकल न्यायाधीश ने मामला बड़ी पीठ को भेजा, और 9 फ़रवरी 2026 को तीन जजों ने जवाब दिया कि पुनः जारी करने को पासपोर्ट अधिकारी नए पासपोर्ट जैसा ही मानेगा। उसी पीठ ने जोड़ा कि एफ़आईआर से संज्ञान तक का हिस्सा असल धूसर इलाक़ा है, जहाँ जाँच अधिकारी को मामले की प्रकृति और जाँच का चरण बताते हुए क्लीयरेंस देनी होगी, और पासपोर्ट अधिकारी उसी रिपोर्ट पर तर्कयुक्त आदेश से फ़ैसला करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल को सीधे तय नहीं किया है। 19 दिसंबर 2025 के फ़ैसले में उसने इतना कहा कि 1993 की अधिसूचना धारा 6(2)(f) से आगे कोई नई रोक नहीं बनाती, और वह यह भी नहीं कहती कि पासपोर्ट जारी या पुनः जारी होने की पूर्व-शर्त के तौर पर आपराधिक अदालत हर मामले में प्रस्थान की सामान्य अनुमति दे। दोनों रुख़ों में फ़र्क़ है और ऐसा कोई फ़ैसला अभी नहीं है जो हर हाई कोर्ट पर बाध्यकारी हो।
पुलिस सत्यापन, प्रतिकूल रिपोर्ट और अपील
पुलिस सत्यापन के तीन ही तरीक़े हैं: पासपोर्ट जारी होने से पहले, जारी होने के बाद, या बिल्कुल नहीं। नए पासपोर्ट में ज़्यादातर मामलों में पहले वाला होता है। पुनः जारी करने में, कार्यालय के रिकॉर्ड के हिसाब से, या तो सत्यापन होता ही नहीं या बाद में होता है, सिवाय पुराना पासपोर्ट खो जाने या नाम पूरी तरह बदलने वाले मामलों के। निर्देश पुस्तिका के मुताबिक़ मियाद ख़त्म होने के तीन साल बाद तक बिना नए सत्यापन के पुनः जारी हो सकता है, बशर्ते पिछले पासपोर्ट पर पुलिस रिपोर्ट साफ़ रही हो और सिस्टम में कोई प्रतिकूल प्रविष्टि न हो।
आपके मामले में यह छूट काम नहीं आएगी। 10 अक्टूबर 2019 के ज्ञापन की हिदायत संख्या तीन कहती है कि सा.का.नि. 570(अ) के साथ आए हर आवेदन में सत्यापन पहले ही अनिवार्य है, ताकि वचन-पत्र को पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में दर्ज मुक़दमों से मिलाया जा सके; ऐसे आवेदन तत्काल में स्वीकार नहीं होंगे, और उन्हें बाद-सत्यापन या बिना-सत्यापन श्रेणी में डालने के लिए लिखित औचित्य और मंज़ूरी दर्ज करनी होगी।

प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद का पूरा क्रम उसी ज्ञापन में है। पहली रिपोर्ट प्रतिकूल हो तो दूसरा सत्यापन कराया जाएगा, और उसके साथ विस्तृत पत्र भेजा जाएगा जिसमें लंबित मुक़दमों और उनकी मौजूदा स्थिति पर स्पष्टीकरण माँगा जाएगा। पासपोर्ट अधिकारी चाहे तो पुलिस से गोपनीय जाँच करा सकता है या दूसरे सरकारी विभागों से पुष्टि माँग सकता है। दूसरी रिपोर्ट भी प्रतिकूल आए तो देखा जाएगा कि उसका ब्योरा वचन-पत्र से मिलता है या नहीं। मिलता हो तो अदालत की दी हुई अनापत्ति प्रतिकूल रिपोर्ट पर भारी पड़ेगी, और पासपोर्ट अधिकारी की लिखित मंज़ूरी से प्रतिकूल रिपोर्ट को दरकिनार किया जा सकता है। न मिलता हो तो आवेदक को नोटिस जाएगा और संशोधित अनापत्ति माँगी जाएगी।
उल्टी तरफ़ का ख़तरा भी उसी ज्ञापन में है: वचन-पत्र अधूरा या भ्रामक हो और दूसरे मुक़दमे छिपाए गए हों, तो कारण-बताओ नोटिस के बाद धारा 12 के तहत कार्रवाई होगी। पासपोर्ट बन जाने के बाद यह बात सामने आए, तो धारा 10(3)(b) के तहत पासपोर्ट इंपाउंड या रद्द हो सकता है।
इनकार अगर हो, तो वह लिखित आदेश से होगा: धारा 5(3) पासपोर्ट अधिकारी को कारणों का संक्षिप्त लिखित विवरण दर्ज करने और माँगने पर प्रति देने को कहती है। उसके बाद धारा 11 की अपील है, जो नियम 14 के मुताबिक़ विदेश मंत्रालय के मुख्य पासपोर्ट अधिकारी, नई दिल्ली के पास जाती है और आदेश की जानकारी मिलने से तीस दिन के भीतर दाख़िल होनी चाहिए। नियम 15 अर्ज़ी के साथ पच्चीस रुपये की फ़ीस रखता है, और नियम 16 कहता है कि अपीलकर्ता को अपनी बात रखने का उचित मौक़ा दिए बिना अपील का निपटारा नहीं होगा। धारा 11(6) के मुताबिक़ उसका आदेश अंतिम है।
देर की शिकायत के तीन रास्ते
समय-सीमाएँ विदेश मंत्रालय के नागरिक चार्टर में लिखी हैं। नया पासपोर्ट: तीस कार्य दिवस तक, पुलिस सत्यापन में लगा समय इसमें शामिल नहीं। पुनः जारी: जहाँ पहले सत्यापन की ज़रूरत नहीं वहाँ सात कार्य दिवस तक, और जहाँ सत्यापन ज़रूरी है वहाँ तीस तक, सत्यापन का समय अलग। तत्काल: तीन कार्य दिवस तक। चार्टर यह भी जोड़ता है कि ये सभी अवधियाँ पूरे दस्तावेज़ मिलने की तारीख़ से गिनी जाती हैं, और सेवा के मानकों का पालन न होने पर शिकायत का रास्ता खुला है।
इनसे ज़्यादा देर हो जाए तो चार्टर तीन रास्ते बताता है: केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली की वेबसाइट pgportal.gov.in, पासपोर्ट सेवा पोर्टल का अपना शिकायत पन्ना, और टोल-फ़्री नंबर 1800-258-1800।
चौथा रास्ता चिट्ठी का है, और पता चार्टर में ही दर्ज है: सहायक पासपोर्ट अधिकारी (जनशिकायत), लोक शिकायत प्रकोष्ठ, कमरा संख्या 24, सीपीवी प्रभाग, विदेश मंत्रालय, पटियाला हाउस एनेक्सी, तिलक मार्ग, नई दिल्ली 110001। फ़ोन 011-23384519 और 011-23384497, ईमेल [email protected]।
विदेश में रहते हुए मुक़दमा दर्ज होने पर
अधिनियम की धारा 1(2) कहती है कि यह क़ानून भारत के बाहर रहने वाले भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है। विदेश में बैठे व्यक्ति के लिए पासपोर्ट सेवाएँ नज़दीकी भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास देखता है, और 2026 की अनुसूची में विदेश की दरें डॉलर में हैं: 36 पन्नों की किताब के लिए 125 डॉलर।
पासपोर्ट पहले से आपके पास है और पीछे मुक़दमा दर्ज हो जाए, तो रास्ता धारा 10 से होकर जाता है। उपधारा (3) का खंड (e) लंबित कार्यवाही पर पासपोर्ट इंपाउंड या रद्द करने की शक्ति देता है, और खंड (h) अदालत के सम्मन, वारंट या देश से बाहर जाने पर रोक के आदेश वाली सूरत के लिए है। धारा 10(5) कारण लिखने और माँगने पर प्रति देने को बाध्य करती है, और उसके बाद वही तीस दिन वाली अपील खुलती है।
यह शक्ति किसके पास है, इस पर सुप्रीम कोर्ट का 24 जनवरी 2008 का फ़ैसला साफ़ है। सुरेश नंदा बनाम सीबीआई में अदालत ने कहा कि पुलिस दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के तहत पासपोर्ट ज़ब्त तो कर सकती है, पर उसे अपने पास रोककर इंपाउंड नहीं कर सकती; वह अधिकार सिर्फ़ पासपोर्ट अधिकारी के पास है। फ़ैसले में यह भी है कि पुलिस को ज़ब्त पासपोर्ट एक चिट्ठी के साथ पासपोर्ट अधिकारी को भेजना होगा जिसमें बताया जाए कि वह धारा 10(3) के किस कारण से इंपाउंड होने लायक़ है।
महेश कुमार अग्रवाल के मामले में यही सारी चीज़ें एक साथ दिखती हैं। पासपोर्ट अदालत में जमा था, मियाद जमा रहते हुए ख़त्म हुई, दोनों अदालतों ने नवीनीकरण की इजाज़त दी, और पासपोर्ट कार्यालय ने फिर भी इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के दोनों आदेश रद्द किए और पूरे दस साल का पासपोर्ट चार हफ़्ते में देने का निर्देश दिया, इस शर्त के साथ कि वह दोनों अदालतों के आदेशों के अधीन रहेगा।
पासपोर्ट में लिंग का ख़ाना
29 अप्रैल 2024 को मद्रास हाई कोर्ट में एक याचिका का निपटारा हुआ जो 2019 से लंबित थी। शिवकुमार टी.डी. ने पासपोर्ट नियम 1980 की तालिका 3 की प्रविष्टि 39 और तालिका 2 के खंड ई की प्रविष्टि 7 को अनुच्छेद 21 के ख़िलाफ़ बताकर चुनौती दी थी। शिकायत यह थी कि पुरुष से महिला या महिला से पुरुष लिंग बदलवाने पर पासपोर्ट कार्यालय लिंग-परिवर्तन सर्जरी का प्रमाणपत्र माँगते हैं, जबकि फ़ॉर्म-4 ऐसा कोई प्रमाणपत्र नहीं माँगता।
आदेश में दर्ज है कि ट्रांसजेंडर आवेदकों के मामले में सरकार नीति पहले ही बदल चुकी थी। अदालत ने केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता से निर्देश लेने को कहा, और उन्होंने अगली सुनवाई में बताया कि पासपोर्ट में लिंग बदलने के लिए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर लागू नीति उन लोगों पर भी लागू होगी जो पुरुष से महिला या महिला से पुरुष लिंग बदलते हैं, और यह कि ऐसे मामलों में भी पासपोर्ट नियमों के तहत सर्जरी का प्रमाणपत्र पेश करना ज़रूरी नहीं होगा। इसी बयान पर याचिकाकर्ता की शिकायत दूर मानी गई और याचिका का निपटारा हो गया।
पासपोर्ट सेवा पोर्टल पर पड़ी निर्देश पुस्तिका अब भी दूसरी बात कहती है। पुनः जारी करने की तालिका में "लिंग में परिवर्तन" वाले प्रकरण के सामने तीन दस्तावेज़ लिखे हैं: दस्तावेज़ 5 यानी पुराना पासपोर्ट, दस्तावेज़ 34 यानी लिंग परिवर्तन का शपथ-पत्र, और दस्तावेज़ 35, जिसका विवरण पुस्तिका में यह है: जिस अस्पताल में ऑपरेशन सफलतापूर्वक हुआ, उसका प्रमाणपत्र। उसी तालिका में यह भी है कि लिंग में परिवर्तन के लिए तत्काल के तहत आवेदन नहीं हो सकता। अदालत में दिया गया बयान और पुस्तिका में छपी सूची, दोनों सरकारी हैं और आपस में नहीं मिलते; यह फ़र्क़ यहाँ दर्ज भर किया जा रहा है।
काग़ज़ों का दूसरा सिरा ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 में है। धारा 4(2) कहती है कि ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता पाए व्यक्ति को अपनी स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान का अधिकार है। धारा 5 के तहत अर्ज़ी ज़िलाधिकारी के पास जाती है और धारा 6 के तहत वह पहचान प्रमाणपत्र जारी करते हैं; उसी धारा की उपधारा (2) कहती है कि उस प्रमाणपत्र के अनुसार व्यक्ति का लिंग सभी सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज होगा। धारा 7 सर्जरी के बाद संशोधित प्रमाणपत्र का रास्ता देती है, जिसके लिए उस संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक या मुख्य चिकित्सा अधिकारी का प्रमाणपत्र लगता है, और धारा 7(3) के मुताबिक़ यह प्रमाणपत्र रखने वाला व्यक्ति पहचान से जुड़े सभी सरकारी दस्तावेज़ों में अपना पहला नाम बदलवाने का हक़दार है।
स्रोतपासपोर्ट अधिनियम 1967 का पूरा पाठ, पासपोर्ट सेवा पोर्टल पर: धारा 5, 6, 7, 8, 10, 11 और 22, पासपोर्ट नियम 1980, विदेश मंत्रालय की प्रति: नियम 12 (अवधि), नियम 14 (अपीलीय अधिकारी और तीस दिन), नियम 15 (अपील शुल्क) और नियम 16, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग II खंड 3(i), संख्या 465, 25 जून 2026: विदेश मंत्रालय की अधिसूचना सा.का.नि. 516(अ), 20 जून 2026, पासपोर्ट (संशोधन) नियम 2026, अनुसूची IV का प्रतिस्थापन, 1 जुलाई 2026 से प्रभावी, पासपोर्ट सेवा पोर्टल पर सा.का.नि. 570(अ), 25 अगस्त 1993 के प्रावधानों के तहत दिए जाने वाले वचन-पत्र का आधिकारिक प्रारूप, पासपोर्ट आवेदन पत्र निर्देश पुस्तिका, संस्करण 3.0: पुलिस सत्यापन के तरीक़े, स्तंभ 7 की हिदायत, तालिका 2 का प्रकरण 7 और तालिका 3 के दस्तावेज़ 5, 34 और 35, पासपोर्ट सेवा पोर्टल: तत्काल योजना के लिए अपात्र श्रेणियों की सूची, जिसमें धारा 6(2)(e) या 6(2)(f) वाले आवेदक शामिल हैं, विदेश मंत्रालय का नागरिक चार्टर: पासपोर्ट सेवाओं की समय-सीमाएँ और शिकायत निवारण के रास्ते, महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ, 2025 INSC 1476, सुप्रीम कोर्ट, 19 दिसंबर 2025 (विक्रम नाथ और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह), जवाहर राजन बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, WP(MD) 26547/2025, मद्रास हाई कोर्ट की तीन जजों की पीठ, 9 फ़रवरी 2026; इसी फ़ैसले में 10 अक्टूबर 2019 का कार्यालय ज्ञापन पूरा उद्धृत है, पिलाजी सुरसिंह जाधवराव बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय पुणे, WP 14116/2024, 2025:BHC-AS:4837-DB, बॉम्बे हाई कोर्ट, 14 जनवरी 2025; सा.का.नि. 570(अ) का पाठ इसी में है, अंगजाला रामा लक्ष्मण राव बनाम भारत संघ, रिट अपील 803/2023, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट, 20 जनवरी 2025; कदर वल्ली शेख़ (2023 SCC OnLine AP 406) का पैरा 103 और तेलंगाना हाई कोर्ट से असहमति, सजेना सलाम बनाम भारत संघ, WP(C) 19465/2021, केरल हाई कोर्ट, 23 सितंबर 2021 (बेचु कुरियन थॉमस): मुहम्मद (2018 (4) KHC 945) और जयन वी.एम. (2018 KHC 823) का हवाला, शिवानी बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, WP(MD) 25198/2026, मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ, 1 सितंबर 2026 (एल. विक्टोरिया गौरी), शिवकुमार टी.डी. बनाम भारत संघ, WP 31705/2019, मद्रास हाई कोर्ट, 29 अप्रैल 2024: लिंग बदलने पर सर्जरी प्रमाणपत्र को लेकर केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता का बयान, सुरेश नंदा बनाम सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, 24 जनवरी 2008: पुलिस पासपोर्ट ज़ब्त कर सकती है, इंपाउंड नहीं, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 का राजपत्र पाठ: धारा 4, 5, 6 और 7