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37,500 करोड़ की योजना पर कोयला मंत्रालय ने खंडन जारी किया, और सबूत में जो दो नाम गिनाए वे दोनों सरकारी हैं

ख़बरें छपी थीं कि सतही कोयला गैसीकरण की योजना में एक भी आवेदन नहीं आया। मंत्रालय ने कहा कि यह जल्दबाज़ी है, आवेदन आए हैं, और गिनाए तालचर फ़र्टिलाइज़र्स और एनटीपीसी। पहली खिड़की 7 सितंबर को बंद हो रही है।

तालचर, अंगुल, ओडिशा में कोल गैसीफ़िकेशन एवं फ़र्टिलाइज़र कॉम्प्लेक्स के लिए आरसीएफ़, गेल, सीआईएल और एफ़सीआईएल के बीच संयुक्त उद्यम समझौते पर हस्ताक्षर के मौक़े पर तत्कालीन रसायन एवं उर्वरक मंत्री अनंतकुमार
तस्वीर: रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय GODL-India

सरकार आमतौर पर तब बोलती है जब कुछ हुआ हो। शनिवार को कोयला मंत्रालय इसलिए बोला क्योंकि उसके हिसाब से कुछ ग़लत छप गया था।

अख़बारों के एक हिस्से में यह छपा था कि सतही कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को प्रोत्साहन देने वाली 37,500 करोड़ रुपये की योजना में एक भी आवेदन नहीं आया।

मंत्रालय ने कहा कि यह निष्कर्ष समय से पहले है, क्योंकि आवेदन की पहली अवधि 7 सितंबर तक खुली है और उससे पहले गिनती करना ठीक नहीं।

फिर उसने दो नाम गिनाए। तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड और एनटीपीसी लिमिटेड ने ऑनलाइन पोर्टल से अपने आवेदन जमा कर दिए हैं।

दोनों सरकारी कंपनियाँ हैं।

योजना है क्या

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 13 मई 2026 को इसे मंज़ूरी दी। कुल वित्तीय परिव्यय 37,500 करोड़ रुपये है।

काम यह है कि देश का कोयला और लिग्नाइट जलाने के बजाय गैस में बदला जाए, और उस गैस से ऊँचे मूल्य वाले उत्पाद बनाए जाएँ। विज्ञप्ति में चार नाम गिनाए गए हैं: सिनगैस, मेथनॉल, अमोनिया और यूरिया।

आख़िरी दो नाम इस पूरी कहानी की जड़ हैं। अमोनिया और यूरिया उर्वरक हैं, और भारत उन्हें बड़ी मात्रा में आयात करता है। जो गैस उन्हें बनाने के लिए चाहिए, वह भी आयात होती है।

इसलिए योजना का घोषित मक़सद आयातित कच्चे माल पर निर्भरता घटाना और घरेलू संसाधनों का ज़्यादा इस्तेमाल है।

सरकार का अनुमान है कि इससे क़रीब 25 परियोजनाओं में 2.5 लाख करोड़ से 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आएगा और लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार बनेंगे। बड़ा लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन गैसीकरण क्षमता का है।

तारीख़ों की क़तार

मंत्रालय ने अपने बचाव में जो कालक्रम रखा, वह अपने-आप में जानकारी है।

13 मई को मंज़ूरी मिली। इसके बाद संभावित विकासकर्ताओं को खींचने के लिए रोड शो हुए: 28 मई को नई दिल्ली में, 11 जून को हैदराबाद में और 18 जून को मुंबई में। इनमें राज्य सरकारों, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं, निवेशकों और वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधि आए। कोयला और खान मंत्री तथा वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

7 जुलाई को प्रस्ताव के लिए अनुरोध जारी हुआ और आवेदन का ऑनलाइन पोर्टल खुला।

20 जुलाई को पूर्व-आवेदन सम्मेलन हुआ, जिसमें संभावित आवेदकों ने योजना के प्रावधानों, पात्रता और आवेदन प्रक्रिया पर सवाल पूछे।

और 7 सितंबर को पहली खिड़की बंद हो जाएगी।

मंज़ूरी से खिड़की बंद होने तक क़रीब चार महीने। तीन शहरों में रोड शो। एक सम्मेलन। और उस पूरी अवधि के बाद जो दो नाम सार्वजनिक रूप से गिनाए जा सके, वे दोनों सरकारी हैं।

जो एक साल पहले हो चुका है

इस ख़बर में जो हिस्सा कहीं नहीं आता, वह यह है कि यह पहली ऐसी योजना नहीं है।

24 जनवरी 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोयला गैसीकरण परियोजनाओं के लिए 8,500 करोड़ रुपये की एक प्रोत्साहन योजना मंज़ूर की थी।

उसका ढाँचा तीन श्रेणियों का था, और वे श्रेणियाँ बताती हैं कि सरकार तब क्या सोच रही थी।

पहली श्रेणी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए थी, जिसमें 4,050 करोड़ रुपये रखे गए। इसमें तीन तक परियोजनाओं को सहायता मिलनी थी, हर एक को 1,350 करोड़ रुपये या पूँजीगत ख़र्च का 15 फ़ीसदी, जो कम हो।

दूसरी श्रेणी सरकारी और निजी, दोनों के लिए थी, जिसमें 3,850 करोड़ रुपये रखे गए और हर परियोजना को 1,000 करोड़ रुपये या पूँजीगत ख़र्च का 15 फ़ीसदी।

तीसरी श्रेणी 600 करोड़ रुपये की थी, प्रदर्शन परियोजनाओं और स्वदेशी तकनीक पर आधारित या छोटे पैमाने के संयंत्रों के लिए, हर एक को 100 करोड़ रुपये या 15 फ़ीसदी।

यानी 2024 की योजना ने आधे से कम पैसा सरकारी कंपनियों के लिए अलग रखा था और बाक़ी निजी तथा छोटे खिलाड़ियों के लिए खुला छोड़ा था।

उस योजना का नतीजा यह बताया जाता है कि 6,233 करोड़ रुपये की आठ परियोजनाएँ लागू होने के चरण में हैं।

अब इसकी तुलना नई योजना से कीजिए। 8,500 करोड़ से 37,500 करोड़। चार गुना से ज़्यादा।

मनुगुरु, तेलंगाना में सिंगरेनी की खुली कोयला खदान
तस्वीर: आदित्यमाधव83, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

तालचर का नाम क्यों जाना-पहचाना लगता है

मंत्रालय ने जो पहला नाम गिनाया, वह तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड है।

यह कंपनी नई नहीं है और न ही यह गैसीकरण में नई है। यह ओडिशा के अंगुल ज़िले के तालचर में कोयला गैसीकरण पर आधारित उर्वरक संयंत्र के लिए बना संयुक्त उद्यम है, जिसमें राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फ़र्टिलाइज़र्स, गेल, कोल इंडिया और फ़र्टिलाइज़र कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया की हिस्सेदारी है।

यानी जिस काम के लिए यह योजना बनी है, वह काम तालचर में पहले से हो रहा है। कंपनी उस काम के लिए बनी थी, उसके लिए संयुक्त उद्यम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, और अब वह उसी काम के लिए बनी प्रोत्साहन योजना में आवेदन कर रही है।

दूसरा नाम एनटीपीसी है, देश की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी, जो केंद्र सरकार के अधीन है।

इन दो नामों से यह तो साबित होता है कि आवेदन शून्य नहीं हैं। जो साबित नहीं होता, वह यह है कि निजी उद्योग इस योजना में आ रहा है।

और यही असली सवाल है, क्योंकि सरकारी कंपनी को किसी योजना में लाने के लिए प्रोत्साहन की उतनी ज़रूरत नहीं होती जितनी निजी कंपनी को। सरकारी कंपनी उसी सरकार के अधीन है जो योजना चला रही है।

तालचर की अपनी घड़ी

मंत्रालय ने जिस कंपनी का नाम पहले लिया, उसकी परियोजना का रिकॉर्ड इस योजना के बारे में सबसे ज़्यादा बताता है।

तालचर का संयंत्र प्रतिदिन 2,200 टन अमोनिया और 3,850 टन यूरिया बनाने के लिए बन रहा है। गैसीकरण की तकनीक शेल ईस्टर्न से ली गई, जो अब अमेरिका की एयर प्रोडक्ट्स के पास है।

परियोजना की शून्य तारीख़ 1 अक्टूबर 2019 थी और उससे 57 महीने में, यानी जून 2024 के अंत तक, संयंत्र चालू हो जाना था।

वह नहीं हुआ। सितंबर 2024 का अगला लक्ष्य भी निकल गया।

अब पूरा होने का लक्ष्य दिसंबर 2027 है।

लागत भी उसी रफ़्तार से चली। शुरुआती अनुमान 13,277 करोड़ रुपये था, जो बढ़कर 17,081 करोड़ हुआ, और उसके बाद के आकलनों में 19,000 करोड़ तक पहुँचा।

देरी के कारणों में कोविड है, जिसने दिसंबर 2019 के बाद से मई 2020 तक काम को गंभीर रूप से रोका। पर वह अकेला कारण नहीं है। जुलाई 2024 से कंपनी अपने एक ठेकेदार के बिलों से क्षतिपूर्ति काटने लगी, धीमी प्रगति और देरी के कारण।

आठ साल, तीन लक्ष्य तारीख़ें, और लागत में लगभग छह हज़ार करोड़ की बढ़ोतरी।

यह किसी एक कंपनी की नाकामी की कहानी नहीं है। यह इस बात का पैमाना है कि कोयला गैसीकरण की एक परियोजना खड़ी करने में क्या लगता है। और यही वह पैमाना है जो एक निजी निवेशक 7 सितंबर से पहले अपने सामने रखकर हिसाब लगाता है।

जो पहले से चल रहा है

भारत में कोयला गैसीकरण नया नहीं है, बस बड़ा नहीं है।

पश्चिम बंगाल के डानकुनी में कोल इंडिया की अनुषंगी साउथ ईस्टर्न कोलफ़ील्ड्स का डानकुनी कोल कॉम्प्लेक्स चलता है, जहाँ से बनी सिनगैस कोलकाता के पास औद्योगिक इस्तेमाल के लिए पाइप से भेजी जाती है।

कोल इंडिया ने उसी डानकुनी में देश का पहला कोयले से मेथनॉल बनाने वाला संयंत्र लगाने के लिए वैश्विक निविदा निकाली थी, जिसका निवेश क़रीब छह हज़ार करोड़ रुपये आँका गया।

निजी क्षेत्र में जिंदल स्टील एंड पावर अंगुल में इस्पात बनाने के लिए कोयला गैसीकरण का इस्तेमाल करती है।

यानी तकनीक देश में मौजूद है और चल रही है। जो नहीं है, वह पैमाना है। 2030 तक 10 करोड़ टन का लक्ष्य इन मौजूदा संयंत्रों से कई गुना ऊपर है, और यही वजह है कि सरकार को 37,500 करोड़ रुपये सामने रखने पड़े।

निजी पूँजी हिचकती क्यों है

मंत्रालय ने ख़ुद इसका एक कारण गिनाया है, और वह ईमानदार है।

विज्ञप्ति कहती है कि इन परियोजनाओं के पैमाने और जटिलता को देखते हुए संभावित आवेदकों को पर्याप्त प्रारंभिक काम करना पड़ता है। उसमें पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट बनाना, प्रौद्योगिकी विकल्पों का आकलन, कोयला और दूसरे कच्चे माल की व्यवस्था तय करना, परियोजना की आर्थिक स्थिति आँकना और विस्तृत प्रस्ताव तैयार करना शामिल है।

यह सूची अपने-आप बता देती है कि दो महीने की खिड़की में कोई नई कंपनी कैसे नहीं आ सकती। जिसने पहले से यह काम नहीं किया है, वह 7 सितंबर तक तैयार नहीं होगा।

मंत्रालय ने इसीलिए प्रक्रिया को निरंतर रखा है। एक चरण की खिड़की बंद होते ही अगला चरण अगले दिन से शुरू होगा और दो महीने चलेगा। जो कंपनियाँ पीछे रह जाएँ, वे अगली बार आ सकें।

इसमें एक और बात है जो विज्ञप्ति में नहीं है। कोयला गैसीकरण की अर्थव्यवस्था गैस के दाम पर टिकी है। अगर आयातित प्राकृतिक गैस सस्ती हो, तो कोयले से गैस बनाना महँगा पड़ता है। अगर वह महँगी हो, तो यह रास्ता आकर्षक हो जाता है। एक निजी निवेशक जो पैंतीस साल चलने वाला संयंत्र लगा रहा है, उसे इस पूरी अवधि के दाम का अंदाज़ा लगाना पड़ता है, और यह अंदाज़ा किसी भी सब्सिडी से बड़ा जोखिम है।

पूँजी का पैमाना भी देखिए। सरकार का अपना अनुमान 25 परियोजनाओं में 2.5 से 3 लाख करोड़ के निवेश का है। इसका मतलब हुआ, हर परियोजना औसतन दस से बारह हज़ार करोड़ रुपये की। और उस पर प्रोत्साहन 15 फ़ीसदी के आसपास रहता है, बाक़ी पैसा निवेशक का है।

परावाड़ा, आंध्र प्रदेश में एनटीपीसी का सिंहाद्रि सुपर थर्मल पावर प्लांट
तस्वीर: पुलकित सिन्हा, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0
सिंगरेनी की खुली खदान की एक और परत। भारतीय कोयले में राख की मात्रा गैसीकरण की सबसे बड़ी तकनीकी अड़चन है
तस्वीर: आदित्यमाधव83, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

गैसीकरण है क्या, और यह इतना कठिन क्यों है

कोयले को जलाने और कोयले को गैस में बदलने में फ़र्क़ है।

जलाने में कोयला पूरी ऑक्सीजन के साथ मिलता है और गर्मी निकलती है, जिससे भाप बनती है और टरबाइन चलती है। यह बिजलीघर का काम है।

गैसीकरण में कोयले को सीमित ऑक्सीजन और भाप के साथ ऊँचे तापमान और दबाव पर रखा जाता है। तब वह पूरी तरह जलता नहीं, टूटता है, और जो निकलता है वह मुख्यतः कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होता है। इसी को सिनगैस कहते हैं।

सिनगैस से आगे कई रास्ते खुलते हैं। हाइड्रोजन और नाइट्रोजन मिलाकर अमोनिया बनता है, अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड से यूरिया। मेथनॉल भी इसी रास्ते से आता है।

कठिनाई भारतीय कोयले में है। यहाँ का कोयला राख से भारी होता है, और गैसीकरण के जो संयंत्र दुनिया में चल रहे हैं वे अक्सर कम राख वाले कोयले के लिए बने हैं। इसीलिए मंत्रालय की तीसरी श्रेणी 2024 में स्वदेशी तकनीक के लिए अलग रखी गई थी।

यह भी ध्यान रखने लायक़ है कि गैसीकरण कार्बन का सवाल हल नहीं करता। कोयले का कार्बन कहीं नहीं जाता, वह प्रक्रिया के किसी न किसी सिरे पर निकलता है। इस योजना का तर्क जलवायु का नहीं, आयात का है।

आयात का वह हिसाब जिससे यह सब शुरू होता है

योजना का तर्क समझने के लिए एक और तस्वीर चाहिए।

भारत यूरिया का बड़ा उपभोक्ता है और उसका एक हिस्सा हर साल बाहर से आता है। जो यूरिया यहाँ बनता भी है, वह ज़्यादातर प्राकृतिक गैस से बनता है, और वह गैस भी बड़े पैमाने पर आयातित तरलीकृत रूप में आती है।

इसका मतलब यह हुआ कि उर्वरक सब्सिडी का बिल दो चीज़ों से बँधा है जिन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है: अंतरराष्ट्रीय गैस के दाम और रुपये की क़ीमत।

तालचर जैसा संयंत्र इस जोड़ी को तोड़ने की कोशिश है। कोयला यहीं का है, खदान पास है, और उसकी क़ीमत घरेलू व्यवस्था से तय होती है।

यही वह गणित है जिसकी वजह से यह योजना उर्वरक और ऊर्जा, दोनों मंत्रालयों के काम की है, और यही वजह है कि इसका पहला आवेदक एक उर्वरक कंपनी है, बिजली कंपनी नहीं।

पर इसी गणित का दूसरा सिरा भी है। घरेलू कोयले की क़ीमत सस्ती होने का कारण यह भी है कि उसकी असली लागत का कुछ हिस्सा कहीं और गिना जाता है, जैसे ज़मीन, पानी और उस इलाक़े की हवा। गैसीकरण उस हिसाब को नहीं बदलता।

आगे क्या देखना है

7 सितंबर सोमवार है। उस दिन पहली खिड़की बंद होगी।

उसके बाद जो संख्या आएगी, वही इस बहस को तय करेगी। मंत्रालय का कहना है कि आख़िरी तारीख़ पास आने पर और आवेदक अपने प्रस्ताव अंतिम रूप देकर जमा कर सकते हैं, और यह आम बात है, क्योंकि ऐसी निविदाओं में ज़्यादातर आवेदन आख़िरी दिनों में आते हैं।

देखने लायक़ बात यह होगी कि उन आवेदनों में सरकारी और निजी का अनुपात क्या है। योजना का घोषित मक़सद 25 परियोजनाएँ हैं। सरकारी कंपनियाँ इतनी परियोजनाएँ अकेले नहीं बना सकतीं।

और दूसरी बात 2024 वाली योजना की है। उसकी आठ परियोजनाएँ और 6,233 करोड़ रुपये कहाँ तक पहुँचे, यह नई योजना के भविष्य का सबसे भरोसेमंद संकेत है। एक योजना का आकार चार गुना कर देना आसान है। जो परियोजनाएँ पिछली योजना में शुरू हुईं, उन्हें चालू कर देना उससे कठिन है।

आख़िर में

मंत्रालय की बात अपनी जगह ठीक है। खिड़की बंद होने से पहले यह कहना कि कोई आवेदन नहीं आया, समय से पहले है।

पर खंडन में जो सबूत रखा गया, वह उतना ही बताता है जितना छिपाता है। एक योजना जो निजी निवेश खींचने के लिए बनी हो, उसके बचाव में दो सरकारी कंपनियों के नाम गिनाना अपने-आप में एक सूचना है।

असली गिनती सोमवार शाम को होगी।

स्रोतकोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, आवेदनों पर रिपोर्ट, बिज़नेस स्टैंडर्ड, जनवरी 2024 की 8,500 करोड़ की योजना, कोयला मंत्रालय, 2024 की योजना के दिशानिर्देश, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, तालचर परियोजना की समीक्षा, इक्रा, तालचर फ़र्टिलाइज़र्स की रेटिंग टिप्पणी, अगस्त 2025

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