एआई डेटा सेंटर 2031-32 तक 26,300 मेगावाट माँगेंगे, और भारत की पूरी बची हुई लघु जलविद्युत क्षमता उससे कम है
नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाइक ने 10 सितंबर को कहा कि देश की लगभग 21 गीगावाट लघु जलविद्युत क्षमता में से सिर्फ़ 5.2 गीगावाट इस्तेमाल हो रही है। जिस आकलन से यह 21 गीगावाट निकलती है, वह आईआईटी रुड़की का जुलाई 2016 का डेटाबेस है। इस वित्त वर्ष में 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक इस क्षेत्र में 10.40 मेगावाट जुड़ी, और अगस्त महीने में शून्य।

पहाड़ी नाले का पानी एक पक्की नहर में मोड़ा जाता है, कुछ सौ मीटर आगे ले जाकर नीचे गिराया जाता है, टरबाइन घुमाता है और फिर उसी धारा में लौट जाता है। कोई जलाशय नहीं बनता, कोई गाँव नहीं डूबता। भारत में ऐसी 25 मेगावाट तक की हर परियोजना को लघु जलविद्युत कहा जाता है, और 31 अगस्त 2026 तक देश में इस तरह की कुल 5,181.76 मेगावाट क्षमता खड़ी है।
इसी साल 1 अप्रैल से 31 अगस्त के बीच इस पूरे क्षेत्र में 10.40 मेगावाट जुड़ी।
अगस्त के महीने में शून्य।
गुरुवार को नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाइक ने नई दिल्ली में भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन के पूर्वावलोकन कार्यक्रम में कहा कि देश की आकलित लघु जलविद्युत क्षमता लगभग 21 गीगावाट है, 7,100 से अधिक चिह्नित स्थलों पर फैली हुई, और उसमें से मात्र 5.2 गीगावाट इस्तेमाल हो रही है।
उन्हीं नाइक ने डेढ़ महीने पहले संसद को लिखित उत्तर में बताया था कि 2031-32 तक अकेले कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले डेटा सेंटरों से 26.3 गीगावाट का अतिरिक्त भार आने वाला है। यह देश की पूरी लघु जलविद्युत क्षमता से 5,000 मेगावाट से ज़्यादा है।
7,133 स्थल, 21,133.61 मेगावाट, और चालू 5,181.76
मंत्री ने जो आँकड़े गोल करके रखे, दस्तावेज़ों में वे दशमलव तक दर्ज हैं। पीआईबी के 26 अप्रैल 2026 के पृष्ठभूमि दस्तावेज़ में लघु जलविद्युत की आकलित क्षमता 21,133.61 मेगावाट है और स्थलों की संख्या 7,133। उसी दस्तावेज़ के हिसाब से 2026 की शुरुआत तक लगभग 5,171 मेगावाट, यानी 24.5 फ़ीसदी, इस्तेमाल में आ चुकी थी और 15,960 मेगावाट से ऊपर बची हुई थी। 31 अगस्त 2026 के मंत्रालय के आँकड़े पर वही बचत 15,951.85 मेगावाट बैठती है। यह वह पूरा भंडार है जिसे सरकार अब खोलने की बात कर रही है।
यह 21 गीगावाट का आँकड़ा कहाँ से आता है
मंत्रालय के अपने अवलोकन पृष्ठ पर इसका स्रोत लिखा है। 21,133 मेगावाट और 7,133 स्थलों का आकलन आईआईटी रुड़की के जल एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग ने किया था, जिसे पहले वैकल्पिक जल ऊर्जा केंद्र कहा जाता था, और उसे "जुलाई 2016 के लघु जलविद्युत डेटाबेस" के रूप में संकलित किया गया था। वह पृष्ठ ख़ुद 5 अप्रैल 2023 के बाद नहीं बदला गया है। सितंबर 2026 में मंच से जो संख्या पढ़ी गई, वह दस साल पुराने सर्वेक्षण की है। इन दस सालों में पर्यावरणीय प्रवाह की शर्तें भी बदली हैं और उन स्थलों तक पहुँचने की लागत भी।
'लघु' जलविद्युत की सीमा कहाँ तक है
1989 तक सारी जलविद्युत विद्युत मंत्रालय के पास थी। उस साल 3 मेगावाट तक की परियोजनाएँ नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को सौंपी गईं। नवंबर 1999 में यह सीमा बढ़ाकर 25 मेगावाट कर दी गई, और तभी से भारत में 25 मेगावाट या उससे छोटी हर जलविद्युत परियोजना लघु मानी जाती है। इससे बड़ी हर परियोजना आज भी विद्युत मंत्रालय के अधिकार में है। मंत्रालय ख़ुद लिखता है कि अलग-अलग देशों में यह सीमा अलग है, यानी यह तकनीकी परिभाषा नहीं, प्रशासनिक बँटवारा है। किस मंत्रालय की फ़ाइल में परियोजना जाएगी, यह उसी एक संख्या से तय होता है।
पाँच महीने में 10.40 मेगावाट
मंत्रालय की साल-दर-साल तालिका इस क्षेत्र की ढलान साफ़ दिखाती है। 2014-15 में 251.68 मेगावाट जुड़ी थी, 2015-16 में 218.11। उसके बाद कभी 100 मेगावाट का आँकड़ा मुश्किल से पार हुआ: 2016-17 में 106.38, 2018-19 में 107.34, 2020-21 में 103.65। 2021-22 में 62.09 और 2023-24 में 58.95 पर पहुँचकर यह अपने सबसे नीचे गया। 2024-25 में 97.30 मेगावाट के साथ थोड़ा सुधार दिखा। इस वित्त वर्ष के पहले पाँच महीनों का आँकड़ा 10.40 मेगावाट है। उन्हीं पाँच महीनों में सौर बिजली की 17,779.35 मेगावाट जुड़ी, यानी लगभग 1,700 गुना।
मंत्रालय की अपनी तालिका में एक साल ग़ायब है
उसी तालिका में एक कॉलम नहीं है। शीर्षक 2014-15 से चलते हैं, 2024-25 तक पहुँचते हैं, और फिर सीधे 2026-27 पर कूद जाते हैं। 2025-26, यानी पिछला पूरा वित्त वर्ष, तालिका में कहीं नहीं है। तालिका के अपने कॉलम जोड़ें तो 5,110.94 मेगावाट बनते हैं, जबकि उसी पंक्ति के अंत में कुल 5,181.76 मेगावाट लिखा है। बीच का अंतर 70.82 मेगावाट है, और वही ग़ायब साल का आँकड़ा है। जिस कॉलम का शीर्षक बचा है, उसमें भी तारीख़ छपी है "1st Apr 2026-31st August 2027"।
2,584.60 करोड़ में 1,500 मेगावाट: यह गणित कैसे बैठता है
18 मार्च 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लघु जलविद्युत विकास योजना मंज़ूर की। कुल परिव्यय 2,584.60 करोड़ रुपये, अवधि 2026-27 से 2030-31, लक्ष्य लगभग 1,500 मेगावाट। इसमें से 2,532 करोड़ रुपये परियोजनाओं के लिए रखे गए हैं और 30 करोड़ रुपये क़रीब 200 विस्तृत परियोजना रिपोर्टों के लिए। पूर्वोत्तर राज्यों और अंतरराष्ट्रीय सीमा वाले ज़िलों में केंद्रीय सहायता 3.6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट या परियोजना लागत का 30 फ़ीसदी, जो कम हो; बाक़ी जगह 2.4 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट या 20 फ़ीसदी।
प्रति परियोजना सीमा कहाँ जाकर काटती है
विज्ञप्ति में एक और शर्त है जिसे आगे नहीं पढ़ा गया। सामान्य राज्यों में प्रति परियोजना ऊपरी सीमा 20 करोड़ रुपये है, पूर्वोत्तर में 30 करोड़। 2.4 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की दर पर 20 करोड़ की सीमा 8.33 मेगावाट पर आ जाती है। उससे बड़ी हर परियोजना को प्रति मेगावाट कम सहायता मिलेगी। 2,532 करोड़ रुपये को 1,500 मेगावाट पर बाँटें तो औसत 1.69 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट निकलता है, जो निर्धारित दर से नीचे है। पूरी दर पर वही रक़म सिर्फ़ 1,055 मेगावाट ख़रीदती। लक्ष्य तभी पूरा होगा जब ज़्यादातर परियोजनाएँ 8.33 मेगावाट से बड़ी हों।
पूँजी कहाँ से आएगी
मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति में लिखा है कि योजना से इस क्षेत्र में क़रीब 15,000 करोड़ रुपये का निवेश आने की उम्मीद है। 1,500 मेगावाट पर यह 10 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट बैठता है, और सरकारी हिस्सा 2,532 करोड़ रुपये, यानी लगभग छठा हिस्सा। बाक़ी पाँच-छठाई पैसा विकासकर्ताओं और बैंकों से आना है। विज्ञप्ति यह भी कहती है कि निवेश में संयंत्र और मशीनरी का शत-प्रतिशत हिस्सा स्वदेशी स्रोतों से लिया जाएगा, और परियोजनाओं की उम्र 40 से 60 साल से ऊपर तक होती है।
सीईआरसी की लागत के हिसाब से देखिए
केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने 3 जुलाई 2026 को अगले टैरिफ़ का मसौदा निकाला, जो 1 अगस्त 2026 से 31 मार्च 2027 के बीच चालू होने वाली परियोजनाओं पर लागू होगा। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए मानक पूँजी लागत 12 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट रखी गई है। उपयोगी आयु 40 साल, ऋण-इक्विटी अनुपात 70:30, ऋण की अवधि 15 साल और इक्विटी पर सामान्य प्रतिफल 15 फ़ीसदी। सरकारी सहायता 2.4 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट इस लागत का पाँचवाँ हिस्सा है।
नदी-प्रवाही परियोजना और बाँध में फ़र्क़
पीआईबी का पृष्ठभूमि दस्तावेज़ लिखता है कि सौर और पवन की तरह रुक-रुककर नहीं, जलविद्युत "पक्की, चौबीसों घंटे" बिजली देती है। सीईआरसी के अपने मसौदे में वही भूगोल उल्टा असर दिखाता है। पहाड़ी राज्यों में पूँजी लागत ज़्यादा है, फिर भी वहाँ 5 मेगावाट से छोटी परियोजना का टैरिफ़ 6.69 रुपये और 5 से 25 मेगावाट का 6.02 रुपये प्रति यूनिट प्रस्तावित है। बाक़ी राज्यों में यही टैरिफ़ 7.70 और 7.49 रुपये है। महँगी परियोजना की बिजली सस्ती इसलिए पड़ती है कि पहाड़ी धारा साल में ज़्यादा घंटे चलती है। जहाँ जलाशय नहीं है, वहाँ उत्पादन नदी के प्रवाह से बँधा रहता है, और सीईईडब्ल्यू के नीति-पत्र के अनुसार ज़्यादातर लघु परियोजनाएँ नहर आधारित या नदी-प्रवाही हैं, जिनमें पानी रोका नहीं जाता।
पाँच साल में 200 डीपीआर, और पिछले दस साल का रिकॉर्ड
योजना राज्यों को क़रीब 200 परियोजनाओं की विस्तृत रिपोर्ट बनाने के लिए 30 करोड़ रुपये देती है, यानी प्रति रिपोर्ट औसतन 15 लाख रुपये। रिपोर्ट बनना और परियोजना चालू होना दो अलग बातें हैं, और पिछले दस साल का रिकॉर्ड यही बताता है। 2016-17 से 2024-25 तक नौ वर्षों में कुल 827.07 मेगावाट जुड़ी, औसतन 91.90 मेगावाट सालाना। इसी रफ़्तार पर पाँच साल में 459 मेगावाट बनती है, लक्ष्य के तीसरे हिस्से से भी कम। मंत्रालय ने पिछली योजनाओं में बनी डीपीआर में से कितनी परियोजनाएँ चालू हुईं, इसका कोई सार्वजनिक ब्योरा इन पृष्ठों पर नहीं है।
सचिव ने ख़ुद कहा: वन और पर्यावरण मंज़ूरी में देरी

उसी कार्यक्रम में मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने वजह बिना घुमाए रखी। उन्होंने जलविद्युत परियोजनाओं के शुरू होने में लगने वाले लंबे समय को प्रमुख चुनौती बताया और कहा कि वन, पर्यावरण तथा मार्ग संबंधी स्वीकृतियों में देरी से क्रियान्वयन प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी बताया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने छोटी परियोजनाओं के लिए समय पर स्वीकृति का आश्वासन दिया है। फिर भी, सारंगी के शब्दों में, "अनुचित देरी" की स्थिति में उस पर ध्यान देने और परियोजना आगे बढ़ाने के लिए एक अलग तंत्र चाहिए। आश्वासन मौजूद है, तंत्र नहीं।
'ऋणयोग्यता' की समस्या, यानी बैंक पैसा क्यों नहीं देते
सारंगी ने दूसरी अड़चन वित्त की बताई। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं की विशिष्ट नक़दी-प्रवाह संरचना के कारण "धैर्य के साथ दीर्घकालिक पूंजी" चाहिए, और भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी से आग्रह किया कि वह बैंकों तथा एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय संगठनों के साथ मिलकर विकासकर्ताओं के लिए ऐसी पूँजी जुटाए। संख्या में यह असंतुलन साफ़ दिखता है: सीईआरसी परियोजना की उपयोगी आयु 40 साल मानता है, पर उसके अपने मानक में ऋण की अवधि 15 साल है। बाक़ी 25 साल की कमाई ऋण चुकाने में काम नहीं आती।
हिमाचल में 172 परियोजनाएँ रद्द

31 जुलाई 2025 को हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल ने हिमऊर्जा के तहत आवंटित 5 मेगावाट से छोटी 172 जलविद्युत परियोजनाओं का आवंटन रद्द कर दिया, क्योंकि बढ़ाई गई अवधि में भी उनका निर्माण अटका रहा। इन्हें दोबारा विज्ञापित किया जाना है। उसी बैठक में 5 मेगावाट से बड़ी 22 परियोजनाएँ भी रद्द हुईं, जिनके क्रियान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए थे। आगे आवंटित होने वाली 5 मेगावाट तक की परियोजनाओं पर 12 फ़ीसदी मुफ़्त बिजली रॉयल्टी और एक फ़ीसदी स्थानीय क्षेत्र विकास निधि की एकसमान दर तय हुई। 7 मार्च 2026 को मंत्रिमंडल ने 15 और परियोजनाएँ रद्द कीं, जो एकमुश्त माफ़ी योजना में छूट पाने के बाद भी चालू नहीं हो सकीं, और 10 मेगावाट की पंडोह परियोजना भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड को दे दी।
उत्तराखंड: प्राधिकरण की सूची में जो नाम दर्ज हैं
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण 31 दिसंबर 2025 तक छोड़ी गई या छोड़ी जाने वाली जलविद्युत परियोजनाओं की सूची रखता है। उसमें उत्तराखंड की 480 मेगावाट की पाला मनेरी है, जिसे राज्य सरकार ने 3 जनवरी 2011 के आदेश से पर्यावरणीय शर्तों के चलते बंद किया; 530 मेगावाट की कोटलीभेल द्वितीय, जिसकी पर्यावरण मंज़ूरी 22 नवंबर 2010 को वापस ली गई और जिसे विशेषज्ञ समिति ने महसीर मछली बचाने के लिए छोड़ने की सिफ़ारिश की; और 261 मेगावाट की रूपसियाबगड़ ख़सियाबाड़ा, जिसे वन्यजीव आवास के कारण वन मंज़ूरी नहीं मिली। ये सब 25 मेगावाट से बड़ी हैं, इसलिए तकनीकी रूप से लघु नहीं। पर मंज़ूरी की जिस मशीनरी की बात सारंगी कर रहे थे, उसका हिसाब यही सूची रखती है।
डेटा सेंटर और एआई: बिजली की माँग किस रफ़्तार से बढ़ रही है
जुलाई 2026 में संसद को दिए एक लिखित उत्तर में विद्युत राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाइक ने कहा, और बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 29 जुलाई को इसकी रिपोर्ट दी: "2031-32 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले डेटा सेंटरों से 26.3 गीगावाट का अतिरिक्त भार अनुमानित है, जिसे ग्रिड में जोड़ा जाएगा और मुख्यतः नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता से पूरा किया जाएगा।" चार महीने पहले, मार्च 2026 में, विद्युत मंत्रालय का यही अनुमान 13.56 गीगावाट था। सरकार का अपना आँकड़ा एक ही वित्त वर्ष के भीतर लगभग दोगुना हो गया। उसी उत्तर में बीसवें विद्युत सर्वेक्षण की मध्यावधि समीक्षा का हवाला देकर बताया गया कि अधिकतम माँग 2026-27 के 289 गीगावाट से बढ़कर 2031-32 में 388 गीगावाट हो जाएगी।
26.3 गीगावाट बनाम 15,951.85 मेगावाट
देश की पूरी बची हुई लघु जलविद्युत क्षमता, हर पहाड़ी नाले और नहर के हर छोर को मिलाकर, 15,951.85 मेगावाट है। अकेले एआई डेटा सेंटरों के लिए सरकार का अपना अनुमान 26,300 मेगावाट है।
अंतर सिर्फ़ मेगावाट का नहीं है। डेटा सेंटर साल के लगभग हर घंटे पूरी क्षमता पर बिजली खींचते हैं, जबकि नदी-प्रवाही परियोजना गर्मियों में धारा के साथ सिकुड़ जाती है। बराबर की स्थापित क्षमता भी बराबर बिजली नहीं देती, और यह फ़ासला संख्या के फ़ासले से बड़ा है।
एक डेटा सेंटर कितनी बिजली खाता है
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की 'एनर्जी एंड एआई' रिपोर्ट के अनुसार एक पारंपरिक डेटा सेंटर 10 से 25 मेगावाट लेता है, जबकि एआई पर केंद्रित हाइपरस्केल सुविधाएँ 100 मेगावाट या उससे ऊपर। यानी एक बड़ा एआई डेटा सेंटर उतनी बिजली माँगता है जितनी भारत ने पूरे 2024-25 में लघु जलविद्युत से जोड़ी, 97.30 मेगावाट। इस साल पाँच महीनों में जुड़ी 10.40 मेगावाट उसका दसवाँ हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर के डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2024 में 415 टेरावाट-घंटा थी, वैश्विक खपत का लगभग 1.5 फ़ीसदी, और 2030 तक 945 टेरावाट-घंटा तक जाने का अनुमान है।
भारत में कितने बन रहे हैं

वुड मैकेंज़ी की 27 जुलाई 2026 को जारी रिपोर्ट कहती है कि भारत की चालू डेटा सेंटर क्षमता 2025 की 2.2 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक 12 गीगावाट पार कर जाएगी। एआई के लिए समर्पित हिस्सा 2025 के 275 मेगावाट से बढ़कर 2030 में 6,546 मेगावाट होगा। बिजली की खपत 2025 के 10 टेरावाट-घंटा से 2040 तक 191 टेरावाट-घंटा आँकी गई है। रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र और तमिलनाडु में ही देश का क़रीब 65 फ़ीसदी स्थापित आईटी भार है, और अडाणीकनेक्स ने अकेले 2.6 गीगावाट की परियोजना शृंखला घोषित की है।
चौबीसों घंटे की बिजली ही अब अड़चन है
वुड मैकेंज़ी की शोध उपाध्यक्ष रशिका गुप्ता का कथन रिपोर्ट में दर्ज है: "भारत में डेटा सेंटर विकासकर्ताओं के लिए ज़मीन और पूँजी अब सीमित करने वाले कारक नहीं रहे। स्थल का चुनाव और डिलीवरी की समय-सीमा अब इससे तय होती है कि नोड के स्तर पर पक्की, चौबीसों घंटे की बिजली मिलती है या नहीं।" यही वाक्य जलविद्युत की तरफ़ इशारा करता है, क्योंकि सौर बिजली दिन में मिलती है और डेटा सेंटर रात को भी उतना ही खींचते हैं। एजेंसी के आँकड़े में 2024 में दुनिया भर के डेटा सेंटरों की बिजली में कोयले का हिस्सा 30 फ़ीसदी, नवीकरणीय का 27, गैस का 26 और परमाणु का 15 फ़ीसदी था।
प्राधिकरण की योजना में लघु जलविद्युत 2035-36 तक सिर्फ़ 6 गीगावाट
यहीं दो सरकारी दस्तावेज़ आपस में नहीं मिलते। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की मार्च 2026 की दीर्घकालिक संसाधन पर्याप्तता योजना 2035-36 के लिए 1,121 गीगावाट की कुल स्थापित क्षमता का न्यूनतम-लागत मिश्रण निकालती है: 509 गीगावाट सौर, 315 कोयला, 155 पवन, 78 बड़ी जलविद्युत, 22 परमाणु, 20 गैस, 16 बायोमास और 6 गीगावाट लघु जलविद्युत। यानी प्राधिकरण दस साल में इस क्षेत्र में 800 मेगावाट के आसपास की बढ़त मानकर चल रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की योजना अकेले पाँच साल में 1,500 मेगावाट का लक्ष्य रखती है, जो पूरा होने पर 2030-31 में ही 6,681 मेगावाट बना देगी। दोनों आँकड़े एक ही सरकार के हैं और एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
प्राधिकरण का जवाब भंडारण है
जिस लचीलेपन की ज़रूरत डेटा सेंटर पैदा करेंगे, उसके लिए प्राधिकरण की योजना जलविद्युत नहीं, भंडारण गिनती है। 2035-36 तक 174 गीगावाट और 888 गीगावाट-घंटा का भंडारण प्रस्तावित है, जिसमें 94 गीगावाट पंप स्टोरेज और 80 गीगावाट बैटरी। रिपोर्ट लिखती है कि 2030 के बाद ज़्यादा नवीकरणीय बिजली जोड़ने के लिए चार से छह घंटे का भंडारण चाहिए होगा। लघु जलविद्युत का ज़िक्र वहाँ "मध्यम और स्थिर सहारा" देने वाले स्रोत के रूप में आता है, प्रमुख समाधान के रूप में नहीं।
अभी निर्माणाधीन: 440 मेगावाट
उसी प्राधिकरण की रिपोर्ट में निर्माणाधीन क्षमता की सूची है। बड़ी जलविद्युत को छोड़कर लगभग 1,54,830 मेगावाट नवीकरणीय क्षमता बन रही है: 64,670 मेगावाट सौर, 83,230 मेगावाट संकर, 6,490 मेगावाट पवन, और 440 मेगावाट लघु जलविद्युत। यानी कुल निर्माणाधीन नवीकरणीय क्षमता का 0.28 फ़ीसदी। 2025-26 में 31 जनवरी तक देश ने रिकॉर्ड 52,537 मेगावाट क्षमता जोड़ी, जिसमें 34,955 मेगावाट सौर थी और 58 मेगावाट लघु जलविद्युत।
यह बिजली किसके घर तक जाएगी
पीआईबी दस्तावेज़ में क्षमता का क्षेत्रवार बँटवारा भी है: उत्तरी क्षेत्र में 7,978 मेगावाट यानी लगभग 38 फ़ीसदी, दक्षिणी में 5,490 मेगावाट यानी 26, पूर्वोत्तर में 3,262 मेगावाट यानी 15, पश्चिमी में 2,963 मेगावाट यानी 14 और पूर्वी क्षेत्र में 1,440 मेगावाट यानी 7 फ़ीसदी। मंत्रालय के अपने पृष्ठ के अनुसार अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड मिलकर इस क्षमता का लगभग आधा रखते हैं। डेटा सेंटर वहाँ नहीं हैं। वे महाराष्ट्र और तमिलनाडु में हैं, और नए निवेश आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश तथा कर्नाटक की तरफ़ जा रहे हैं। योजना जिस विकेंद्रीकृत बिजली की बात करती है, वह पहाड़ी ज़िलों में बनेगी और उसका ख़रीदार मैदान में बैठा है।
नवंबर में भारत मंडपम
नाइक ने कहा कि 2 से 5 नवंबर 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन और एक्सपो में लघु जलविद्युत पर एक समर्पित सत्र होगा, जिसमें नीतिगत सुधार, निवेश, वित्तपोषण, प्रौद्योगिकी और साझेदारी पर बात होगी। उन्होंने नीतिगत निरंतरता, सुव्यवस्थित अनुमोदन प्रक्रिया, केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय तथा परियोजनाओं की बेहतर ऋणयोग्यता की ज़रूरत गिनाई। 10 सितंबर की उस विज्ञप्ति की संख्या 2308729 है, और उसमें डेटा सेंटर शब्द एक बार भी नहीं आता।
स्रोतपीआईबी, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की विज्ञप्ति, 10 सितंबर 2026, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, भौतिक उपलब्धियाँ, 31 अगस्त 2026 तक, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, साल-दर-साल उपलब्धियाँ, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, लघु जलविद्युत अवलोकन पृष्ठ, अंतिम संशोधन 5 अप्रैल 2023, पीआईबी पृष्ठभूमि दस्तावेज़, लघु जलविद्युत विकास योजना, 26 अप्रैल 2026, पीआईबी, मंत्रिमंडल की मंज़ूरी की विज्ञप्ति, 18 मार्च 2026, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, दीर्घकालिक राष्ट्रीय संसाधन पर्याप्तता योजना 2026-27 से 2035-36, मार्च 2026, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, छोड़ी गई या छोड़ी जाने वाली जलविद्युत परियोजनाओं की सूची, 31 दिसंबर 2025 तक, बिज़नेस स्टैंडर्ड, संसद में विद्युत राज्य मंत्री के लिखित उत्तर पर रिपोर्ट, 29 जुलाई 2026, बिज़नेस स्टैंडर्ड और पीटीआई, वुड मैकेंज़ी की डेटा सेंटर रिपोर्ट पर, 27 जुलाई 2026, डाउन टू अर्थ, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की 'एनर्जी एंड एआई' रिपोर्ट पर, 10 अप्रैल 2025, द ट्रिब्यून, हिमाचल मंत्रिमंडल के 31 जुलाई 2025 के फ़ैसले पर, द न्यूज़ हिमाचल, मंत्रिमंडल के 7 मार्च 2026 के फ़ैसले पर, पावर लाइन, सीईआरसी के प्रस्तावित सामान्य टैरिफ़ पर, 13 अगस्त 2026, सोलरक्वार्टर, सीईआरसी के 3 जुलाई 2026 के मसौदा टैरिफ़ पर, सीईईडब्ल्यू, लघु जलविद्युत पर नीति-पत्र