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बिजली मंत्रालय ने 112 कैप्टिव बिजलीघरों को धारा 11 के तहत पूरी क्षमता पर चलने को कहा, मुआवज़े का ज़िक्र नहीं

शुक्रवार, 25 सितंबर को जारी यह आदेश 50 मेगावाट और उससे बड़े 112 कोयला आधारित कैप्टिव बिजलीघरों पर लागू होता है, और 1 अक्तूबर से 31 दिसंबर तक ही चलेगा। बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 11(2) कहती है कि ऐसे हुक्म से हुए नुक़सान की भरपाई हो सकती है, और 2022 में यही धारा आयातित कोयला बिजलीघरों पर लगने पर टाटा पावर नियामक आयोग तक गया था। इस बार के आदेश में मुआवज़े की कोई व्यवस्था दर्ज नहीं मिलती।

छत्तीसगढ़ के कोरबा में सीएसईबी वेस्ट ताप बिजलीघर का कूलिंग टावर, मार्च 2022 की तस्वीर; यह राज्य बिजली बोर्ड का संयंत्र है, पर कोयला आधारित बिजलीघर के बॉयलर और कूलिंग ढाँचे ऐसे ही दिखते हैं
तस्वीर: Mettle30, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बिजली मंत्रालय ने शुक्रवार, 25 सितंबर को एक आदेश जारी किया। दायरा साफ़ है: 50 मेगावाट या उससे बड़ी क्षमता वाले कोयला आधारित कैप्टिव बिजलीघर, यानी फ़ैक्ट्रियाँ ख़ुद अपने इस्तेमाल के लिए जो बिजलीघर लगाती हैं, गिनती में 112, अब 1 अक्तूबर से 31 दिसंबर तक अपनी पूरी उपलब्ध क्षमता पर चलेंगे। आदेश बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 11 के तहत आया है, वह धारा जो सरकार को "असाधारण परिस्थितियों" में किसी भी बिजली कंपनी को हुक्म देने का अधिकार देती है। तीन महीने बाद यह हुक्म ख़ुद ख़त्म हो जाएगा।

स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट, पेट्रोलियम रिफ़ाइनिंग, उर्वरक, काग़ज़ और रसायन: सात उद्योग समूहों के अपने बिजलीघर अब एक ही हुक्म से बंधे हैं। क़ानून की धारा 11(2) एक और बात भी कहती है। ऐसे हुक्म से जो आर्थिक नुक़सान हो, उसकी भरपाई हो सकती है। 2022 में यही धारा आयातित कोयले वाले बिजलीघरों पर लगी थी, और टाटा पावर मुआवज़े के लिए नियामक आयोग तक गया था। इस बार के आदेश में मुआवज़े का कोई तंत्र दर्ज नहीं मिलता, कम से कम उन रिपोर्टों में नहीं जो अब तक पढ़ी जा सकी हैं।

शुक्रवार का आदेश: 112 बिजलीघर, 92 दिन की मियाद

आदेश की भाषा में तीन तारीख़ें अहम हैं। पहली, 25 सितंबर, जब बिजली मंत्रालय ने इसे जारी किया। दूसरी, 1 अक्तूबर, जब से यह लागू होता है। तीसरी, 31 दिसंबर, जब यह अपने-आप ख़त्म हो जाएगा। बीच के 92 दिन ही इसकी पूरी उम्र है।

आदेश की प्रति सिर्फ़ 112 कंपनियों तक सीमित नहीं गई। डेली एक्सेलसियर की 26 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़, इसे केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के अध्यक्ष, ग्रिड-इंडिया (पहले पॉसोको) के प्रबंध निदेशक, बिजली और नवीन-नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयों के सचिवों और सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को भी भेजा गया। यानी यह सिर्फ़ 112 बिजलीघरों को दिया निर्देश नहीं है। यह पूरे बिजली तंत्र को दी गई सूचना है कि यह क्षमता अब हिसाब में शामिल है।

आदेश दो काम माँगता है। पहला: पूरी क्षमता पर बिजली बनाना, और अपनी ज़रूरत से ऊपर जो बचे उसे बिजली एक्सचेंज या दूसरे अनुमत रास्तों से बेचना। दूसरा: कोयले का पर्याप्त भंडार बनाए रखना, ताकि ईंधन की कमी बहाना न बने। दोनों की साप्ताहिक रिपोर्ट सीईए को देनी होगी: उत्पादन, अपनी खपत, एक्सचेंज पर बिकी बिजली, उपलब्ध क्षमता और कोयला भंडार, सब अलग-अलग दर्ज होंगे।

टाटा स्टील, वेदांता, हिंडाल्को, जेएसडब्ल्यू स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट, इंडियन ऑयल और नाल्को के बिजलीघर इस सूची में हैं, एएनआई और द ट्रिब्यून की 26 सितंबर की रिपोर्टों के मुताबिक़। भारत पन्ना को अपनी खोज में धारा 11 का कोई पुराना आदेश नहीं मिला जो सीधे कैप्टिव बिजलीघरों के नाम पर गया हो। 2022 और 2023 के आदेश आयातित कोयला बिजलीघरों के लिए थे, जो बेचने के लिए बिजली बनाते हैं। कैप्टिव बिजलीघर अपने लिए बनाते हैं। हुक्म अब वहाँ तक पहुँच गया है।

धारा 11 का पूरा पाठ: असाधारण परिस्थितियाँ

बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 11 की भाषा छोटी है, और पूरी क़ीमत उसी छोटेपन में है। उपधारा (1) कहती है: "The Appropriate Government may specify that a generating company shall, in extraordinary circumstances operate and maintain any generating station in accordance with the directions of that Government." सीधी भाषा में: उपयुक्त सरकार किसी बिजली बनाने वाली कंपनी से कह सकती है कि असाधारण हालात में वह अपना बिजलीघर सरकार के निर्देशों के मुताबिक़ चलाए।

"असाधारण परिस्थितियों" की परिभाषा धारा के साथ ही, स्पष्टीकरण के तौर पर दी गई है: "circumstances arising out of threat to security of the State, public order or a natural calamity or such other circumstances arising in the public interest." यानी राज्य की सुरक्षा को ख़तरा, लोक व्यवस्था, प्राकृतिक आपदा, या लोकहित में उठी कोई और वजह। आख़िरी हिस्सा सबसे चौड़ा है। युद्ध या भूकंप जैसी कोई तय सूची नहीं दी गई है। सरकार को बस यह तय करना है कि हालात लोकहित में इतने गंभीर हैं।

धारा 11 का हुक्म "जनरेटिंग कंपनी" पर चलता है, और क़ानून की धारा 2(28) में यह शब्द बहुत चौड़ा है: बिजलीघर का मालिक, चलाने वाला या रखरखाव करने वाला कोई भी निगम, संगठन या व्यक्तियों का समूह। कैप्टिव बिजलीघर अपने लिए बिजली बनाता है, बेचने के लिए नहीं, फिर भी वह इसी परिभाषा में आता है, इसीलिए धारा 11 उस तक पहुँच पाई। यह फ़ैसला अकेले बिजली मंत्रालय का है, कम से कम इस मामले में। क़ानून की धारा 2(5) के मुताबिक़ अंतर-राज्यीय बिजली कारोबार में केंद्र सरकार ही "उपयुक्त सरकार" होती है, राज्य नहीं। चूँकि 112 बिजलीघरों की बची बिजली एक्सचेंज के ज़रिए राज्यों की सीमा पार बिकती है, यह अधिकार केंद्र का ही बनता है। न किसी अदालत की पूर्व-मंज़ूरी चाहिए, न किसी नियामक आयोग की। मंत्रालय ख़ुद तय करता है कि परिस्थितियाँ असाधारण हैं, ख़ुद आदेश लिखता है, ख़ुद उसकी मियाद तय करता है। तभी हर ऐसा आदेश अपने भीतर एक ख़त्म होने की तारीख़ लेकर आता है। क़ानून किसी कार्यपालिका को इतनी बड़ी ताक़त हमेशा के लिए नहीं देता।

नुक़सान की भरपाई: धारा 11(2) और 2022 का मुक़दमा

धारा 11 वहीं नहीं रुकती। उपधारा (2) जोड़ती है: "The Appropriate Commission may offset the adverse financial impact of the directions referred to in sub-section (1) on any generating company in such manner as it considers appropriate." सीधी भाषा में: अगर सरकार किसी बिजलीघर को घाटे में चलने का हुक्म देती है, तो उस घाटे की भरपाई का दावा बनता है। कितना, कैसे और कब, यह तय करने का काम नियामक आयोग का है, सरकार का नहीं।

2022 में यह ठीक इसी तरह हुआ। 5 मई 2022 को बिजली मंत्रालय ने सभी आयातित कोयला बिजलीघरों को धारा 11 के तहत पूरी क्षमता पर चलने को कहा था, 6 मई से 31 अक्तूबर तक के लिए। उस समय देश में क़रीब 17.6 गीगावाट आयातित-कोयला क्षमता थी, और मुआवज़े की अस्पष्टता के चलते उसमें से मुश्किल से 10 गीगावाट ही चल रही थी। आदेश ने एस्सार पावर और कोस्टल एनर्जेन के गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में बंद पड़े क़रीब 7 गीगावाट के बिजलीघर फिर चालू कराए, और अदाणी पावर व टाटा पावर की भी कुछ इकाइयाँ लौटाईं।

मंत्रालय ने ख़ुद उसी आदेश में एक कमेटी बनाई, जिसका काम था बेंचमार्क दर तय करना। टाटा पावर कंपनी लिमिटेड ने, जो मुंद्रा का संयंत्र अपनी सहायक कंपनी कोस्टल गुजरात पावर लिमिटेड (सीजीपीएल) के ज़रिए चलाती है, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) में याचिका संख्या 128/एमपी/2022 दाख़िल की। कंपनी का दावा साफ़ था: कमेटी ने जो दर तय की, वह लागत पूरी नहीं करती। कमेटी की सिफ़ारिश थी 6.05 रुपये प्रति यूनिट। कंपनी का अपना हिसाब कहता था 9.11 रुपये प्रति यूनिट, यानी क़रीब 50 फ़ीसदी ज़्यादा। आयोग ने 17 जून 2022 के अपने आदेश में याचिका स्वीकार कर ली, पर अंतरिम राहत में कंपनी को कमेटी की ही दर पर काम चलाने को कहा, जब तक असली दावे की सुनवाई पूरी न हो। गुजरात ऊर्जा विकास निगम समेत आठ ख़रीदार कंपनियों को दो हफ़्ते में जवाब दाख़िल करने को कहा गया, टाटा पावर को उसके बाद प्रत्युत्तर का एक और मौक़ा मिला। साथ ही कंपनी से हर हफ़्ते का ऑडिट किया हुआ ब्यौरा माँगा गया: जहाज़-दर-जहाज़ आए कोयले की लागत, उसकी गुणवत्ता, अपनी खदान में हिस्सेदारी से हुआ मुनाफ़ा, सब अलग-अलग हिसाब में।

यह सुनवाई जल्दी ख़त्म नहीं होती। एक जुड़े मामले, याचिका संख्या 356/एमपी/2022 में, मध्य प्रदेश की एमबी पावर ने जुलाई 2022 से मार्च 2023 तक के घाटे का दावा किया था, घरेलू कोयले में आयातित कोयला मिलाने के एक अलग मंत्रालयी निर्देश की वजह से। आयोग का फ़ैसला आया 31 दिसंबर 2023 को, दावे की अवधि ख़त्म होने के नौ महीने बाद और घटना शुरू होने के डेढ़ साल बाद, तब जाकर हरियाणा पावर परचेज़ सेंटर को हर महीने का बकाया ब्याज सहित चुकाने का आदेश हुआ। भरपाई का हक़ काग़ज़ पर तुरंत बनता है। पैसा हाथ में आने में बरसों लगते हैं।

इस आदेश में मुआवज़े का कोई तंत्र नहीं

25 सितंबर के आदेश में यह कमेटी कहीं नहीं है। न बेंचमार्क दर, न पखवाड़े की समीक्षा, न भुगतान की गारंटी। जो रिपोर्टें अब तक सामने आई हैं, उनमें मुआवज़े या दर तय करने की किसी व्यवस्था का ज़िक्र नहीं मिलता। सिर्फ़ इतना कहा गया है कि बची हुई बिजली एक्सचेंज पर बेची जा सकती है, जो हर बिजलीघर के पास पहले से मौजूद रास्ता है। इसमें नया कुछ नहीं है।

फ़र्क़ समझना ज़रूरी है। आयातित कोयला बिजलीघर बेचने के लिए बनते हैं, और उनका कारोबार बिजली ख़रीद समझौतों पर टिका है। कैप्टिव बिजलीघर अपने मालिक की फ़ैक्ट्री के लिए बनते हैं। उनकी मुख्य कमाई पहले से ही सुरक्षित है, अपनी ही खपत से। सवाल सिर्फ़ इतना है: जो अतिरिक्त कोयला वे अब जलाएँगे, उसकी लागत कौन उठाएगा। आदेश इसका जवाब नहीं देता।

टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट, हिंडाल्को और वेदांता, पाँचों शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध हैं। इनके बिजलीघरों की बढ़ी हुई कोयला लागत, अगर कोई बढ़ी, तो घर के बिजली बिल में नहीं दिखेगी। वह इन्हीं कंपनियों की अगली तिमाही के मुनाफ़े में कहीं दर्ज होगी।

कैप्टिव बिजलीघर: 26 फ़ीसदी मालिकाना, 51 फ़ीसदी खपत

क़ानून की धारा 2(8) एक वाक्य में कैप्टिव बिजलीघर को परिभाषित करती है: "a power plant set up by any person to generate electricity primarily for his own use and includes a power plant set up by any co-operative society or association of persons for generating electricity primarily for use of members of such co-operative society or association." यानी कोई भी व्यक्ति, कंपनी, सहकारी समिति या लोगों का समूह अपने इस्तेमाल के लिए जो बिजलीघर लगाए, वह कैप्टिव है। धारा 9 इसे अधिकार का रूप देती है: क़ानून के बाक़ी प्रावधानों के बावजूद कोई भी व्यक्ति अपना कैप्टिव बिजलीघर और समर्पित पारेषण लाइनें बना सकता है, बिना लाइसेंस के।

पर हर फ़ैक्ट्री का अपना जनरेटर कैप्टिव नहीं कहलाता। बिजली नियम, 2005 का नियम 3 दो शर्तें जोड़ता है, और दोनों साथ पूरी करनी होती हैं। पहली: कैप्टिव इस्तेमाल करने वालों का मालिकाना कम से कम 26 फ़ीसदी होना चाहिए। दूसरी: संयंत्र में साल भर में जितनी बिजली बनी, उसका कम से कम 51 फ़ीसदी उन्हीं मालिकों की खपत में जाना चाहिए। एक भी शर्त चूकी, दर्जा नहीं मिलता।

मध्य प्रदेश के सारणी में सतपुड़ा ताप बिजलीघर, अगस्त 2017 की तस्वीर; यह भी राज्य बिजली उत्पादन कंपनी का संयंत्र है, कैप्टिव बिजलीघर इससे मालिकाने और खपत की शर्तों में अलग होते हैं
तस्वीर: Emmit97, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यह नियम मार्च 2026 में फिर से लिखा गया। बिजली मंत्रालय की 14 मार्च की विज्ञप्ति के मुताबिक़, नए नियम ने 26 और 51 फ़ीसदी की दोनों सीमाएँ जस की तस रखीं, पर एक कंपनी की सहायक और मूल कंपनियों को मालिकाना गिनने में एक ही "व्यक्ति" मान लिया। सत्यापन अब पूरे वित्त वर्ष के लिए होगा। 1 अप्रैल 2026 से अंतर-राज्यीय मामलों में राष्ट्रीय भार प्रेषण केंद्र और राज्य के भीतर के मामलों में राज्य की नामित एजेंसी यह जाँच करेगी, और जाँच पूरी होने तक क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज नहीं लगेगा, बशर्ते कंपनी तय घोषणा-पत्र भर दे। जिन 112 बिजलीघरों को अब पूरी क्षमता पर चलने को कहा गया है, हरेक ने यही दो शर्तें पहले ही पूरी की हैं। तभी वे कैप्टिव कहलाए।

सितंबर में मांग और भंडार का हिसाब

आदेश की वजह समझने के लिए तारीख़ थोड़ी पीछे ले जानी होगी। सितंबर में देश की रातों की बिजली-कमी गर्मियों से भी ज़्यादा हो गई, ब्लूमबर्ग की 24 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़: रात की कमी बढ़कर 7.7 गीगावाट तक पहुँची, अप्रैल-मई की भीषण गर्मी के दौरान भी यह आँकड़ा इतना नहीं था। वजह मॉनसून है। जून से सितंबर तक बारिश सामान्य से 15 फ़ीसदी कम रही, अल नीनो की वजह से, और अगर यह कमी बनी रही तो यह 2009 के बाद का सबसे कमज़ोर मॉनसून होगा। सितंबर के पहले तीन हफ़्तों में पनबिजली उत्पादन पिछले साल के मुक़ाबले 12 फ़ीसदी कम रहा, लगातार पाँचवें महीने गिरावट। जो कमी पानी से पूरी नहीं हुई, कोयले से पूरी करनी पड़ी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ कोयला बिजली उत्पादन इस महीने 18 फ़ीसदी बढ़ा।

महाराष्ट्र के कोराडी ताप बिजलीघर का कूलिंग टैंक और चिमनी, हाईवे से ली गई तस्वीर, अगस्त 2016; ऐसे ही बिजलीघरों के कोयला भंडार की रोज़ की रिपोर्ट केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण बनाता है
तस्वीर: Kailash Mohankar, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की अपनी दैनिक कोयला रिपोर्ट यह गिरावट संख्या में दिखाती है। 19 सितंबर की रिपोर्ट में देश के 190 निगरानी वाले ताप बिजलीघरों का कुल भंडार 2.29 करोड़ टन था, यानी मानक ज़रूरत का सिर्फ़ 39 फ़ीसदी, और इनमें से 74 बिजलीघर "संकटग्रस्त" श्रेणी में थे, यानी उनका भंडार मानक के एक-चौथाई से भी कम था। पाँच दिन बाद, 24 सितंबर की रिपोर्ट में हालत और बिगड़ी: भंडार गिरकर 2.23 करोड़ टन, मानक का 38 फ़ीसदी, और संकटग्रस्त बिजलीघरों की गिनती 74 से बढ़कर 80 हो गई। आदेश ठीक अगले दिन आया।

गर्मियों के आँकड़े इस उलट-फेर को साफ़ करते हैं। 25 अप्रैल को देश की पीक मांग 256 गीगावाट रही और दिन में पूरी तरह पूरी हुई, पर उसी रात 10:39 बजे 4.2 गीगावाट की कमी दर्ज हुई। 22 मई को मांग बढ़कर 270.8 गीगावाट पर पहुँची, और उस दिन देर शाम रॉयटर की रिपोर्ट में दर्ज ग्रिड-इंडिया के अपने आँकड़े के मुताबिक़ 2.57 गीगावाट की कमी हुई। दिन सौर ऊर्जा से भर जाता है। रात कोयले पर टिकी है। सितंबर की 7.7 गीगावाट की रात्रि-कमी इन दोनों से बड़ी है, और वह भी मॉनसून के महीने में, जब मांग आम तौर पर घट जाती है।

2022 से 2026 तक धारा 11 के सारे आदेश

धारा 11 की उम्र बीस साल से ज़्यादा है, पर इसका बार-बार इस्तेमाल हाल के बरसों की बात है। 2022 का आदेश छह महीने चला, 6 मई से 31 अक्तूबर तक, आयातित कोयला बिजलीघरों पर। साथ ही घरेलू कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को अपने ईंधन में कम से कम 10 फ़ीसदी आयातित कोयला मिलाने को भी कहा गया था, वही निर्देश जिसकी भरपाई का मुक़दमा 356/एमपी/2022 में डेढ़ साल चला। 2023 में एक और आदेश आया, 16 मार्च से 15 जून तक, फिर उन्हीं आयातित कोयला बिजलीघरों के लिए। यह पैटर्न अब जाना-पहचाना है।

टाटा पावर का मुंद्रा संयंत्र, जिसे कंपनी कोस्टल गुजरात पावर लिमिटेड (सीजीपीएल) के नाम से चलाती है, इसी दायरे में सबसे बड़ा नाम है: 4,000 मेगावाट, पाँच इकाइयाँ, गुजरात के कच्छ ज़िले में। घाटे में बंद पड़े इस संयंत्र को 22 मार्च 2026 के एक अलग आदेश से फिर धारा 11 के तहत चालू कराया गया, 1 अप्रैल से 30 जून तक के लिए। इससे बनी बिजली मुख्यतः गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब को जाती है, यानी पाँच राज्यों की आपूर्ति सीधे इस एक संयंत्र से जुड़ी है। उस आदेश में मंत्रालय ने 2022 वाला ढाँचा लगभग जस का तस दोहराया: बिजली मंत्रालय, सीईए और एनटीपीसी के प्रतिनिधियों वाली एक कमेटी, हर पंद्रह दिन में नई बेंचमार्क दर, ख़रीदारों पर साप्ताहिक भुगतान की अनिवार्य गारंटी यानी लेटर ऑफ़ क्रेडिट या एडवांस, और बिना बिकी बिजली से मुनाफ़ा हुआ तो वह जनरेटर और ख़रीदार में आधा-आधा।

तेलंगाना के रामागुंडम में एनटीपीसी के बिजलीघर का स्विचयार्ड, ऊँचाई पर तनी तारें और टावर; मुंद्रा जैसे बड़े संयंत्रों से बनी बिजली भी ऐसे ही स्विचयार्ड से होकर कई राज्यों तक पहुँचती है
तस्वीर: Getsuhas08, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

यह मियाद दो बार बढ़ चुकी है। पहली बार 23 जून को, 30 सितंबर तक के लिए। दूसरी बार 26 सितंबर को, यानी उसी हफ़्ते जब कैप्टिव बिजलीघरों वाला नया आदेश आया, 31 दिसंबर तक के लिए। 26 सितंबर की शाम तक बिजली मंत्रालय की मेज़ पर धारा 11 के दो अलग-अलग हुक्म एक साथ चल रहे थे, दोनों की मियाद 31 दिसंबर को ख़त्म होगी।

पर सिर्फ़ एक में मुआवज़े का कोई ज़िक्र है।

स्रोतकेंद्रीय विद्युत नियामक आयोग: बिजली अधिनियम, 2003 का संशोधनों सहित पाठ, धारा 2(5), 2(8), 9, 11 और 11(2), पत्र सूचना कार्यालय, बिजली मंत्रालय, 14 मार्च 2026, शाम 6:13: बिजली नियम (संशोधन), 2026 पर विज्ञप्ति, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग: याचिका संख्या 128/एमपी/2022 (टाटा पावर कंपनी लिमिटेड बनाम गुजरात ऊर्जा विकास निगम व अन्य), आदेश दिनांक 17 जून 2022, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग: याचिका संख्या 356/एमपी/2022 (एमबी पावर बनाम हरियाणा पावर परचेज़ सेंटर), आदेश दिनांक 31 दिसंबर 2023, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, ईंधन प्रबंधन प्रभाग: दैनिक कोयला रिपोर्ट, स्थिति 19 सितंबर 2026, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण: दैनिक कोयला रिपोर्ट, स्थिति 24 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, 26 सितंबर 2026: 112 कैप्टिव कोयला बिजलीघरों को अक्तूबर से दिसंबर तक पूरी क्षमता पर चलाने का आदेश, एएनआई, 26 सितंबर 2026, शाम 4:59: वही आदेश, कंपनियों और पतों की सूची सहित, डेली एक्सेलसियर, 26 सितंबर 2026: आदेश किन दफ़्तरों को भेजा गया, इसका ब्यौरा, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 26 सितंबर 2026, एनर्जेटिका इंडिया: कोस्टल गुजरात पावर लिमिटेड पर मार्च 2026 के धारा 11 आदेश की शर्तें, पीएसयू वॉच: मुंद्रा संयंत्र पर 22 मार्च 2026 के आदेश का ब्यौरा, डिस्कवरी अलर्ट: मुंद्रा निर्देश का दूसरा विस्तार, 26 सितंबर 2026 तक, ब्रीफ़्स.को, ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के हवाले से, 24 सितंबर 2026: सितंबर की रात्रि बिजली-कमी गर्मियों से ज़्यादा, न्यूज़कर्नाटक, 25 सितंबर 2026: सीईए के हवाले से कोयला भंडार के आँकड़े, वाजीराम एंड रवि करेंट अफेयर्स: भारत का रात्रि ऊर्जा संकट, ग्रिड-इंडिया के आँकड़ों के हवाले से, अप्रैल 2026, मार्केटस्केल, 11 सितंबर 2026: रॉयटर की रिपोर्ट के हवाले से ग्रिड-इंडिया का 22 मई का आँकड़ा

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