मलेरिया 80 फ़ीसदी घटा, पर भारत यह लड़ाई 1961 में भी जीत चुका था
उस साल देश में सिर्फ़ 49,151 मामले बचे थे। पंद्रह साल बाद आँकड़ा 64 लाख पर था। जो वजहें तब थीं, मंत्रालय की ताज़ा समीक्षा उन्हीं की चेतावनी दे रही है।
भारत में मलेरिया के मामले और मौतें दस साल में क़रीब 80 फ़ीसदी घटी हैं। जिन ज़िलों में बोझ सबसे भारी था, वे 155 से घटकर 33 रह गए।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को 2030 तक मलेरिया ख़त्म करने के लक्ष्य पर समीक्षा बैठक की। अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक आराधना पटनायक ने की।
एक नज़र में
- 2015 से 2025 के बीच मामले और मौतें क़रीब 80 फ़ीसदी घटीं
- उच्च-बोझ ज़िले 155 से घटकर 33
- इन 33 ज़िलों में देश के 64 फ़ीसदी मामले, 54 फ़ीसदी मौतें
- मौतों की मुख्य वजह बीमारी नहीं, जाँच और इलाज में देरी
- लक्ष्य: 2030 तक मलेरिया मुक्त भारत
यह आँकड़ा जितना अच्छा है, उतना ही जाना-पहचाना है।
1961: जब देश में 49,151 मामले बचे थे
आज़ादी के वक़्त भारत में हर साल क़रीब साढ़े सात करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आते थे और क़रीब आठ लाख की मौत होती थी। देश की आबादी तब 33 करोड़ थी। यानी हर चौथे-पाँचवें आदमी को साल में एक बार मलेरिया।
1953 में सरकार ने राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया। तरीक़ा तीन हिस्सों का था: घरों की दीवारों पर साल में दो बार डीडीटी का छिड़काव, मरीज़ों की खोज, और दवा।
नतीजा असाधारण था। पाँच साल में मामले साढ़े सात करोड़ से घटकर लगभग बीस लाख रह गए। 1958 में कार्यक्रम का नाम बदलकर राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम कर दिया गया, क्योंकि अब नियंत्रण नहीं, ख़ात्मा लक्ष्य था।
1964 तक देश के लगभग 88 फ़ीसदी हिस्से से मलेरिया ख़त्म माना जा चुका था।
1976: और फिर 64 लाख
पंद्रह साल बाद, 1976 में, देश में 64 लाख से ज़्यादा मामले दर्ज हुए।
सरकारी दस्तावेज़ इस वापसी की वजहें गिनाते हैं, और वे किसी एक चूक की नहीं हैं।
निगरानी ढीली पड़ी। जब मामले कम हो गए तो मरीज़ खोजने का ढाँचा वैसा नहीं रहा जैसा 1958 में था। दवा और किट की सप्लाई का तंत्र कई इलाक़ों में लड़खड़ाया। मच्छरों में डीडीटी के ख़िलाफ़ प्रतिरोध विकसित हो गया, यानी छिड़काव पहले जितना असर नहीं करता था। और फ़ैल्सीपेरम परजीवी पर क्लोरोक्वीन, उस वक़्त की मुख्य दवा, काम करना कम कर चुकी थी।
1977 में सरकार को संशोधित कार्य योजना लानी पड़ी, जिसका पहला बिंदु फिर वही था: जल्दी जाँच और तुरंत इलाज।
आज की समीक्षा में वही शब्द
अब शुक्रवार की बैठक पर लौटिए।
उसमें मलेरिया से होने वाली मौतों का मुख्य कारण बीमारी की गंभीरता नहीं, बल्कि निदान और उपचार में देरी बताया गया। राज्यों से कहा गया कि सक्रिय निगरानी मज़बूत करें, और दुर्गम इलाक़ों में जाँच किट तथा मलेरिया-रोधी दवाओं की सप्लाई कभी न टूटे।
देरी, निगरानी, सप्लाई। 1976 की वापसी की वजहों की सूची भी इन्हीं तीन शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती है।
फ़र्क़ यह है कि इस बार यह चेतावनी पहले से दर्ज है, और आँकड़े शून्य पर पहुँचने से पहले दी जा रही है।
मलेरिया होता क्या है
मलेरिया वायरस नहीं, परजीवी से होता है। नाम प्लास्मोडियम। यह संक्रमित मादा एनोफ़िलीज़ मच्छर के काटने से इंसान के ख़ून में पहुँचता है, फिर लिवर में जाकर बढ़ता है, और वहाँ से लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करता है। बुख़ार, कँपकँपी और पसीने का चक्र इसी हमले का नतीजा है।
भारत में दो क़िस्में मुख्य हैं।
प्लास्मोडियम वाइवैक्स ज़्यादा फैलता है पर कम जानलेवा है। इसकी ख़ास बात यह है कि परजीवी लिवर में छिपा रह सकता है और महीनों बाद दोबारा बुख़ार ला सकता है। इसीलिए इसमें पूरा कोर्स ज़रूरी होता है, सिर्फ़ बुख़ार उतरना पर्याप्त नहीं।
प्लास्मोडियम फ़ैल्सीपेरम कम फैलता है पर ज़्यादातर मौतें इसी से होती हैं। यह गंभीर मलेरिया और सेरेब्रल मलेरिया की वजह बनता है, जिसमें परजीवी दिमाग़ तक पहुँचने वाली रक्त नलियों को जाम कर देता है।
यहीं देरी घातक बनती है। फ़ैल्सीपेरम में बीमारी घंटों में बिगड़ सकती है। जाँच रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट या माइक्रोस्कोप से होती है और दोनों में मिनट लगते हैं, घंटे नहीं। इलाज मौजूद है और सस्ता है।
इसलिए जब मंत्रालय कहता है कि मौतों की वजह देरी है, तो वह दवा की कमी की बात नहीं कर रहा। वह उस दूरी की बात कर रहा है जो मरीज़ और जाँच किट के बीच पड़ी है।
बचे हुए 33 ज़िले
2025 में देश के 64 फ़ीसदी मलेरिया मामले और 54 फ़ीसदी मौतें इन्हीं 33 ज़िलों से आईं।
ये नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हैं: मिज़ोरम, ओडिशा, त्रिपुरा, असम, आंध्र प्रदेश, अंडमान और निकोबार, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र। सूची ज़्यादातर वन क्षेत्रों, पहाड़ी इलाक़ों और आदिवासी बहुल ज़िलों की है, जहाँ नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र कई किलोमीटर दूर पड़ता है।
दूसरी तरफ़ की तस्वीर भी दर्ज है। 2022 से 2025 के बीच 160 ज़िलों ने ऐसा साल बिताया जिसमें स्थानीय स्तर पर एक भी मामला नहीं मिला।
पटनायक ने हर ज़िले की अलग कार्य योजना और सबसे प्रभावित गाँवों के लिए अलग ग्राम योजना बनाने पर ज़ोर दिया। मच्छर की क़िस्म, बारिश का पैटर्न और आबादी की बनावट हर ज़िले में अलग होती है।
लक्ष्य 2030 का है। चार साल बचे हैं। 1961 का सबक़ यह है कि आख़िरी चालीस हज़ार मामले पहले साढ़े सात करोड़ से ज़्यादा मुश्किल साबित हो सकते हैं।
स्रोतस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, भारत सरकार, राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र