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बालाघाट में बच्चों की मौतों के बाद जिस टीकाकरण आँकड़े का हवाला दिया गया, वह 55 बच्चों के नमूने पर टिका है

मध्य प्रदेश के बिरसा विकासखंड में मई से बैगा और गोंड समुदाय के कम से कम 25 बच्चों की मौत दर्ज है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की मध्य प्रदेश रिपोर्ट में बालाघाट की पूरी पंक्ति कोष्ठक में छपी है, यानी वह 25 से 49 अभारित मामलों पर आधारित है। जिस ब्लॉक में मौतें हुईं, उसका अलग आँकड़ा उस सर्वेक्षण में है ही नहीं।

मध्य प्रदेश के एक गाँव में मिट्टी का कच्चा घर, मई 2017 की तस्वीर; बिरसा विकासखंड के जिन गाँवों में मौतें हुईं, वहाँ सड़क नहीं है और एम्बुलेंस नहीं पहुँच पाती
तस्वीर: Shagil Kannur, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अगस्त के आख़िरी हफ़्ते में बोंदरी गाँव में धुआँ छोड़ने वाली मशीन पहुँची। मच्छर मारने आई टीम को देखते हुए समारू धुर्वे ने स्क्रॉल से कहा कि छिड़काव वाले अब आ रहे हैं, उनके बच्चों के मरने के बाद। गाँव में सड़क नहीं है, एम्बुलेंस नहीं पहुँच सकती, और बीमार को बाँस पर लादकर ले जाना पड़ता है।

बालाघाट के जिस बिरसा विकासखंड में ये मौतें हुईं, उसका अपना टीकाकरण आँकड़ा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में है ही नहीं।

जो आँकड़ा है, वह पूरे ज़िले का है, और उसकी पूरी पंक्ति कोष्ठक में छपी है।

कितनी मौतें, किन गाँवों में, किस अवधि में

मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के जिन रिकॉर्ड तक स्क्रॉल पहुँचा, उनमें मई से अब तक बैगा और गोंड समुदाय के कम से कम 25 बच्चों की मौत दर्ज है। स्थानीय कांग्रेस विधायक संजय उइके और स्वास्थ्य अधिकारी यह संख्या 29 बताते हैं। मौतें बिरसा विकासखंड के माटला, बोंदरी, कुंडेकसा और आसपास के गाँवों में हुईं: मई में माटला में तीन, जून में चार, जुलाई में तीन। उन 25 में से सिर्फ़ नौ बच्चे किसी अस्पताल तक पहुँच पाए। बाक़ी घर पर मरे। सबसे पहले जिन सात बच्चों की मौत हुई वे एक से बारह बरस के थे, और स्क्रॉल के मुताबिक़ उनमें से किसी को खसरे का टीका नहीं लगा था।

मई से 22 जुलाई तक, नौ मौतें और कोई सूचना नहीं

माटला की आँगनवाड़ी कार्यकर्ता सुहद्रा यादव ने माना कि उन्हें गाँव की मौतों की जानकारी थी, पर उन्होंने सूचना ऊपर नहीं भेजी। आँगनवाड़ी कार्यकर्ता को हर महीने की प्रगति रिपोर्ट में मौतें दर्ज करके पर्यवेक्षक और बाल विकास परियोजना अधिकारी को भेजनी होती हैं। उनके रजिस्टर में माटला के दो मृत बच्चों के नाम बदले हुए दर्ज मिले। 22 जुलाई को अदोरी पंचायत के सरपंच परशुराम धुर्वे ने तत्कालीन अनुविभागीय दंडाधिकारी अर्पित गुप्ता को बताया कि बोंदरी में तीन बच्चे मर चुके हैं। गुप्ता ने अगले दिन टीम भेजी और स्क्रॉल से कहा कि पहले मौसमी बुख़ार लगा, पर घर-घर जाने पर हर घर में बीमार बच्चे मिले। बोंदरी के 103 घरों में कम से कम एक बच्चा बीमार निकला।

तीन प्रयोगशालाओं ने नमूनों में क्या पाया

27 जुलाई को राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के सदस्य बालाघाट पहुँचे। संस्थान की जिस रिपोर्ट तक स्क्रॉल पहुँचा, उसमें 47 में से 21 नमूनों में खसरा मिला और 16 में से 8 में मलेरिया। जुलाई के आख़िरी हफ़्ते में स्वास्थ्य विभाग ने बीमार बच्चों के ख़ून के नमूने जबलपुर मेडिकल कॉलेज और पुणे के राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान भेजे। जबलपुर के सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग ने 64 सीरम नमूनों में से 17 में खसरे का विषाणु पाया, और 96 नमूनों में से 50 में मलेरिया का परजीवी। ये सभी नमूने बीमार बच्चों के थे, मरे हुए बच्चों के नहीं।

मौत का कारण किस काग़ज़ पर क्या लिखा है

मृत बच्चों को दफ़ना दिया गया था, इसलिए उनकी मौत का कारण पुष्ट नहीं हो सका। बालाघाट के एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी ने स्क्रॉल से कहा कि लक्षणों का ब्योरा खसरे जैसी बीमारी की ओर इशारा करता है। कुंडेकसा में 22 जुलाई को मरी तीन साल की एक बच्ची के काग़ज़ पर मौत का कारण "अज्ञात" दर्ज है। बोंदरी की तीन साल की एक और बच्ची 13 अगस्त को भर्ती होने के दो दिन के भीतर मर गई; सरकारी रिकॉर्ड में उसकी मौत का कारण गंभीर तीव्र कुपोषण, गंभीर श्वसन कष्ट, गंभीर रक्ताल्पता, शॉक और श्वसन विफलता लिखा है। ज़िला अर्ली इंटरवेंशन अधिकारी राजाराम चंद्रवंशी के मुताबिक़ मरते समय उसका वज़न 4 किलो था; उस उम्र में वह 11 से 15 किलो होना चाहिए।

टीकाकरण का वह आँकड़ा जो ज़िले के अपने रिकॉर्ड में है

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) की मध्य प्रदेश रिपोर्ट की तालिका 60 में बालाघाट की पंक्ति यह है: 12 से 23 महीने के बच्चों में बीसीजी 94.3 फ़ीसदी, खसरे का टीका 91.7 फ़ीसदी, सभी बुनियादी टीके 75.8 फ़ीसदी, उम्र के हिसाब से सभी ज़रूरी टीके 62.3 फ़ीसदी, और एक भी टीका न लगे बच्चे 5.7 फ़ीसदी। इन्हीं ख़ानों में राज्य का औसत 95.4, 88.1, 77.1, 67.7 और 3.6 फ़ीसदी है। खसरे के ख़ाने में बालाघाट राज्य से ऊपर दिखता है।

बालाघाट की यह पूरी पंक्ति कोष्ठक में छपी है। रिपोर्ट की अपनी टिप्पणी बताती है कि कोष्ठक का मतलब है, आँकड़ा 25 से 49 अभारित मामलों पर आधारित है। पंक्ति के आख़िरी ख़ाने में बच्चों की संख्या 55 दर्ज है।

177 बच्चों का वह सर्वे जिसने बिरसा को अलग गिना

अगस्त में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक टीम ने बिरसा विकासखंड में 177 बच्चों का सर्वे किया। स्क्रॉल के मुताबिक़ उनमें 80 फ़ीसदी को खसरे का पहला टीका लगा मिला और 70 फ़ीसदी को दूसरा। यह ज़िले के बजाय ब्लॉक की तस्वीर है, और दोनों में फ़ासला है। स्क्रॉल ने सात मृत बच्चों के परिवारों से टीकाकरण की स्थिति पूछी। छह के माता-पिता ने कहा कि उनके बच्चों को कभी कोई टीका नहीं लगा; एक माँ ने कहा कि दो टीके लगे थे, पर किस बीमारी के, यह उन्हें नहीं पता। भारत ने खसरे का टीका 1985 में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में जोड़ा; 2015, 2020 और 2023 की उन्मूलन समयसीमाएँ चूकने के बाद मंत्रालय ने 2026 का लक्ष्य रखा, और इस साल की पहली छमाही में देश में 26,332 मामले दर्ज हुए। बिरसा में दो दशकों से खसरे का कोई प्रकोप दर्ज नहीं है।

रजिस्टर में एक तारीख़, पिता की बात दूसरी

ओडिशा के ढेंकानाल ज़िले के बुधिबिली गाँव में एक आँगनवाड़ी केंद्र, जनवरी 2018 की तस्वीर; बच्चों के टीकाकरण की प्रविष्टियाँ ऐसे ही केंद्रों के रजिस्टर में दर्ज होती हैं
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

बोंदरी गाँव की कोहनीमोड़ आँगनवाड़ी के रिकॉर्ड में एक बच्चे के नाम के आगे 21 अप्रैल 2026 को खसरे के टीके की एक ख़ुराक दर्ज है, साथ में विटामिन ए का इंजेक्शन और न्यूमोकोकल टीका। उस बच्चे के पिता समारू धुर्वे का कहना है कि उनके सातों बच्चों में से किसी को कभी कोई टीका नहीं लगा। उन्होंने आरोप लगाया कि एक स्वास्थ्यकर्मी ने उनसे दोनों बच्चों को टीका लगा हुआ बताने को कहा। "पर मैं झूठ क्यों बोलूँ," उन्होंने स्क्रॉल से कहा। आँगनवाड़ी कार्यकर्ता ललिता धुर्वे ने बताया कि वे मई में इस पद पर आईं, उन्हें इस प्रविष्टि की जानकारी नहीं, और उनके आने के बाद कोई टीकाकरण दौर नहीं चला। कुंडेकसा के रजिस्टर के 15 बच्चों में से 11 पहला टीका चूक चुके थे।

मलेरिया के तीन साल: 697, फिर 492, फिर एक महीने में 404

जिन 40 गाँवों को कंटेनमेंट ज़ोन में रखा गया, वहाँ 2024 में मलेरिया के 697 मामले दर्ज हुए थे और 2025 में 492। इस साल जुलाई के आख़िर से अगस्त के आख़िर तक, यानी एक महीने में, उन्हीं गाँवों में 404 मामले दर्ज हुए। बालाघाट स्वास्थ्य विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने स्क्रॉल से कहा कि पिछले बरसों में मलेरिया की भारी कम-रिपोर्टिंग हुई, और इसी वजह से कार्यक्रम के कई ज़रूरी क़दम नहीं उठाए गए। एक अधिकारी के शब्दों में, प्रकोप शुरू होने तक काग़ज़ पर मलेरिया क़ाबू में दिखता था। स्क्रॉल जिन चार गाँवों में गया, वहाँ इस साल मच्छरदानियाँ नहीं बँटीं। छिड़काव के लिए संविदा कर्मचारी सुंदर मरकाम 12 अगस्त से तैनात हुए।

बैगा: विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह का दर्जा क्या देता है

जनजातीय कार्य मंत्रालय जो राज्यवार सूची रखता है, उसमें 75 समूह हैं। उसमें मध्य प्रदेश की प्रविष्टि "मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित)" लिखी है और उसके नीचे सात नाम हैं: अबूझ मारिया, बैगा, भारिया, बिरहोर, हिल कोरबा, कमार और सहरिया। इसी सूची में बिहार "झारखंड सहित" है, आंध्र प्रदेश "तेलंगाना सहित", उत्तर प्रदेश "उत्तराखंड सहित", और ओडिशा अब भी "ओरिसा"। यानी मंत्रालय की सूची नवंबर 2000 से पहले की राज्य-सीमाओं पर चल रही है। बालाघाट के बैगा इसी सूची में हैं। काउंटरव्यू पर 19 अगस्त 2026 को छपे राज कुमार सिन्हा के लेख के मुताबिक़ पीएम-जनमन स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पेयजल, सड़क और बिजली की खाई पाटने के लिए बना है, बालाघाट उसका चिह्नित प्राथमिकता ज़िला है, और मध्य प्रदेश 2017 से इन्हीं समूहों के लिए आहार अनुदान योजना चलाता है।

जंगल से आने वाला खाना और वन अधिकार क़ानून

मध्य प्रदेश की बैगा महिलाएँ, मार्च 2023 की तस्वीर, जिनका इस लेख के परिवारों से कोई ताल्लुक़ नहीं; बैगा समुदाय पीढ़ियों से जंगल से जिमीकंद, पिहरी और कंद-मूल बटोरता रहा है
तस्वीर: Sandy & Vyjay, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

ज़िला पंचायत सदस्य मनसाराम मेरावी ने स्क्रॉल से कहा कि कई आदिवासी परिवार वन अधिकार क़ानून, 2006 के तहत वनोपज और ज़मीन के अधिकार नहीं ले पाए, जिससे उनके पारंपरिक पोषण पर असर पड़ा। बैगा समुदाय जंगल से जिमीकंद, पिहरी यानी खाने वाली कुकुरमुत्ता और कंद-मूल इकट्ठा करता रहा है। मेरावी के मुताबिक़ कई लोगों को अब वनोपज बटोरने नहीं दिया जाता और जंगल में उनकी आवाजाही पर नियंत्रण है। माटला के महासिंह पार्ते तेंदूपत्ता और वनोपज बेचकर तथा दूसरों के खेतों में मज़दूरी करके गुज़ारा करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर हो सका तो वे दिन में दो बार खाते हैं, और कई दिन बच्चे एक ही बार खाते हैं।

आँगनवाड़ी और पोषण पुनर्वास केंद्र वहाँ कितनी दूर हैं

मध्य प्रदेश के गुना में सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की इमारत, जून 2015 की तस्वीर; पोषण पुनर्वास केंद्र ऐसे ही सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के भीतर चलते हैं
तस्वीर: Teacher1943, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

मध्य प्रदेश सरकार का पोषण पुनर्वास केंद्र एमआईएस जो सूची छापता है, उसमें राज्य के 51 ज़िलों में कुल 318 केंद्र और 3,801 बिस्तर दर्ज हैं। बालाघाट में छह केंद्र हैं: बैहर 10 बिस्तर, ज़िला अस्पताल 20, बिरसा 10, कटंगी 10, खैरलांजी 10 और लांजी 10। कुल 70 बिस्तर। राज्य के अपने ब्योरे में प्रकोप वाले इलाक़े के 518 गंभीर कुपोषित बच्चों को इन्हीं केंद्रों में भेजा गया। बिरसा के केंद्र में दस बिस्तर हैं। उसी एमआईएस का "रिपोर्ट" पन्ना बिस्तर अधिभोग देने का दावा करता है, पर 10 सितंबर 2026 की शाम 1 जुलाई से 31 अगस्त की अवधि माँगने पर वह संदेश लौटाता है कि वेबसाइट रखरखाव में है। माटला में आशा कार्यकर्ता नहीं है, सबसे नज़दीकी उप-स्वास्थ्य केंद्र मछुर्दा में है, पाँच किलोमीटर दूर, बिना डॉक्टर के। बोंदरी में भी आशा नहीं, और सोंगुड्डा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा अधिकारी नहीं था।

टेक-होम राशन मार्च में रुका, भुगतान अटका

मार्च तक तीन साल तक के बच्चों को महिला एवं बाल विकास विभाग से मुफ़्त पोषण आहार मिलता था: चावल, दाल और सोयाबीन। कुंडेकसा की आँगनवाड़ी कार्यकर्ता ममता यादव के मुताबिक़ आख़िरी आपूर्ति मार्च में आई और वह स्टॉक अप्रैल तक चला। स्क्रॉल की रिपोर्ट में लिखा है कि यह मदद पाँच महीने पहले रुकी, क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार आपूर्तिकर्ता एजेंसियों को भुगतान नहीं कर पाई। माटला की सुहद्रा यादव ने कहा कि इलाक़े के कई ग़रीब परिवारों के लिए आँगनवाड़ी का खाना काम आता है और वे पर्यवेक्षकों से वैकल्पिक इंतज़ाम माँगती रही हैं। विभाग के सहायक संचालक देवेंद्र सुंदरियाल ने स्क्रॉल के फ़ोन और संदेशों का जवाब नहीं दिया।

127 बच्चे, पाँच नाम और एक ख़ाली ख़ाना

स्क्रॉल जिन तीन आँगनवाड़ियों में गया, वहाँ के रजिस्टर में 127 बच्चों में से सिर्फ़ पाँच गंभीर तीव्र कुपोषित दर्ज थे, यानी हर 25 में एक। मध्यम तीव्र कुपोषित बच्चों का रिकॉर्ड ही नहीं था, जबकि कई बच्चे देखने में कम वज़न के थे। 13 अगस्त को 4 किलो वज़न के साथ मरी तीन साल की बच्ची उस सूची में नहीं थी। बिठली के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जुलाई से भर्ती 150 बच्चों में से चिकित्सा अधिकारी डॉ. सौरभ उइके ने पचास से ज़्यादा को कम वज़न का पाया। राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के प्रोफ़ेसर विजय नेमा ने कहा कि बच्चों की बाँह नापने की ज़रूरत नहीं पड़ी, और यह भी कि टीका गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों पर पूरी तरह असर न भी करे।

ज़िले का कुपोषण, राज्य के औसत के सामने

एनएफ़एचएस-5 की तालिका 72 में बालाघाट की पंक्ति यह है: पाँच साल से छोटे बच्चों में नाटापन 41.9 फ़ीसदी, दुबलापन 20.5 फ़ीसदी और कम वज़न 44.9 फ़ीसदी। राज्य का औसत क्रमशः 35.7, 18.9 और 33.0 फ़ीसदी है, और राज्य की अनुसूचित जनजातियों का 40.0, 21.4 और 39.8 फ़ीसदी। कम वज़न में बालाघाट अनुसूचित जनजातियों के राज्य-औसत से भी पाँच अंक ऊपर है। तालिका 81 में ज़िले के 6 से 59 महीने के 56.7 फ़ीसदी बच्चे रक्ताल्पता के शिकार दर्ज हैं, 60.6 फ़ीसदी महिलाएँ भी, और 30.2 फ़ीसदी महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से नीचे है।

दो सर्वेक्षणों के आँकड़े आपस में नहीं मिलते

स्क्रॉल ने एनएफ़एचएस-6 का हवाला देकर लिखा है कि बालाघाट में पाँच साल से छोटा हर तीसरा बच्चा कम वज़न का है, और यह भी कि ज़िले के 81.3 फ़ीसदी बच्चों को खसरे की दोनों ख़ुराकें मिली हैं। एनएफ़एचएस-5 की मध्य प्रदेश रिपोर्ट, जो इस लेख के लिए पढ़ी गई, कम वज़न 44.9 फ़ीसदी बताती है और खसरे के टीके का एक ही ख़ाना रखती है, 91.7 फ़ीसदी। एनएफ़एचएस-6 (2023-24) की ज़िला फ़ैक्टशीट इस काम के दौरान नहीं खुल सकी; nfhsiips.in पर उसकी कड़ी पीडीएफ़ के बजाय एक वेबपेज लौटाती है। दोनों संख्याएँ यहाँ अपने-अपने स्रोत के साथ दर्ज हैं।

आशा कार्यकर्ताओं की 72 रिक्तियाँ, 48 एक ही ब्लॉक में

बालाघाट ज़िले में आशा कार्यकर्ताओं के 72 पद ख़ाली हैं, और उनमें से 48 अकेले बिरसा विकासखंड में। स्क्रॉल जिन गाँवों में गया, वहाँ सहायक नर्स दाई और आशा, दोनों ग़ैरहाज़िर थीं। आदिवासी विकास परिषद के ज़िला अध्यक्ष दिनेश धुर्वे ने कहा कि यहाँ स्वास्थ्य विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग, दोनों की पहुँच सीमित है। बच्चों को भर्ती कराना इतना मुश्किल था कि कलेक्टर ने वार्डों के बाहर पुलिस आरक्षक तैनात करने का आदेश दिया, क्योंकि कुछ माता-पिता बच्चों को लेकर वार्ड से निकल जाते थे।

जिन तीन पत्रकारों के इंस्टाग्राम खाते बंद हुए

तीन स्वतंत्र पत्रकारों, मोनिका सिंह, बिंदु गुर्जर और लोकभद्र सिंह, के इंस्टाग्राम खाते कुछ दिन निलंबित रहे। मीडियानामा ने निलंबन की तारीख़ 6 सितंबर लिखी है, स्क्रॉल ने सोमवार, यानी 7 सितंबर; दोनों के मुताबिक़ खाते बुधवार सुबह बहाल हो गए। तीनों बालाघाट से आदिवासी संगठनों के प्रदर्शन, अस्पताल के प्रबंधन और आशा कार्यकर्ताओं की दिक़्क़तों पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने मंगलवार के बयान में निलंबन की निंदा करते हुए लिखा कि वे तीन महीनों में क़रीब 30 संदिग्ध बाल मौतों के आरोपों पर काम कर रहे थे, कि बालाघाट के अधिकारियों ने उन पर अलग में मिलने का दबाव डाला, मना करने पर कथित तौर पर होटल के कमरे ख़ाली कराए गए, और सादा कपड़ों में पुलिसकर्मी दो दिन तक उनकी आवाजाही पर नज़र रखते दिखे। इन रिपोर्टों में मेटा का कोई बयान या निलंबन का कोई बताया गया कारण दर्ज नहीं है।

राज्य ने अब तक क्या कहा है

22 अगस्त 2026 को उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल बालाघाट गए। इसके बाद डॉ. परेश उपलप को ज़िला टीकाकरण अधिकारी और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, दोनों पदों से हटाया गया, ज़िला मलेरिया अधिकारी को भी, और अनुविभागीय दंडाधिकारी अर्पित गुप्ता का तबादला हुआ। 29 अगस्त को मुख्यमंत्री मोहन यादव प्रभावित गाँवों में पहुँचे और मरे 22 बच्चों के परिवारों के लिए दो-दो लाख रुपये मुआवज़े की घोषणा की। संडे गार्डियन ने राज्य के जवाबी क़दमों का जो ब्योरा छापा है, उसमें 12 अगस्त को राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल की तैनाती, 32,433 लोगों की जाँच, 431 बच्चों का रेफ़रल, एक से दस साल के 14,637 बच्चों को एमआर की अतिरिक्त ख़ुराक, और बिरसा तथा बैहर में छह चल चिकित्सा इकाइयाँ शामिल हैं। स्क्रॉल ने स्वास्थ्य विभाग के हवाले से 28 अगस्त तक 10,481 ख़ुराकें लिखी हैं, जो अलग कट-ऑफ़ तारीख़ का आँकड़ा है।

हाई कोर्ट में लगी याचिका और 18 सितंबर की तारीख़

10 सितंबर 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ ने, जिसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रुसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल हैं, एक जनहित याचिका पर राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट कलेक्टर और अन्य को नोटिस जारी किए। याचिका नरसिंहपुर के अंशुल तिवारी ने लगाई है। उसमें कहा गया है कि संक्रामक बीमारियों से तीस से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई, और 50 बिस्तरों वाले एक अस्पताल में क़रीब 400 बच्चों का इलाज चल रहा है। याचिका में यह भी दर्ज है कि प्रभावित इलाक़ों में हैंडपंप से पीला पानी निकल रहा था। अगली सुनवाई 18 सितंबर को है।

पिछली बार यही ज़िला किस वजह से ख़बर में था

बिरसा विकासखंड को दिसंबर 2025 में नक्सल-मुक्त घोषित किया गया था। डॉ. उपलप ने स्क्रॉल से कहा कि नक्सली गतिविधियों ने विभाग का काम मुश्किल बनाया, और अधिकारी हाल ही में इन गाँवों तक पहुँचने लगे हैं। बालाघाट के सामाजिक कार्यकर्ता शुभम उइके का कहना है कि ज़िले में कई बरसों से नक्सलियों की कोई सक्रिय हिंसा दर्ज नहीं हुई। ज़िले की अपनी वेबसाइट के मुताबिक़ 2011 की जनगणना में बालाघाट की आबादी 17,01,156 थी और क्षेत्रफल 9,245 वर्ग किलोमीटर। उसी पन्ने पर अनुसूचित जनजातियों की संख्या 2,98,665 दर्ज है, पर वह 2001 का आँकड़ा है। माटला मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर है, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से लगे पहाड़ों में, जहाँ एक किलोमीटर की फिसलन भरी चढ़ाई चढ़कर पहुँचा जाता है।

मृत्यु पंजीयन 93 फ़ीसदी, फिर भी दो महीने की चुप्पी

एनएफ़एचएस-5 की तालिका 15 में बालाघाट के लिए दर्ज है कि सर्वेक्षण से पहले के तीन साल में ज़िले के स्थायी निवासियों की 93.3 फ़ीसदी मौतें नागरिक प्राधिकारी के पास पंजीकृत हुईं, ग्रामीण इलाक़ों में 92.1 फ़ीसदी। तालिका 13 में पाँच साल से छोटे 97.3 फ़ीसदी बच्चों के जन्म पंजीकृत दर्ज हैं। इसी ज़िले में नौ बच्चों की मौत की जानकारी स्वास्थ्य विभाग तक दो महीने नहीं पहुँची। स्क्रॉल ने लिखा है कि इस समुदाय में सरकारी अधिकारियों द्वारा मौतों की कम-रिपोर्टिंग आम बात है।

जो आँकड़े माँगे जाने चाहिए

ऊपर जिन दस्तावेज़ों का नाम आया, उनमें से कोई सार्वजनिक नहीं है। मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग का वह रिकॉर्ड जिसमें 25 बच्चों का ब्योरा है। राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान की 27 जुलाई वाली रिपोर्ट। जबलपुर मेडिकल कॉलेज की सूक्ष्मजीव विज्ञान रिपोर्ट और पुणे भेजे गए नमूनों का नतीजा। बोंदरी, कुंडेकसा और माटला की आँगनवाड़ियों के टीकाकरण रजिस्टर। मई, जून और जुलाई की मासिक प्रगति रिपोर्टें, जिनमें मौतें दर्ज होनी थीं। पोषण आहार एजेंसियों के भुगतान की फ़ाइल। प्रकोप वाले हफ़्तों में बालाघाट के 70 बिस्तरों का अधिभोग। बिरसा का ब्लॉक-स्तरीय खसरा टीकाकरण आँकड़ा, जो किसी राष्ट्रीय सर्वेक्षण में अलग से नहीं छपता। स्वास्थ्य विभाग के जिस रिकॉर्ड में 25 बच्चों के नाम हैं, उनमें से नौ के आगे किसी अस्पताल का नाम दर्ज है।

स्रोतस्क्रॉल, तबस्सुम बरनगरवाला की दो-कड़ी शृंखला की दूसरी रिपोर्ट, 10 सितंबर 2026, स्क्रॉल, इसी शृंखला की पहली रिपोर्ट, बिरसा विकासखंड से ज़मीनी रिपोर्टिंग, स्क्रॉल, तीन पत्रकारों के इंस्टाग्राम खाते निलंबित होने की ख़बर, सितंबर 2026, मीडियानामा, इंस्टाग्राम खातों के निलंबन और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के बयान पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21), मध्य प्रदेश रिपोर्ट, ज़िलेवार तालिकाएँ 13, 15, 47, 60, 67, 72 और 81, जनजातीय कार्य मंत्रालय, विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों की राज्यवार सूची, मध्य प्रदेश पोषण पुनर्वास केंद्र एमआईएस, केंद्रों और बिस्तरों की सूची, मध्य प्रदेश पोषण पुनर्वास केंद्र एमआईएस, बिस्तर अधिभोग रिपोर्ट का पन्ना, द प्रिंट, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की 10 सितंबर 2026 की सुनवाई पर रिपोर्ट, संडे गार्डियन, राज्य सरकार के जवाबी क़दमों के आँकड़ों पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, बालाघाट ज़िला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट, जनसांख्यिकी पन्ना, काउंटरव्यू, राज कुमार सिन्हा का लेख, 19 अगस्त 2026

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