रातभर की हर सौ यात्राओं में अड़तालीस अब तीर्थ और धार्मिक मक़सद से हैं, ग्यारह साल पहले यही मक़सद तीस दिन की खिड़की में गिना जाता था
बुधवार, 23 सितंबर की शाम 4 बजे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने घरेलू पर्यटन व्यय सर्वेक्षण, जुलाई 2025 से जून 2026, का प्रेस नोट जारी किया। रातभर बाहर रहकर लौटने वाली हर सौ यात्राओं में अड़तालीस अब तीर्थ और धार्मिक मक़सद से हैं, हर मापे गए मक़सद में सबसे ज़्यादा। मगर 2014-15 के पिछले सर्वेक्षण में यही मक़सद व्यापार और सामाजिक यात्राओं के साथ तीस दिन की खिड़की में गिना गया था, छुट्टी और स्वास्थ्य वाले साल-भर के समूह में नहीं, इसलिए अड़तालीस फ़ीसदी की तुलना सीधे पुराने आँकड़े से नहीं हो सकती।

भारत में रातभर बाहर रहकर लौटने वाली हर सौ यात्राओं में से अड़तालीस अब तीर्थ और धार्मिक मक़सद से होती हैं, किसी और वजह से ज़्यादा। यह अंक बड़ा लगता है। पर इसे समझने से पहले एक बात जाननी ज़रूरी है: तीर्थ को गिनने का तरीक़ा ख़ुद ग्यारह साल में बदल चुका है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने यह आँकड़ा बुधवार, 23 सितंबर की शाम 4 बजे जारी किया, घरेलू पर्यटन व्यय सर्वेक्षण के प्रेस नोट में, जुलाई 2025 से जून 2026 तक के आंकड़ों पर आधारित। सुर्ख़ी में तीन बातें दर्ज हैं: सामाजिक यात्राएं सबसे ज़्यादा हैं, ख़र्च व्यापार-यात्रा पर सबसे ज़्यादा होता है, और तीर्थ तथा धार्मिक मक़सद अब सबसे ऊपर है।
यही सर्वेक्षण पहले भी हुआ था, 2014-15 में, राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के 72वें दौर में। उस रिपोर्ट में तीर्थ और धार्मिक यात्रा साल-भर की गिनती में थी ही नहीं। वह व्यापार और सामाजिक यात्राओं के साथ तीस दिन की गिनती में थी।
यह सिर्फ़ एक तकनीकी फ़र्क़ नहीं है। यही इस सर्वेक्षण की असली कहानी है: भारत कैसे यात्रा करता है, और तीर्थ उसमें कहाँ बैठता है।
सर्वेक्षण की परिभाषाएं: यात्रा, आगंतुक और मक़सद
यह सर्वेक्षण राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के 80वें दौर का हिस्सा है, और इसके नतीजे एनएसएस रिपोर्ट संख्या 597, "डोमेस्टिक टूरिज़्म इन इंडिया" में छपे हैं। नमूने में देश भर की 24,778 प्रथम-चरण इकाइयाँ हैं, यानी गांव और शहरी ब्लॉक, जिनमें 14,371 ग्रामीण और 10,407 शहरी हैं। इन्हीं में 2,46,113 परिवारों से पूछताछ हुई, 1,42,603 ग्रामीण और 1,03,510 शहरी। अंडमान-निकोबार के दुर्गम गांवों को छोड़कर बाक़ी पूरा देश दायरे में है। नमूना बहु-चरण स्तरीकृत है, और हर चरण का चुनाव सामान्य यादृच्छिक पद्धति से हुआ। आंकड़े शेड्यूल 21.1 के तहत टैबलेट पर, यानी सीएपीआई तकनीक से जुटाए गए।
सर्वेक्षण जिसे "यात्रा" मानता है, उसकी अपनी शर्तें हैं। रातभर की यात्रा वह है जो कम से कम बारह घंटे की हो, आधी रात से सुबह पांच बजे का समय उसमें शामिल हो, दो लगातार दिनों में फैली हो, और अधिकतम 180 दिन में घर वापसी के साथ ख़त्म हो। ठहरने की जगह होटल हो, रिश्तेदार का घर हो या धर्मशाला, गिनती पर फ़र्क़ नहीं पड़ता। जगह मायने नहीं रखती। "आगंतुक" वह परिवार-सदस्य है जिसने ऐसी कोई यात्रा, रातभर की या उसी दिन की, पूरी की हो। "मुख्य मक़सद" वह वजह है जिसके बिना परिवार का कोई सदस्य उस यात्रा पर जाता ही नहीं, पूरी यात्रा के लिए एक ही।
इसी सर्वेक्षण में दो अलग खिड़कियाँ भी हैं। छुट्टी-मनोरंजन, तीर्थ-धार्मिक, स्वास्थ्य और ख़रीदारी के मक़सद से हुई यात्राएं पिछले 365 दिनों में गिनी गईं। व्यापार, सामाजिक, शिक्षा-प्रशिक्षण और बाक़ी मक़सदों वाली यात्राएं पिछले तीस दिनों में। वजह सीधी है: पड़ोस की दुकान या रिश्तेदार के घर जैसी बार-बार होने वाली यात्रा घर वाले को बीते महीने भर की ठीक-ठीक याद रहती है, पर साल में एक बार होने वाली लंबी यात्रा को पकड़ने के लिए पूरा साल पूछना पड़ता है। दोनों खिड़कियाँ अपनी जगह सही हैं। इनसे निकले आँकड़ों को आपस में मिलाना ग़लत है।
तीर्थ और धार्मिक मक़सद अब साल भर में गिना जाता है, पहले तीस दिन में गिना जाता था
यहीं वह फ़र्क़ है जो अड़तालीस फ़ीसदी को समझने के लिए सबसे ज़रूरी है। 2014-15 के सर्वेक्षण की रिपोर्ट, एनएसएस केआई (72/21.1), अपने पैराग्राफ़ 2.4.2 में साफ़ लिखती है कि रातभर की यात्रा का आँकड़ा दो हिस्सों में जुटाया गया: छुट्टी-मनोरंजन, स्वास्थ्य और ख़रीदारी के लिए पिछले 365 दिन, और व्यापार, सामाजिक, "तीर्थ और धार्मिक गतिविधियों", शिक्षा-प्रशिक्षण तथा बाक़ी के लिए पिछले तीस दिन। तीर्थ उस वक़्त साल-भर वाले समूह में था ही नहीं। वह तीस दिन वाले, यानी छोटी और बार-बार होने वाली यात्राओं के समूह में था।
रिपोर्ट के स्टेटमेंट 3.2 में हर मक़सद की अनुमानित यात्रा-संख्या दर्ज है। तीस दिन वाले समूह में सामाजिक यात्राएं क़रीब 5.02 करोड़ थीं, और तीर्थ तथा धार्मिक यात्राएं क़रीब 48.46 लाख। इस डेस्क के हिसाब से, पूरे समूह में तीर्थ की हिस्सेदारी महज़ 8.3 फ़ीसदी बैठती थी। सामाजिक यात्राओं की हिस्सेदारी 85.9 फ़ीसदी थी। अपने ही समूह में तीर्थ तब दूसरे नंबर पर था, पहले नंबर से बहुत पीछे। फ़र्क़ बहुत बड़ा था।
अब 2025-26 के सर्वेक्षण में तीर्थ और धार्मिक मक़सद साल-भर वाले समूह में डाल दिया गया है, छुट्टी-मनोरंजन, स्वास्थ्य और ख़रीदारी के साथ। उसी समूह में यह अब सबसे ऊपर है, अड़तालीस फ़ीसदी पर। वजह गिनती के तरीक़े में छिपी है। तीस दिन की खिड़की किसी परिवार की उस महीने की यात्रा तभी पकड़ेगी जब वह परिवार उसी महीने तीर्थ पर गया हो। ज़्यादातर परिवार साल में एक बार तीर्थ जाते हैं, हर महीने नहीं। तीस दिन की खिड़की से देखने पर ऐसी यात्रा अक्सर दिखती ही नहीं। तीस दिन की खिड़की साल के बारह हिस्सों में से बस एक को देखती है। कोई परिवार अगर साल में ठीक एक बार तीर्थ पर जाता है, तो उसकी यात्रा उस खिड़की में पकड़ में आने का मौक़ा बारह में से एक ही रहता है। बाक़ी ग्यारह महीनों में सर्वेक्षक से पूछे जाने पर वही परिवार तीर्थ यात्रा के ख़ाने में शून्य दर्ज कराएगा, भले उसने साल में एक बड़ी यात्रा की हो। साल-भर की खिड़की उसे पकड़ लेती है। बस यही फ़र्क़ है।
इसलिए 8.3 फ़ीसदी और 48 फ़ीसदी की तुलना ग़लत है। दोनों संख्याएं अलग-अलग समूहों का हिस्सा हैं, अलग-अलग खिड़की से नापी गई हैं। एक को दूसरे से छह गुना बताना यह मान लेना है कि भारतीय परिवार अचानक कहीं ज़्यादा तीर्थ जाने लगे। रिपोर्ट ख़ुद ऐसा दावा नहीं करती, और यह लेख भी नहीं करेगा। दरअसल यह ठीक वही चेतावनी है जो 2014-15 की रिपोर्ट अपने बारे में भी देती है: उसमें दर्ज है कि उस सर्वेक्षण के नतीजों की तुलना उससे पिछले, 65वें दौर से नहीं की जा सकती, क्योंकि बीच में गिनने का तरीक़ा बदल गया था। सर्वेक्षण एजेंसी ख़ुद यह मानती आई है कि तरीक़ा बदलने पर तुलना टूट जाती है।
यह एक ग़लती नहीं है।
यह गिनने का एक नया तरीक़ा है, अपनी वजह के साथ।
स्वास्थ्य और चिकित्सा की यात्राएं दोनों दौर में एक ही समूह में हैं
तीर्थ और धार्मिक मक़सद के उलट, स्वास्थ्य और चिकित्सा यात्राएं दोनों सर्वेक्षणों में साल-भर वाले समूह में रहीं। यही एक जगह है जहाँ तुलना करना ग़लत नहीं है, बस सावधानी से करनी पड़ती है।
2025-26 में स्वास्थ्य और चिकित्सा मक़सद पूरे देश में तीस फ़ीसदी रातभर की यात्राओं की वजह है, तीर्थ के बाद दूसरे नंबर पर। ग्रामीण इलाक़ों में यह हिस्सेदारी 38.4 फ़ीसदी तक जाती है, वहाँ भी दूसरे नंबर पर, क्योंकि पहले नंबर पर तीर्थ है। यही मक़सद ख़र्च में भी सबसे आगे है: रातभर की यात्रा पर औसत ख़र्च ग्रामीण परिवारों में 29,454 रुपये और शहरी परिवारों में 41,649 रुपये, दोनों जगह किसी और मक़सद से ज़्यादा। ख़र्च में यह सबसे भारी यात्रा है।
2014-15 में तस्वीर अलग थी। उस साल-भर वाले समूह में तब सिर्फ़ तीन मक़सद थे: छुट्टी-मनोरंजन, स्वास्थ्य-चिकित्सा और ख़रीदारी। स्टेटमेंट 3.2 के मुताबिक़ स्वास्थ्य-चिकित्सा यात्राएं क़रीब 3.66 करोड़ थीं, पूरे समूह की क़रीब 5.63 करोड़ यात्राओं में से। इस डेस्क के हिसाब से यह हिस्सेदारी 65.1 फ़ीसदी बैठती है, यानी बहुमत। छुट्टी-मनोरंजन की हिस्सेदारी 34 फ़ीसदी थी, ख़रीदारी की महज़ एक फ़ीसदी।
तो क्या स्वास्थ्य यात्रा की हिस्सेदारी ग्यारह साल में 65 से घटकर 30 फ़ीसदी पर आ गई? जवाब उतना सीधा नहीं है। समूह में अब एक चौथा मक़सद जुड़ चुका है, तीर्थ, और वह अकेला अड़तालीस फ़ीसदी ले जाता है। हिस्सा बड़ा है। जब एक बड़ा हिस्सा नए सिरे से जुड़ता है, बाक़ी सबकी हिस्सेदारी अपने आप घट जाती है, भले उनकी असली संख्या न बदली हो। 2025-26 की रिपोर्ट में स्वास्थ्य यात्राओं की असली संख्या, यानी करोड़ों में गिनती, अभी दर्ज नहीं मिली। वह तालिका अभी नहीं है। स्वास्थ्य यात्रा घटी, बढ़ी या जस की तस रही, यह सवाल इसलिए खुला है।
रोज़मर्रा की यात्रा असल में रिश्तेदारों तक जाने की यात्रा है
तीस दिन वाले समूह में मक़सद कुछ और ही कहानी बताते हैं। इसमें सामाजिक यात्राओं की हिस्सेदारी 89 फ़ीसदी है, बाक़ी सारे मक़सद मिलाकर भी इसके आस-पास नहीं पहुँचते। दोनों इलाक़ों में ठहरने की सबसे बड़ी जगह रिश्तेदार या दोस्त का घर है, होटल या धर्मशाला नहीं। यात्रा का साधन बस है: ग्रामीण परिवारों की अड़तालीस फ़ीसदी और शहरी परिवारों की चवालीस फ़ीसदी यात्राएं बस से हुईं। बस का दबदबा साफ़ है।

यह पैटर्न बताता है कि जो यात्रा बार-बार होती है, वह किसी दर्शनीय जगह की तरफ़ नहीं, किसी अपने की तरफ़ जाती है। साल में एक बार होने वाली बड़ी यात्रा में होटल, गेस्ट हाउस और ट्रेन की भूमिका बढ़ जाती है। रोज़मर्रा की यात्रा में नहीं।
उसी दिन लौट आने वाली यात्राओं की तस्वीर तीसरी है, और यहाँ ग्यारह साल पुरानी तुलना भी मुमकिन है, क्योंकि इसकी खिड़की दोनों दौर में तीस दिन ही रही। 2025-26 में हर सौ ग्रामीण परिवारों में से 65.1 ने बीते महीने कम से कम एक उसी-दिन की यात्रा की। 2014-15 में यह आँकड़ा 57.1 था। शहरी परिवारों में यह 46.2 फ़ीसदी है, पहले 40.6 फ़ीसदी था। दोनों तरफ़ बढ़त असली है, क्योंकि नापने का तरीक़ा नहीं बदला। इन छोटी यात्राओं में भी दो मक़सद आगे हैं, सामाजिक और ख़रीदारी। पूरे देश में सामाजिक 33 फ़ीसदी और ख़रीदारी 26 फ़ीसदी यात्राओं की वजह है। बाक़ी मक़सद बहुत पीछे हैं। ग्रामीण इलाक़ों में सामाजिक मक़सद की हिस्सेदारी 32 फ़ीसदी है और ख़रीदारी की 29 फ़ीसदी। शहरी इलाक़ों में सामाजिक 37 फ़ीसदी तक जाता है और ख़रीदारी घटकर 17 फ़ीसदी रह जाती है।
ख़र्च की तस्वीर यात्राओं की गिनती से अलग है
सबसे ज़्यादा यात्राएं किस मक़सद से होती हैं, और सबसे ज़्यादा ख़र्च किस पर होता है, ये दो अलग सवाल हैं। तीस दिन वाले समूह में सबसे महंगी यात्रा व्यापार की है, पूरे देश में औसतन 5,949 रुपये प्रति यात्रा। ग्रामीण परिवारों में यह औसत 5,179 रुपये है और शहरी परिवारों में 6,934 रुपये। सामाजिक यात्राएं सबसे ज़्यादा होती हैं, पर सबसे महंगी नहीं। गिनती और ख़र्च अलग बात है।
साल-भर वाले समूह में स्वास्थ्य-चिकित्सा यात्रा हर मक़सद से महंगी पड़ती है, जैसा पिछले हिस्से में दर्ज है। छुट्टी-मनोरंजन की यात्रा में ख़र्च की तस्वीर पैकेज के अलावा हुए ख़र्च की एक तालिका से मिलती है। ग्रामीण परिवारों में परिवहन पर 32.6 फ़ीसदी ख़र्च होता है, खाने पर 19.5 फ़ीसदी, ख़रीदारी पर 24.6 फ़ीसदी, ठहरने पर 16.1 फ़ीसदी, और बाक़ी मनोरंजन तथा इलाज पर मिलाकर छह फ़ीसदी से कम। शहरी परिवारों में परिवहन का हिस्सा और बड़ा है, 37.3 फ़ीसदी, खाने पर 17.9 फ़ीसदी और ख़रीदारी पर 21.2 फ़ीसदी। यानी छुट्टी की यात्रा में सबसे बड़ा ख़र्च पहुँचने-लौटने में ही निकल जाता है। सफ़र ख़ुद सबसे महंगा है।
उसी दिन लौटने वाली यात्राओं में ख़र्च की कहानी सीधी है। ग्रामीण परिवारों के कुल ख़र्च का 51 फ़ीसदी और शहरी परिवारों के कुल ख़र्च का 41 फ़ीसदी अकेले ख़रीदारी पर जाता है, भले यात्रा किसी और मक़सद से शुरू हुई हो। इसके बाद नंबर आता है स्वास्थ्य-चिकित्सा का। एक छोटी यात्रा भी अक्सर बाज़ार में ख़त्म होती है।

यात्रा का साल: महीने, साधन, ठिकाना
छुट्टी और मनोरंजन की यात्राओं के लिए साल के दो महीने सबसे व्यस्त रहते हैं, मई और अक्तूबर। सफ़र का साधन इलाक़े के हिसाब से बदलता है। साल-भर वाली यात्राओं में ग्रामीण परिवार सबसे ज़्यादा बस से जाते हैं, बत्तीस फ़ीसदी यात्राओं में। शहरी परिवार ट्रेन को तरजीह देते हैं, पैंतीस फ़ीसदी यात्राओं में।

ठहरने में भी फ़र्क़ है। शहरी आगंतुकों में होटल और गेस्ट हाउस सबसे आगे हैं, छत्तीस फ़ीसदी हिस्से के साथ। ग्रामीण आगंतुकों में सबसे बड़ा हिस्सा उन जगहों का है जिन्हें रिपोर्ट "अन्य ग़ैर-व्यावसायिक ठहराव" कहती है, यानी अपना दूसरा घर, दफ़्तर की दी हुई अस्थायी जगह, या धार्मिक-मिशनरी संस्थाओं का मुफ़्त इंतज़ाम, अट्ठाईस फ़ीसदी हिस्से के साथ।
राज्यों में उत्तर प्रदेश दोनों खिड़कियों में सबसे आगे है। साल-भर वाली यात्राओं में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 15.7 फ़ीसदी है, तमिलनाडु की 13.4 फ़ीसदी और राजस्थान की 8 फ़ीसदी। तीस दिन वाली यात्राओं में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 15.5 फ़ीसदी है, बिहार की 10.5 फ़ीसदी और तमिलनाडु की 9.6 फ़ीसदी। पैटर्न फिर दोहराता है। एक राज्य का दोनों सूचियों में ऊपर रहना बताता है कि उत्तर प्रदेश छोटी और बड़ी, दोनों तरह की यात्राओं का बड़ा ठिकाना है।
कुल यात्राओं की गिनती में भी ग्यारह साल पहले से तुलना मुमकिन है, क्योंकि यह गिनती किसी मक़सद पर नहीं, कुल यात्रा करने वाले परिवारों पर टिकी है। हर 100 ग्रामीण "पर्यटक परिवार", यानी जिन्होंने साल में कम से कम एक रातभर की यात्रा की, ने 2025-26 में औसतन 127 यात्राएं कीं। 2014-15 में यह आँकड़ा 118 था। शहरी पर्यटक परिवारों में यह संख्या 132 है, पहले 121 थी। दोनों तरफ़ बढ़त है। शहरी इलाक़ों में यह थोड़ी ज़्यादा है।
पर्यटन मंत्रालय की अपनी गिनती एक अलग यंत्र है
सांख्यिकी मंत्रालय के अलावा, पर्यटन मंत्रालय भी घरेलू यात्रा का आँकड़ा रखता है, अपने डेटा पोर्टल पर। पर यह गिनती परिवारों या यात्राओं की नहीं, "घरेलू पर्यटक विज़िट" की है, यानी किसी जगह पर पहुंचने की गिनती, जो राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों के पर्यटन विभाग ख़ुद दर्ज करते हैं। एक ही परिवार का एक ही सदस्य साल में दो अलग तीर्थ-स्थलों पर जाए तो यहाँ दो विज़िट गिने जाएंगे, भले सांख्यिकी मंत्रालय के सर्वेक्षण में यह एक ही परिवार की गिनी-चुनी यात्राएं हों। फ़र्क़ साफ़ है।
23 सितंबर को इसी पोर्टल पर देखने पर 2025 का आँकड़ा 428.7 करोड़ घरेलू पर्यटक विज़िट दिखा, पिछले साल से 45.55 फ़ीसदी ज़्यादा। पोर्टल इस उछाल की वजह ख़ुद नहीं बताता। यह लेख भी कोई वजह नहीं जोड़ता। पोर्टल ख़ुद को "बीटा वर्शन" बताता है, यानी अभी विकास के दौर में है। राज्यवार टूटन भी वहाँ चार्ट के तौर पर मौजूद है, पर पढ़ने लायक़ अलग-अलग अंकों में इस डेस्क को नहीं मिली, इसलिए यहाँ राज्यवार तुलना नहीं की गई है।
दोनों गिनतियों को आपस में मिलाना ग़लत होगा। सांख्यिकी मंत्रालय का सर्वेक्षण परिवारों से पूछकर यात्रा गिनता है। पर्यटन मंत्रालय का पोर्टल स्थलों से मिली रिपोर्ट पर टिका है। एक घर से देखता है, दूसरा मंज़िल से। दोनों सही हो सकते हैं। दोनों अलग सवालों के जवाब देते हैं।
पूरी रिपोर्ट अभी सार्वजनिक तालिकाओं के साथ नहीं मिली
बुधवार के प्रेस नोट में ख़ुद लिखा है कि तफ़सील एनएसएस रिपोर्ट संख्या 597, "डोमेस्टिक टूरिज़्म इन इंडिया" में है, और वह मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध बताई गई है। इस डेस्क ने वेबसाइट, उसकी खोज-सुविधा और वही पता जहाँ पुराने दौर की रिपोर्टें रखी जाती हैं, तीनों जगह देखा। बुधवार शाम तक सिर्फ़ सात पन्नों का प्रेस नोट मिला, पूरी रिपोर्ट नहीं। पूरी रिपोर्ट का इंतज़ार बाक़ी है।
यानी स्वास्थ्य-चिकित्सा यात्रा की असली संख्या वाली तालिका, जैसी 2014-15 की रिपोर्ट में स्टेटमेंट 3.2 के तौर पर छपी थी, अभी जाँची नहीं जा सकती। इस लेख में रुपये के हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था में पर्यटन के आकार का कोई अनुमान नहीं लगाया गया है, क्योंकि प्रेस नोट ख़ुद ऐसा कोई हिसाब नहीं देता।
जो दर्ज है, वही यहाँ है: परिभाषाएं, हिस्सेदारियाँ, और वे दो सर्वेक्षण जिनसे ये निकली हैं। पाठक जब ख़ुद यह रिपोर्ट खोजें, तो ध्यान रहे कि सात पन्नों का यह प्रेस नोट और सैकड़ों पन्नों की तफ़सीली रिपोर्ट, दोनों मंत्रालय एक ही वेबसाइट पर रखता है, बस अलग-अलग समय पर।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 23 सितंबर 2026, शाम 4:00: घरेलू पर्यटन व्यय सर्वेक्षण (जुलाई 2025-जून 2026) पर प्रेस नोट, PRID 2314212, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय: घरेलू पर्यटन व्यय सर्वेक्षण प्रेस नोट की मूल पीडीएफ़ प्रति, 23 सितंबर 2026, सात पन्ने, एनएसएस रिपोर्ट संख्या 597 का हवाला देते हुए, राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय: NSS KI (72/21.1), 'की इंडिकेटर्स ऑफ़ डोमेस्टिक टूरिज़्म इन इंडिया', 1 जुलाई 2014 से 30 जून 2015 के आंकड़ों पर आधारित, जून 2016 में प्रकाशित, 103 पन्ने, पर्यटन मंत्रालय: इंडिया टूरिज़्म डेटा पोर्टल, डोमेस्टिक सेक्शन, 23 सितंबर 2026 को देखा गया (डैशबोर्ड को साइट ख़ुद 'बीटा वर्शन' बताती है)