44.4 करोड़ भारतीय दूसरों के धुएँ में साँस लेते हैं, और जिस जगह यह धुआँ सबसे ज़्यादा है वह क़ानून की परिभाषा से बाहर है
लैंसेट पब्लिक हेल्थ में छपे नए वैश्विक अध्ययन ने 2023 के लिए भारत का आँकड़ा 44.4 करोड़ रखा है। सरकार का अपना सर्वेक्षण कहता है कि सबसे ज़्यादा धुआँ घर के भीतर मिलता है। कोटपा की धारा 3 में 'सार्वजनिक स्थान' की जो सूची है, उसमें घर नहीं आता।

कोटपा की धारा 3 में "सार्वजनिक स्थान" की परिभाषा एक सूची है: सभागार, अस्पताल की इमारतें, रेलवे का प्रतीक्षालय, मनोरंजन केंद्र, रेस्तराँ, सरकारी दफ़्तर, अदालत की इमारतें, शिक्षण संस्थान, पुस्तकालय, सार्वजनिक सवारी। इसके बाद क़ानून जोड़ता है, "और इसी तरह की जगहें जहाँ आम जनता आती है", और फिर एक कटौती करता है, "पर इसमें कोई खुली जगह शामिल नहीं है।"
पूरी सूची में एक शब्द नहीं है। घर।
लैंसेट पब्लिक हेल्थ में छपे एक नए अध्ययन के मुताबिक़ 2023 में 44.4 करोड़ भारतीय दूसरों के धुएँ की चपेट में थे।
1990 में यह संख्या 37.5 करोड़ थी। और स्वास्थ्य मंत्रालय का अपना सर्वेक्षण कहता है कि यह धुआँ जिस एक जगह सबसे ज़्यादा मिलता है वह रेस्तराँ या सरकारी दफ़्तर नहीं, घर है।
अध्ययन किसका है
लेख का शीर्षक है "204 देशों और क्षेत्रों में परोक्ष धूम्रपान का प्रसार और उससे जुड़ा रोग-भार, 1990 से 2023"। यह ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिज़ीज़ 2023 का पहला ऐसा प्रकाशन है जो पूरी तरह परोक्ष धूम्रपान पर है, यह बात लेख अपने आरंभिक हिस्से में ख़ुद कहता है। क्रॉसरेफ़ के रिकॉर्ड में इसके 1,104 लेखक दर्ज हैं। पहली लेखक लुइसा एस फ़्लोर हैं और सूची में अंतिम नाम एमानुएला गाकिडू का है। धन ब्लूमबर्ग फ़िलैंथ्रोपीज़ और गेट्स फ़ाउंडेशन से आया।
प्रकाशन की तारीख़ पर दो जवाब
यूरोप पीएमसी का रिकॉर्ड, जिसमें इस लेख की पीएमआईडी 42705247 है, प्रकाशन की पहली तारीख़ 7 सितंबर 2026 बताता है। क्रॉसरेफ़ में इस डीओआई का रिकॉर्ड यूटीसी समय के हिसाब से 7 सितंबर की रात 10 बजकर 48 मिनट पर बना। पर मेडिकल एक्सप्रेस और यूरोन्यूज़, दोनों ने प्रकाशन तिथि 8 सितंबर 2026 लिखी। यह फ़र्क़ किसी स्रोत ने समझाया नहीं है, और नीचे दिए गए सारे आँकड़े दोनों तारीख़ों पर एक जैसे हैं।
गिनती किस तरीक़े से हुई
अध्ययन का सार बताता है कि अनुमान जीबीडी 2023 के तुलनात्मक जोखिम आकलन ढाँचे से निकले। लोगों की चपेट का हिसाब आबादी-आधारित सर्वेक्षणों और घरों की बनावट के आँकड़ों को मिलाकर लगाया गया, और इसके लिए स्थानिक-कालिक गॉसियन प्रक्रिया प्रतिगमन नाम की सांख्यिकीय विधि इस्तेमाल हुई। नौ बीमारियों के लिए सापेक्ष जोखिम निकाले गए, और इस बार सूची में दमा भी जोड़ा गया। इसी से मौतों और स्वस्थ जीवन के खोए हुए वर्षों की गणना की गई।
दुनिया का आँकड़ा
2023 में दुनिया भर में 271 करोड़ लोग परोक्ष धूम्रपान की चपेट में थे, जिनमें शून्य से 14 साल के 76.7 करोड़ बच्चे शामिल हैं। इससे जुड़ी मौतें 16.6 लाख आँकी गईं और स्वस्थ जीवन के 4.48 करोड़ वर्ष खोए हुए माने गए। सबसे ज़्यादा नुक़सान इस्केमिक हृदय रोग से हुआ, जिसके हिस्से 1.2 करोड़ वर्ष आते हैं। बच्चों में सबसे बड़ा हिस्सा निचले श्वसन तंत्र के संक्रमणों का है, 51.6 लाख वर्ष।
भारत किस कतार में है
चीन में 66.4 करोड़, भारत में 44.4 करोड़ और इंडोनेशिया में 14.2 करोड़ लोग इस धुएँ की चपेट में हैं। तीनों देश मिलकर दुनिया की प्रभावित आबादी का लगभग आधा हिस्सा बनाते हैं। अध्ययन के अनुसार उम्र-समायोजित प्रसार सबसे ऊँचा दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया और ओशिनिया में है, 48.4 फ़ीसदी। डेक्कन क्रॉनिकल में छपी पीटीआई ख़बर दुनिया का समग्र प्रसार 33.9 फ़ीसदी बताती है। कुछ देशों में महिलाओं की चपेट पुरुषों से लगभग 1.8 गुना है।
मौतें बढ़ीं, दर घटी
भारत में परोक्ष धूम्रपान से जुड़ी मौतें 1990 में 2,17,700 थीं और 2023 में 3,25,600। यह लगभग 50 फ़ीसदी की बढ़त है। पर प्रति लाख आबादी पर मृत्यु दर इसी अवधि में 46.1 से घटकर 30 रह गई, यानी लगभग 35 फ़ीसदी कम। उम्र-समायोजित प्रसार भी 43.2 फ़ीसदी से गिरकर 30.6 फ़ीसदी हुआ। दो में से एक आँकड़ा सुधार दिखाता है और दूसरा बिगाड़, और दोनों सही हैं।
दोनों आँकड़े एक साथ सही कैसे हैं
विश्व बैंक के आँकड़ों में भारत की आबादी 1990 में लगभग 86.5 करोड़ थी और 2023 में लगभग 143.8 करोड़। यानी आबादी दो-तिहाई बढ़ी, जबकि चपेट में आए लोगों की संख्या 18.4 फ़ीसदी बढ़ी। हिस्सा घटा, गिनती बढ़ी। दर हर लाख लोगों पर निकलती है, इसलिए हर लाख में कम मौतें होने पर भी कुल मौतें बढ़ सकती हैं, बशर्ते लाखों की संख्या ही कई गुना हो जाए। अध्ययन का सार यही बात दुनिया के स्तर पर कहता है: प्रसार में 22.2 फ़ीसदी की गिरावट के बावजूद चपेट में आए लोगों की कुल संख्या घटी नहीं।
उम्र का ढाँचा भी बदला
अध्ययन नुक़सान की अपनी सूची में सबसे ऊपर इस्केमिक हृदय रोग रखता है, जबकि बच्चों की अलग सूची में सबसे ऊपर निचले श्वसन तंत्र के संक्रमण हैं। दोनों सूचियाँ अलग हैं। विश्व बैंक के आँकड़ों में 65 साल से ऊपर की आबादी का हिस्सा भारत में 1990 में 4.04 फ़ीसदी था और 2023 में 6.92 फ़ीसदी। इन हिस्सों को कुल आबादी से गुणा करने पर बुज़ुर्गों की संख्या लगभग 3.5 करोड़ से बढ़कर लगभग 9.9 करोड़ बैठती है। उम्र-समायोजित दर इसी असर को हटाने के लिए निकाली जाती है। दिल्ली के पुष्पावती सिंघानिया अस्पताल की फेफड़ा-विशेषज्ञ डॉ. नीतू जैन ने पीटीआई से कहा कि समायोजित दरों में गिरावट के बावजूद चपेट में आए लोगों की पूर्ण संख्या अब भी बढ़ रही है।
क़ानून जिस जगह रुक जाता है
अधिनियम की धारा 4 का पाठ छोटा है: "कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान नहीं करेगा।" इस वाक्य का दायरा धारा 3 की उसी परिभाषा से तय होता है। उसमें दस श्रेणियाँ गिनाई गई हैं और अंत में खुली जगह को साफ़ तौर पर बाहर किया गया है। निजी आवास का ज़िक्र न शामिल करने के लिए है, न बाहर करने के लिए। धारा 3 में धूम्रपान की परिभाषा भी है, जो सिगरेट, सिगार और बीड़ी को समान रूप से घेरती है। अधिनियम की अनुसूची में बीड़ी चौथे क्रम पर दर्ज है।
तीस कमरे और तीस कुर्सियाँ
धारा 4 के साथ एक परंतुक जुड़ा है। तीस कमरों वाले होटल में, तीस या उससे ज़्यादा लोगों के बैठने की क्षमता वाले रेस्तराँ में और हवाई अड्डों पर धूम्रपान के लिए अलग जगह रखी जा सकती है। इस छूट का पैमाना इमारत का आकार है, वहाँ मौजूद लोगों की संख्या या उनकी उम्र नहीं। एक बड़ा होटल क़ानूनी रूप से धुएँ का कमरा रख सकता है; दो कमरों के मकान में यह सवाल क़ानून के दायरे में आता ही नहीं।
दो सौ रुपये

धारा 21 की उपधारा एक कहती है कि धारा 4 का उल्लंघन करने वाला जुर्माने से दंडित होगा, "जो दो सौ रुपये तक हो सकता है"। उपधारा दो के अनुसार यह अपराध शमनीय है और इसका विचारण संक्षिप्त प्रक्रिया से होगा। धारा 27 इस अधिनियम के अपराधों को ज़मानती बताती है। धारा 28 में शमन की रक़म भी दो सौ रुपये से ऊपर नहीं जा सकती। यही दो सौ रुपये 2003 से आज तक अधिकतम सीमा हैं।
एक तुलना जो दस्तावेज़ों से निकलती है
जीएटीएस-2 की फ़ैक्ट शीट में एक पंक्ति आर्थिक आँकड़ों की है: रोज़ बीड़ी पीने वालों का बीड़ी पर औसत मासिक ख़र्च 284.1 रुपये है। सिगरेट पर यह ख़र्च 1,192.5 रुपये है। सार्वजनिक जगह पर धूम्रपान करते पकड़े जाने पर लगने वाला अधिकतम जुर्माना, दो सौ रुपये, एक बीड़ी पीने वाले के महीने भर के बीड़ी ख़र्च से भी कम बैठता है। जीएटीएस-1 के मुद्रास्फीति-समायोजित आँकड़े में यही ख़र्च 156.3 रुपये था।
जो विधेयक मसौदा ही रह गया
स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर कोटपा संशोधन विधेयक 2020 का मसौदा रखा है, जिसके पहले पन्ने पर "ड्राफ़्ट" छपा है। इसका खंड 4 कहता है कि मूल अधिनियम की धारा 4 का परंतुक हटा दिया जाए, यानी होटल और रेस्तराँ में धूम्रपान क्षेत्र की छूट ख़त्म हो। खंड 14 का पाठ इतना है: धारा 21 की उपधारा एक में "जो दो सौ रुपये तक हो सकता है" शब्दों के स्थान पर "दो हज़ार रुपये का" शब्द रखे जाएँ। खंड 20 शमन की रक़म भी दो हज़ार रुपये कर देता है।
जिस शब्द को मसौदा भी नहीं छूता
विधेयक का खंड 3 मूल अधिनियम की धारा 3 में संशोधन करता है, पर सिर्फ़ दो खंडों में। "विज्ञापन" की परिभाषा नई लिखी गई है, जिसमें इंटरनेट, वेबसाइट और सोशल मीडिया जोड़े गए हैं। "उत्पादन" की परिभाषा में पैकिंग, लेबलिंग और थोक से खुदरा पैकिंग शामिल की गई है। "सार्वजनिक स्थान" वाला खंड (एल) मसौदे में कहीं नहीं आता। जुर्माना दस गुना करने का प्रस्ताव है, दायरा बढ़ाने का नहीं।
सरकार का अपना सर्वेक्षण
ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे का दूसरा दौर अगस्त 2016 से फ़रवरी 2017 के बीच टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़, मुंबई ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए किया। यह 30 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में घर-घर जाकर हुआ, 15 साल और उससे ऊपर के लोगों पर। कुल 74,037 साक्षात्कार पूरे हुए और प्रतिक्रिया दर 92.9 फ़ीसदी रही। पहला दौर जून 2009 से जनवरी 2010 के बीच हुआ था, जिसमें 69,296 साक्षात्कार थे।
घर के भीतर का आँकड़ा
रिपोर्ट की तालिका 6.2 के अनुसार 38.7 फ़ीसदी वयस्क अपने घर के भीतर परोक्ष धुएँ की चपेट में थे। धूम्रपान न करने वालों में यह हिस्सा 35.0 फ़ीसदी था। महिलाओं का आँकड़ा 39.3 और पुरुषों का 38.1 फ़ीसदी है, पर धूम्रपान न करने वालों में यह अंतर चौड़ा हो जाता है: महिलाएँ 38.4 फ़ीसदी और पुरुष 31.0 फ़ीसदी। सर्वेक्षण की परिभाषा में घर की चपेट का मतलब है कि पिछले तीस दिनों में किसी ने घर के भीतर धूम्रपान किया हो, और बालकनी, आँगन या बग़ीचे जैसी खुली जगहें इसमें नहीं गिनी जातीं।
किन घरों में इजाज़त है

48.8 फ़ीसदी वयस्कों ने बताया कि उनके घर में धूम्रपान की इजाज़त है। शहरों में यह 38.2 फ़ीसदी है और गाँवों में 54.4 फ़ीसदी। पढ़ाई के साथ यह हिस्सा लगातार गिरता है: जिनकी कोई औपचारिक स्कूली पढ़ाई नहीं, उनमें 59.0 फ़ीसदी, और माध्यमिक या उससे ऊपर पढ़े लोगों में 37.4 फ़ीसदी। चपेट का आँकड़ा भी इसी ढलान पर चलता है, शहरों में 27.9 और गाँवों में 44.4 फ़ीसदी।
घर और बाकी जगहों का फ़ासला
तालिका 6.3 सात सार्वजनिक जगहों का हिसाब देती है। सभी वयस्कों में सरकारी इमारत में चपेट 5.3 फ़ीसदी, स्वास्थ्य केंद्र में 5.6, रेस्तराँ में 7.4, सार्वजनिक परिवहन में 13.3, निजी दफ़्तर में 3.6, बार में 2.1 और सिनेमाघर में 2.2 फ़ीसदी है। इन सात में से किसी एक जगह चपेट में आने वाले 25.7 फ़ीसदी हैं। घर का 38.7 इनमें से हर एक से ऊपर है, और सातों को मिलाकर बने 25.7 के आँकड़े से भी ऊपर।
पर जो वहाँ गए, उनका हिसाब अलग है
इसी तालिका में एक दूसरा स्तंभ है, जो सिर्फ़ उन लोगों को गिनता है जो उस जगह गए थे। वहाँ आँकड़े बदल जाते हैं: बार में 79.2 फ़ीसदी, रेस्तराँ में 39.3, सिनेमाघर में 35.4, सार्वजनिक परिवहन में 27.0, निजी दफ़्तर में 24.1, सरकारी इमारत में 21.2 और स्वास्थ्य केंद्र में 15.6 फ़ीसदी। रिपोर्ट ख़ुद लिखती है कि सभी वयस्कों वाला कम आँकड़ा दो चीज़ों का गुणनफल है, कितने लोग वहाँ गए और उनमें कितनों को धुआँ मिला। रेस्तराँ का 7.4 इसलिए छोटा है कि रेस्तराँ जाने वाले कम हैं।
एक ही रिपोर्ट अपने आँकड़े अलग-अलग बताती है
फ़ैक्ट शीट की मुख्य तालिका में घर वाले आँकड़े पर लगे फ़ुटनोट सात का पाठ है, "किसी भी समय चपेट में आए सभी वयस्कों में"। उसी फ़ैक्ट शीट का तुलना-चित्र और पूरी रिपोर्ट की परिभाषा-सूची, दोनों इन्हीं आँकड़ों को "पिछले 30 दिनों" का बताते हैं। दूसरा: रिपोर्ट का विवरण-अनुच्छेद सरकारी इमारतों में चपेट सात फ़ीसदी बताता है, जबकि उसी पन्ने की तालिका 6.3 में यह 5.3 फ़ीसदी है। तीसरा: अध्याय 6 का एक वाक्य 46 फ़ीसदी को "धूम्रपान करने वालों" का हिस्सा लिखता है, जबकि तालिका और उससे पहले का वाक्य यही 45.5 फ़ीसदी धूम्रपान न करने वालों का बताते हैं। किसी का स्पष्टीकरण दस्तावेज़ों में नहीं है।
2009 से 2016 के बीच जो बदला
तालिका 6.6 दोनों दौरों को आमने-सामने रखती है। घर के भीतर चपेट 52.3 फ़ीसदी से गिरकर 38.7 फ़ीसदी हुई, सापेक्ष गिरावट 26.0 फ़ीसदी। धूम्रपान न करने वालों में यह 48.0 से 35.0 फ़ीसदी हुई। कार्यस्थल पर तस्वीर उलटी है: शहरी इलाक़ों में चपेट 27.6 से घटकर 25.3 फ़ीसदी हुई, पर ग्रामीण इलाक़ों में 32.1 से बढ़कर 34.3 फ़ीसदी। रिपोर्ट इस पर लिखती है कि निजी और सार्वजनिक कार्यस्थलों पर धूम्रपान की रोक शायद गाँवों की तुलना में शहरों में बेहतर लागू होती है।
राज्यों के बीच का फ़ासला
मिज़ोरम, मणिपुर, मेघालय, जम्मू-कश्मीर और त्रिपुरा में 75 से 84 फ़ीसदी वयस्कों ने बताया कि उनके घर में धूम्रपान की इजाज़त है, और इन सभी राज्यों में 70 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग घर के भीतर धुएँ की चपेट में हैं। आंध्र प्रदेश इसका उलटा है: वहाँ धूम्रपान का प्रसार तुलनात्मक रूप से ऊँचा होने के बावजूद सिर्फ़ 23 फ़ीसदी घरों में इजाज़त है और 16 फ़ीसदी वयस्क चपेट में हैं। कार्यस्थल पर सबसे ऊँचे आँकड़े जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में 58 फ़ीसदी और हरियाणा में 53 फ़ीसदी दर्ज हुए।
सिगरेट नहीं, बीड़ी

भारत में धुएँ का ढाँचा सिगरेट पर नहीं टिका है। फ़ैक्ट शीट के अनुसार 7.7 फ़ीसदी वयस्क बीड़ी पीते हैं और 4.0 फ़ीसदी सिगरेट। रोज़ पीने वालों में यह अंतर और चौड़ा है, बीड़ी 6.4 फ़ीसदी और सिगरेट 2.2 फ़ीसदी। पुरुषों में बीड़ी 14.0 फ़ीसदी और सिगरेट 7.3 फ़ीसदी है। किसी भी रूप में तंबाकू का इस्तेमाल 28.6 फ़ीसदी वयस्कों ने बताया, जो 26.68 करोड़ लोग बनते हैं; इनमें 9.95 करोड़ धुएँ वाले रूप में तंबाकू लेते हैं।
जानकारी की कमी नहीं है
इसी सर्वेक्षण में 92.4 फ़ीसदी वयस्कों ने माना कि दूसरों का धुआँ साँस में लेने से धूम्रपान न करने वालों को गंभीर बीमारी होती है, और 93.3 फ़ीसदी ने माना कि बच्चों को होती है। जो लोग ख़ुद धूम्रपान करते हैं, उनमें भी ये आँकड़े 91.0 और 91.8 फ़ीसदी हैं। मंत्रालय के अपने सवाल-जवाब पन्ने पर लिखा है कि धूम्रपान करने वालों के धुएँ में रहने वाले लोगों में तीव्र हृदय रोग का ख़तरा 25 से 35 फ़ीसदी ज़्यादा होता है।
कार्यक्रम की सूची में घर नहीं है
राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम 2007-08 में शुरू हुआ था, पहले 21 राज्यों के 42 ज़िलों में, और अब यह सभी 36 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के छह सौ से ज़्यादा ज़िलों में चलता है। मंत्रालय की वेबसाइट इसके मुख्य ज़ोर-क्षेत्र गिनाती है: स्वास्थ्यकर्मियों और शिक्षकों का प्रशिक्षण, सूचना-शिक्षा-संचार गतिविधियाँ, स्कूल कार्यक्रम, तंबाकू नियंत्रण क़ानूनों की निगरानी, पंचायती राज संस्थाओं के साथ गाँव-स्तर पर समन्वय, और ज़िला स्तर पर तंबाकू छुड़ाने की सुविधाएँ। इस सूची में घर के भीतर के धुएँ पर कोई अलग घटक नहीं है, जबकि उसी वेबसाइट का सवाल-जवाब पन्ना लिखता है कि घर में धूम्रपान शिशुओं, छोटे बच्चों, बुज़ुर्गों और ख़ासकर महिलाओं को प्रभावित करता है।
शिकायत कहाँ की जाए
मंत्रालय के सवाल-जवाब पन्ने पर बारहवाँ सवाल यही है कि कोटपा के उल्लंघन की शिकायत करने की कोई व्यवस्था है या नहीं। जवाब में न कोई हेल्पलाइन गिनाई गई, न कोई अधिकारी। जवाब यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय है और तंबाकू उत्पादों के नियमन की प्राथमिक ज़िम्मेदारी संबंधित राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश सरकारों की है। सवाल शिकायत की व्यवस्था के बारे में है और जवाब अधिकार-क्षेत्र के बारे में।
जो आँकड़ा नौ साल पुराना है
मंत्रालय की सर्वेक्षण और रिपोर्ट सूची में वयस्कों का सबसे नया सर्वेक्षण अब भी जीएटीएस-2, 2016-17 ही है। उस पन्ने पर अंतिम अद्यतन की तारीख़ 12 जून 2024 दर्ज है। स्कूली बच्चों के लिए सबसे नया दस्तावेज़ ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे का चौथा दौर है, 2019 का। लैंसेट वाला 44.4 करोड़ का आँकड़ा भारत में नए सिरे से गिना हुआ नहीं है; वह सर्वेक्षणों और घरों की बनावट के आँकड़ों पर बने एक मॉडल से निकला अनुमान है।
दो कागज़, दो हिसाब
प्लॉस वन में जून 2020 में छपे एक पुनर्विश्लेषण में, जिसे वर्मा एम और उनके साथियों ने लिखा, धूम्रपान न करने वालों में घर के भीतर चपेट जीएटीएस-1 के लिए 47.1 फ़ीसदी और जीएटीएस-2 के लिए 34.7 फ़ीसदी दी गई है। सरकारी रिपोर्ट की तालिका 6.6 इन्हीं दो आँकड़ों को 48.0 और 35.0 फ़ीसदी बताती है। दोनों एक ही सर्वेक्षण के कच्चे आँकड़ों पर बने हैं, और अंतर का कारण किसी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है।
स्रोतलैंसेट पब्लिक हेल्थ, 'ग्लोबल, रीजनल एंड नेशनल प्रीवेलेंस ऑफ़ सेकंड-हैंड स्मोक', जीबीडी 2023 सेकंड-हैंड स्मोक कोलैबोरेटर्स; सार यूरोप पीएमसी रिकॉर्ड (पीएमआईडी 42705247) से लिया गया, तेलंगाना टुडे में छपी पीटीआई की ख़बर, अध्ययन के भारत से जुड़े आँकड़े, सितंबर 2026, डेक्कन क्रॉनिकल में उसी पीटीआई ख़बर का दूसरा प्रकाशन, आँकड़ों के मिलान के लिए, मेडिकल एक्सप्रेस, अध्ययन का डीओआई, पहले लेखक का नाम और प्रकाशन तिथि, सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम 2003 का अंग्रेज़ी पाठ, राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम की वेबसाइट पर रखा गया राजपत्र संस्करण, कोटपा संशोधन विधेयक 2020 का मसौदा, स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर, ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे भारत 2016-17 की फ़ैक्ट शीट, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, जीएटीएस-2 भारत 2016-17 की पूरी रिपोर्ट, अध्याय 6 और तालिकाएँ 6.2, 6.3, 6.6, राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के अक्सर पूछे जाने वाले सवाल, स्वास्थ्य मंत्रालय, मंत्रालय की सर्वेक्षण और रिपोर्ट सूची, पृष्ठ पर अंतिम अद्यतन 12 जून 2024 दर्ज, प्लॉस वन, वर्मा एम और साथी, जीएटीएस 1 और 2 के आधार पर परोक्ष धूम्रपान का पुनर्विश्लेषण, 10 जून 2020, विश्व बैंक का जनसंख्या आँकड़ा, भारत, 1990 और 2023