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मणिपुर की अंतिम मतदाता सूची छप गई, और कितने नाम कटे इसकी तीन अलग गिनतियाँ छपी हैं

एक रिपोर्ट कहती है 1.32 लाख, दूसरी 1.89 लाख, तीसरी कहती है मसौदे से पहले 1.58 लाख बाहर हुए और उसके बाद 30,650 और। अंतिम सूची में कुल मतदाता 19,60,620 हैं।

मतदान केंद्र पर क़तार में खड़े मतदाता, हाथों में पहचान पत्र
तस्वीर: भारत निर्वाचन आयोग, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

मणिपुर की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हो चुकी है।

राज्य की साठों विधानसभा सीटों के लिए उसमें कुल 19,60,620 मतदाता हैं। इनमें 9,53,350 पुरुष, 10,06,962 महिलाएँ और 308 तृतीय लिंग के मतदाता हैं।

यह संख्या सब जगह एक जैसी छपी है।

जो संख्या एक जैसी नहीं छपी, वह यह है कि इस पुनरीक्षण में कितने नाम हटे।

तीन गिनतियाँ

एक रिपोर्ट कहती है कि 1.32 लाख मतदाता हटाए गए, और यह कुल मतदाताओं का 6.33 फ़ीसदी बैठता है।

दूसरी रिपोर्ट कहती है कि 1.89 लाख नाम हटे।

तीसरी रिपोर्ट इसे दो हिस्सों में बाँटती है। उसके मुताबिक़ 1.58 लाख नाम मसौदा सूची बनने से पहले ही बाहर हो गए थे, और उसके बाद 30,650 और हटाए गए।

तीनों आँकड़े एक ही अंतिम सूची के बारे में हैं।

इस अख़बार का नियम है कि जब स्रोत आपस में न मिलें, तो उन्हें मिलाने की कोशिश करने के बजाय अंतर दर्ज कर दिया जाए। इसलिए यहाँ तीनों दर्ज हैं।

पर यह पूछा जाना चाहिए कि यह अंतर बना क्यों।

फ़र्क़ छोटा नहीं है। सबसे कम और सबसे ज़्यादा गिनती में क़रीब सत्तावन हज़ार नामों का अंतर है। मणिपुर की एक औसत विधानसभा सीट में क़रीब बत्तीस हज़ार मतदाता हैं।

यानी जिस संख्या पर अख़बार आपस में सहमत नहीं हैं, वह लगभग दो विधानसभा क्षेत्रों के बराबर है।

अंतर बनता कहाँ है

तीसरी रिपोर्ट अपने आप में इसका सुराग़ देती है।

सघन पुनरीक्षण एक चरण की प्रक्रिया नहीं है। पहले मौजूदा सूची की जाँच होती है और उसमें से नाम निकलते हैं, फिर मसौदा सूची छपती है, फिर उस पर दावे और आपत्तियाँ आती हैं, और उसके बाद अंतिम सूची बनती है।

तो "कितने नाम कटे" का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहाँ से गिनना शुरू करते हैं।

अगर पुरानी सूची से अंतिम सूची तक गिनें, तो एक संख्या आएगी। अगर मसौदे से अंतिम तक गिनें, तो बहुत छोटी संख्या आएगी।

1.58 लाख और 30,650 को जोड़िए तो 1.88 लाख के आसपास आता है, जो दूसरी रिपोर्ट के 1.89 लाख के बहुत क़रीब है।

यानी दो में से दो आँकड़े शायद एक ही चीज़ को दो तरीक़ों से बता रहे हैं। पहला आँकड़ा, 1.32 लाख, इनसे मेल नहीं खाता, और उसका कारण सार्वजनिक तौर पर साफ़ नहीं है।

जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है

इस उलझन का हल एक ही चीज़ है: आयोग की तरफ़ से एक सुलझी हुई तालिका।

उसमें यह होना चाहिए कि पुरानी सूची में कितने नाम थे, मसौदे में कितने, अंतिम में कितने। और हटाए गए नामों का कारणवार विभाजन होना चाहिए: कितने मृत, कितने स्थानांतरित, कितने दोहरे, कितने नहीं मिले।

यह जानकारी हर पुनरीक्षण में बनती है, क्योंकि उसके बिना काम ही नहीं हो सकता।

पर जो जानकारी बनती है और जो सार्वजनिक रूप से एक जगह छपती है, वे दो अलग चीज़ें हैं। यही वजह है कि अख़बारों को अलग-अलग सूत्रों से आँकड़े लेने पड़ते हैं, और उसी से यह अंतर पैदा होता है।

सघन पुनरीक्षण होता क्या है

मिज़ोरम में एक मतदान केंद्र
तस्वीर: भारत निर्वाचन आयोग, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

आम पुनरीक्षण में मौजूदा सूची को आधार मानकर उसमें जोड़-घटाव होता है। नए नाम जुड़ते हैं, मरे हुओं के हटते हैं, पते बदलते हैं।

सघन पुनरीक्षण अलग है। उसमें पूरी सूची दोबारा बनाई जाती है और हर मतदाता को अपनी पात्रता फिर से स्थापित करनी होती है।

फ़र्क़ यह है कि आम पुनरीक्षण में सूची में बने रहना डिफ़ॉल्ट है और हटना अपवाद। सघन पुनरीक्षण में यह उलट जाता है।

इसी वजह से इस प्रक्रिया में हटने वाले नामों की संख्या हमेशा बड़ी होती है, और इसी वजह से इसमें ग़लती की गुंजाइश भी ज़्यादा रहती है।

सिक्किम में इसी दौर में 11.2 फ़ीसदी नाम हटे, जो मणिपुर के आँकड़े से लगभग दोगुना है। यह अपने आप में बताता है कि यह प्रक्रिया राज्य दर राज्य कितने अलग नतीजे देती है।

मणिपुर में यह मामला अलग क्यों है

मणिपुर के आंद्रो गाँव के पास का इलाक़ा। संघर्ष के बाद लाखों लोग अपने दर्ज पते पर नहीं हैं
तस्वीर: Debanish Achom, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अब उस बात पर जो इस राज्य में इस प्रक्रिया को बाक़ी राज्यों से अलग बनाती है।

मणिपुर में 2023 से जो संघर्ष चल रहा है, उसमें लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं। बहुत से लोग राहत शिविरों में हैं। बहुत से दूसरे ज़िलों में चले गए और कुछ दूसरे राज्यों में।

सघन पुनरीक्षण में नाम हटाने के जो आधार होते हैं, उनमें एक यह है कि व्यक्ति उस पते पर नहीं मिला या उसका वहाँ स्थायी निवास नहीं है।

अब इन दोनों बातों को साथ रखिए।

एक आदमी जो दंगे में अपना घर छोड़कर भागा और अब सौ किलोमीटर दूर शिविर में है, वह अपने पुराने पते पर नहीं मिलेगा। जाँच करने वाला वहाँ जाएगा तो घर या तो ख़ाली मिलेगा या जला हुआ।

काग़ज़ पर यह "स्थानांतरित" या "नहीं मिला" दर्ज होगा।

और नाम कट जाएगा।

यह डर क्यों वाजिब है

इस पर चिंता जताई गई है और वह चिंता तकनीकी नहीं, राजनीतिक है।

मणिपुर में विस्थापन समुदायों के हिसाब से हुआ है। कुछ इलाक़ों से एक समुदाय के लोग निकले और कुछ से दूसरे के। इसलिए अगर विस्थापितों के नाम बड़ी संख्या में कटते हैं, तो उसका असर सब पर बराबर नहीं पड़ेगा।

वह असर उन विधानसभा क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा दिखेगा जहाँ से लोग निकले, और उसका फ़ायदा या नुक़सान किसी एक तरफ़ जाएगा।

यह अनुमान है, आरोप नहीं, क्योंकि इसे साबित करने के लिए वही कारणवार आँकड़ा चाहिए जो उपलब्ध नहीं है।

विस्थापित मतदाताओं के लिए अलग इंतज़ाम मुमकिन है और पहले भी हुए हैं। शिविरों में विशेष शिविर लगाकर नाम दर्ज कराना, या विस्थापित मतदाता के तौर पर अलग श्रेणी बनाना।

ऐसा इस बार कितना हुआ, यह भी उन सवालों में है जिनका जवाब एक तालिका से मिल जाता।

अब झारखंड

उसी हफ़्ते झारखंड के गोड्डा ज़िले से एक अलग तरह की ख़बर आई।

वहाँ एक बूथ स्तरीय एजेंट को गिरफ़्तार किया गया, जिसे बाद में ज़मानत मिल गई। आरोप यह है कि उसने क़रीब दो सौ फ़ॉर्म सात जमा किए, जिनमें एक ही समुदाय के मतदाताओं के नाम हटाने की माँग थी।

फ़ॉर्म सात वह प्रपत्र है जिससे कोई नागरिक किसी नाम को सूची से हटाने की माँग करता है। यह अधिकार हर मतदाता को है और उसका मक़सद यह है कि मरे हुए या जा चुके लोगों के नाम सूची में न रह जाएँ।

गोड्डा के मामले में जो बात सामने आई, वह इस अधिकार के इस्तेमाल का तरीक़ा है।

एजेंट ने कहा कि उसने ये फ़ॉर्म पार्टी के निर्देश पर जमा किए। उसे पच्चीस फ़ॉर्म दिए गए थे और उनके सारे ख़ाने पहले से भरे हुए थे। उसे बस उन्हें बूथ स्तरीय अधिकारी तक पहुँचाना था।

अधिकारी ने लेने से मना कर दिया।

अधिकारी ने मना क्यों किया

यह हिस्सा सबसे अहम है।

बूथ स्तरीय अधिकारियों ने आपत्ति की कि जिन मतदाताओं के नाम इन फ़ॉर्मों में थे, उनमें से कई बरसों से उसी इलाक़े में रह रहे हैं।

और उनमें से बहुत से 2003 की मतदाता सूची में भी दर्ज हैं।

2003 की सूची इस पूरी प्रक्रिया में एक ख़ास मुक़ाम रखती है, क्योंकि उसे कई मामलों में आधार माना जाता है। जो नाम उसमें है, उसके लिए यह साबित करने का बोझ अलग होता है।

तो यहाँ जो हुआ वह यह है कि थोक में हटाने की माँगें आईं और स्थानीय अधिकारी ने अपनी जानकारी के आधार पर उन्हें रोक दिया।

यह व्यवस्था के काम करने की मिसाल है। पर वह उस स्तर पर काम किया जहाँ एक व्यक्ति की समझ पर सब कुछ टिका था।

बूथ स्तरीय अधिकारी आम तौर पर उसी इलाक़े का कोई सरकारी कर्मचारी होता है, अक्सर शिक्षक या आँगनवाड़ी कार्यकर्ता। वह लोगों को जानता है, इसीलिए वह पहचान सका कि ये नाम फ़र्ज़ी माँग हैं।

अगर उसकी जगह कोई बाहरी अधिकारी होता, या अगर उस पर काम पूरा करने का दबाव ज़्यादा होता, तो नतीजा अलग हो सकता था।

पूरी प्रक्रिया की सबसे नीचे वाली कड़ी सबसे मज़बूत निकली। यह अच्छी ख़बर है, और साथ ही यह भी बताता है कि उसके ऊपर की कड़ियों में ऐसी कोई छलनी नहीं थी।

जाँच के आदेश

गोड्डा के मामले में जाँच के आदेश दिए गए हैं, और यह भी दर्ज होना चाहिए।

जब इस तरह की शिकायत आती है तो ज़िला निर्वाचन अधिकारी उसकी जाँच कराता है, और अगर फ़ॉर्म फ़र्ज़ी पाए जाएँ तो जमा करने वाले पर मुक़दमा बनता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में झूठी घोषणा के लिए सज़ा का प्रावधान है।

पर इस तरह के मामलों में असली सवाल आगे का है। एजेंट ने कहा कि फ़ॉर्म उसे भरे-भराए दिए गए थे।

अगर यह सच है, तो भरने वाला कोई और है, और वह अकेला व्यक्ति नहीं हो सकता क्योंकि दो सौ फ़ॉर्म भरने में समय और जानकारी दोनों लगती है। मतदाताओं के नाम, क्रम संख्या और पते कहीं से आए होंगे।

जाँच वहाँ तक पहुँचती है या एजेंट पर रुक जाती है, यह इस मामले का असली इम्तिहान है।

दो कहानियों का जोड़

मणिपुर वाली कहानी और गोड्डा वाली कहानी एक ही प्रक्रिया के दो सिरे हैं।

पहली में नाम प्रशासनिक कारणों से कट सकते हैं, क्योंकि आदमी वहाँ है ही नहीं जहाँ उसका पता कहता है।

दूसरी में नाम कटवाने की कोशिश जान-बूझकर होती है, और वह संगठित तरीक़े से होती है।

दोनों में शिकार वह आदमी है जिसे यह पता ही नहीं चलता कि उसका नाम हटाने की अर्ज़ी लगी है।

फ़ॉर्म सात पर सुनवाई का प्रावधान है और नोटिस देने का भी। पर जिस आदमी का पता बदल चुका है या जो शिविर में है, उस तक नोटिस पहुँचेगा कैसे।

मिज़ोरम में भी सूची आई

मिज़ोरम की राजधानी आइज़ोल। पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में निवास के रिकॉर्ड परंपरागत व्यवस्थाओं से चलते हैं, राजस्व काग़ज़ों से नहीं
तस्वीर: Bogman, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

इसी दौर में मिज़ोरम की अंतिम मतदाता सूची भी प्रकाशित हुई।

तीन पूर्वोत्तर राज्यों में एक साथ यह प्रक्रिया चलना अपने आप में ध्यान खींचता है, क्योंकि इस क्षेत्र में नागरिकता और निवास के सवाल बाक़ी देश से अलग तरह के हैं।

यहाँ अंतरराज्यीय आवाजाही ज़्यादा है, बहुत से लोग रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में रहते हैं, और कई इलाक़ों में ज़मीन तथा निवास के रिकॉर्ड परंपरागत व्यवस्थाओं से चलते हैं, न कि राजस्व काग़ज़ों से।

ऐसे इलाक़ों में "स्थायी निवास का प्रमाण" माँगना उतना सीधा नहीं है जितना किसी शहर में।

यह बात इन राज्यों के ख़िलाफ़ नहीं जाती। यह उस प्रक्रिया के बारे में है जो पूरे देश के लिए एक जैसी बनाई गई है और हर जगह एक जैसी नहीं बैठती।

नाम कट जाए तो क्या करें

यह सवाल पाठक के काम का है, इसलिए इसका जवाब यहाँ दर्ज है।

अंतिम सूची छपने के बाद भी नाम जुड़वाया जा सकता है। इसके लिए फ़ॉर्म छह भरना होता है, जो नए नाम जोड़ने का प्रपत्र है।

सूची में अपना नाम देखने के लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर खोज की सुविधा होती है, और मणिपुर में उन नामों की अलग सूची भी रखी गई है जो 2025 की सूची में थे पर मसौदे में नहीं आए।

अगर नाम ग़लत तरीक़े से कटा है, तो निर्वाचन निबंधन अधिकारी के सामने अपील की जा सकती है, और उससे ऊपर ज़िला निर्वाचन अधिकारी के सामने।

यह सब तभी काम आता है जब आदमी को पता चले कि उसका नाम कटा है। और यही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे कमज़ोर कड़ी है।

जो एक तालिका से हल हो जाता

इस लेख में जितने सवाल उठाए गए हैं, उनमें से ज़्यादातर का जवाब एक ही दस्तावेज़ से मिल सकता था।

हर ज़िले के लिए: पुरानी सूची में कितने नाम, अंतिम में कितने, कितने हटे, और किन कारणों से।

उसके साथ यह भी कि कितने फ़ॉर्म सात आए, कितने मंज़ूर हुए, कितने ख़ारिज।

यह जानकारी बनती है। उसे एक जगह रखने में कोई तकनीकी अड़चन नहीं है।

जब तक वह नहीं रखी जाती, हर पुनरीक्षण के बाद यही होगा कि तीन अख़बारों में तीन संख्याएँ छपेंगी, और पढ़ने वाले को यह तय करना होगा कि किस पर भरोसा करे।

यह सिर्फ़ आँकड़े का सवाल नहीं है

अंत में एक बात जो इस पूरे विषय को उसकी जगह पर रख देती है।

मतदाता सूची भारत में नागरिकता का प्रमाण नहीं है, और आयोग यह बार-बार कहता है। पर व्यवहार में वह उन दस्तावेज़ों में गिनी जाती है जिनसे आदमी अपनी पहचान और अपना पता साबित करता है।

इसलिए नाम कटने का असर सिर्फ़ वोट देने पर नहीं पड़ता। वह उन सब जगहों पर पड़ता है जहाँ यह दिखाना होता है कि आदमी कहाँ रहता है।

राशन, पेंशन, बच्चों का दाख़िला, बैंक का पता, सरकारी योजनाओं की पात्रता। इनमें से किसी में मतदाता पहचान पत्र काम आ सकता है।

और यही वजह है कि इस प्रक्रिया की एक छोटी सी प्रशासनिक ग़लती किसी परिवार के लिए बड़ी हो जाती है।

मणिपुर में जो लोग शिविरों में हैं, उनके पास पहले ही कुछ नहीं बचा है। उनकी सूची में एक और चीज़ जुड़ जाए, यह उस राज्य के लिए भारी पड़ेगा जो अभी अपने ही घावों से उबर नहीं पाया।

एक तालिका छापना इस सबका हल नहीं है। पर उसके बिना यह पता ही नहीं चलेगा कि हल की ज़रूरत कहाँ है।

स्रोतमुख्य निर्वाचन अधिकारी, मणिपुर, सघन पुनरीक्षण रिपोर्ट, द ट्रिब्यून, मणिपुर के आँकड़ों पर रिपोर्ट, असम ट्रिब्यून, अलग गिनती के साथ रिपोर्ट, आउटलुक, गोड्डा में थोक फ़ॉर्म पर जाँच की रिपोर्ट

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