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कांग्रेस ने सत्रावसान की 29 दिन की देरी को रिकॉर्ड कहा, राज्यसभा के अपने दस्तावेज़ में 71 दिन का अंतराल दर्ज है

मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। शुक्रवार को उस स्थगन के 29 दिन पूरे हो गए और सत्रावसान का आदेश अब भी नहीं निकला। राज्यसभा सचिवालय की अपनी पुस्तक में इससे लंबी चार देरियाँ दर्ज हैं, और चारों में सदन दोबारा बुलाया गया था।

नए संसद भवन में राज्यसभा का सदन और बीच में सभापति का आसन, मई 2023 की तस्वीर। सत्रावसान का आदेश इसी सदन का सत्र बंद करता है, और 13 अगस्त से वह आदेश नहीं निकला
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

सत्रावसान की पूरी कार्रवाई एक वाक्य की होती है।

राज्यसभा सचिवालय की अपनी पुस्तक 'राज्यसभा ऐट वर्क' में उस आदेश का नमूना छपा हुआ है। पाठ यह है: "संविधान के अनुच्छेद 85 के खंड (2) के उपखंड (क) से मुझे मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए, मैं राज्यसभा का सत्रावसान करती हूँ।" नीचे तारीख़ लिखी जाती है और राष्ट्रपति हस्ताक्षर करती हैं।

यह वाक्य 13 अगस्त से नहीं लिखा गया।

उसी दिन संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। शुक्रवार, 11 सितंबर को उस स्थगन के 29 दिन पूरे हो गए। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने उसी दिन एक्स पर लिखा कि मोदी सरकार ने 2015 में बनाया अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है।

यह दावा जाँचा जा सकता है। जिस पुस्तक से ऊपर का आदेश लिया गया है, उसी में चार सत्र दर्ज हैं जहाँ यह अंतर 34, 49, 63 और 71 दिन रहा। चारों में एक बात समान है, और वह बात इस पूरे विवाद के केंद्र में बैठी है।

कांग्रेस का दावा और उसकी गिनती

संसदीय कार्य मंत्रालय की 13 अगस्त की विज्ञप्ति के मुताबिक़ मानसून सत्र सोमवार, 20 जुलाई को शुरू हुआ और गुरुवार, 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। 25 दिन की अवधि में 19 बैठकें हुईं। यह 18वीं लोकसभा का आठवाँ और राज्यसभा का 271वाँ सत्र था।

कांग्रेस ने पहली बार 23 अगस्त को सवाल उठाया, जब स्थगन को दस दिन हुए थे। 7 सितंबर को रमेश ने कहा कि सत्र को "वेंटिलेटर पर" रखा गया है। 9 सितंबर को उन्होंने पीटीआई से कहा कि "कुछ गड़बड़ ज़रूर है"। 11 सितंबर को उन्होंने रिकॉर्ड टूटने की घोषणा कर दी।

उनकी अपनी तुलना यह रही: सामान्य अंतर तीन से चार दिन का होता है, 2015 के मानसून सत्र में यह 28 दिन था और 2021 में 20 दिन। इस साल के बजट सत्र का हिसाब उन्होंने ख़ुद गिनाया, जो 18 अप्रैल को ख़त्म हुआ और 20 अप्रैल को जिसका सत्रावसान हो गया।

आरोप का असल हिस्सा परिसीमन है। 17 अप्रैल को लोकसभा में संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक चौवन वोट से गिरा था। वह विधेयक क्या करता, दो-तिहाई का हिसाब कहाँ अटका और दक्षिण के राज्यों की आपत्ति क्या है, यह हमने 8 सितंबर के अंक में लिखा था। रमेश का कहना है कि गृह मंत्री अमित शाह तब से गिनती बदलने में लगे हैं, और उन्होंने विधेयक के ख़िलाफ़ वोट देने वाले तीन दलों में टूट कराने का आरोप लगाया। एएनआई की 7 सितंबर की रिपोर्ट में वे दोनों घटनाएँ दर्ज हैं जिनकी तरफ़ इशारा है: शिवसेना (उद्धव) के छह सांसदों का एकनाथ शिंदे की शिवसेना में जाना, और तृणमूल के 20 बाग़ी सांसदों का एनसीपीआई में विलय का ऐलान।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पर सिर्फ़ इतना कहा कि विधेयक दोबारा कब लाया जाएगा, यह नेतृत्व पूरे विचार-विमर्श के बाद तय करेगा।

राज्यसभा सचिवालय की अपनी किताब में चार लंबे अंतराल

'राज्यसभा ऐट वर्क' का छठा अध्याय सत्रों पर है, और उसमें सत्रावसान की देरी के उदाहरण नाम और तारीख़ के साथ छपे हैं।

राज्यसभा का 151वाँ सत्र 18 जुलाई 1989 को शुरू हुआ और 18 अगस्त 1989 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ। सत्रावसान नहीं हुआ। संसदीय कार्य मंत्री के प्रस्ताव पर सभापति ने 11 अक्तूबर को सदन दोबारा बुला लिया। दूसरा भाग 13 अक्तूबर को स्थगित हुआ और राष्ट्रपति ने 20 अक्तूबर 1989 को सत्रावसान किया। पहले स्थगन से आदेश तक 63 दिन।

155वाँ सत्र 7 अगस्त 1990 को शुरू हुआ, 7 सितंबर को स्थगित हुआ, 1 अक्तूबर को दोबारा बुलाया गया और 11 अक्तूबर 1990 को इसका सत्रावसान हुआ। 34 दिन। 200वाँ सत्र 23 दिसंबर 2003 को स्थगित हुआ, 30 जनवरी 2004 को दोबारा बैठा और 10 फ़रवरी 2004 को ख़त्म हुआ। 49 दिन। 230वाँ सत्र 18 दिसंबर 2013 को तय समय से पहले स्थगित हुआ, 5 फ़रवरी 2014 को दोबारा बुलाया गया, 21 फ़रवरी को फिर स्थगित हुआ और 27 फ़रवरी 2014 को इसका सत्रावसान हुआ। 71 दिन।

चारों बार सदन दोबारा बैठा। पुस्तक इस प्रक्रिया को अलग से समझाती है: अनिश्चितकाल के स्थगन के बाद और सत्रावसान से पहले सदन दोबारा बुलाया जा सकता है, दोबारा बैठक उसी सत्र का दूसरा भाग मानी जाती है, सदस्यों को नया समन जारी नहीं होता, और उन्हें चिट्ठी या एसएमएस से ख़बर कर दी जाती है।

देरी की लंबाई और इस रास्ते के इस्तेमाल में कोई सीधा रिश्ता भी नहीं है। 153वाँ सत्र 30 मार्च 1990 को स्थगित हुआ, 9 अप्रैल को दोबारा बैठा, 10 अप्रैल को ख़त्म हुआ और 12 अप्रैल को इसका सत्रावसान हुआ। पूरा अंतर तेरह दिन का, और उसी तेरह दिन में सदन लौटकर काम भी कर गया। 2006 के 207वें सत्र में लाभ के पद के विवाद पर सदन 22 मार्च को समय से पहले स्थगित हुआ और सभापति ने उसे 10 मई को दोबारा बुलाया, यानी उनचास दिन बाद, और वह 23 मई तक चला।

यानी 29 दिन रिकॉर्ड तभी है जब गिनती में सिर्फ़ वे सत्र रखे जाएँ जो दोबारा बुलाए ही नहीं गए। जो चार सत्र इससे लंबे खिंचे, उन चारों में सदन लौटा। कांग्रेस का आरोप ठीक यही है कि सरकार इस बार भी सदन लौटाने की गुंजाइश बचाकर रखना चाहती है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड उनके शब्द को काटता है और उनके संदेह को सहारा देता है।

एक और आँकड़ा उसी पन्ने पर है। पुस्तक कहती है कि अनिश्चितकाल के स्थगन और सत्रावसान के बीच का अंतर आम तौर पर दो से दस दिन रहता है, और कई बार सदन उसी दिन या अगले दिन ख़त्म कर दिया गया। कांग्रेस जिस "तीन से चार दिन" को सामान्य बताती है, सचिवालय का अपना दायरा उससे चौड़ा है।

सत्रावसान का आदेश एक वाक्य का है

सत्रावसान राष्ट्रपति करती हैं, पर फ़ाइल कहीं और से चलती है।

सरकार के कामकाज के बँटवारे के नियमों के तहत दोनों सदनों को बुलाने और उनका सत्रावसान करने की तारीख़ें तय करना संसदीय कार्य मंत्रालय का काम है। पुस्तक के मुताबिक़ मंत्रिमंडल की संसदीय कार्य संबंधी समिति से मंज़ूरी मिलने के बाद मंत्रालय सरकार का फ़ैसला महासचिव को भेजता है। महासचिव के हस्ताक्षर वाला नोट सत्रावसान आदेश के साथ राष्ट्रपति के सचिव को जाता है। राष्ट्रपति हस्ताक्षर करती हैं, और उसी दिन आदेश भारत के राजपत्र, असाधारण में महासचिव के हस्ताक्षर से छपता है। सदस्यों को संसदीय बुलेटिन के एक पैराग्राफ़ से पता चलता है, और बाक़ी देश को प्रेस विज्ञप्ति से।

भारत के राजपत्र, असाधारण का एक पन्ना, जिस पर 5 अगस्त 2019 का संविधान संबंधी आदेश राष्ट्रपति और विधायी विभाग के सचिव के नाम के साथ छपा है। सत्रावसान का आदेश भी इसी तरह, उसी दिन, राजपत्र में छपता है
तस्वीर: Government of India, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

अनिश्चितकाल का स्थगन इस रास्ते से नहीं जाता। वह पीठासीन अधिकारी की कुर्सी से होता है और उसमें राष्ट्रपति का कोई काम नहीं। दोनों का फ़र्क़ और स्थगित सदन को दोबारा बुलाने का अधिकार 8 सितंबर के लेख में दर्ज है। यहाँ बात उस काग़ज़ की है जो अब तक बना नहीं।

अनुच्छेद 85 अपने मौजूदा रूप में संविधान का मूल पाठ भी नहीं है। संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 6 ने पुराने अनुच्छेद की जगह यह पाठ रखा।

एक छोटा ब्योरा पुस्तक की पादटिप्पणी में है। 1961 के 35वें और 36वें सत्र तथा 1965 के 51वें सत्र के सत्रावसान आदेशों पर राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे उपराष्ट्रपति के हस्ताक्षर हैं।

उत्पादकता के दो अलग आँकड़े, सरकार का और पीआरएस का

संसदीय कार्य मंत्रालय की विज्ञप्ति सत्र के आख़िरी दिन जारी हुई और उसमें आख़िरी पंक्ति यह है: लोकसभा की उत्पादकता क़रीब 19 फ़ीसदी रही और राज्यसभा की क़रीब 39 फ़ीसदी।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च का आँकड़ा अलग है। उसके मुताबिक़ लोकसभा अपने निर्धारित समय के 15 फ़ीसदी और राज्यसभा 33 फ़ीसदी चली। पीआरएस अपने स्रोत गिनाता है, दोनों सदनों के बुलेटिन और कार्यवाही, दोनों सदनों की वेबसाइट, और संसदीय कार्य मंत्रालय की ही सांख्यिकी पुस्तिका। दोनों आँकड़े एक ही चीज़ नापने का दावा करते हैं और चार अंक का फ़र्क़ दोनों सदनों में बना हुआ है। यह फ़र्क़ किसी ने समझाया नहीं है, और यहाँ दोनों संख्याएँ वैसे ही दर्ज हैं जैसे उनके स्रोतों में हैं।

नए संसद भवन में लोकसभा का ख़ाली सदन और ऊपर दर्शक दीर्घाएँ, मई 2023 की तस्वीर। उत्पादकता का जो आँकड़ा विवाद में है, वह इसी सदन के चलने के समय का है
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

प्रश्नकाल पर दोनों में झगड़ा नहीं। पीआरएस के मुताबिक़ लोकसभा में प्रश्नकाल निर्धारित समय का 1 फ़ीसदी चला और राज्यसभा में 12 फ़ीसदी। पूरे सत्र में लोकसभा का प्रश्नकाल कुल नौ मिनट चला और दो प्रश्नों के मौखिक जवाब हो सके। सत्र में कोई बहस, कोई चर्चा और ग़ैर-सरकारी सदस्यों का कोई काम नहीं हुआ।

लोकसभा ने ढंग से सिर्फ़ दो मौक़ों पर काम किया, 28 जुलाई की दोपहर और 29 जुलाई को दो बजे तक, जब सार्वजनिक परीक्षा विधेयक पर चर्चा हुई और वह पारित हुआ। बाक़ी दिन सदन कुछ मिनट बैठा और बार-बार स्थगित होता रहा।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 25 अगस्त को लिखा कि सत्र में 7,023 मिनट का कामकाजी समय ज़ाया हुआ, यानी क़रीब 117 घंटे। उसी रिपोर्ट में 2015 से 2025 तक का औसत है: मानसून सत्रों में लोकसभा औसतन 69.4 फ़ीसदी समय चली, बजट सत्रों में 95.8 और शीतकालीन सत्रों में 74.2। इस बार का 15 फ़ीसदी उस औसत का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है।

व्यवधान किस पर था, यह एएनआई की रिपोर्ट में दर्ज है: नीट पेपर लीक, राम मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ी, और 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई।

ग्यारह विधेयक, नौ पर कोई सांसद नहीं बोला

पीआरएस ने हर विधेयक के सामने दो चीज़ें लिखी हैं, पारित होने में लगा समय और बोलने वाले सांसदों की संख्या। लोकसभा की सूची पढ़ने लायक़ है।

जन्म-मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 दो मिनट में पारित हुआ और मंत्री के अलावा कोई नहीं बोला। सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक चार मिनट में, बोलने वाला कोई नहीं। एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक तीन मिनट, कराधान तथा अन्य विधि (संशोधन) विधेयक तीन मिनट, बैंककार बही साक्ष्य विधेयक पाँच मिनट, केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक पाँच मिनट, खान और खनिज (संशोधन) विधेयक पाँच मिनट, एनसीडीसी (संशोधन) विधेयक दस मिनट, अधिकरण सुधार विधेयक बारह मिनट। इन नौ में किसी पर कोई सांसद नहीं बोला। राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक पर दो सांसद बोले और वह चौदह मिनट में पारित हो गया, जिसमें मंत्री का जवाब भी शामिल है।

अपवाद एक ही रहा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक पर लोकसभा में 10 घंटे 54 मिनट चर्चा हुई और 48 सांसदों ने हिस्सा लिया।

वह विधेयक 2024 के मूल क़ानून में संशोधन करता है और उसकी शर्तें कड़ी हैं। जाँच दो महीने में और मुक़दमा तीन महीने में पूरा करना होगा। राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश विशेष फ़ास्ट ट्रैक अदालतें तय कर सकेंगी और विशेष लोक अभियोजक नियुक्त कर सकेंगी। केंद्र ज़रूरत पड़ने पर जाँच के लिए विशेष कार्यबल बना सकेगा। सज़ा बढ़ाई गई है और अपील के लिए हाई कोर्ट की खंडपीठ के सामने समयबद्ध रास्ता रखा गया है। मंत्रालय की विज्ञप्ति के मुताबिक़ दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति भी मिल चुकी है।

राज्यसभा में बोलने वाले ज़्यादा थे, समय उतना ही कम। जन्म-मृत्यु पंजीकरण विधेयक पर 16 सांसद बोले और कुल 50 मिनट लगे, यानी औसतन तीन मिनट प्रति सांसद। सुप्रीम कोर्ट वाले विधेयक पर 33 सांसद बोले, समय 2 घंटे 21 मिनट। केरल के नाम वाले विधेयक पर 24 सांसद, 2 घंटे 16 मिनट। वहाँ भी विस्तार से बहस सिर्फ़ सार्वजनिक परीक्षा विधेयक पर हुई, साढ़े छह घंटे और 35 सांसद।

पीआरएस की यह सूची ग्यारह विधेयकों की है क्योंकि उसमें वित्त और विनियोग विधेयक नहीं गिने जाते। मंत्रालय की गिनती बारह की है, और बारहवाँ विनियोग (सं. 3) विधेयक है, जो 2022-23 की अधिक अनुदान माँगों का था और 4 अगस्त को लोकसभा में पारित होकर 6 अगस्त को राज्यसभा से लौटा।

पारित हुआ क्या, यह भी दर्ज रहना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायाधीशों की संख्या 33 से 37 हुई। केरल का नाम संविधान की पहली अनुसूची में 'केरलम' हुआ। खान और खनिज संशोधन ने राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज वाली ज़मीन पर उगाही से रोक दिया, सिवाय उन शर्तों के जो केंद्र तय करे। बैंककार बही साक्ष्य विधेयक ने 1891 के क़ानून की जगह ली। अधिकरण सुधार विधेयक ने राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की नींव रखी। इनमें दो विधेयक उन अध्यादेशों की जगह आए जो सत्र से पहले जारी हुए थे।

सत्र से पहले 30 विधेयक लंबित थे, सत्र में 13 पेश हुए, 12 पारित हुए, और सत्र के आख़िर में 31 लंबित रह गए। जो पेश होकर अटका, वह भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 है, जो 3 अगस्त को लोकसभा में आया और वहीं है।

एफ़सीआरए विधेयक की संयुक्त समिति 18 सितंबर को बैठेगी

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 इस सत्र में पेश नहीं हुआ था। वह 25 मार्च को लोकसभा में आया था। इस सत्र में उसके साथ जो हुआ वह यह कि 12 अगस्त को सरकार ने संयुक्त समिति बनाने का प्रस्ताव रखा और विधेयक समिति को चला गया।

लोकसभा सचिवालय ने शुक्रवार को सूचना जारी की कि 31 सदस्यों वाली इस समिति की पहली बैठक 18 सितंबर को होगी, जिसमें गृह मंत्रालय के अधिकारी सदस्यों को विधेयक के प्रावधान समझाएँगे। अध्यक्ष बीजेपी सांसद संजय जायसवाल हैं। समिति में बीजेपी के 14 और कांग्रेस के पाँच सदस्य हैं, जेडीयू, तृणमूल और डीएमके के दो-दो, तथा समाजवादी पार्टी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, शिवसेना, एनसीपी, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) और तेलुगु देशम के एक-एक। समिति को अपनी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र के पहले हफ़्ते के आख़िरी दिन तक देनी है।

विपक्ष की आपत्ति विधेयक के "नामित प्राधिकारी" वाले प्रावधानों पर है। द हिंदू के 11 सितंबर के ब्योरे के मुताबिक़ किसी संस्था का एफ़सीआरए प्रमाणपत्र रद्द होने, वापस लिए जाने या अपने आप ख़त्म होने पर विदेशी अंशदान और उससे बनी सारी संपत्ति सरकार के नामित प्राधिकारी में निहित हो जाएगी, बिना पहले सुनवाई के और बिना किसी न्यायिक फ़ैसले के। तय अवधि में नया प्रमाणपत्र न मिले तो संपत्ति बेची या किसी सरकारी विभाग को हस्तांतरित की जा सकेगी और रक़म भारत की संचित निधि में जाएगी। दोबारा पंजीकरण पर संपत्ति वापस माँगने का मौजूदा अधिकार हट जाएगा और संस्थापक संस्था उसे हमेशा के लिए वापस नहीं पा सकेगी। विपक्ष ने विधेयक पूरी तरह वापस लेने की माँग की है।

समितियों को विधेयक भेजने का अनुपात 18वीं लोकसभा में अब 21 फ़ीसदी है। 17वीं में यह 16 फ़ीसदी था और 16वीं में 28 फ़ीसदी।

समिति का काम सत्रावसान से रुकता नहीं। राज्यसभा के नियम कहते हैं कि किसी समिति के सामने लंबित काम सिर्फ़ सत्रावसान के कारण समाप्त नहीं होगा और समिति काम करती रहेगी। तो 18 सितंबर की बैठक आदेश निकले या न निकले, होगी। उलझन आगे है। समिति की समयसीमा शीतकालीन सत्र से बँधी है, और शीतकालीन सत्र तब तक बुलाया नहीं जा सकता जब तक मानसून सत्र का सत्रावसान न हो।

अध्यादेश की शर्त और 1994 तथा 2015 के दो अपवाद

अनुच्छेद 123 का पहला खंड अध्यादेश की शर्त एक ही वाक्य में रख देता है। राष्ट्रपति अध्यादेश तभी जारी कर सकती हैं जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों।

यह शर्त काग़ज़ पर कैसे उतरती है, इसका नमूना इस साल के पहले अध्यादेश में है। भारत के राजपत्र, असाधारण में 16 मई 2026 को छपे सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश की प्रस्तावना यों शुरू होती है: "चूँकि संसद सत्र में नहीं है और राष्ट्रपति का समाधान हो गया है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक है।" वह 2026 का पहला अध्यादेश था। दूसरा आयकर संशोधन का था, जो एससीसी ऑनलाइन की 10 जून की रिपोर्ट के मुताबिक़ 5 जून 2026 को जारी हुआ और जिसने विदेशी संस्थागत निवेशकों तथा बैंक फ़ॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स को सरकारी प्रतिभूतियों की आमदनी पर कर से छूट दी।

दोनों बजट सत्र के सत्रावसान और मानसून सत्र के बीच के 91 दिन में जारी हुए, और दोनों की जगह इसी सत्र में विधेयक पारित हुए। 13 अगस्त के बाद के 29 दिन में ऐसी एक भी प्रस्तावना नहीं लिखी जा सकती, क्योंकि सत्र अब भी चालू है।

पर यहाँ पुस्तक एक और बात दर्ज करती है, और वह इस पूरे हिसाब को बदल देती है। दोनों सदनों का सत्रावसान एक साथ होना ज़रूरी नहीं है। 1994 में लोकसभा का सत्रावसान 24 मई को हुआ जबकि राज्यसभा सत्र में बनी रही, और 24 तथा 25 मई को राष्ट्रपति ने तीन अध्यादेश जारी कर दिए, मणिपुर नगरपालिका, चंडीगढ़ पर पंजाब नगर निगम विधि विस्तार, और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद। 2015 में उल्टा हुआ। राज्यसभा का सत्रावसान 28 मार्च को हुआ, लोकसभा सत्र में रही, और 3 अप्रैल को भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश जारी हो गया।

यानी सरकार को अध्यादेश चाहिए हो तो एक सदन का सत्रावसान भी पर्याप्त रहा है, और दोनों बार वह रास्ता हफ़्ते भर के भीतर इस्तेमाल हुआ। पुस्तक यह भी जोड़ती है कि सत्रावसान के आदेश से पहले जारी और अधिसूचित अध्यादेश शून्य होगा, और इसके लिए पटना हाई कोर्ट के 1950 के फ़ैसले का हवाला देती है।

अध्यादेश की उम्र भी संविधान ने बाँध रखी है। अनुच्छेद 123(2)(क) के मुताबिक़ हर अध्यादेश दोनों सदनों के सामने रखा जाएगा और संसद के दोबारा बैठने के छह हफ़्ते बाद ख़त्म हो जाएगा। इसीलिए मई और जून वाले दोनों अध्यादेशों की जगह इसी मानसून सत्र में विधेयक लाने पड़े, और मंत्रालय की विज्ञप्ति उन्हें अलग से गिनाती है।

सत्रावसान के दिन सूचनाएँ ख़त्म हो जाएँगी

आदेश जिस दिन निकलेगा, उस दिन संसद के काग़ज़ों में दो तरह की चीज़ें अलग-अलग बर्ताव पाएँगी।

विधेयक बचे रहेंगे। अनुच्छेद 107(3) का यह प्रावधान 8 सितंबर के लेख में दर्ज हो चुका है। पुस्तक उसमें एक बात जोड़ती है: यह सुरक्षा उन विधेयकों पर भी लागू है जो प्रवर या संयुक्त समिति के सामने पड़े हैं, यानी एफ़सीआरए विधेयक पर भी। विधेयक पेश करने की अनुमति माँगने वाली सूचनाएँ भी नहीं मरतीं, और अगले सत्र में उन्हें दोबारा देने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

बाक़ी सब मर जाता है। प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण, संकल्प, संशोधन, इन सबकी लंबित सूचनाएँ सत्रावसान के साथ समाप्त हो जाती हैं और अगले सत्र के लिए नए सिरे से देनी पड़ती हैं। पेश हो चुके पर बिना निपटान रह गए प्रस्ताव और संकल्प भी समाप्त हो जाते हैं, जब तक सदन अलग से कोई प्रस्ताव पारित न करे या सर्वसम्मति से आगे चर्चा जारी रखने पर राज़ी हो जाए। पुस्तक में ऐसे मौक़े तारीख़ों के साथ गिनाए गए हैं, 30 अप्रैल 1954 और 10 दिसंबर 1954 से लेकर 14 दिसंबर 2012 तक, जब सदन ने सहमति से किसी ग़ैर-सरकारी संकल्प पर चर्चा अगले सत्र के लिए बचा ली।

एक घड़ी इस सबसे बाहर चलती है। अनुच्छेद 85(1) का पाठ छह महीने की गिनती सदन की "अंतिम बैठक" से शुरू करता है। सत्रावसान की तारीख़ इस गिनती में आती ही नहीं। 8 सितंबर के लेख में हमने लिखा था कि सत्र खुला रहने से यह घड़ी उसी तरह नहीं चलती। अनुच्छेद का पाठ इससे अलग है, और यहाँ वही दर्ज है। अंतिम बैठक 13 अगस्त 2026 को हुई, इसलिए अगले सत्र की पहली बैठक फ़रवरी 2027 के मध्य तक हो जानी चाहिए, आदेश जब भी निकले।

उपाध्यक्ष की कुर्सी सात साल से खाली है

अनुच्छेद 93 कहता है कि लोकसभा "यथाशीघ्र" अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी।

पीआरएस के मुताबिक़ 17वीं लोकसभा ने अपना पूरा कार्यकाल उपाध्यक्ष के बिना निकाला। फ़रवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था और वह मामला अब भी लंबित है। 18वीं लोकसभा को दो साल हो चुके हैं और उसने भी उपाध्यक्ष नहीं चुना है। सात साल से ज़्यादा हो गए।

नए संसद भवन में लोकसभा का सदन और सामने पीठासीन अधिकारी का आसन, मई 2023 की तस्वीर। अनुच्छेद 93 इसी सदन से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों चुनने को कहता है
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

पीआरएस में विधायी और नागरिक सहभागिता के प्रमुख चक्षु रॉय ने बिज़नेस स्टैंडर्ड की 25 अगस्त की रिपोर्ट में कहा कि भारत की संसद साल में मोटे तौर पर 70 दिन बैठती है, और हर व्यवधान पर जो जाता है वह पैसा नहीं, सरकार से सवाल पूछने और क़ानून पर ढंग से बहस करने का मौक़ा है। लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी ने उसी रिपोर्ट में कहा कि पहली ज़िम्मेदारी सरकार की है, उसके बाद विपक्ष की, और दोनों ने ज़रूरी कोशिश नहीं की।

सत्र 13 अगस्त को स्थगित हुआ था और 11 सितंबर तक आदेश नहीं आया था। तय तारीख़ अब सिर्फ़ एक है, 18 सितंबर, जब एफ़सीआरए समिति पहली बार बैठेगी। वह बैठक सत्रावसान के बिना भी हो जाएगी।

स्रोतराज्यसभा सचिवालय, 'राज्यसभा ऐट वर्क', अध्याय 6 (सत्र): सत्रावसान की प्रक्रिया, आदेश का पाठ, 151वें, 153वें, 155वें, 200वें और 230वें सत्र के उदाहरण, और सत्रावसान के प्रभाव, पत्र सूचना कार्यालय, संसदीय कार्य मंत्रालय, 13 अगस्त 2026: मानसून सत्र 2026 के आँकड़े, विधेयकों की सूची और उत्पादकता, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: मानसून सत्र 2026 में संसद का कामकाज, विधेयकवार समय और सांसदों की संख्या, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: सत्र का लेखा-जोखा, पारित और लंबित विधेयकों की सूची, द हिंदू, 11 सितंबर 2026: कांग्रेस का रिकॉर्ड देरी का आरोप, द हिंदू, 11 सितंबर 2026: एफ़सीआरए संशोधन विधेयक की संयुक्त समिति की पहली बैठक, सदस्य संख्या और दलीय बनावट, द ट्रिब्यून, 11 सितंबर 2026: जयराम रमेश के बयान का पूरा ब्योरा, बिज़नेस स्टैंडर्ड (पीटीआई), 23 अगस्त 2026: बजट सत्र के सत्रावसान की तारीख़ और 2015-2021 की तुलना, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 25 अगस्त 2026: 7,023 मिनट का नुक़सान और 2015-2025 की उत्पादकता का औसत, नेशनल हेराल्ड, 9 सितंबर 2026: 17 अप्रैल के मतदान के आँकड़े, एएनआई, 7 सितंबर 2026: जयराम रमेश की पूरी पोस्ट, 2015 का हवाला और सत्र में व्यवधान के कारण, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, संख्या 18, 16 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026, एससीसी ऑनलाइन, 10 जून 2026: आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 के जारी होने की तारीख़ और प्रावधान, भारत का संविधान, पूर्ण पाठ (सरकारी पीडीएफ़): अनुच्छेद 85, 93, 107 और 123

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।