मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का रास्ता जज वाला, बाक़ी आयुक्तों का बिल्कुल अलग
6 अप्रैल 2026 को लोकसभा और राज्यसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के दो नोटिस बिना कोई वजह बताए ठुकरा दिए थे, आज़ाद भारत में किसी बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ यह पहला औपचारिक प्रयास था। पाँच महीने बाद कांग्रेस और वाम दल एक नई कोशिश की तैयारी में हैं। संविधान का अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी सुरक्षा देता है, पर उसी अनुच्छेद का अगला हिस्सा बाक़ी निर्वाचन आयुक्तों को महज़ मुख्य आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाने लायक़ बना देता है। यह लेख उसी प्रक्रिया, उसकी शर्तों और अब तक के इतिहास को खोलता है।

6 अप्रैल 2026 की शाम लोकसभा और राज्यसभा ने लगभग हूबहू एक जैसे शब्दों वाले दो बुलेटिन जारी किए। दोनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दाख़िल नोटिस ठुकरा दिए थे, बिना कोई वजह बताए। यह आज़ाद भारत के इतिहास में किसी बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ पहला औपचारिक प्रयास था। इसके बावजूद यह ख़बर लगभग अनदेखी रह गई।
पाँच महीने बाद, इसी हफ़्ते, कांग्रेस और वाम दल एक नई कोशिश की तैयारी में हैं। जिस प्रक्रिया से ऐसा कोई भी नोटिस गुज़रता है, वह शायद ही कहीं ठीक से समझाई गई हो: कितने सांसद चाहिए, किसकी मंज़ूरी चाहिए, समिति कैसे बनती है, और अब तक इतिहास में क्या हुआ है। यह लेख उसी प्रक्रिया का है, उस राजनीति का नहीं जो इस हफ़्ते फिर सुर्ख़ियों में है।
अनुच्छेद 324(5) में एक जैसी नहीं, दो अलग सुरक्षाएँ
संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग की बुनियाद है। इसका खंड (5) निर्वाचन आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों की सेवा-शर्तें राष्ट्रपति के नियमों पर छोड़ता है, पर उसी खंड में दो परंतुक जुड़े हैं, और दोनों बिल्कुल अलग बात कहते हैं।

पहला परंतुक मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए है। उन्हें पद से उसी ढंग और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिन पर सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है, और नियुक्ति के बाद उनकी सेवा-शर्तें उनके नुक़सान में नहीं बदली जा सकतीं। यह भारत में किसी भी संवैधानिक पद को मिली सबसे सख़्त सुरक्षाओं में है।
दूसरा परंतुक बाक़ी आयुक्तों के लिए है, और यह पहले से बिल्कुल अलग रास्ता खोलता है। कोई भी अन्य निर्वाचन आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफ़ारिश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता। न संसद चाहिए, न कोई समिति, न कोई वोट। सिर्फ़ मुख्य आयुक्त की सिफ़ारिश राष्ट्रपति के पास जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह असमानता क्यों बनी, इसे 14 जुलाई 1995 को टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ में विस्तार से समझाया। पाँच सदस्यों की संविधान पीठ ने लिखा कि मुख्य आयुक्त का पद स्थायी है, आयोग उसके बिना बन ही नहीं सकता, जबकि बाक़ी आयुक्तों की संख्या समय के साथ राष्ट्रपति घटा-बढ़ा सकते हैं। इसीलिए मुख्य आयुक्त को जज जैसी अलग सुरक्षा दी गई, ताकि वे कार्यपालिका और सत्तारूढ़ दल दोनों के दबाव से बचे रहें। बाक़ी आयुक्तों को वह सुरक्षा नहीं दी जा सकती थी, इसलिए संविधान ने एक अलग रास्ता चुना: उन्हें ख़ुद मुख्य आयुक्त की छत्रछाया में रखा।
पर अदालत यहीं नहीं रुकी। उसने साफ़ लिखा कि मुख्य आयुक्त की यह सिफ़ारिश करने की ताक़त बेरोक-टोक नहीं है। सिफ़ारिश का आधार आयोग के कामकाज से जुड़ी सुस्पष्ट और ठोस वजहें होनी चाहिए, महज़ मर्ज़ी या सनक नहीं। फ़ैसले के अपने शब्दों का हिंदी रूप कुछ यूँ है: "अगर यह अधिकार मुख्य आयुक्त की मर्ज़ी और सनक पर छोड़ दिया जाए, तो मुख्य आयुक्त ख़ुद ज़ुल्म का एक औज़ार बन जाएगा, और वही आज़ादी ख़त्म कर देगा जिसकी हिफ़ाज़त के लिए यह प्रावधान बनाया गया था।" संविधान सभा में के.एम. मुंशी ने भी यही तर्क रखा था: चुनाव के मौसम में आयोग बड़ा हो सकता है, पर नए सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, इसलिए उनकी आज़ादी पर आँच नहीं आती।
यह विषमता सिर्फ़ इतिहास की बात नहीं रह गई। इसी हफ़्ते जिन दो निर्वाचन आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, के लिखित असहमति दर्ज कराने की ख़बर आई, उनकी अपनी नौकरी की सुरक्षा इसी दूसरे परंतुक से तय होती है। यह सुरक्षा कमज़ोर है। मुख्य आयुक्त की अपनी सुरक्षा कहीं ज़्यादा मज़बूत है। किसी ने अब तक इसे अमल में लाने की बात नहीं कही, और यह लेख भी वैसा कोई दावा नहीं करता। फिर भी 1995 का फ़ैसला बताता है कि संविधान ने यह फ़र्क़ जानबूझकर रखा। अदालत ने पहले ही इसकी सीमाएँ खींच दी थीं।
जज हटाने वाला ही रास्ता: अनुच्छेद 124(4) की दो शर्तें
पहला परंतुक जिस रास्ते की बात करता है, वह ख़ुद अनुच्छेद 324 में कहीं नहीं लिखा। वह उधार लिया गया है अनुच्छेद 124(4) से, जो सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने का तरीक़ा बताता है।
अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को राष्ट्रपति के आदेश से ही हटाया जा सकता है, और वह आदेश तभी आता है जब संसद के दोनों सदन, एक ही सत्र में, प्रस्ताव पारित कर चुके हों। आधार सिर्फ़ दो हैं: सिद्ध कदाचार, या अक्षमता। हर सदन में प्रस्ताव को दो शर्तें एक साथ पूरी करनी होती हैं, कोई एक नहीं। पहली शर्त उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत है। दूसरी शर्त उस दिन उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई है। दोनों अलग हैं, और दोनों साथ चाहिए।
यह शर्त व्यावहारिक बाधा भी है। अगर एक सदन प्रस्ताव पारित कर दे, और दूसरा उसी सत्र में समय पर मतदान तक न पहुँच पाए, तो पूरी प्रक्रिया अगले सिरे से शुरू करनी होगी।
यहाँ एक आम ग़लतफ़हमी दूर कर लेनी चाहिए। अख़बार अक्सर इसे "महाभियोग" लिखते हैं। संविधान में यह शब्द कहीं नहीं है। अनुच्छेद 61 राष्ट्रपति को हटाने की जिस प्रक्रिया की बात करता है, केवल उसी का शीर्षक "महाभियोग की प्रक्रिया" है। जजों के लिए, और इसी वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए भी, संविधान सिर्फ़ "हटाना" और "संबोधन" जैसे शब्द इस्तेमाल करता है। नाम भले अख़बारी हो, प्रक्रिया संवैधानिक है।
अनुच्छेद 124(5) आगे कहता है कि इस प्रक्रिया का ब्योरा संसद क़ानून से तय कर सकती है। यही अधिकार इस्तेमाल करके संसद ने 1968 में एक अलग क़ानून बनाया, न्यायाधीश जाँच अधिनियम। असली मशीनरी वहीं है।
सौ या पचास दस्तख़त, फिर तीन सदस्यों की समिति
न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 की धारा 3 वह जगह है जहाँ अनुच्छेद 124(4) के दो शब्द, प्रस्ताव और संबोधन, असली प्रक्रिया में बदलते हैं।

पहली शर्त दस्तख़त की गिनती है। लोकसभा में नोटिस पर कम से कम 100 सांसदों के दस्तख़त चाहिए। राज्यसभा में यह संख्या घटकर 50 रह जाती है। यह अंतर लोकसभा और राज्यसभा की अलग-अलग सदस्य संख्या से मेल खाता है। क़ानून ख़ुद इस अंतर की वजह नहीं बताता।
नोटिस मिलने पर स्पीकर या सभापति के पास सिर्फ़ दो रास्ते हैं: प्रस्ताव मंज़ूर करना, या ठुकरा देना। क़ानून उन्हें जिससे चाहें सलाह लेने और जो सामग्री उपलब्ध हो उस पर विचार करने की छूट देता है, पर कारण लिखित रूप में देने की कोई बाध्यता नहीं रखता। यह चुप्पी बाद में दो अलग-अलग मौक़ों पर दो बिल्कुल अलग नतीजों में बदली, और आगे दोनों का ज़िक्र आएगा।
अगर नोटिस मंज़ूर हो जाए, तभी तीन सदस्यों की जाँच समिति बनती है: एक सुप्रीम कोर्ट का जज, एक किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, और एक ऐसा व्यक्ति जिसे स्पीकर या सभापति की नज़र में क़ानून का बड़ा जानकार माना जाए। तीन नाम, तीन तरह के जानकार। यही समिति तय आरोप गढ़ती है, जज को जवाब का मौक़ा देती है, और अगर आधार अक्षमता का हो तो मेडिकल बोर्ड तक बैठा सकती है। जज मेडिकल जाँच से इनकार करे, तो समिति यह मान सकती है कि आरोप सही है।
एक शर्त और है, जो ठीक इसी हफ़्ते के मामले में काम आई। अगर दोनों सदनों में नोटिस एक ही दिन दिए जाएँ, तो समिति तभी बनेगी जब दोनों सदन उसे मंज़ूर करें। मंज़ूरी मिलने पर समिति स्पीकर और सभापति मिलकर बनाएँगे। अगर नोटिस अलग-अलग दिन दिए जाएँ, तो जो बाद में आया, वह अपने आप ख़ारिज माना जाता है।
जस्टिस वी. रामासामी, 1993: वोट हुआ, पर बहुमत तक संख्या नहीं पहुँची
आज़ाद भारत में अब तक सिर्फ़ एक बार यह प्रस्ताव संसद के फ़र्श तक, यानी असली वोट तक पहुँचा है। सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामासामी के ख़िलाफ़ प्रस्ताव 10 मई 1993 को लोकसभा में वोटिंग के लिए आया।
नतीजा अपने आप में एक सबक़ है। पक्ष में 196 वोट पड़े। विपक्ष में एक भी नहीं। फिर भी प्रस्ताव गिर गया, क्योंकि उस समय सत्तारूढ़ कांग्रेस से जुड़े क़रीब 205 सांसद, ज़्यादातर दक्षिण भारत से, वोटिंग से ही ग़ैरहाज़िर रहे। हाँ में पड़े वोट सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत तक नहीं पहुँचे, भले ही जितने सांसदों ने वोट डाला वे सब एकमत थे।
यहीं वह बारीक़ी है जो अनुच्छेद 124(4) की दो शर्तों को अलग करती है। उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में दो-तिहाई का हिसाब लगाया जाए, तो 196 शून्य के मुक़ाबले पूरे सौ फ़ीसदी है। पर कुल सदस्य संख्या के बहुमत का हिसाब पूरे सदन से लगता है, चाहे कोई सदन में आया हो या नहीं। ग़ैरहाज़िरी, बिना एक भी "नहीं" कहे, प्रस्ताव को गिरा सकती है। रामासामी बिना किसी दंड के अपने कार्यकाल पर 14 फ़रवरी 1994 को सेवानिवृत्त हुए।
जस्टिस दीपक मिश्रा, 2018: कारण लिखकर बताया गया
दूसरा मामला वोट तक कभी नहीं पहुँचा। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ नोटिस राज्यसभा में 20 अप्रैल 2018 को दिया गया, सात विपक्षी दलों के 64 सांसदों के दस्तख़त के साथ, जो 50 की न्यूनतम सीमा से कहीं ज़्यादा था।
सभापति और तत्कालीन उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने तीन दिन बाद, 23 अप्रैल को, नोटिस को मंज़ूरी देने से मना कर दिया। धारा 3 उन्हें कारण बताने के लिए बाध्य नहीं करती थी। फिर भी नायडू ने एक विस्तृत आदेश लिखा: नोटिस के आरोप शक और अटकल पर टिके थे, सिद्ध कदाचार के दर्जे तक नहीं पहुँचते थे। यह आज़ाद भारत में किसी प्रधान न्यायाधीश के ख़िलाफ़ पहला ऐसा प्रयास था, और वह भी दाख़िले के पहले पायदान पर ही रुक गया।
नायडू के आदेश ने एक बात साफ़ कर दी। भले क़ानून कारण माँगता न हो, स्पीकर या सभापति चाहें तो अपनी वजह लिखकर रिकॉर्ड पर ला सकते हैं। यह फ़र्क़ आगे अहम हो जाता है, जब आठ बरस बाद बिल्कुल यही धारा किसी मुख्य चुनाव आयुक्त पर लागू हुई, और नतीजा बिल्कुल अलग ढंग से लिखा गया।
ज्ञानेश कुमार, मार्च-अप्रैल 2026: पहला औपचारिक प्रयास, कारण कोई नहीं
12 मार्च 2026 को विपक्ष ने दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दाख़िल किए, ठीक वही तरीक़ा जिसकी बात धारा 3 का पहला परंतुक करता है। लोकसभा के नोटिस पर 130 सांसदों के दस्तख़त थे, राज्यसभा के नोटिस पर 63। जोड़ 193 बैठता है।
साढ़े तीन हफ़्ते बाद, 6 अप्रैल 2026 की शाम को दोनों सदनों ने लगभग हूबहू एक जैसे बुलेटिन जारी किए। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़ दोनों बुलेटिन में एक ही भाषा थी: नोटिस पर पूरा विचार और सभी प्रासंगिक पहलुओं का निष्पक्ष आकलन करने के बाद, धारा 3 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए, नोटिस को मंज़ूरी देने से इनकार किया गया। इससे ज़्यादा कोई वजह नहीं लिखी गई। न लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने, न राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने।
यह फ़र्क़ ऊपर के मामले से सीधे जुड़ता है। नायडू ने 2018 में पन्नों का आदेश लिखा था। बिरला और राधाकृष्णन ने 2026 में एक पैराग्राफ़ से काम चला लिया। दोनों तरीक़े क़ानूनन जायज़ हैं, क्योंकि धारा 3 दोनों की इजाज़त देती है।
यहाँ एक बात साफ़ कर लेनी ज़रूरी है। यह नोटिस 2024 में नहीं, 2026 में दाख़िल हुआ, और यह ज्ञानेश कुमार के पूर्ववर्ती के ख़िलाफ़ नहीं, ख़ुद ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ था। ज्ञानेश कुमार ने 19 फ़रवरी 2025 को राजीव कुमार से मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला, और मार्च 2026 का नोटिस उन्हीं के ख़िलाफ़ था। द फ़ेडरल की 12 मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक़, यह मंज़ूर होता तो आज़ाद भारत के इतिहास में किसी बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ पहला औपचारिक प्रयास होता। इस डेस्क की खोज में इससे पहले किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ धारा 3 की शर्तें पूरी करता कोई नोटिस नहीं मिला। टी.एन. शेषन के 1990 के दशक के हंगामेदार कार्यकाल में भी नहीं, जब राजनीतिक हलक़ों में हटाने की बात कई बार उठी थी पर औपचारिक दस्तख़ती नोटिस तक कभी नहीं पहुँची। यह पहली बार था।
दूसरे रास्ते, यानी अनुच्छेद 324(5) के दूसरे परंतुक, का इस्तेमाल इससे पहले एक बार हो चुका है। 31 जनवरी 2009 को तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को भेजी थी, पक्षपात के आरोप में। राष्ट्रपति ने इनकार कर दिया। उन्होंने सिफ़ारिश को अपने ऊपर बाध्यकारी नहीं माना और उस पर अमल नहीं किया। संसद की कोई भूमिका इसमें नहीं थी। यह रास्ता संसद से होकर जाता ही नहीं। फिर भी यह मामला दिखाता है कि सिफ़ारिश मिलने पर भी राष्ट्रपति के पास उसे न मानने की गुंजाइश बनी रहती है।
दोनों सदनों का मौजूदा गणित: दो-तिहाई का हिसाब पाठक ख़ुद लगा सकते हैं
अनुच्छेद 124(4) की पहली शर्त, यानी कुल सदस्य संख्या का बहुमत, आज की तारीख़ में एक तयशुदा आँकड़ा है। दूसरी शर्त तयशुदा नहीं है। वह उस दिन सदन में कौन मौजूद है, इस पर टिकी है, इसलिए पहले से नहीं जानी जा सकती। पहली शर्त का आँकड़ा नीचे है। यह संसद की अपनी वेबसाइट sansad.in से, 24 सितंबर 2026 को पढ़ा गया।

लोकसभा में कुल सीटें 543 हैं। इनमें से नागांव, बशीरहाट और शिलांग की तीन ख़ाली हैं। भरी हुई 540 सीटों में भाजपा के 240 सदस्य हैं, कांग्रेस के 98, समाजवादी पार्टी के 37, तृणमूल कांग्रेस के 28, डीएमके के 22, तेलुगु देशम के 16, शिवसेना (शिंदे) के 13, जनता दल यूनाइटेड के 12, राकांपा (शरद पवार) के 8, और सात निर्दलीय।
| लोकसभा (कुल 543, भरी 540) | सदस्य |
|---|---|
| भाजपा | 240 |
| कांग्रेस | 98 |
| समाजवादी पार्टी | 37 |
| तृणमूल कांग्रेस | 28 |
| डीएमके | 22 |
| तेलुगु देशम | 16 |
| शिवसेना (शिंदे) | 13 |
| जनता दल (यूनाइटेड) | 12 |
बहुमत के लिए 543 का आधा से ऊपर, यानी कम से कम 272 वोट चाहिए, चाहे उस दिन सदन में कितने भी सदस्य मौजूद क्यों न हों।
राज्यसभा में कुल सीटें 245 हैं, जिनमें से 243 भरी हैं। भाजपा के 116 सदस्य हैं, कांग्रेस के 30, तृणमूल के 9, डीएमके के 8, सात मनोनीत सदस्य किसी दल से नहीं जुड़े, बीजू जनता दल के 5, और बाक़ी बचे तीस से ज़्यादा दलों में हर एक के पास चार, तीन, दो या एक ही सदस्य है।
| राज्यसभा (कुल 245, भरी 243) | सदस्य |
|---|---|
| भाजपा | 116 |
| कांग्रेस | 30 |
| तृणमूल कांग्रेस | 9 |
| डीएमके | 8 |
| मनोनीत (दलरहित) | 7 |
| बीजू जनता दल | 5 |
यहाँ बहुमत के लिए 245 का आधा से ऊपर, यानी कम से कम 123 वोट चाहिए।
दोनों सदनों में यह गणित पाठक ख़ुद आगे बढ़ा सकते हैं: किस दल के पास कितने सदस्य हैं, कौन किसके साथ खड़ा हो सकता है, और दो-तिहाई की दूसरी शर्त तक पहुँचना किस दिन कितना मुश्किल या आसान होगा। यह लेख वह हिसाब ख़ुद आगे नहीं बढ़ाता। नतीजा वोट के दिन तय होगा, आज नहीं।
अभी क्या चल रहा है: दूसरी कोशिश की तैयारी
24 सितंबर 2026 की दोपहर तक की रिपोर्टों के मुताबिक़, कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन एक नया नोटिस तैयार कर रहा है। यह नोटिस संसद का सत्र चालू न होने पर भी दिया जा सकता है, और अगले हफ़्ते तक दाख़िल होने की बात कही जा रही है।
तात्कालिक वजह इंडियन एक्सप्रेस की वह पड़ताल है, जिसमें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की दस महीनों में चौदह बार दर्ज लिखित आपत्तियों का ज़िक्र है। यह इस डेस्क की 24 सितंबर की रिपोर्ट में पहले ही दर्ज है, और यहाँ दोहराने की ज़रूरत नहीं।
अगर यह दूसरा नोटिस दाख़िल होता है, तो वह ठीक उसी रास्ते से गुज़रेगा जो ऊपर बताया गया: पहले दस्तख़त की गिनती, फिर स्पीकर और सभापति का फ़ैसला, और मंज़ूरी मिलने पर ही तीन सदस्यों की समिति। मार्च 2026 में यह रास्ता दाख़िले के पहले पायदान पर ही ख़त्म हो गया था। इस बार क्या होगा, यह अभी किसी को नहीं पता।
स्रोतइंडियन कानून पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 का पूरा पाठ, खंड (5) के दोनों परंतुकों सहित; मूल दस्तावेज़ विधायी विभाग, legislative.gov.in का है, जिसका पृष्ठ जावास्क्रिप्ट-आधारित होने से यह प्रतिलिपि पढ़ी गई, इंडियन कानून पर संविधान के अनुच्छेद 124 का पूरा पाठ, खंड (4) और (5): जज हटाने की दो शर्तें और संसद की क़ानून बनाने की शक्ति, इंडियन कानून पर न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 की धारा 3 का पूरा पाठ: दस्तख़त की संख्या, स्पीकर-सभापति का विवेकाधिकार, समिति गठन और दोनों परंतुक, टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ, (1995) 4 SCC 611, सुप्रीम कोर्ट की पाँच-सदस्यीय संविधान पीठ का 14 जुलाई 1995 का फ़ैसला, इंडियन कानून पर पूरा पाठ पढ़ा गया; इसी में एस.एस. धनोआ (1991) के पैराग्राफ़ 10-11 और के.एम. मुंशी का संविधान सभा भाषण उद्धृत हैं, द वायर, 6 अप्रैल 2026, रात 10:18 बजे: दोनों सदनों के लगभग हूबहू बुलेटिन, 130 और 63 सांसदों के दस्तख़त, नोटिस बिना कारण ख़ारिज, न्यूज़ ऑन एयर (आकाशवाणी समाचार), 6 अप्रैल 2026: राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का नोटिस ख़ारिज करने का बुलेटिन, द फ़ेडरल, 12 मार्च 2026: नोटिस दाख़िल होने के दिन की रिपोर्ट, 100/50 दस्तख़त की शर्त, और यह आकलन कि मंज़ूर होने पर यह किसी बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ पहला औपचारिक प्रयास होता, लोकसभा की अपनी वेबसाइट sansad.in: 'सदस्यों की सूची' में सांख्यिकीय जानकारी (दल-वार) और रिक्त निर्वाचन क्षेत्र, 24 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, राज्यसभा की अपनी वेबसाइट sansad.in: 'सदस्यों की सूची' में सांख्यिकीय जानकारी (दल-वार), चार्ट दृश्य, 24 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, यूपीआई आर्काइव्स, 11 मई 1993: जस्टिस वी. रामासामी प्रस्ताव पर 10 मई की वोटिंग का ब्योरा, 196 पक्ष में, क़रीब 205 ग़ैरहाज़िर, द ट्रिब्यून, 23-24 अप्रैल 2018: सभापति वेंकैया नायडू का जस्टिस दीपक मिश्रा नोटिस ख़ारिज करने का विस्तृत आदेश, इंडिया टीवी न्यूज़: मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी की 31 जनवरी 2009 की सिफ़ारिश और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का उसे न मानना, न्यूज़ ऑन एयर, 20 फ़रवरी 2025: ज्ञानेश कुमार का राजीव कुमार से मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालना, 19 फ़रवरी 2025 से प्रभावी, इंडिया टीवी न्यूज़, 24 सितंबर 2026, शाम 4:51 बजे: इंडिया गठबंधन के नया नोटिस तैयार करने की ख़बर, सूत्रों के हवाले से