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समझिए

मानसून सत्र पच्चीस दिन से बंद नहीं हुआ, और इसका मतलब यह है कि अध्यक्ष कभी भी सदन बुला सकते हैं

कांग्रेस कह रही है सत्र इसलिए खुला रखा गया है ताकि परिसीमन विधेयक दोबारा लाया जा सके। सत्रावसान आम तौर पर तीन-चार दिन में होता है। 2015 में यह अट्ठाईस दिन बाद हुआ था।

संसद भवन, नई दिल्ली
तस्वीर: डेविड कैसल, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए पच्चीस दिन हो चुके हैं और अभी तक उसका सत्रावसान नहीं हुआ है।

कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि सत्र को वेंटिलेटर पर रखा गया है, और वजह यह है कि गृह मंत्री परिसीमन विधेयक पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश में हैं।

आरोप गंभीर है। इसे जाँचने के लिए तीन अलग सवाल पूछने पड़ेंगे: क्या यह देरी असामान्य है, इस देरी से सरकार को मिलता क्या है, और जिस विधेयक की बात हो रही है उसका अब तक क्या हुआ है।

तीनों के जवाब उपलब्ध हैं, और तीनों एक ही दिशा में नहीं जाते। एक जवाब आरोप को मज़बूत करता है, एक उसे कमज़ोर, और तीसरा बताता है कि यह झगड़ा इस साल क्यों हो रहा है, पिछले पचास साल में क्यों नहीं हुआ।

पहले दो शब्दों का फ़र्क़ समझिए

अख़बारों में ये दोनों शब्द अक्सर एक साथ आते हैं और अक्सर एक जैसे पढ़ लिए जाते हैं। ये एक चीज़ नहीं हैं।

अनिश्चितकाल के लिए स्थगन का मतलब है कि सदन की बैठक बिना अगली तारीख़ बताए ख़त्म कर दी गई। यह काम पीठासीन अधिकारी करते हैं, यानी लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति।

सत्रावसान का मतलब है कि सत्र ही ख़त्म हो गया। यह काम राष्ट्रपति करते हैं, और वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं। संविधान का अनुच्छेद 85(2)(क) उन्हें यह अधिकार देता है।

पहले में बैठक ख़त्म होती है, दूसरे में सत्र।

यह फ़र्क़ किताबी लगता है। इसका एक नतीजा है जो बिलकुल किताबी नहीं है।

जो सदन स्थगित है, उसे अध्यक्ष कभी भी बुला सकते हैं

विजय चौक, जहाँ से संसद भवन का रास्ता जाता है
तस्वीर: कार्तिकेय कौल, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

अनिश्चितकाल के स्थगन के बाद पीठासीन अधिकारी सदन की बैठक किसी भी समय बुला सकते हैं। इसके लिए उन्हें किसी नई मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती।

सत्रावसान हो जाने के बाद यह अधिकार ख़त्म हो जाता है। फिर सदन तभी बैठेगा जब राष्ट्रपति नया सत्र बुलाएँ।

यही वह फ़र्क़ है जिससे इस पूरे विवाद का मतलब निकलता है।

जब तक सत्रावसान नहीं होता, संसद तकनीकी तौर पर सत्र में है और उसे दोबारा बैठाने में कुछ दिन लगेंगे, हफ़्ते नहीं। सत्रावसान के बाद पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी होगी।

तो कांग्रेस का यह कहना कि सत्र को जीवित रखा गया है, प्रक्रिया के लिहाज़ से ग़लत नहीं है। खुला सत्र सरकार को रफ़्तार देता है।

पर एक चीज़ जो इससे नहीं जुड़ी

यहाँ एक ग़लतफ़हमी दूर करना ज़रूरी है, क्योंकि वह इस बहस में बार-बार आती है।

लोग समझते हैं कि सत्रावसान होने से लंबित विधेयक ख़त्म हो जाते हैं। ऐसा नहीं होता।

संविधान का अनुच्छेद 107(3) साफ़ कहता है कि संसद में लंबित कोई विधेयक सदनों के सत्रावसान के कारण व्यपगत नहीं होगा। विधेयक तभी मरते हैं जब लोकसभा भंग होती है, सत्रावसान से नहीं।

हाँ, सत्रावसान से लंबित सूचनाएँ ख़त्म हो जाती हैं, सिवाय उनके जो विधेयक पेश करने की सूचनाएँ हैं। नए सत्र में वे सूचनाएँ फिर से देनी पड़ती हैं।

यानी सत्र खुला रखने से विधेयक नहीं बचाया जा रहा। विधेयक तो वैसे भी बचा रहता। जो बचाया जा रहा है वह समय है।

क्या यह देरी अभूतपूर्व है

कांग्रेस के आरोप का जो हिस्सा जाँच में कमज़ोर पड़ता है, वह यही है।

सामान्य तौर पर सत्रावसान अनिश्चितकाल के स्थगन के तीन से चार दिन बाद हो जाता है। इस बार पच्चीस दिन हो गए हैं। यह लंबा है।

पर यह पहली बार नहीं है। 2015 में मानसून सत्र का सत्रावसान अनिश्चितकाल के स्थगन के अट्ठाईस दिन बाद हुआ था।

यानी अभी की देरी उस देरी से कम है।

असामान्य होना और अभूतपूर्व होना दो अलग बातें हैं। यह असामान्य है। अभूतपूर्व नहीं है। और जब कोई राजनीतिक दल दूसरा शब्द इस्तेमाल करता है तो उसे जाँचा जाना चाहिए, चाहे वह दल कोई भी हो।

अब उस विधेयक पर आइए

पुराने संसदीय दस्तावेज़
तस्वीर: mooncow, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

जिस विधेयक की वजह से यह सब हो रहा है, उसकी कहानी अप्रैल में शुरू हुई थी।

16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में तीन विधेयक एक साथ पेश हुए। इनमें मुख्य था संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026। उसके साथ परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक।

अगले दिन, 17 अप्रैल को, संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान हुआ।

पक्ष में 298 वोट पड़े। ज़रूरत 352 की थी।

विधेयक चौवन वोट से गिर गया।

संविधान संशोधन के लिए कितने वोट चाहिए

अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन के लिए दो शर्तें एक साथ लगती हैं।

पहली, विधेयक को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से पास होना चाहिए। लोकसभा में यह 272 बनता है।

दूसरी, उसे उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन चाहिए।

दूसरी शर्त पहली से कठिन होती है जब सदन भरा हो। उस दिन 352 का आँकड़ा इसी दूसरी शर्त से निकला था, यानी उस दिन क़रीब 528 सदस्यों ने मतदान किया।

298 पहली शर्त से ऊपर था। दूसरी से नीचे।

विधेयक क्या करता

संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा की अधिकतम सीट संख्या बदलता। अभी वह 550 है, जिसमें राज्यों से 530 और संघ राज्यक्षेत्रों से 20 आते हैं।

प्रस्ताव इसे 850 करने का था। राज्यों से 815 और संघ राज्यक्षेत्रों से 35।

साथ वाला परिसीमन विधेयक यह तय करता कि यह नया बँटवारा किस आधार पर हो। उसमें लिखा था कि परिसीमन 2011 की जनगणना पर होगा, यानी 2027 की गिनती का इंतज़ार किए बिना।

विधेयक एक परिसीमन आयोग बनाता जिसका अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का कोई मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता। उसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनका नामित निर्वाचन आयुक्त होता, और संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त।

आयोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें तय करता, और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण भी, जिसमें इन वर्गों के भीतर भी आरक्षण होता और सीटें बदलती रहतीं।

एक और बात इसमें थी। महिला आरक्षण अभी इस शर्त से बँधा है कि वह 2023 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर लागू होगा। यह विधेयक उस शर्त को हटा देता।

यह सब अभी क्यों हो रहा है

सर्वोच्च न्यायालय। प्रस्तावित परिसीमन आयोग का अध्यक्ष इसी अदालत का कोई मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता
तस्वीर: सुभाशीष पाणिग्रही, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

एक तारीख़ है जो इस पूरे झगड़े को समझा देती है, और वह किसी विधेयक में नहीं, संविधान में है।

लोकसभा की सीटें राज्यों के बीच आबादी के अनुपात से बँटती हैं। यह बँटवारा 1971 की जनगणना पर जमा है।

1976 में बयालीसवें संविधान संशोधन ने इसे जमा दिया था, और तब तय हुआ था कि यह रोक सन 2000 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक चलेगी।

2001 में चौरासीवें संशोधन ने उस रोक को आगे बढ़ाया। नई सीमा तय हुई: 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना।

अब गिनिए। 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना कौन सी है।

वही जो अगले साल मार्च में होनी है।

यानी यह रोक अपने आप ख़त्म होने वाली है, और उसे ख़त्म करने के लिए किसी को कुछ करना नहीं पड़ेगा। पचास साल से टलता आ रहा सवाल एक तयशुदा तारीख़ पर सामने आ खड़ा होगा।

इस पृष्ठभूमि में परिसीमन विधेयक की एक बात नए सिरे से दिखती है। वह परिसीमन 2011 की जनगणना पर कराना चाहता था, 2027 की गिनती का इंतज़ार किए बिना।

दक्षिण की आपत्ति क्या है

रोक लगाने की वजह यह थी कि जिन राज्यों ने आबादी नियंत्रित की, उन्हें सीटें गँवाकर उसका ख़ामियाज़ा न उठाना पड़े।

दक्षिण के राज्यों में प्रजनन दर उत्तर के मुक़ाबले पहले और तेज़ी से गिरी। नया परिसीमन आबादी के ताज़ा अनुपात पर हुआ तो उनका हिस्सा घटेगा और उत्तर का बढ़ेगा।

इसीलिए तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इस विधेयक का विरोध दलगत सीमाओं से ऊपर रहा है। यह किसी एक पार्टी का सवाल नहीं, राज्यों के हिस्से का सवाल है।

और यही वजह है कि दो-तिहाई का आँकड़ा जुटाना मुश्किल है। बहुमत सरकार के पास है। दो-तिहाई के लिए उसे उन दलों का साथ चाहिए जिनके अपने राज्य इसमें नुक़सान देख रहे हैं।

एक और घड़ी जो चल रही है

संविधान में एक और समयसीमा है जो इस मामले से जुड़ती है।

अनुच्छेद 85(1) कहता है कि संसद के दो सत्रों के बीच छह महीने से ज़्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए। यानी पिछले सत्र की आख़िरी बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच छह महीने से ज़्यादा नहीं बीत सकते।

यह प्रावधान इसलिए है कि कोई सरकार संसद को अनिश्चित काल तक न बैठने दे।

अब यहाँ एक बारीकी है। जब तक सत्र चालू है, यह घड़ी उसी तरह नहीं चलती जैसे सत्रावसान के बाद चलती। इसलिए सत्र खुला रखने का एक और नतीजा यह है कि अगली बैठक बुलाने की बाध्यता का हिसाब उस बिंदु से नहीं शुरू होता जहाँ से लोग मान लेते हैं।

यह कोई छिपा हुआ रास्ता नहीं है, न ही यह पहली बार हो रहा है। यह उस लचीलेपन का हिस्सा है जो प्रक्रिया में मौजूद है, और जिसका इस्तेमाल हर दौर की सरकारें करती रही हैं।

गिरे हुए विधेयक का क्या होता है

एक सवाल यहाँ बनता है जिसका जवाब सीधा नहीं है।

लोकसभा की प्रक्रिया में एक सिद्धांत है कि जिस प्रश्न पर सदन एक बार फ़ैसला दे चुका है, उसे उसी सत्र में दोबारा नहीं उठाया जाता।

यह विधेयक अप्रैल में गिरा था, यानी पिछले सत्र में। मानसून सत्र अलग सत्र है। इसलिए वह बाधा इस मामले में लागू नहीं होती।

पर एक व्यावहारिक बात है। जो विधेयक एक बार गिर चुका है, उसे उसी शक्ल में दोबारा लाने का कोई फ़ायदा नहीं जब तक गिनती न बदली हो। यही वजह है कि सरकार पर इस समय संख्या जुटाने का आरोप लग रहा है, और यही वजह है कि यह आरोप ख़ारिज करना भी आसान नहीं है।

जो अभी तय नहीं है

सरकार ने यह नहीं कहा है कि वह सदन दोबारा बुलाएगी। उसने यह भी नहीं कहा है कि वह विधेयक दोबारा लाएगी।

अभी जो है वह सिर्फ़ इतना है: एक सत्र जो बंद नहीं किया गया, और एक विधेयक जो चौवन वोट से गिरा था।

इन दोनों के बीच का रिश्ता किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है। वह अनुमान है, और उस अनुमान को कांग्रेस ने आरोप की शक्ल दी है।

पर प्रक्रिया की एक बात तय है, और उसे किसी अनुमान की ज़रूरत नहीं। जब तक सत्रावसान नहीं होता, संसद को दोबारा बैठाने का अधिकार पीठासीन अधिकारी के पास है।

यह अधिकार किसी काम में लाया जाएगा या नहीं, यह अलग सवाल है। पर वह मौजूद है, और उसे मौजूद रखने के लिए एक फ़ैसला रोज़ लिया जा रहा है।

संख्या का खेल कहाँ अटकता है

दो-तिहाई जुटाने की बात सुनने में गिनती जैसी लगती है। है वह उससे पेचीदा।

लोकसभा में सरकार के पास बहुमत है। दो-तिहाई के लिए उसे विपक्ष के एक हिस्से का साथ चाहिए, और यह साथ किसी सौदे से आता है।

पर इस मामले में सौदे की गुंजाइश सीमित है, क्योंकि आपत्ति विचारधारा की नहीं है। जिस सांसद का राज्य सीटें गँवाएगा, उसके लिए यह वोट उसके अपने राजनीतिक भविष्य का सवाल है, चाहे वह किसी भी दल में हो।

इसी वजह से अप्रैल की गिनती में जो अंतर रहा, वह मामूली नहीं था। चौवन वोट किसी एक छोटे दल के मान जाने से नहीं भरते।

और सदन में उपस्थिति भी हिसाब बदल देती है। दो-तिहाई उपस्थित सदस्यों का होता है, कुल सदस्यों का नहीं। यानी अगर विपक्ष का कुछ हिस्सा मतदान के दिन सदन से बाहर रहे, तो ज़रूरी आँकड़ा अपने आप नीचे आ जाता है।

अप्रैल में 528 सदस्यों ने मतदान किया था, जो लगभग पूरा सदन है। यह अपने आप में बताता है कि उस दिन दोनों तरफ़ कितनी तैयारी थी।

इसे कैसे पढ़ा जाए

इस पूरे मामले में तीन बातें अलग-अलग रखी जानी चाहिए।

पहली, तथ्य। सत्रावसान नहीं हुआ है और पच्चीस दिन बीत चुके हैं। यह दर्ज है और इस पर कोई विवाद नहीं।

दूसरी, प्रक्रिया का नतीजा। खुला सत्र सदन को जल्दी दोबारा बुलाने की गुंजाइश रखता है। यह भी तय है, क्योंकि यह नियमों में लिखा है।

तीसरी, नीयत। सरकार ऐसा किसलिए कर रही है, यह किसी दस्तावेज़ में नहीं है। इस पर जो कहा जा रहा है वह राजनीतिक आरोप है, और उसे उसी तरह पढ़ा जाना चाहिए।

तीनों को एक साथ मिला देना आसान होता है, ख़ासकर तब जब पहली दो बातें तीसरी को विश्वसनीय बनाती हों। पर तथ्य और नतीजा साबित हैं, नीयत नहीं।

अगले कुछ हफ़्तों में इनमें से एक बात साफ़ हो जाएगी। या तो सत्रावसान होगा, या सदन दोबारा बैठेगा। दोनों में से जो होगा, वह अपने आप बता देगा कि यह देरी किस काम आ रही थी।

और जो भी हो, वह सवाल टलेगा नहीं। चौरासीवें संशोधन ने जो तारीख़ तय की थी, वह अब दूर नहीं है। अगले साल की जनगणना के आँकड़े आते ही पचास साल पुरानी वह रोक अपने आप हट जाएगी जिसने भारत के संघीय संतुलन को इतने लंबे समय तक थामे रखा।

तब यह सवाल किसी सत्र के खुले या बंद होने का नहीं रहेगा।

स्रोतपीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, परिसीमन विधेयक 2026 की स्थिति, भारत का संविधान, अनुच्छेद 85 और 107, लोकसभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियम, डेक्कन हेराल्ड, कांग्रेस के आरोप पर रिपोर्ट, 7 सितंबर 2026

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