जिस विज्ञप्ति में परीक्षा 'सफलतापूर्वक संपन्न' लिखा है, उसी में 2,445 की परीक्षा अधूरी रहने की बात है
नीट-पीजी 2026 पर जारी सरकारी विज्ञप्ति का शीर्षक सफलता का है। आठ पैराग्राफ़ नीचे लिखा है कि जयपुर के दो केंद्रों पर परीक्षा पूरी नहीं हो सकी, और उसकी वजह परीक्षा कराने वाली एजेंसी बताई गई है।
नीट-पीजी 2026 पर 30 अगस्त को जारी सरकारी विज्ञप्ति का शीर्षक कहता है कि परीक्षा पूरे देश में मज़बूत सुरक्षा और तत्क्षण निगरानी के साथ सफलतापूर्वक आयोजित की गई।
उसी विज्ञप्ति में, आठ पैराग्राफ़ नीचे, यह लिखा है कि जयपुर के दो केंद्रों पर 2,445 उम्मीदवारों की परीक्षा पूरी नहीं की जा सकी।
उनकी दोबारा परीक्षा 5 सितंबर को होगी।
वजह बिजली विभाग या शहर की बिजली नहीं बताई गई। विज्ञप्ति में लिखा है कि यह परीक्षा केंद्रों पर आंतरिक बिजली आपूर्ति की समस्या थी, और यह परीक्षा कराने वाली एजेंसी मेसर्स टीसीएस लिमिटेड के कारण हुई।
सरकार ने अपनी ही एजेंसी का नाम लेकर ज़िम्मेदारी तय की है, और यही इस विज्ञप्ति की सबसे ईमानदार पंक्ति है।
हिंदी वाली विज्ञप्ति ज़्यादा साफ़ है
एक बात जो ध्यान देने लायक़ है।
हिंदी उपशीर्षक में शब्द साफ़ लिखा है, पुनर्परीक्षा। अंग्रेज़ी उपशीर्षक में यह शब्द है ही नहीं। वहाँ सिर्फ़ इतना लिखा है कि तकनीकी व्यवधान से प्रभावित 2,445 उम्मीदवारों के लिए 5 सितंबर को परीक्षा होगी।
अक्षरशः पढ़ें तो अंग्रेज़ी पंक्ति से यह पता ही नहीं चलता कि कुछ ग़लत हुआ था।
दो संख्याएँ, और उनके बीच का फ़र्क़
विज्ञप्ति में दो आँकड़े हैं। बैठने वालों की संख्या 2,65,980, और जिनकी परीक्षा पूरी हुई उनकी संख्या लगभग 2,63,535।
दोनों का अंतर ठीक 2,445 है।
जिन रिपोर्टों में सिर्फ़ पहला आँकड़ा छपा, उनसे यह घटना ग़ायब हो गई।
एक तीसरा आँकड़ा भी घूम रहा है, दो लाख तिहत्तर हज़ार। वह पंजीकृत उम्मीदवारों की संख्या है, बैठने वालों की नहीं। दोनों में सात हज़ार से ज़्यादा का अंतर है।
केंद्रों की गिनती भी बदल गई
1 अगस्त को जारी एक विज्ञप्ति में स्वास्थ्य मंत्री को बताया गया था कि परीक्षा लगभग 340 शहरों और 1,300 से ज़्यादा केंद्रों पर होगी।
30 अगस्त की विज्ञप्ति में केंद्रों की संख्या 1,111 है, और शहर 339।
यानी एक महीने में लगभग 190 केंद्र कम हो गए, क़रीब पंद्रह फ़ीसदी। किसी सरकारी दस्तावेज़ में इसकी वजह नहीं बताई गई।
अब वह आँकड़ा जो किसी ने नहीं छापा
इस परीक्षा में लगभग 2.66 लाख डॉक्टर बैठे। स्नातकोत्तर की सीटें लगभग 86,360 हैं।
यानी हर सीट पर तीन से कुछ ज़्यादा उम्मीदवार।
यह भीड़ जैसी लगती है। पिछली बार क्या हुआ, यह देखिए।
फ़रवरी 2026 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यसभा को बताया कि काउंसलिंग के दो दौर के बाद भी लगभग 20 हज़ार पीजी सीटें ख़ाली थीं, जिनमें डीएनबी सीटें भी शामिल थीं।
आख़िर में ख़ाली रहने वाली सीटों की संख्या 1,140 पर आकर रुकी।
यह अंतर माँग बढ़ने से नहीं पटा।
पास होने की सीमा घटा दी गई। अनारक्षित उम्मीदवारों के लिए यह सातवें पर्सेंटाइल पर लाई गई, अनारक्षित दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए पाँचवें पर, और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए परीक्षा में बैठे हर व्यक्ति को उत्तीर्ण घोषित कर दिया गया।
मंत्रालय ने संसद को यह भी बताया कि ऐसा पहले के शैक्षणिक वर्षों के अनुरूप ही किया गया, यानी यह असामान्य नहीं है।
एक साथ भीड़ और ख़ाली सीटें
दोनों बातें एक ही समय सच हैं। सीटों के लिए मारामारी भी है, और सीटें ख़ाली भी रह जाती हैं।
बीच में जो चीज़ खड़ी है, वह फ़ीस है।
निजी डीम्ड विश्वविद्यालयों की पिछली काउंसलिंग की फ़ीस के एक विश्लेषण में आठ संस्थानों के कम से कम पंद्रह पाठ्यक्रम ऐसे मिले जिनकी पूरी फ़ीस दो करोड़ रुपये से ऊपर है। ग़ाज़ियाबाद के एक कॉलेज में एमडी रेडियोडायग्नोसिस की फ़ीस साल के 76 लाख रुपये है, यानी पूरे कोर्स की 2.28 करोड़।
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने फ़रवरी 2022 के एक ज्ञापन में कहा था कि निजी मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों की पचास फ़ीसदी सीटों की फ़ीस उसी राज्य के सरकारी कॉलेजों के बराबर होनी चाहिए।
और एक बात, जिसे सावधानी से पढ़ा जाना चाहिए। जिन तीन संस्थानों के नाम फ़ीस वाले विश्लेषण में दो करोड़ से ऊपर के रूप में आए, उन्हीं तीनों के नाम काउंसलिंग समिति की उसी चक्र की ख़ाली सीटों वाली सूची में भी मौजूद हैं।
यह दोनों दस्तावेज़ों में नाम होने की बात है। इससे यह साबित नहीं होता कि किस कॉलेज की कौन-सी सीट ख़ाली रही, और न यह कि फ़ीस ही उसकी वजह थी।
पर सवाल बनता है, और वह सवाल आयोग तथा काउंसलिंग समिति से पूछा जाना चाहिए।
स्रोतस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विज्ञप्ति, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, मेडिकल काउंसलिंग कमेटी