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काम की बात

लोक अदालत में अपना मामला कैसे भिजवाएँ, उसमें ख़र्च क्या आता है, और फ़ैसले के बाद कौन सा रास्ता बंद हो जाता है

मुक़दमा अदालत में है तो आवेदन उसी अदालत में, और दायर ही नहीं हुआ तो तालुक, ज़िला या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में। फ़ीस कोई नहीं, और पहले जमा की गई अदालती फ़ीस समझौता होने पर वापस मिलती है। बदले में अपील का हक़ ख़त्म हो जाता है।

बेंगलूरु का नगर दीवानी न्यायालय परिसर, जिसके फाटक पर लघु वाद न्यायालय और ज़िला एवं सत्र न्यायालय दोनों के बोर्ड लगे हैं, फ़रवरी 2021 की तस्वीर। लोक अदालत के दिन मेज़ें ऐसे ही किसी परिसर में लगती हैं
तस्वीर: Wilhelm Tell DCCXLVI, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

आपका मुक़दमा किसी अदालत में चल रहा है, तो उसे लोक अदालत में भिजवाने का आवेदन उसी अदालत में देना होता है। मुक़दमा अभी दायर ही नहीं हुआ, तो आवेदन आपके तालुक, ज़िला या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जाता है। दोनों रास्तों पर कोई फ़ीस नहीं लगती, और अदालत में पहले जमा की गई फ़ीस समझौता हो जाने पर वापस मिल जाती है।

बदले में आप एक चीज़ छोड़ देते हैं। लोक अदालत जो अवॉर्ड बनाती है, वह विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 21 के तहत दीवानी अदालत की डिक्री मानी जाती है, और उसी धारा की उपधारा दो कहती है कि उसके ख़िलाफ़ किसी भी अदालत में अपील नहीं होगी।

12 सितंबर 2026 की राष्ट्रीय लोक अदालत में शाम 7 बजे तक के अस्थायी आँकड़ों के हिसाब से 2,10,39,112 मामले निपटे और समझौते की रक़म 13,589.28 करोड़ रुपये रही। इनमें 1,90,75,743 अदालत तक पहुँचे ही नहीं थे और 19,63,369 लंबित थे; दोनों जोड़ने पर कुल आँकड़ा बनता है।

यह लेख उस आँकड़े पर नहीं, इस पर है कि उन मामलों में आपका मामला पहुँचता कैसे है, और वहाँ क्या मिलता है, क्या छूटता है।

लोक अदालत की बुनियाद: धारा 19 से 22 तक

अधिनियम का छठा अध्याय चार धाराओं का है और लोक अदालत की पूरी बनावट उन्हीं चार में है।

धारा 19 की पहली उपधारा बताती है कि इसे लगा कौन सकता है: राज्य प्राधिकरण, ज़िला प्राधिकरण, सुप्रीम कोर्ट विधिक सेवा समिति, हाई कोर्ट विधिक सेवा समिति, और तालुक विधिक सेवा समिति। ये जिस अंतराल पर और जिस इलाक़े के लिए ठीक समझें, लोक अदालत लगा सकते हैं; कोई सालाना कैलेंडर क़ानून में तय नहीं है। बेंच में कौन बैठेगा, यह दूसरी उपधारा तय करती है और विनियम 6 उसे खोलता है: ज़िला स्तर पर एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, और उसके साथ एक या दो लोग, जिनमें कोई वकील, समाजसेवी, पैरा-लीगल स्वयंसेवक या मध्यस्थ हो सकता है।

धारा 19 की पाँचवीं उपधारा दायरा तय करती है। लोक अदालत उन मामलों में समझौता कराने का अधिकार रखती है जो किसी अदालत में लंबित हैं, या जो उस अदालत के क्षेत्राधिकार में आते हैं पर अभी उसके सामने लाए नहीं गए। इसी उपधारा का परंतुक वह रेखा खींचता है जो आगे लौटकर आएगी: ऐसे मामले में लोक अदालत का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होगा जो किसी क़ानून के तहत ग़ैर-समझौता योग्य अपराध से जुड़ा हो।

धारा 22 उसे अदालत जैसी ताक़त देती है। किसी भी निर्धारण के लिए उसके पास दीवानी प्रक्रिया संहिता 1908 के तहत दीवानी अदालत की वही शक्तियाँ होती हैं: गवाह को शपथ पर बुलाना और जाँचना, दस्तावेज़ की पेशी कराना, हलफ़नामे पर साक्ष्य लेना, और किसी भी सरकारी रिकॉर्ड की माँग करना। उसी धारा की तीसरी उपधारा उसकी कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 193, 219 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही मानती है। वहाँ झूठ बोलना अदालत में झूठ बोलने जैसा ही अपराध है।

विनियम 9 उतनी ही साफ़ भाषा में तय करने की ताक़त वापस ले लेता है। लोक अदालत के पास सिर्फ़ यह शक्ति है कि वह पक्षकारों को समझौते तक पहुँचने में मदद करे, और ऐसा करते हुए वह उनके विवाद में कोई निर्देश या आदेश जारी नहीं करेगी। विनियम 13 की छठी उपधारा दोहराती है कि किसी लोक अदालत को नियमित अदालत की तरह पक्षों को सुनकर विवाद तय करने का अधिकार नहीं है, और उसका अवॉर्ड न कोई फ़ैसला है, न किसी निर्णय-प्रक्रिया से निकली कोई राय। जो ताक़त धारा 22 देती है, वह सबूत जुटाने तक सीमित है।

समझौता योग्य अपराध, तलाक़ और दायरे की सीमाएँ

सबसे पहले देखिए कि आपका मामला किस श्रेणी में है, क्योंकि मना दो जगह से हो सकता है।

पहली रेखा अपराध की है। दीवानी मामले लोक अदालत में जा सकते हैं। आपराधिक मामलों में सिर्फ़ समझौता योग्य अपराध, यानी वे जिनमें क़ानून ख़ुद शिकायतकर्ता को राज़ीनामे की इजाज़त देता है। चेक बाउंस इसी श्रेणी में है: परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 147 कहती है कि दंड प्रक्रिया संहिता में कुछ भी हो, इस अधिनियम के तहत दंडनीय हर अपराध समझौता योग्य होगा। हत्या, बलात्कार और दहेज हत्या समझौता योग्य नहीं हैं और उनका वहाँ जाने का कोई रास्ता नहीं है।

दूसरी रेखा तलाक़ की है, और वह अधिनियम में नहीं, विनियमों में है। विनियम 10 की दूसरी उपधारा का परंतुक कहता है कि तलाक़ से जुड़े मामले और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत ग़ैर-समझौता योग्य आपराधिक मामले लोक अदालत को नहीं भेजे जाएँगे। विनियम 17 की सातवीं उपधारा उसी बात को दूसरी तरफ़ से कहती है: लोक अदालत न कोई ज़मानत दे सकती है, न आपसी सहमति से तलाक़। दिल्ली प्राधिकरण की 9 सितंबर 2026 की अधिसूचना इसी को अपने दायरे की भाषा में लिखती है: हर तरह के दीवानी और समझौता योग्य आपराधिक मामले, तलाक़ के मामलों को छोड़कर।

वैवाहिक मामले इससे पूरे बाहर नहीं होते। भरण-पोषण, स्त्रीधन या सामान की वापसी, बच्चों से मिलने की तय व्यवस्था और दांपत्य अधिकारों की वापसी की अर्ज़ी, ये सब लोक अदालत में निपट सकते हैं। विनियम 3 का परंतुक तो यह भी कहता है कि सभी परिवार न्यायालयों के लिए नियमित अंतराल पर विशेष लोक अदालतें लगाई जाएँगी।

जगह का एक भ्रम यहीं साफ़ कर लीजिए। लोक अदालत सिर्फ़ ज़िला अदालत के परिसर में नहीं लगती। दिल्ली की उसी अधिसूचना में सात अदालत परिसरों के अलावा हाई कोर्ट, ऋण वसूली अधिकरण, स्थायी लोक अदालतें और उपभोक्ता आयोग भी बेंच की जगहों में गिनाए गए हैं। आपका मामला जिस मंच पर लंबित है, लोक अदालत उसी पर बैठती है।

आवेदन की जगह, समय-सीमा और अदालती फ़ीस की वापसी

लंबित मुक़दमे के लिए धारा 20 तीन रास्ते देती है, और तीनों का नतीजा एक ही है: अदालत मामला लोक अदालत को भेज देती है।

पहला, दोनों पक्ष सहमति दे दें। दूसरा, एक पक्ष अर्ज़ी लगाए और अदालत को पहली नज़र में लगे कि समझौते की गुंजाइश है। तीसरा, अदालत ख़ुद संतुष्ट हो जाए कि मामला लोक अदालत के लिए उपयुक्त है। पिछले दो रास्तों में धारा 20 का परंतुक और विनियम 10 की तीसरी उपधारा एक शर्त जोड़ते हैं: भेजने से पहले अदालत को पक्षकारों को सुनने का उचित मौक़ा देना होगा। विनियम 10 की दूसरी उपधारा आगे कहती है कि लंबित मुक़दमों को यांत्रिक ढंग से लोक अदालत भेजने से बचा जाएगा। यह वाक्य विनियमों में क्यों डालना पड़ा, इसका जवाब लेख के आख़िरी हिस्से में है।

मुक़दमा दायर नहीं हुआ है, तो रास्ता प्राधिकरण से होकर जाता है। धारा 20 की दूसरी उपधारा कहती है कि एक पक्ष का आवेदन मिलने पर प्राधिकरण या समिति मामले को लोक अदालत भेज सकती है, और उसका परंतुक दूसरे पक्ष को सुनवाई का उचित मौक़ा देना ज़रूरी करता है। विनियम 12 की दूसरी उपधारा जोड़ती है कि दोनों पक्षों का अपना-अपना पक्ष लिखित में लिया जाएगा।

फ़रीदकोट की ज़िला कचहरी का मुख्य द्वार, अप्रैल 2021 की तस्वीर। खंभों पर स्थायी लोक अदालत और ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण की मुफ़्त सहायता के बोर्ड लगे हैं, यानी आवेदन के दोनों रास्ते एक ही फाटक पर लिखे मिलते हैं
तस्वीर: Stalinjeet Brar, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

समय-सीमा अधिनियम में कहीं नहीं है, वह हर प्राधिकरण अपनी अधिसूचना में तय करता है। दिल्ली की 25 अक्टूबर 2026 वाली अधिसूचना इसे इस तरह लिखती है: लंबित मामले की अर्ज़ी उसी अदालत या अधिकरण में जल्द से जल्द दीजिए, और मुक़दमे से पहले वाले मामलों में प्राधिकरण के दफ़्तर में अर्ज़ी तारीख़ से कम से कम सात दिन पहले पहुँच जाए। अपने राज्य की अधिसूचना में यही पंक्ति खोजिए।

अब ख़र्च। लोक अदालत में मामला दायर करने पर कोई अदालती फ़ीस नहीं लगती। लंबित मुक़दमा वहाँ भेजा गया और निपट गया, तो धारा 21 की पहली उपधारा के मुताबिक़ अदालत में जमा की गई फ़ीस न्यायालय-फ़ीस अधिनियम 1870 में बताए तरीक़े से वापस होती है। विनियम 17 की तीसरी उपधारा इसे अवॉर्ड की शर्त बना देती है: अदालत से भेजे गए मामलों में अवॉर्ड में यह लिखा जाएगा कि वादी या याचिकाकर्ता फ़ीस वापसी का हक़दार है। निकलने से पहले अपने अवॉर्ड में यह पंक्ति देख लीजिए, क्योंकि वही आपका दावा-पत्र है।

अवॉर्ड की प्रति प्राधिकरण की मुहर के साथ मुफ़्त मिलती है। और विनियम 23 कहता है कि वकीलों की पेशी पर रोक नहीं है, पर कोशिश यह होगी कि पक्षकार ख़ुद मौजूद रहें; वकीलों को सलाह है कि वहाँ चोगा और बैंड न पहनें।

मना करने का हक़

यह पंक्ति सूचना-पत्रों में शायद ही छपती है। विनियम 5 का दूसरा परंतुक कहता है कि कोई पक्ष अपना मामला लोक अदालत भेजने को तैयार नहीं है, तो संबंधित अदालत उस पर गुण-दोष के आधार पर विचार कर सकती है।

मना करने की क़ीमत भी क़ानून में लिखी है, और वह शून्य है। धारा 20 की पाँचवीं उपधारा के तहत समझौता न होने पर कोई अवॉर्ड नहीं बनता और मामले का रिकॉर्ड उसी अदालत को लौट जाता है जिसने भेजा था। सातवीं उपधारा जोड़ती है कि अदालत उसी पड़ाव से आगे चलेगी जहाँ भेजने से पहले मामला खड़ा था। मुक़दमे से पहले वाले मामलों में छठी उपधारा के तहत लोक अदालत पक्षों को अदालत जाने की सलाह देती है।

और जो वहाँ कहा गया, वह वहीं रह जाता है। विनियम 18 की दूसरी उपधारा के मुताबिक़ कार्यवाही में पक्षों के विचार, उनकी स्वीकारोक्तियाँ, सदस्यों के प्रस्ताव और पक्षों का आचरण किसी दूसरी अदालत या माध्यस्थम कार्यवाही में साक्ष्य के तौर पर पेश नहीं किए जा सकते।

लोक अदालत से लौटने पर एक तारीख़ जाती है, मुक़दमा नहीं।

अवॉर्ड दीवानी डिक्री है, और उस पर अपील नहीं होती

धारा 21 की पहली उपधारा कहती है कि लोक अदालत का हर अवॉर्ड दीवानी अदालत की डिक्री, या जैसी स्थिति हो, किसी दूसरी अदालत का आदेश माना जाएगा। दूसरी उपधारा उसे बंद कर देती है: हर अवॉर्ड विवाद के सभी पक्षों पर अंतिम और बाध्यकारी होगा, और उसके ख़िलाफ़ किसी भी अदालत में कोई अपील नहीं होगी।

इस वाक्य का असल मतलब सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम जलौर सिंह में खोला, जो 2008 की तीन जजों की बेंच का फ़ैसला है और (2008) 2 एससीसी 660 पर छपा है। मामला मोटर दुर्घटना के मुआवज़े का था, जिसमें लोक अदालत ने पक्षों की सहमति के बिना मुआवज़ा बढ़ा दिया था। फ़ैसले के बारहवें पैराग्राफ़ में अदालत ने कहा कि जहाँ अवॉर्ड पक्षों के दस्तख़त वाले समझौते की शर्तों पर बना हो और वह समझौता अवॉर्ड के साथ नत्थी हो, वहाँ वह अंतिम और बाध्यकारी है, दीवानी डिक्री की तरह निष्पादन योग्य है, और उसके ख़िलाफ़ अपील नहीं होती। ऐसे अवॉर्ड को चुनौती देने का एक ही रास्ता है, संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत याचिका, और वह भी "बहुत सीमित आधारों पर"।

रायगड़ा की ज़िला अदालत में दूसरी राष्ट्रीय लोक अदालत की एक बेंच, दिसंबर 2014 की तस्वीर। मेज़ पर जो समझौता दस्तख़त होकर अवॉर्ड के साथ नत्थी होता है, वही उसे दीवानी डिक्री बनाता है और अपील का रास्ता बंद कर देता है
तस्वीर: Hpsatapathy, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

सीमित का दायरा कितना छोटा है, यह भार्गवी कंस्ट्रक्शंस बनाम कोठाकापु मुथ्यम रेड्डी से दिखता है, जिसका फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट ने 7 सितंबर 2017 को दिया। वहाँ वादियों का कहना था कि 22 अगस्त 2007 का अवॉर्ड उनकी निरक्षरता का फ़ायदा उठाकर और धोखाधड़ी से हासिल किया गया था, और उन्होंने उसे शून्य घोषित कराने के लिए दीवानी मुक़दमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11(घ) के तहत वाद-पत्र ख़ारिज कर दिया, हाई कोर्ट ने मुक़दमा बहाल कर दिया, और सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश पलटकर ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया। धोखाधड़ी के आरोप पर भी दीवानी मुक़दमा नहीं चलेगा; रास्ता वही रिट है। संहिता के आदेश 23 का नियम 3क इसी को दोहराता है कि जिस समझौते पर डिक्री टिकी है उसके ग़ैर-क़ानूनी होने के आधार पर डिक्री रद्द कराने का मुक़दमा नहीं चलेगा।

यहाँ सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों में फ़र्क़ है और उसे छिपाना ठीक नहीं। पी.टी. थॉमस बनाम थॉमस जॉब, (2005) 6 एससीसी 478, दो जजों का फ़ैसला है और उसमें कहा गया कि लोक अदालत के अवॉर्ड को क़ानून के किसी भी सामान्य उपाय से चुनौती नहीं दी जा सकती, अनुच्छेद 226 समेत, और उस पर न्यायिक पुनर्विलोकन लागू नहीं होता। जलौर सिंह में तीन जजों ने सीमित आधारों पर रिट का दरवाज़ा खुला रखा। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने 28 मार्च 2018 को दोनों को पढ़ा और न्यायिक अनुशासन के आधार पर बड़ी बेंच वाले जलौर सिंह को तरजीह दी।

विनियम 12 की तीसरी उपधारा इसे और छोटा करती है: ऐसे अवॉर्ड को सिर्फ़ धारा 20 की प्रक्रिया के उल्लंघन पर, अनुच्छेद 226 और 227 की याचिका से चुनौती दी जा सकती है।

इसका एक फ़ायदा भी है। सामने वाला अवॉर्ड की शर्तें न माने तो आपको नया मुक़दमा नहीं करना पड़ता; डिक्री है, इसलिए सीधे निष्पादन की अर्ज़ी लगती है।

बिजली-पानी के बिल, बैंक वसूली, चेक बाउंस और मोटर दुर्घटना दावे

नालसा ने 12 सितंबर की विज्ञप्ति में ये श्रेणियाँ गिनाईं: चेक बाउंस, मोटर दुर्घटना दावे, वैवाहिक मामले, श्रम विवाद, उपभोक्ता शिकायतें, भूमि अधिग्रहण, उत्तराधिकार, छोटे कारोबारियों के माध्यस्थम दावे, समझौता योग्य आपराधिक मामले, यातायात चालान, बैंक वसूली, सेवा और राजस्व मामले, और सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं की शिकायतें।

उस दिन की बनावट दो आँकड़ों से दिखती है। 2,10,39,112 में से 1,90,75,743 मुक़दमे से पहले वाले थे, यानी क़रीब 90.67 फ़ीसदी। दस में से नौ मामले कभी किसी अदालत में दर्ज ही नहीं हुए थे।

दूसरा आँकड़ा रक़म का है। 13,589.28 करोड़ रुपये को 2,10,39,112 से भाग दीजिए तो प्रति मामला औसत क़रीब 6,459 रुपये बैठता है। औसत बताता है कि ढेर ज़्यादातर बिलों और चालानों का है।

फिर भी औसत वह पूँछ छिपा लेता है जहाँ असल पैसा है। मोटर दुर्घटना का एक दावा लाखों में निपटता है, और मोल-भाव का जोखिम भी वहीं सबसे ज़्यादा है; जलौर सिंह का मुक़दमा ऐसा ही था। बैंक वसूली में मुक़दमे से पहले वाले रास्ते से बैंक बकाया खाता लोक अदालत में लाता है, और जिस आँकड़े पर आप दस्तख़त करते हैं वही अंतिम है।

एक बात यहाँ साफ़ रहनी चाहिए। ब्याज या अधिभार में जो छूट आपको मिलती है, वह लोक अदालत नहीं देती; विनियम 9 उसे कोई आदेश देने से रोकता है। छूट सामने वाले की अपनी नीति से आती है, चाहे वह बिजली कंपनी की एकमुश्त योजना हो, बैंक का समझौता प्रस्ताव, या चालान-निपटान की व्यवस्था। लोक अदालत उसे काग़ज़ पर उतारकर डिक्री का दर्जा देती है, इसलिए तैयारी उसी योजना को पढ़कर करनी होती है।

स्थायी लोक अदालत और सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएँ

बिजली, पानी और परिवहन के झगड़ों के लिए एक अलग मंच है, जो तारीख़ का इंतज़ार नहीं कराता। अध्याय छह-क, जो 2002 के संशोधन से 11 जून 2002 को लागू हुआ, उसे बनाता है।

धारा 22क सार्वजनिक उपयोगिता सेवा की सूची देती है: हवाई, सड़क या जल मार्ग से ढुलाई; डाक, तार या टेलीफ़ोन; जनता को बिजली, रोशनी या पानी की आपूर्ति; सार्वजनिक सफ़ाई; अस्पताल या औषधालय की सेवा; और बीमा। केंद्र या राज्य सरकार अधिसूचना से इसमें और सेवाएँ जोड़ सकती है। धारा 22ख के तहत ऐसी हर अदालत का अध्यक्ष ज़िला जज या अपर ज़िला जज रह चुका व्यक्ति होता है, और उसके साथ इन सेवाओं का अनुभव रखने वाले दो सदस्य होते हैं।

पुरुलिया, पश्चिम बंगाल में एक दीवार पर लगा पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत वितरण कंपनी का मीटर, जून 2025 की तस्वीर। बिजली की आपूर्ति उसी सूची में है, इसलिए ऐसे मीटर से उठा झगड़ा स्थायी लोक अदालत में जाता है
तस्वीर: Xzantiyamoloy, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

धारा 22ग की शर्त ध्यान से पढ़िए। आवेदन विवाद के अदालत में जाने से पहले करना होता है। तीन परंतुक हैं: ग़ैर-समझौता योग्य अपराध का मामला नहीं जाएगा; विवादित संपत्ति का मूल्य दस लाख रुपये से ज़्यादा न हो; और केंद्र सरकार अधिसूचना से यह सीमा बढ़ा सकती है। सीमा 20 मार्च 2015 की अधिसूचना एस.ओ. 803(ई) से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये की जा चुकी है, इसलिए अधिनियम में छपे दस लाख को आख़िरी शब्द मत मानिए। नालसा की अपनी वेबसाइट पर इसके दो जवाब मिलते हैं: 'स्थायी लोक अदालत' पृष्ठ, जो 3 अप्रैल 2025 को अद्यतन हुआ, एक करोड़ लिखता है, और 'लोक अदालत' पृष्ठ, जो 5 अगस्त 2026 को अद्यतन हुआ, अब भी दस लाख लिखता है।

अंतर असली यहाँ है। धारा 22ग की दूसरी उपधारा के मुताबिक़ आवेदन के बाद कोई पक्ष उसी विवाद में किसी अदालत का दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता। और आठवीं उपधारा कहती है कि पक्ष सहमति तक न पहुँचें, तो स्थायी लोक अदालत ख़ुद विवाद तय कर देगी, बशर्ते वह किसी अपराध से न जुड़ा हो। उसका अवॉर्ड बहुमत से बनता है, दीवानी डिक्री माना जाता है, और किसी मूल वाद या निष्पादन कार्यवाही में उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

पैमाना छोटा है। नालसा के अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के प्रतिवेदन में देश भर में 382 स्थायी लोक अदालतें काम करती दिखती हैं, जिनमें साल भर में 2,70,685 मामले निपटे और 1,868.59 करोड़ रुपये का निपटान हुआ। अकेले कर्नाटक का हिस्सा 1,276.98 करोड़ रुपये है, यानी क़रीब 68 फ़ीसदी। पंद्रह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में उस पूरे साल एक भी स्थायी लोक अदालत काम करती नहीं दिखती, जिनमें गुजरात, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर हैं। दिल्ली में तीन हैं, रोहिणी, माता सुंदरी लेन और विकासपुरी में, और वे बिजली वितरण कंपनियों के मामले देखती हैं।

कर्नाटक, राजस्थान और दिल्ली की अलग तारीख़ें

12 सितंबर 2026 का आँकड़ा पूरे देश का नहीं है, और नालसा ने यह छिपाया भी नहीं। उस दिन बेंचें 26 राज्यों और 7 केंद्रशासित प्रदेशों में लगीं, यानी कर्नाटक, राजस्थान और दिल्ली को घटाकर पूरा देश।

तीनों की अपनी सूचनाएँ मौजूद हैं। कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने तीसरी लोक अदालत 12 सितंबर के बजाय 19 सितंबर 2026 को करने की सूचना लगाई, और राजस्थान के प्राधिकरण ने उसे 10 अक्टूबर 2026 पर खिसका दिया।

दिल्ली दो बार हटी। प्राधिकरण की 25 अगस्त 2026 की अधिसूचना ने उसे 12 सितंबर से हटाकर 10 अक्टूबर किया, और 9 सितंबर की अधिसूचना ने 10 अक्टूबर से हटाकर 25 अक्टूबर, जो रविवार है। दोनों एक ही वजह दर्ज करती हैं: दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने उस महीने के दूसरे शनिवार को अधीनस्थ अदालतों के लिए कार्य दिवस घोषित कर दिया था, पहले 21 अगस्त 2026 की अधिसूचना संख्या 85 से और फिर 8 सितंबर की अधिसूचना संख्या 86 से। कई ख़बरों में पहली बार तारीख़ बदलने की वजह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन बताई गई थी; प्राधिकरण की किसी अधिसूचना में ब्रिक्स का ज़िक्र नहीं है।

यह चलन नया नहीं है। नालसा के जिस प्रतिवेदन पर लिखा है "9 मई 2026 को हुई राष्ट्रीय लोक अदालत", उसी के नीचे तीन पाद-टिप्पणियाँ हैं: केरल, पुदुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने इसे 13 जून को किया, अंडमान-निकोबार और तेलंगाना ने 20 जून को, और आंध्र प्रदेश, गुजरात तथा कर्नाटक ने 11 जुलाई को। एक तारीख़ का प्रतिवेदन, चार तारीख़ों की बैठकें।

शाम 7 बजे वाला आँकड़ा इसीलिए निचली सीमा भर है। उसी 9 मई की लोक अदालत के लिए नालसा का उस शाम का आँकड़ा 2,07,66,548 मामले और 3,440.81 करोड़ रुपये था। बाद के संकलित प्रतिवेदन में वही लोक अदालत 3,91,30,051 मामलों के निपटान और 17,299.65 करोड़ रुपये पर बैठती है। मामलों में 1.88 गुना, रक़म में क़रीब पाँच गुना। नालसा ने मई में ख़ुद कहा था कि उस शाम का आँकड़ा कम इसलिए दिख रहा है कि कुछ राज्यों की तारीख़ें अलग हैं और संकलन चल रहा है। 12 सितंबर का प्रतिवेदन यह लेख लिखे जाने तक नालसा की सूची में नहीं चढ़ा था; वहाँ सबसे नई प्रविष्टि 9 मई 2026 की ही थी।

पाठक के लिए हिसाब सीधा है। अख़बार में छपा आँकड़ा आपके राज्य का हो, यह ज़रूरी नहीं, और तारीख़ आगे है तो आपका मौक़ा बीता नहीं है। उसे अपने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की सूचना में देखिए।

राष्ट्रीय तारीख़ों के बाहर भी लोक अदालतें लगती हैं, पर पैमाना दूसरा है। अप्रैल 2025 से मार्च 2026 में राज्य प्राधिकरणों ने उनके अलावा 13,093 बेंचें बनाईं, जिनमें साल भर में 9,81,345 मामले निपटे। पंद्रह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने उस साल एक भी ऐसी बेंच नहीं बनाई, जिनमें बिहार, हरियाणा, ओडिशा, पंजाब और पश्चिम बंगाल हैं। ज़्यादातर लोगों के लिए राष्ट्रीय तारीख़ ही व्यवहार में इकलौता मौक़ा होती है।

दबाव में हुए समझौते और नियमों की सीमा

विनियमों में संख्या के दबाव का जवाब तीन जगह लिखा है, और तीनों जगह भाषा सख़्त है।

विनियम 7 की तीसरी उपधारा कहती है कि हर बेंच समझौता कराने की ईमानदार कोशिश करेगी, बिना किसी तरह के दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन या ग़लतबयानी के। विनियम 13 की दूसरी उपधारा सदस्यों को सीधे या घुमाकर किसी पक्ष पर समझौते का दबाव डालने से रोकती है। विनियम 17 की पाँचवीं उपधारा दस्तख़त से ठीक पहले दो बातें सदस्यों की ज़िम्मेदारी बनाती है: यह देखना कि समझौते की शर्तें अनुचित, ग़ैर-क़ानूनी या एकतरफ़ा न हों, और यह कि पक्षकार अपनी मर्ज़ी से समझौते में आए हैं, किसी धमकी, दबाव या अनुचित प्रभाव में नहीं।

नियम इतने ब्यौरे में इसलिए लिखे जाते हैं कि जोखिम असली है। बेंगलुरु के वरिष्ठ अधिवक्ता एस. बसवराज ने 16 जुलाई 2026 को दक्ष में लिखा कि ज़्यादा से ज़्यादा निपटान पर अनुचित ज़ोर है और निपटान के आँकड़े संस्था की सफलता का पैमाना बन रहे हैं। उनका कहना था कि संपत्ति, वैवाहिक और भरण-पोषण के मामलों में महिलाएँ जज के सुझाव को अक्सर आदेश की तरह लेती हैं, जबकि सहमति असली, स्वैच्छिक और सूचित होनी चाहिए।

बाद में यह कहने का रास्ता कितना सँकरा है, इसका एक दर्ज उदाहरण इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के 28 मार्च 2018 के फ़ैसले में है। अपीलकर्ता ने कहा कि सुल्तानपुर के परिवार न्यायालय की लोक अदालत का 8 अप्रैल 2017 का अवॉर्ड पति के दबाव में हुआ था। अदालत ने पहले तय किया कि ऐसे अवॉर्ड पर अपील चलती ही नहीं, फिर रिकॉर्ड में यह भी दर्ज किया कि वकील से दबाव की कोई ठोस घटना बताने को कहा गया और कोई घटना बताई नहीं जा सकी; अर्ज़ी में सिर्फ़ एक सपाट वाक्य था।

इससे निकलने वाली सलाह सादा है। दस्तख़त से पहले समझौता-पत्र पूरा पढ़िए, क्योंकि आपको काग़ज़ पर लिखी शर्तें बाँधती हैं। तैयार न हों तो विनियम 5 आपको मना करने देता है और मुक़दमा उसी पड़ाव पर लौट जाता है जहाँ था।

स्रोतविधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का पूरा पाठ, नालसा की वेबसाइट पर: अध्याय छह की धारा 19 से 22 और अध्याय छह-क की धारा 22क से 22ङ, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम 2009, 28 अगस्त 2019 की अधिसूचना से संशोधित, 6 सितंबर 2019 के राजपत्र में प्रकाशित, नालसा का 'लोक अदालत' पृष्ठ, अंतिम अद्यतन 5 अगस्त 2026: फ़ीस, वापसी, बेंच की बनावट और स्थायी लोक अदालत की सीमा दस लाख रुपये, नालसा का 'स्थायी लोक अदालत' पृष्ठ, अंतिम अद्यतन 3 अप्रैल 2025: वही सीमा एक करोड़ रुपये, नालसा, 9 मई 2026 की राष्ट्रीय लोक अदालत का संकलित निपटान प्रतिवेदन, सभी श्रेणियों के मामले, राज्यवार, पाद-टिप्पणी सहित, नालसा, स्थायी लोक अदालतों का सांख्यिकीय प्रतिवेदन, अप्रैल 2025 से मार्च 2026, नालसा, राष्ट्रीय लोक अदालत के अलावा राज्य प्राधिकरणों की लोक अदालतों का प्रतिवेदन, अप्रैल 2025 से मार्च 2026, दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की अधिसूचना संख्या 10/DSLSA/ADRW/NLAs/2026/11105, 9 सितंबर 2026: राष्ट्रीय लोक अदालत 10 अक्टूबर से हटाकर 25 अक्टूबर 2026, दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की अधिसूचना संख्या 10/DSLSA/ADRW/NLAs/2026/10673, 25 अगस्त 2026: 12 सितंबर से हटाकर 10 अक्टूबर 2026, कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण: तीसरी लोक अदालत 12 सितंबर के बजाय 19 सितंबर 2026 को, राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण: तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत 12 सितंबर 2026 से हटाकर 10 अक्टूबर 2026, लाइव लॉ, 12 सितंबर 2026: नालसा की विज्ञप्ति के अस्थायी आँकड़े और छूटे हुए राज्यों की सूची, लाइव लॉ, 9 मई 2026: दूसरी राष्ट्रीय लोक अदालत के शाम 7 बजे तक के अस्थायी आँकड़े और नालसा की अपनी सफ़ाई, दक्ष, 16 जुलाई 2026: वरिष्ठ अधिवक्ता एस. बसवराज का लेख, लोक अदालतों में निपटान की संख्या के दबाव पर

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।