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एक मुक़दमे में बरी, दूसरे में मुक़दमा चल रहा: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोंडा का ज़िला-बदर आदेश रद्द किया

गुरुवार, 10 सितंबर को जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने गोंडा के ज़िलाधिकारी का वह आदेश रद्द कर दिया जिसमें ज़ाहिद अली को 'गुंडा' घोषित करके छह महीने के लिए ज़िले से बाहर किया गया था। फ़ैसले में लिखा है कि अदालतें बार-बार टोक चुकी हैं, फिर भी राज्य गुंडा एक्ट को दमन के औज़ार की तरह इस्तेमाल करने पर लगातार बना हुआ है, और यह मामला उसी दुरुपयोग की चमकती मिसाल है।

गोमती नगर, लखनऊ में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ का भवन, नवंबर 2018 की तस्वीर। ज़ाहिद अली को ज़िला-बदर करने का आदेश इसी पीठ ने 10 सितंबर को रद्द किया
तस्वीर: Veera.sj, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

गोंडा के पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट 29 अक्टूबर 2020 की है। उसमें लिखा था कि ज़ाहिद अली आपराधिक प्रवृत्ति के आदमी हैं और दो मुक़दमों में नामज़द हैं। उस रिपोर्ट पर ज़िलाधिकारी का आदेश पाँच साल छह महीने बाद निकला: 11 मई 2026 को ज़ाहिद अली को 'गुंडा' घोषित किया गया और छह महीने के लिए गोंडा ज़िले से बाहर कर दिया गया।

गुरुवार, 10 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने वह आदेश रद्द कर दिया, और उसके साथ मंडलायुक्त का वह आदेश भी जिसने अपील ख़ारिज की थी। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी के फ़ैसले की भाषा असामान्य है। उसमें लिखा है कि अदालतें बार-बार यही बात दोहरा चुकी हैं, फिर भी इस अदालत के सामने इतने मामले आ रहे हैं कि लगता है राज्य गुंडा एक्ट को दमन के औज़ार की तरह इस्तेमाल करने पर लगातार बना हुआ (persistent) है, और यह मामला उस दुरुपयोग की चमकती मिसाल है।

आठ दिन पहले, बुधवार 2 सितंबर को, इसी हाई कोर्ट की एक और पीठ ने नोएडा की छात्रा आकृति चौधरी पर लगा राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून रद्द करते हुए गौतम बुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी की तनख़्वाह से पाँच लाख रुपये वसूलने का आदेश दिया था। रविवार, 13 सितंबर को वही ज़िलाधिकारी सुप्रीम कोर्ट पहुँच गईं। दोनों मामलों को एक ही सवाल जोड़ता है: निवारक अधिकार वहाँ चले जहाँ साधारण मुक़दमा या तो चल ही रहा था, या पहले ही नाकाम हो चुका था।

गोंडा की फ़ाइल: 2020 की रिपोर्ट, 2021 का नंबर, 2026 का आदेश

ज़िलाधिकारी के 11 मई 2026 के आदेश में लिखा है कि पुलिस अधीक्षक की 29 अक्टूबर 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़ाहिद अली दो मुक़दमों में शामिल हैं। पहला, अपराध संख्या 905/2010, थाना कोतवाली नगर, गोंडा। धाराएँ 452, 323, 504 और 506 भारतीय दंड संहिता की। शिकायत शमी अहमद हुसैन ने दर्ज कराई थी कि ज़ाहिद अली और उनके साथी उनकी दुकान में घुसे, मारपीट की, गाली दी और धमकाया। इस मुक़दमे में चार्जशीट 2 नवंबर 2010 को दाख़िल हुई।

बदायूँ के कलेक्ट्रेट का प्रवेश द्वार और उस पर लगा हिंदी बोर्ड, सितंबर 2020 की तस्वीर। यह गोंडा नहीं है, पर गुंडा एक्ट की हर कार्यवाही ज़िले के ऐसे ही दफ़्तर से निकलती है
तस्वीर: ArmouredCyborg, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

दूसरा मुक़दमा अपराध संख्या 430/2020 है, जिसमें धाराएँ 147, 148, 323, 504, 506, 427, 336, 324 और 188 भारतीय दंड संहिता की हैं, साथ में आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 56 और महामारी रोग अधिनियम 1897 की धारा 3। शिकायतकर्ता राम निरंजन त्रिपाठी का आरोप है कि ज़ाहिद अली, उनके भाइयों और दूसरे साथियों ने उनके घर पर पथराव किया। जाँच के बाद चार्जशीट 13 सितंबर 2020 को गई, और उसमें धारा 324 भी जोड़ी गई।

इन दो प्राथमिकियों के अलावा तीसरा काग़ज़ भी था: 27 अक्टूबर 2020 को दर्ज बीट सूचना रिपोर्ट, यानी पुलिस अधीक्षक की अपनी रिपोर्ट से दो दिन पहले की। ज़िलाधिकारी ने अपने आदेश में दर्ज किया कि ज़ाहिद अली ने कारण बताओ नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया, कि दोनों मुक़दमों में उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट जा चुकी है, और कि जाँच में बीट सूचना सही पाई गई। इन्हीं तीन बातों को जोड़कर उन्हें 'गुंडा' घोषित किया गया।

फ़ाइल का नंबर अपनी अलग तारीख़ बताता है। ज़िलाधिकारी का आदेश केस संख्या 342/2021 में पारित हुआ है, यानी कार्यवाही 2021 में दर्ज हुई और आदेश मई 2026 में निकला। ज़ाहिद अली ने गुंडा एक्ट की धारा 6 के तहत अपील संख्या 895/2026 दाख़िल की। देवीपाटन मंडल, गोंडा की मंडलायुक्त ने उसे 12 अगस्त 2026 को ख़ारिज कर दिया। इसके बाद अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में आपराधिक विविध रिट याचिका संख्या 8680/2026 दाख़िल हुई, जिस पर कोर्ट नंबर 14 में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से कुँवर बहादुर सिंह और राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता रवि श्रीवास्तव पेश हुए।

10 सितंबर 2026 को हाई कोर्ट ने दोनों आदेश रद्द कर दिए और याचिका मंज़ूर कर ली।

क़ानून 'गुंडा' किसे कहता है, और ज़िला-बदर की तीन शर्तें

उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम 1970 को उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 8, 1971 के रूप में जगह मिली। इसमें कुल सोलह धाराएँ हैं और इसका घोषित मक़सद लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गुंडों पर क़ाबू पाना है। 'गुंडा' की परिभाषा धारा 2(ख) में है और उसके छह उपखंड हैं: जो ख़ुद या किसी गिरोह के सदस्य या सरगना के तौर पर आदतन दंड संहिता की धारा 153, 153-ख, 294 या अध्याय 15, 16, 17 या 22 के अपराध करता हो, करने की कोशिश करता हो या उकसाता हो; जिसे अनैतिक व्यापार वाले क़ानून में सज़ा हो चुकी हो; जिसे आबकारी, जुआ या शस्त्र अधिनियम की गिनी हुई धाराओं में कम से कम तीन बार सज़ा हो चुकी हो; जो आमतौर पर समाज के लिए ख़तरनाक माना जाता हो; जो आदतन महिलाओं या लड़कियों पर फ़ब्तियाँ कसता हो; और जो दलाल हो। फ़ैसले में अदालत ने परिभाषा यहीं तक उद्धृत की है। क़ानून के प्रकाशित पाठ में सातवाँ उपखंड और है, मकान हड़पने वाला।

ज़िला-बदर की ताक़त धारा 3 में है, और उपधारा 1 उस पर तीन शर्तें लगाती है। पहली, ज़िलाधिकारी को लगे कि व्यक्ति गुंडा है। दूसरी, कि उसकी गतिविधियाँ ज़िले में लोगों या संपत्ति के लिए ख़तरा या नुक़सान पैदा कर रही हैं, या यह मानने का उचित आधार है कि वह धारा 2(ख) के उपखंड (एक) से (तीन) वाले अपराध कर रहा है या करने वाला है। और तीसरी शर्त यह है:

  • गवाह उसके ख़िलाफ़ गवाही देने आगे आने को तैयार न हों, क्योंकि उन्हें अपनी जान या संपत्ति की सुरक्षा का डर है।

तीनों शर्तों की "भौतिक आरोपों की सामान्य प्रकृति" लिखित नोटिस में बतानी होती है, और सफ़ाई का उचित मौक़ा देना होता है। धारा 3(2) के तहत व्यक्ति अपनी पसंद का वकील रख सकता है, ख़ुद गवाही दे सकता है और अपने गवाह पेश कर सकता है, जब तक ज़िलाधिकारी लिखित में यह दर्ज न करे कि माँग तंग करने या देर कराने के लिए है। ज़िला-बदर की अधिकतम अवधि छह महीने है, और धारा 5 उसे बढ़ाकर कुल दो साल तक ले जा सकती है। धारा 6 के तहत अपील मंडलायुक्त के पास पंद्रह दिन में जाती है, और उसी धारा की उपधारा 2 कहती है कि अपीलकर्ता या उसका वकील उस रिकॉर्ड को देखने या जानने का हक़दार नहीं होगा जो जाँच में उसे दिखाया ही नहीं गया था।

सबूत की कसौटी भी अलग है। धारा 8 कहती है कि ज़िलाधिकारी या मंडलायुक्त ऐसा कोई भी सबूत देख सकते हैं जिसे वे प्रमाणकारी मानें, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 लागू नहीं होगा। आदेश तोड़ना अपने आप में जुर्म है: धारा 10 के तहत कम से कम छह महीने और ज़्यादा से ज़्यादा तीन साल का कठोर कारावास, साथ में जुर्माना। धारा 13 इससे आगे जाती है: इस अधिनियम के तहत दिए गए किसी आदेश को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। ज़ाहिद अली की याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत थी, और हाई कोर्ट ने उसे सुना भी और आदेश रद्द भी किया।

कार्यवाही शुरू कहाँ से होती है, यह नियमावली बताती है। नियम 3(1) के मुताबिक़ ज़िलाधिकारी आमतौर पर तभी क़दम उठाते हैं जब ज़िले के पुलिस अधीक्षक या उपमंडल के मजिस्ट्रेट की लिखित सूचना मिले, या उस मोहल्ले के दो प्रतिष्ठित नागरिकों की, जहाँ वह व्यक्ति रहता या सक्रिय है। सूचना देने वालों की पहचान बताना ज़रूरी नहीं।

बीट सूचना रिपोर्ट और नैसर्गिक न्याय की टूटी शर्त

गोंडा के आदेश का तीसरा पाया बीट सूचना रिपोर्ट थी, और मंडलायुक्त ने भी उसे अपने आदेश में लंबित काग़ज़ों की सूची में रखा।

जस्टिस विद्यार्थी ने इस काग़ज़ को दो वाक्यों में ख़ारिज किया, और तर्क क़ानून की बनावट से निकाला। बीट सूचना रिपोर्ट के आधार पर न कोई मुक़दमा दर्ज होता है, और न उस व्यक्ति को, जिसके ख़िलाफ़ बीट सूचना दर्ज हुई है, उस रिपोर्ट के सिलसिले में सुनवाई का कोई मौक़ा दिया जाता है। सुनवाई का मौक़ा दिए बिना बीट सूचना रिपोर्ट पर की गई कोई भी जाँच किसी को गुंडा घोषित करने का आधार नहीं बन सकती, क्योंकि वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

अंबेडकर नगर के थाना जहाँगीरगंज का फाटक और उस पर टँगा नामपट्ट, अगस्त 2016 की तस्वीर। बीट सूचना ऐसे ही थाने के रजिस्टर में दर्ज होती है, और उस पर न मुक़दमा बनता है न सुनवाई होती है
तस्वीर: In.sandeepgupta, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यह तर्क इस फ़ैसले में पहली बार नहीं आया। अप्रैल 2024 में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने वक़ार के मामले में 1981 की पूर्ण पीठ के फ़ैसले रामजी पांडेय और 1999 के भीम सेन त्यागी का हवाला देते हुए लिखा था कि अपराध संख्याओं, प्राथमिकियों और बीट रिपोर्ट की फ़ेहरिस्त धारा 3(1) के वैध नोटिस की कसौटी पूरी नहीं करती। रामजी पांडेय में अदालत ने "भौतिक आरोपों की सामान्य प्रकृति" और "आरोपों के ब्योरे" के बीच फ़र्क़ किया था: नोटिस में गवाहों के नाम या वारदात की तारीख़ लिखना ज़रूरी नहीं, पर तथ्यों का सामान्य विवरण ज़रूरी है। उस मामले के नोटिस में मुक़दमों के नंबर, धाराएँ और यह तक दर्ज था कि किसमें सज़ा हुई और किसमें बरी, फिर भी नोटिस रद्द हुआ।

नोटिस छपा हुआ आता है, यह भी नियमावली से ही निकलता है। नियम 4 कहता है कि धारा 3(1) का नोटिस, जहाँ तक हो सके, फ़ॉर्म 1 के मुताबिक़ होगा, और अनुसूची में दिया फ़ॉर्म 1 खाली जगहों वाला छपा प्रारूप है जिसमें (क), (ख) और (ग) के नीचे कोष्ठक में निर्देश लिखा है: जो सामग्री लागू न हो उसे काट दें। ज़ाहिद अली के नोटिस में क्या लिखा था, यह फ़ैसले में दर्ज नहीं है। दर्ज यह है कि उन्होंने उसका जवाब नहीं दिया।

2017 की बरी और 2026 की गिनती

26 अगस्त 2017 को गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपराध संख्या 905/2010 में ज़ाहिद अली को बरी कर दिया था। यह बात उन्होंने मंडलायुक्त के सामने अपील में रखी, बरी होने के आदेश की प्रति भी दी, और मंडलायुक्त के 12 अगस्त 2026 के आदेश में इसका ज़िक्र भी है। इसके बावजूद उसी आदेश में यह निष्कर्ष दर्ज है कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से साबित होता है कि दोनों मुक़दमे और बीट सूचना रिपोर्ट उनके ख़िलाफ़ लंबित हैं। राज्य ने हाई कोर्ट में जो संक्षिप्त प्रति-शपथपत्र दिया, उसमें बरी होने से इनकार नहीं किया गया।

फ़ैसले ने इससे तीन अलग नतीजे निकाले, और तीनों अलग-अलग लोगों पर गए। पहला, क़ानून का: किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ दायर मुक़दमे में उसकी संलिप्तता को, उसके उसी मुक़दमे से बरी हो जाने के बाद, उसे गुंडा घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। दूसरा, ज़िलाधिकारी के बारे में, और यह उम्मीद के उलट है: ज़ाहिद अली ने ज़िलाधिकारी के सामने कोई आपत्ति दाख़िल करके बरी होने की बात बताई ही नहीं थी, इसलिए उस मुक़दमे को गिनती में लेने के लिए अदालत ने ज़िलाधिकारी पर ग़लती नहीं मढ़ी। तीसरा, पुलिस के बारे में: पुलिस को 2017 की बरी की जानकारी रही होगी, इसलिए पुलिस रिपोर्ट में उस मुक़दमे का ज़िक्र यह बताता है कि पुलिस ने ज़िलाधिकारी के सामने जान-बूझकर याचिकाकर्ता की झूठी तस्वीर रखी।

मंडलायुक्त के हिस्से में अलग टिप्पणी आई। ज़ाहिद अली ने बरी होने की बात अपील में कही, आदेश में उसका ज़िक्र भी हुआ, फिर भी मंडलायुक्त ने निष्कर्ष यही लिखा कि वे दो मुक़दमों में शामिल हैं। फ़ैसले के मुताबिक़ यह दिखाता है कि अपील तय करते समय मंडलायुक्त ने याचिकाकर्ता के आधारों पर दिमाग़ लगाया ही नहीं, और दिमाग़ न लगाने के दोष से ग्रस्त अपीलीय आदेश क़ानून में टिक नहीं सकता।

यहाँ एक पेच है जिसका ज़िक्र फ़ैसले में नहीं है। नियमावली का नियम 23 कहता है कि धारा 8 के मक़सद से यह बात भी प्रमाणकारी मानी जा सकती है कि व्यक्ति धारा 2(ख) वाले किसी अपराध से महज़ तकनीकी आधार पर या संदेह का लाभ पाकर बरी हुआ हो। 2017 की बरी किस आधार पर हुई, यह फ़ैसले में दर्ज नहीं है, और फ़ैसले में यह भी दर्ज नहीं कि ज़िलाधिकारी या मंडलायुक्त ने कभी नियम 23 का सहारा लेने की कोशिश की हो।

साधारण दंड विधि और निवारक क़ानून का बँटवारा

फ़ैसले का बीचोंबीच हिस्सा आठ बिंदुओं का वह सार है जो इसी अदालत ने राहुल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में पुराने फ़ैसलों से निकाला था। उसका पाँचवाँ बिंदु कहता है कि यह क़ानून निवारक है, दंडात्मक नहीं। सातवाँ कहता है कि गुंडा एक्ट का मक़सद किसी को बग़ैर ठोस अपराध में सज़ा हुए सज़ा दिलाना नहीं है। और आठवाँ बिंदु सबसे सीधा है: ज़िला-बदर का आदेश उन लोगों के ख़िलाफ़ पारित किया जाना चाहिए जिन्हें साधारण दंड विधि के दायरे में आसानी से लाया नहीं जा सकता और जिन्हें उनके कथित अपराधों के लिए दोषी ठहराया नहीं जा सकता।

गोंडा के मामले में यह कसौटी उलटी बैठती है। फ़ैसले में लिखा है कि यह आरोप ही नहीं है कि ज़ाहिद अली लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए ख़तरा हैं। वे 2020 के जिस इकलौते मामले में आरोपी हैं, उसकी सुनवाई अदालत में चल रही है, और फ़ैसले का वाक्य है कि ऐसा नहीं है कि याचिकाकर्ता को साधारण दंड विधि के तहत निपटाया नहीं जा रहा।

2020 के मुक़दमे की चार्जशीट 13 सितंबर 2020 को अदालत में जा चुकी थी। ज़िला-बदर का आदेश उसके पाँच साल आठ महीने बाद आया।

गोवर्धन से वक़ार तक: तीन साल में न बने दिशा-निर्देश

बुधवार, 23 अगस्त 2023 को हाई कोर्ट की खंडपीठ ने गोवर्धन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में अलीगढ़ के अपर ज़िलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) का 15 जून 2023 का नोटिस रद्द किया था। वह नोटिस भी दो काग़ज़ों पर टिका था: एक मुक़दमा और 3 मई 2023 की रपट संख्या 20। जस्टिस राहुल चतुर्वेदी और जस्टिस मोहम्मद अज़हर हुसैन इदरीसी ने लिखा कि इस अधिनियम के प्रावधानों का धड़ल्ले से दुरुपयोग हो रहा है, कि कार्यपालक अधिकारी बाहरी विचारों से, अपनी मर्ज़ी और सनक के हिसाब से एक मुक़दमे या किसी बीट रिपोर्ट पर नोटिस भेज रहे हैं, और इससे यह कठोर क़ानून ख़ुद कुंद हो जाता है।

उसी आदेश में एक वाक्य ऐसा है जो ज़िला-बदर से आगे जाता है। खंडपीठ ने लिखा कि 'गुंडा' का ठप्पा आदमी पर ज़िंदगी भर लगा रहता है, और जब कार्यपालक अधिकारी लापरवाही से किसी को यह नाम देते हैं तो उसका पूरा भविष्य और उसके परिवार की साख तबाह हो जाती है। अदालत ने महानिबंधक को निर्देश दिया कि फ़ैसले की प्रति राज्य के सभी कार्यपालक अधिकारियों तक पहुँचाई जाए, और राज्य सरकार को कहा कि 31 अक्टूबर 2023 तक अधिनियम के इस्तेमाल पर एक समान दिशा-निर्देश बनाकर सभी ज़िलाधिकारियों में बाँटे जाएँ।

शनिवार, 27 अप्रैल 2024 को वक़ार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस सुरेंद्र सिंह-प्रथम ने दर्ज किया कि इस अदालत के पहले के आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने ज़िलाधिकारियों को कोई दिशा-निर्देश जारी करने की ज़हमत नहीं उठाई, और ज़िलाधिकारी तथा उनके मातहत धारा 3 के तहत लगातार ग़ैर-क़ानूनी नोटिस जारी कर रहे हैं। रामपुर का नोटिस और आदेश रद्द हुए, राज्य पर बीस हज़ार रुपये हर्जाना लगा जो दो महीने में याचिकाकर्ता को देना था, और अदालत ने कहा कि राज्य यह रक़म सुनवाई का मौक़ा देकर अपर ज़िलाधिकारी से वसूल सकता है। गृह सचिव को अलग निर्देश गया कि वे यह सुनिश्चित करें कि राज्य की शक्तियाँ इस्तेमाल करने वाले लोक सेवक क़ानून की सीमा में रहें, और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।

इस पृष्ठभूमि में 2026 का शब्द अपनी जगह पर बैठता है। जिस फ़ैसले में अदालत ने 'आदतन' का अर्थ समझाते हुए लिखा कि उसका मतलब बार-बार या लगातार करना है, उसी फ़ैसले के आख़िरी हिस्से में वही विशेषण राज्य के लिए आया।

नोएडा का एनएसए मामला और सुप्रीम कोर्ट में अपील

दूसरा मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 960/2026 है, जिसका फ़ैसला जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव ने 2 सितंबर 2026 को सुनाया। आकृति चौधरी क़रीब 24 साल की हैं, दौलत राम कॉलेज से इतिहास में स्नातक, दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए, और अभी उसी विश्वविद्यालय के विधि संकाय में क़ानून की पहले साल की छात्रा। फ़ैसले में दर्ज है कि उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, और राज्य ने भी यह माना।

अप्रैल 2026 में गौतम बुद्ध नगर में मज़दूरों का आंदोलन हुआ था। शिकायत कम मज़दूरी की थी: दस से पंद्रह हज़ार रुपये महीना, बरसों से कोई बढ़ोतरी नहीं, और एक साथ बारह घंटे की पाली। हज़ारों मज़दूर सड़कों पर आए और तोड़फोड़ तथा आगज़नी के आरोप लगे। राज्य का कहना था कि इस पूरे मामले में आकृति चौधरी भड़काने वाली थीं।

नोएडा के सेक्टर 57 के चौराहे पर रात की आवाजाही, नवंबर 2021 की तस्वीर। गौतम बुद्ध नगर के इन्हीं औद्योगिक सेक्टरों की पाली और मज़दूरी उस आंदोलन की शिकायत थी
तस्वीर: DwfDelhi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अदालत ने गिरफ़्तारी की तारीख़ राज्य के ही काग़ज़ों से तय की। राज्य ने कहा कि गिरफ़्तारी 12 अप्रैल को हुई, याचिका में कहा गया कि 11 अप्रैल की शाम साढ़े पाँच बजे बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से। पीठ ने राज्य की पेश की हुई व्हाट्सऐप बातचीत देखी: 11 अप्रैल को दोपहर 2:03 बजे तक आकृति चौधरी जवाब दे रही हैं, और उसके बाद शाम 5:56 से रात 7:11 बजे तक आए आठ संदेशों और 7:31 बजे की मिस्ड कॉल का कोई जवाब नहीं। इससे अदालत ने माना कि वे 11 अप्रैल की शाम साढ़े पाँच बजे से ही हिरासत में थीं। हिंसा 13 अप्रैल से शुरू हुई, यानी उनके हिरासत में चले जाने के बाद।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 का नोटिस भी उसी तरह खुला। जस्टिस सचदेव ने ध्यान दिलाया कि जिस सामान्य डायरी प्रविष्टि संख्या 37 के आधार पर गिरफ़्तारी दिखाई गई, वह 12 अप्रैल की सुबह 10:20 बजे बनी, और वही नंबर धारा 130 के नोटिस पर छपा हुआ है। नोटिस पर जारी होने का समय कहीं नहीं है। पीठ ने लिखा कि नोटिस गिरफ़्तारी के बाद तैयार हुआ और दिखावे से ज़्यादा कुछ नहीं था, और रिकॉर्ड में दिख रही गढ़ंत पर राज्य के वकील से कोई जवाब नहीं आया।

अदालत ने बार-बार पूछा कि किस संदेश या किस वीडियो में हिंसा के लिए उकसावा है, और राज्य एक भी नहीं दिखा सका। एनएसए के तहत जारी हिरासत को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन मानते हुए आदेश और हिरासत के आधार, दोनों रद्द हुए। मुआवज़े की माँग पचास लाख रुपये की थी। अदालत ने पाँच लाख दिलाए और कहा कि यह रक़म गौतम बुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी की तनख़्वाह से वसूली जाए, और उन सभी ज़िम्मेदार अफ़सरों से भी, नीचे उस थानाध्यक्ष तक जिसने पहली रिपोर्ट तैयार की थी। इनकी सेवा पुस्तिका में अदालत की नाराज़गी दर्ज करने का निर्देश भी है। इसी सिलसिले में फ़ैसले का वह वाक्य आया कि अगर नौकरशाही में भटके हुए लोग यही करते रहे तो उत्तर प्रदेश को ऑरवेल की कल्पना वाले दमनकारी राज्य में बदलते देर नहीं लगेगी।

बुधवार, 9 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दाख़िल होगी। पीटीआई के मुताबिक़ रविवार, 13 सितंबर को गौतम बुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी मेधा रूपम सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं। फ़ैसले के वक़्त आकृति चौधरी अपराध संख्या 163/2026 में न्यायिक हिरासत में थीं, और हाई कोर्ट ने राज्य की यह दलील मान ली थी कि एनएसए की हिरासत उसी न्यायिक हिरासत में समा गई। मुआवज़ा पूरा न देने की वजह भी यही दर्ज है।

एनएसए का हिसाब ऊपर जाता है, गुंडा एक्ट का नहीं

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 ज़िलाधिकारी को हिरासत का आदेश देने की ताक़त तभी देता है जब राज्य सरकार लिखित आदेश से उसे यह अधिकार दे, और पहली बार में वह अवधि तीन महीने से ज़्यादा नहीं हो सकती। इसके बाद पूरा काग़ज़ ऊपर की तरफ़ चलता है। धारा 3(4) कहती है कि ज़िलाधिकारी आदेश और उसके आधार तुरंत राज्य सरकार को भेजेंगे, और राज्य की मंज़ूरी के बिना वह आदेश बारह दिन से ज़्यादा नहीं टिकेगा। धारा 3(5) के तहत राज्य सात दिन में केंद्र को सूचित करता है। धारा 8 के मुताबिक़ बंदी को हिरासत के आधार आमतौर पर पाँच दिन में बताने होते हैं, और लिखित कारण दर्ज करके ही दस दिन तक की देर हो सकती है। धारा 10 के तहत मामला तीन हफ़्ते में सलाहकार बोर्ड के सामने जाता है, जिसमें हाई कोर्ट के जज या उस पद के योग्य तीन लोग होते हैं, और बोर्ड सात हफ़्ते में रिपोर्ट देता है। धारा 13 के तहत कुल हिरासत बारह महीने से ज़्यादा नहीं हो सकती।

गुंडा नियंत्रण अधिनियम में इनमें से कुछ भी नहीं है। सोलह धाराओं में कहीं यह नहीं लिखा कि ज़िलाधिकारी अपने ज़िला-बदर आदेश की ख़बर ज़िले से ऊपर किसी को दे। नियमित रिपोर्ट का इकलौता प्रावधान नियमावली के नियम 7 में है: जिस व्यक्ति को धारा 3(3)(ख) के तहत अपनी आवाजाही बताने का निर्देश मिला हो, उसकी पाक्षिक रिपोर्ट थानाध्यक्ष उसी ज़िले के ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को भेजता है। नियम 25 कहता है कि ज़िलाधिकारी ऐसे रजिस्टर रखेंगे जैसा राज्य सरकार समय-समय पर निर्देश दे।

इसलिए यह गिनती कहीं छपती नहीं कि उत्तर प्रदेश में हर साल कितने लोग ज़िला-बदर होते हैं। एनएसए के मामले में भी सार्वजनिक हिसाब सरकार ने नहीं, अख़बार ने लगाया। द इंडियन एक्सप्रेस ने 6 अप्रैल 2021 की पड़ताल में अदालती रिकॉर्ड गिनकर बताया था कि जनवरी 2018 से दिसंबर 2020 के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एनएसए की 120 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर फ़ैसला दिया, और 94 में 32 ज़िलों के ज़िलाधिकारियों के आदेश रद्द करके रिहाई का हुक्म दिया। उन 120 में से 41 गोकशी के मुक़दमों से निकले थे और उनमें से 30 में हिरासत रद्द हुई। छह मामलों में अदालत ने दर्ज किया कि एनएसए इकलौते मुक़दमे पर लगा था और उस व्यक्ति का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।

ज़ाहिद अली के फ़ैसले के आख़िरी पन्ने पर दो पंक्तियाँ छपी हैं। पहली, कि यह फ़ैसला कारण देने वाला है। दूसरी, कि यह फ़ैसला रिपोर्ट किए जाने योग्य नहीं है। ज़िला-बदर का आदेश 11 मई का था और उसकी अवधि छह महीने की, अपील 12 अगस्त को ख़ारिज हुई, और फ़ैसला 10 सितंबर को आया। इस बीच ज़ाहिद अली गोंडा से बाहर रहे या नहीं, यह रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।

स्रोतइलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ पीठ: ज़ाहिद अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, आपराधिक विविध रिट याचिका संख्या 8680/2026, जस्टिस सुभाष विद्यार्थी, 10 सितंबर 2026 का पूरा फ़ैसला, सात पन्ने (लाइव लॉ की प्रति), उसी फ़ैसले की दूसरी प्रति (लॉ बीट), पाठ अक्षरशः समान, इलाहाबाद हाई कोर्ट: आकृति चौधरी बनाम भारत संघ, बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 960/2026, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव, 2 सितंबर 2026, पंद्रह पन्ने, उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 (उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 8, 1971) का पूरा पाठ, सोलह धाराएँ, उसी अधिनियम का दूसरा पाठ, धारा 5, 6, 8, 9, 10, 13 और 14 के मिलान के लिए, उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण नियमावली, 1970, उत्तर प्रदेश असाधारण राजपत्र, 9 सितंबर 1970, अधिसूचना संख्या 4475-पी/आठ-ख-1-655-पी-70, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (अधिनियम संख्या 65, 1980) का पूरा पाठ, इलाहाबाद हाई कोर्ट: वक़ार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, तटस्थ उद्धरण 2024:AHC:75211-DB, जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस सुरेंद्र सिंह-प्रथम, 27 अप्रैल 2024; इसी में 23 अगस्त 2023 के गोवर्धन वाले आदेश का पूरा पाठ उद्धृत है, लाइव लॉ, 23 अगस्त 2023: गोवर्धन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, आपराधिक विविध रिट याचिका संख्या 12619/2023, जस्टिस राहुल चतुर्वेदी और जस्टिस मोहम्मद अज़हर हुसैन इदरीसी, लाइव लॉ, 11 सितंबर 2026: ज़ाहिद अली के फ़ैसले की रिपोर्ट, उद्धरण 2026 लाइव लॉ (एबी) 698, बार एंड बेंच, 12 सितंबर 2026: उसी फ़ैसले की स्वतंत्र रिपोर्ट, वर्डिक्टम: फ़ैसले का तटस्थ उद्धरण 2026:AHC-LKO:63435 (इस रिपोर्ट में फ़ैसले की तारीख़ 13 सितंबर लिखी है, जबकि फ़ैसले की प्रति पर 10 सितंबर 2026 दर्ज है), द इंडियन एक्सप्रेस, 6 अप्रैल 2021, कौनैन शरीफ़ एम: जनवरी 2018 से दिसंबर 2020 तक इलाहाबाद हाई कोर्ट में एनएसए की 120 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का हिसाब, पीटीआई, 13 सितंबर 2026, दोपहर 2:15: गौतम बुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी मेधा रूपम का सुप्रीम कोर्ट जाना, और 9 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल का बयान, फ़्री प्रेस जर्नल, 13 सितंबर 2026: उसी अपील की स्वतंत्र रिपोर्ट

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