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मंत्रिमंडल ने 20,804 करोड़ की आठ रेल परियोजनाएँ मंज़ूर कीं, पर मंज़ूर 35,966 किलोमीटर में से 12,769 ही चालू हुए हैं

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 9 सितंबर को आठ मिनट के अंतर पर दो विज्ञप्तियाँ जारी कीं: नौ राज्यों की आठ मल्टीट्रैकिंग परियोजनाएँ, 1,196 किलोमीटर, 2029-30 की समयसीमा। रेल मंत्रालय के अपने संसदीय जवाबों में मंज़ूरी और चालू होने के बीच का फ़ासला दर्ज है। दक्षिण वाली विज्ञप्ति हर परियोजना की लंबाई छापती है, पूरब वाली एक भी नहीं। और कार्बन बचत को पेड़ों में बदलने का गुणा दोनों में एक जैसा नहीं है।

हैदराबाद के भरतनगर के पास विद्युतीकृत पटरी पर कोयले की एक मालगाड़ी, आगे डब्ल्यूएजी-7 इंजन और ऊपर ओवरहेड तार; यह तस्वीर 2022 की है। 9 सितंबर 2026 को मंज़ूर आठों परियोजनाएँ इसी तरह के माल मार्गों पर पटरियाँ जोड़ेंगी
तस्वीर: Adityamadhav83, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

लोकसभा में 17 दिसंबर 2025 को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक लिखित उत्तर में बताया कि 1 अप्रैल 2025 तक देश भर में 431 रेल परियोजनाएँ मंज़ूर थीं: 154 नई लाइन, 33 आमान परिवर्तन, 244 दोहरीकरण और मल्टीट्रैकिंग। कुल लंबाई 35,966 किलोमीटर, कुल लागत लगभग 6.75 लाख करोड़ रुपये। उसी उत्तर में यह भी दर्ज था कि मार्च 2025 तक इनमें से 12,769 किलोमीटर चालू हुए और लगभग 2.91 लाख करोड़ रुपये ख़र्च हुए।

मंज़ूर लंबाई का 35 फ़ीसदी।

9 सितंबर 2026 को इसी बही में आठ नाम और जुड़े। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 20,804 करोड़ रुपये की आठ मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को मंज़ूरी दी, जो नौ राज्यों के 31 ज़िलों में लगभग 1,196 किलोमीटर जोड़ेंगी।

दो विज्ञप्तियाँ, आठ मिनट का फ़ासला

मंज़ूरी एक बैठक में हुई, पर पीआईबी से दो अलग विज्ञप्तियाँ निकलीं। पहली, रिलीज़ आईडी 2308292, दोपहर 3:25 बजे: पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तीन परियोजनाएँ, 10,783 करोड़ रुपये, 14 ज़िले, लगभग 656 किलोमीटर। दूसरी, रिलीज़ आईडी 2308324, 3:33 बजे: तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना की पाँच परियोजनाएँ, 10,021 करोड़ रुपये, 17 ज़िले, लगभग 540 किलोमीटर। रेल मंत्रालय ने पहली विज्ञप्ति को 3:26 बजे अपने नाम से दोबारा जारी किया, रिलीज़ आईडी 2308303। दोनों में समयसीमा एक है: 2029-30।

दक्षिण की पाँच लाइनें, जिनका जोड़ ठीक बैठता है

करूर रेलवे स्टेशन का प्रवेश-द्वार, तमिलनाडु; यह तस्वीर 2012 की है। सलेम, करूर और डिंडीगुल के बीच 159 किलोमीटर का दोहरीकरण इन्हीं पाँच दक्षिणी परियोजनाओं में है
तस्वीर: Balaji, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

विज्ञप्ति 2308324 पाँचों परियोजनाओं की लंबाई अलग-अलग छापती है। अरक्कोनम से रेनिगुंटा तीसरी और चौथी लाइन, 77 किलोमीटर। व्हाइटफ़ील्ड से बांगरपेट तीसरी और चौथी लाइन, 47 किलोमीटर। होसुर से ओमालूर दोहरीकरण, 147 किलोमीटर। सलेम, करूर और डिंडीगुल के बीच दोहरीकरण, 159 किलोमीटर। सिकंदराबाद के घाटकेसर से काज़ीपेट तक 110 किलोमीटर की मल्टीट्रैकिंग। इन पाँचों को जोड़ने पर ठीक 540 किलोमीटर आते हैं, वही आँकड़ा जो विज्ञप्ति की सुर्ख़ी में है। इससे 2,121 गाँवों की पहुँच बदलेगी, जिनकी आबादी लगभग 52 लाख बताई गई है।

पूरब की तीन लाइनों की लंबाई कहीं नहीं छपी

विज्ञप्ति 2308292 में तीन नाम हैं और एक भी लंबाई नहीं। खड़गपुर से झारसुगुड़ा के बागदेही तक चौथी लाइन। कटनी से पेंड्रा रोड तक चौथी लाइन। बिलासपुर के उसलापुर से पेंड्रा रोड तक तीसरी लाइन। तीनों मिलकर 656 किलोमीटर बनते हैं, पर किस मार्ग का कितना हिस्सा है, यह विज्ञप्ति नहीं बताती। 9 सितंबर की किसी भी बड़ी रिपोर्ट में यह विभाजन नहीं मिला। दक्षिण वाली विज्ञप्ति में यह ब्योरा है, पूरब वाली में नहीं, जबकि दोनों एक ही बैठक से निकलीं और आठ मिनट के भीतर जारी हुईं।

367 किलोमीटर का आँकड़ा एक सांसद के बयान से आया

संबलपुर के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उसी दिन बयान दिया कि खड़गपुर से झारसुगुड़ा तक की चौथी लाइन 367 किलोमीटर की है और उस पर 6,528 करोड़ रुपये लगेंगे। उनके मुताबिक़ यह मार्ग ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड के आठ ज़िलों से गुज़रता है, जिनमें सुंदरगढ़, संबलपुर और झारसुगुड़ा शामिल हैं। इसी बयान में 125 लाख मानव-दिवस रोज़गार और सालाना 967 करोड़ रुपये की परिवहन बचत का दावा है। ये चारों आँकड़े केंद्र सरकार की विज्ञप्ति में नहीं हैं।

बचे हुए 289 किलोमीटर का हिसाब नहीं मिलता

अगर सांसद का आँकड़ा सही है तो 656 में से 367 घटाने पर बाक़ी दो परियोजनाओं के लिए 289 किलोमीटर बचते हैं। कटनी से पेंड्रा रोड और उसलापुर से पेंड्रा रोड, दोनों बिलासपुर-कटनी मार्ग पर पड़ते हैं। इस मार्ग की मुख्य लंबाई विकिपीडिया के विवरण में 318.6 किलोमीटर दर्ज है। दोनों टुकड़े मिलकर लगभग पूरा मार्ग बनते हैं, इसलिए 289 और 318.6 के बीच का लगभग 30 किलोमीटर का अंतर खुला रह जाता है। यह विरोधाभास यहाँ दर्ज किया जा रहा है, सुलझाया नहीं। सरकारी विज्ञप्ति ने कोई लंबाई छापी ही नहीं, इसलिए मिलान का कोई प्राथमिक आधार उपलब्ध नहीं है।

पेंड्रा रोड पर पहले से दो पटरियाँ हैं

बिलासपुर जंक्शन का नाम-पट्ट, छत्तीसगढ़; यह तस्वीर 2021 की है। पेंड्रा रोड इसी बिलासपुर मंडल में पड़ता है और नई तीसरी लाइन का एक सिरा बिलासपुर के उसलापुर पर है
तस्वीर: Suyash Dwivedi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पेंड्रा रोड स्टेशन समुद्र तल से 618 मीटर की ऊँचाई पर है, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मंडल में। स्टेशन पर तीन प्लेटफ़ॉर्म हैं और पटरियाँ दोहरी और विद्युतीकृत ब्रॉड गेज हैं। बिलासपुर-कटनी मार्ग का विद्युतीकरण 1995 में हुआ था, इसकी शाखाओं का 1994 में। इसी मार्ग की शाखाएँ अनूपपुर से चिरमिरी और बोरिदंड से अंबिकापुर जाती हैं, और यही हिस्सा कोयले की ढुलाई के लिए जाना जाता है। नई तीसरी और चौथी लाइन मौजूदा दो पटरियों के ऊपर जुड़ेंगी।

पेड़ों का गुणा दोनों विज्ञप्तियों में अलग है

दोनों विज्ञप्तियाँ कार्बन डाइऑक्साइड में कमी बताती हैं और फिर उसे पेड़ों में बदलती हैं। दक्षिण वाली में 42 करोड़ किलोग्राम की कमी को लगभग 2 करोड़ वृक्षारोपण के बराबर बताया गया है। पूरब वाली में 62 करोड़ किलोग्राम को 2.48 करोड़ वृक्षारोपण के बराबर। पहली गणना में एक पेड़ 21 किलोग्राम कार्बन के बराबर बैठता है, दूसरी में 25 किलोग्राम। एक ही मंत्रालय, एक ही बैठक, आठ मिनट का अंतर, और प्रति पेड़ लगभग पाँचवाँ हिस्सा फ़र्क़। दोनों विज्ञप्तियों में यह नहीं लिखा कि यह दर किस आधार पर तय हुई।

वही गुणा पिछली चार मंज़ूरियों में चार अलग दरें देता है

31 जुलाई 2025 की मंज़ूरी में 515 करोड़ किलोग्राम कार्बन को 20 करोड़ पेड़ों के बराबर बताया गया, यानी 25.75 किलोग्राम प्रति पेड़। 14 फ़रवरी 2026 की मंज़ूरी में 111 करोड़ किलोग्राम को 4 करोड़ पेड़, यानी 27.75 किलोग्राम। 5 मई 2026 की मंज़ूरी में 185 करोड़ किलोग्राम को 7 करोड़ पेड़, यानी 26.43 किलोग्राम। इनमें 9 सितंबर की दोनों दरें जोड़ दें तो पाँच मंज़ूरियों में पाँच अलग दरें बनती हैं, 21 से 27.75 किलोग्राम के बीच। सबसे नीची और सबसे ऊँची दर में लगभग एक-तिहाई का अंतर है।

असली सवाल: पिछली मंज़ूरियाँ कहाँ पहुँचीं

17 दिसंबर 2025 के लोकसभा उत्तर के आँकड़े इस सवाल का सीधा जवाब देते हैं। 431 मंज़ूर परियोजनाओं की 35,966 किलोमीटर लंबाई में से मार्च 2025 तक 12,769 किलोमीटर चालू हुए। बाक़ी 23,197 किलोमीटर किसी न किसी चरण में हैं। ख़र्च के पक्ष में 6.75 लाख करोड़ रुपये की मंज़ूर लागत के मुक़ाबले लगभग 2.91 लाख करोड़ रुपये लग चुके थे, जो कुल का लगभग 43 फ़ीसदी है। उसी उत्तर में गति का सुधार भी दर्ज है: 2009 से 2014 के बीच 7,599 किलोमीटर, यानी 4.2 किलोमीटर रोज़; 2014 से 2025 के बीच 34,428 किलोमीटर, यानी 8.57 किलोमीटर रोज़।

सोलह महीने में बही 83 परियोजनाएँ लंबी हुई

5 अगस्त 2026 को रेल मंत्री ने लोकसभा में एक और लिखित उत्तर दिया। उसमें मंज़ूर परियोजनाओं की संख्या 514 बताई गई, कुल लंबाई लगभग 40,000 किलोमीटर, कुल लागत लगभग 8.31 लाख करोड़ रुपये। 1 अप्रैल 2025 की स्थिति से तुलना करें तो लगभग सोलह महीनों में मंज़ूर परियोजनाएँ 431 से बढ़कर 514 हुईं, लंबाई लगभग 4,000 किलोमीटर बढ़ी और मंज़ूर लागत लगभग 1.56 लाख करोड़ रुपये। दोनों आँकड़े एक ही मंत्रालय के दो संसदीय उत्तरों से हैं, पर उनकी कट-ऑफ़ तारीख़ें अलग हैं और अगस्त वाले उत्तर में कोई कट-ऑफ़ तारीख़ नहीं छपी। 9 सितंबर की आठ परियोजनाएँ इस 514 में शामिल नहीं हैं, क्योंकि वे बाद की हैं।

बजट का 39 फ़ीसदी जुलाई तक

उसी 5 अगस्त के उत्तर में चालू वित्त वर्ष का हिसाब है। रेलवे को 2,93,030 करोड़ रुपये का बजट अनुदान मिला है और जुलाई 2026 तक 1,14,973 करोड़ रुपये ख़र्च हुए, जो 39 फ़ीसदी बनता है। इसी उत्तर में कवच के आँकड़े भी हैं: 31 जुलाई 2026 तक 2,633 रूट किलोमीटर पर यह प्रणाली चालू है, जिसमें दिल्ली-मुंबई गलियारे के 1,423 और दिल्ली-हावड़ा गलियारे के 1,210 रूट किलोमीटर शामिल हैं। सरकार ने लिखा कि कवच का चौथा संस्करण बड़े पैमाने पर लगाने की योजना है।

संसदीय समिति: 39 फ़ीसदी काम, 74 फ़ीसदी ख़र्च

पूर्वी समर्पित माल गलियारे की निर्माणाधीन पटरी, जिस पर कंक्रीट के स्लीपर बिछे हैं; यह तस्वीर 2016 की है। समिति ने जो 39 फ़ीसदी भौतिक उपलब्धि दर्ज की, वह ऐसी ही अधूरी लंबाई का हिसाब है
तस्वीर: Teacher1943, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

रेलवे संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अनुदान माँगों पर अपनी रिपोर्ट में दोहरीकरण की प्रगति पर टिप्पणी की है। समिति के सामने रखे आँकड़ों में दिसंबर 2024 तक का लक्ष्य 2,900 किलोमीटर था और पूरा हुआ 1,134 किलोमीटर, यानी 39.10 फ़ीसदी। इसी अवधि में बजट अनुमान 29,312 करोड़ रुपये था, संशोधित अनुमान 31,036.86 करोड़ रुपये, और ख़र्च 22,918.57 करोड़ रुपये। समिति ने दर्ज किया कि बजट का वित्तीय उपयोग लगभग 74 फ़ीसदी रहा जबकि लक्ष्य की भौतिक उपलब्धि सिर्फ़ 39 फ़ीसदी। यही अंतर हर नई मंज़ूरी के पीछे खड़ा है।

बिहार का ब्योरा एक सवाल के जवाब में खुलता है

राष्ट्रीय आँकड़े औसत छिपाते हैं, राज्यवार उत्तर नहीं। लोकसभा के अतारांकित प्रश्न संख्या 588 पर, जो डॉ. आलोक कुमार सुमन ने पूछा और जिसका उत्तर 22 जुलाई 2026 को अश्विनी वैष्णव ने दिया, बिहार का पूरा हिसाब छपा है: 1 अप्रैल 2026 तक राज्य में पूरी या आंशिक रूप से पड़ने वाली 59 परियोजनाएँ मंज़ूर हैं, जिनमें 32 नई लाइन, 1 आमान परिवर्तन और 26 दोहरीकरण हैं, कुल 5,067 किलोमीटर, कुल लागत 96,651 करोड़ रुपये; इनमें से मार्च 2026 तक 1,050 किलोमीटर चालू हुए और 29,860 करोड़ रुपये ख़र्च हुए, यानी मंज़ूर लंबाई का लगभग 21 फ़ीसदी और मंज़ूर रक़म का लगभग 31 फ़ीसदी।

दोहरीकरण का ख़ाना सबसे पीछे है

उसी तालिका में श्रेणीवार विभाजन है। नई लाइनों की 32 परियोजनाएँ 2,616 किलोमीटर की हैं, जिनमें से 533 किलोमीटर चालू हुए और 14,806 करोड़ रुपये लगे। आमान परिवर्तन की इकलौती परियोजना 69 किलोमीटर की है, 52 किलोमीटर चालू, 544 करोड़ रुपये ख़र्च। दोहरीकरण और मल्टीट्रैकिंग की 26 परियोजनाएँ 2,382 किलोमीटर की हैं, जिनमें से सिर्फ़ 465 किलोमीटर चालू हुए और 14,509 करोड़ रुपये लग चुके हैं। यह मंज़ूर लंबाई का 19.5 फ़ीसदी है, तीनों श्रेणियों में सबसे कम।

फ़रवरी में मंज़ूर, जुलाई में निर्माणाधीन

इसी बिहार उत्तर में एक परियोजना का नाम पहचाना हुआ है। पुनारख से किउल तीसरी और चौथी लाइन को सीसीईए ने 24 फ़रवरी 2026 को मंज़ूरी दी थी, पर उस मंज़ूरी की रिपोर्टिंग में इसकी लंबाई कहीं नहीं छपी। 22 जुलाई 2026 के उत्तर में यह परियोजना चालू कामों की सूची में है, 50 किलोमीटर और 2,668 करोड़ रुपये के साथ। पाँच महीने बाद संसद के एक जवाब से वह आँकड़ा मिला जो मंज़ूरी की विज्ञप्ति ने नहीं दिया था। उसी सूची में सोननगर से अंडाल तक 749 किलोमीटर की मल्टीट्रैकिंग भी है, 12,334 करोड़ रुपये की।

2026 की पाँच बैठकों का जोड़

इस साल मल्टीट्रैकिंग की मंज़ूरियाँ पाँच बार आईं। 14 फ़रवरी को तीन परियोजनाएँ, 18,509 करोड़ रुपये, 389 किलोमीटर, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक के 12 ज़िले। 24 फ़रवरी को तीन परियोजनाएँ, 9,072 करोड़ रुपये। 18 अप्रैल को दो परियोजनाएँ, 24,815 करोड़ रुपये, 601 किलोमीटर। 5 मई को तीन परियोजनाएँ, 23,437 करोड़ रुपये, 901 किलोमीटर, छह राज्यों के 19 ज़िले। और 9 सितंबर को आठ परियोजनाएँ, 20,804 करोड़ रुपये, 1,196 किलोमीटर। पाँचों का जोड़ 19 परियोजनाएँ और 96,637 करोड़ रुपये बैठता है।

किलोमीटर के जोड़ में एक ख़ाना ख़ाली रह जाता है

चार बैठकों की कुल लंबाई छपी है और वह 3,087 किलोमीटर बनती है। 24 फ़रवरी वाली मंज़ूरी का कुल आँकड़ा किसी रिपोर्ट में नहीं मिला। उस बैठक की तीन परियोजनाओं में से गोंदिया-जबलपुर दोहरीकरण 230.5 किलोमीटर का बताया गया, गमहरिया-चांडिल तीसरी और चौथी लाइन 56 किलोमीटर की, और पुनारख-किउल 50 किलोमीटर की। तीनों जोड़ने पर लगभग 336.5 किलोमीटर आते हैं, जो अलग-अलग स्रोतों से लिया गया अनुमान है, किसी एक दस्तावेज़ का छपा हुआ जोड़ नहीं। इसे मिलाने पर 2026 की मंज़ूर लंबाई लगभग 3,424 किलोमीटर होती है।

एक जैसे रुपये, बहुत अलग माल क्षमता

मंज़ूरियों में अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता भी बताई जाती है, और यहाँ दरें दूर-दूर तक फैली हैं। 9 सितंबर की दक्षिण वाली मंज़ूरी में 10,021 करोड़ रुपये पर 47 एमटीपीए मिलती है। पूरब वाली में लगभग उतनी ही रक़म, 10,783 करोड़ रुपये, पर 27 एमटीपीए। 14 फ़रवरी की मंज़ूरी में 18,509 करोड़ रुपये पर 96 एमटीपीए, 5 मई की मंज़ूरी में 23,437 करोड़ रुपये पर 60 एमटीपीए, और 31 जुलाई 2025 की मंज़ूरी में 11,169 करोड़ रुपये पर 95.91 एमटीपीए। प्रति हज़ार करोड़ रुपये यह 2.5 से 8.6 एमटीपीए के बीच घूमती है। विज्ञप्तियाँ इस फ़र्क़ की कोई वजह नहीं बतातीं।

भीड़ का इकलौता छपा हुआ आँकड़ा किसी और मार्ग का है

मल्टीट्रैकिंग की दलील भीड़ है, पर मौजूदा भीड़ का आँकड़ा शायद ही कभी छपता है। 18 अप्रैल 2026 की मंज़ूरी इसका अपवाद रही: उसमें ग़ाज़ियाबाद-सीतापुर मार्ग की लाइन उपयोग दर 168 फ़ीसदी बताई गई, यानी क्षमता से दो-तिहाई ज़्यादा ट्रेनें। उसी मंज़ूरी में गोदावरी पर 4.3 किलोमीटर लंबे पुल का ज़िक्र है। 9 सितंबर की दोनों विज्ञप्तियों में इस तरह का कोई प्रतिशत नहीं है, न खड़गपुर-झारसुगुड़ा के लिए, न बिलासपुर-कटनी के लिए, जबकि तीनों नए मार्ग कोयला गलियारे के हैं।

किस माल के लिए बन रही हैं ये लाइनें

दोनों विज्ञप्तियाँ मालसूची में भी अलग हैं। दक्षिण वाली में आठ चीज़ें गिनाई गई हैं: कोयला, सीमेंट, लोहा और इस्पात, कंटेनर, ऑटोमोबाइल, अनाज, पेट्रोलियम उत्पाद और उर्वरक। पूरब वाली में सिर्फ़ तीन: कोयला, सीमेंट, लोहा और इस्पात। यह संकरी सूची उन तीनों मार्गों के चरित्र से मेल खाती है, जो कोरबा और झारसुगुड़ा के कोयला क्षेत्रों से होकर गुज़रते हैं। पर्यटन की सूची में बांधवगढ़ बाघ अभयारण्य, अमरकंटक, अचानकमार बाघ अभयारण्य, मल्हार पुरातात्विक स्थल, रतनपुर महामाया मंदिर और खुटाघाट बांध शामिल हैं।

समय पर चलने का आँकड़ा 77 फ़ीसदी के ऊपर

मंज़ूरी की ख़बर के साथ छपे एक विश्लेषण में 2025-26 का समयपालन आँकड़ा फ़रवरी तक 77 फ़ीसदी से ऊपर बताया गया, और इसके पीछे व्यस्त पटरियों पर यात्री और माल गाड़ियों के मिले-जुले संचालन को गिनाया गया। तर्क यह है कि नई लाइनें, दोहरीकरण और मल्टीट्रैकिंग समयपालन सुधार सकती हैं। यह दलील मंत्रिमंडल की विज्ञप्तियों में सीधे नहीं है; वे मोटे तौर पर परिचालन दक्षता और सेवा विश्वसनीयता की भाषा में लिखी गई हैं।

प्रधानमंत्री की पोस्ट में रक़म कुछ और है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 सितंबर को सोशल मीडिया पर लिखा कि तीन मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं से जुड़ा मंत्रिमंडल का फ़ैसला 10,500 करोड़ रुपये से अधिक का है, जिससे छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में संपर्क सुधरेगा और विरासत तथा वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। विज्ञप्ति में यही रक़म 10,783 करोड़ रुपये है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि ये परियोजनाएँ राज्य के रेल नेटवर्क की क्षमता मज़बूत करेंगी और उद्योग तथा व्यापार के लिए माल ढुलाई आसान बनाएँगी।

बिजली के तार पहले पहुँच चुके हैं

नई पटरियों से पहले विद्युतीकरण का काम लगभग पूरा हो चुका है। 22 जुलाई 2026 के लोकसभा उत्तर के मुताबिक़ ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 99.6 फ़ीसदी विद्युतीकृत है। उसी उत्तर में तुलना है: 2014 से पहले के लगभग 60 वर्षों में 21,801 रूट किलोमीटर, और 2014 से 2026 के बीच 48,072 रूट किलोमीटर। यही उत्तर बताता है कि सभी नई लाइन और मल्टीट्रैकिंग परियोजनाएँ अब विद्युतीकरण के साथ ही मंज़ूर और निर्मित की जा रही हैं, इसलिए 9 सितंबर की आठों परियोजनाओं में यह लागत शामिल है।

पिछले साल की मंज़ूरी और उसका वादा

31 जुलाई 2025 को मंत्रिमंडल ने चार मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को 11,169 करोड़ रुपये में मंज़ूरी दी थी: इटारसी-नागपुर चौथी लाइन, औरंगाबाद-परभणी दोहरीकरण, अलुआबाड़ी रोड-न्यू जलपाईगुड़ी तीसरी और चौथी लाइन, और डांगोआपोसी-जरोली तीसरी और चौथी लाइन। छह राज्यों के 13 ज़िले, 574 किलोमीटर, 95.91 एमटीपीए अतिरिक्त क्षमता, 229 लाख मानव-दिवस रोज़गार। इनकी समयसीमा 2028-29 है, जो 9 सितंबर वाली परियोजनाओं से एक साल पहले पड़ती है।

तीन साल में 6,708 किलोमीटर मल्टीट्रैकिंग मंज़ूर हुई

30 जुलाई 2025 को लोकसभा में अश्विनी वैष्णव ने बताया कि 2022-23 से 2024-25 तक और 2025-26 की पहली तिमाही तक, कुल 184 मल्टीट्रैकिंग परियोजनाएँ मंज़ूर हुईं, जिनकी लंबाई 6,708 किलोमीटर और लागत 1,15,198 करोड़ रुपये है। मंत्री ने कहा कि इनसे लाइन क्षमता बढ़ेगी, अतिरिक्त यात्री और माल यातायात संभव होगा, माल और सेवाओं की तेज़ आवाजाही होगी, परिचालन की अड़चनें घटेंगी और लॉजिस्टिक दक्षता सुधरेगी। उस जोड़ में 9 सितंबर की आठ परियोजनाएँ शामिल नहीं हैं।

बिहार में 2,382 मंज़ूर, 465 चालू

बिहार की तालिका इस पूरे हिसाब का सबसे साफ़ नमूना है, क्योंकि वह एक ही राज्य में मंज़ूरी और निर्माण दोनों को एक पन्ने पर रखती है। वहाँ दोहरीकरण और मल्टीट्रैकिंग की 26 परियोजनाओं की मंज़ूर लंबाई 2,382 किलोमीटर है और 1 अप्रैल 2026 तक चालू लंबाई 465 किलोमीटर। 9 सितंबर की आठ परियोजनाएँ 1,196 किलोमीटर जोड़ेंगी, जो बिहार में अब तक चालू हुई दोहरीकरण लंबाई से ढाई गुना से भी ज़्यादा है, और उनकी तय तारीख़ 2029-30 है।

स्रोतपीआईबी दिल्ली, सीसीईए की हिंदी विज्ञप्ति, दक्षिण की पाँच परियोजनाएँ, 9 सितंबर 2026, 3:33PM, पीआईबी दिल्ली, सीसीईए की हिंदी विज्ञप्ति, पूरब-मध्य की तीन परियोजनाएँ, 9 सितंबर 2026, 3:25PM, लोकसभा अतारांकित प्रश्न संख्या 588, रेल मंत्रालय का उत्तर, 22 जुलाई 2026, स्वराज्य, 17 दिसंबर 2025 के लोकसभा उत्तर पर रिपोर्ट, मंज़ूर और चालू परियोजनाओं के आँकड़े, द ट्रिब्यून, रेलवे संबंधी संसदीय स्थायी समिति की अनुदान माँग रिपोर्ट पर ख़बर, द ट्रिब्यून, 5 अगस्त 2026 के लोकसभा लिखित उत्तर पर ख़बर, बजट उपयोग और 514 मंज़ूर परियोजनाएँ, आर्गस इंग्लिश, ओडिशा, खड़गपुर-झारसुगुड़ा चौथी लाइन पर सांसद धर्मेंद्र प्रधान का बयान, 9 सितंबर 2026, न्यूज़ड्रम, मंत्रिमंडल की मंज़ूरी और समयपालन के आँकड़े पर रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, पीएसयू कनेक्ट, 14 फ़रवरी 2026 की मंत्रिमंडल मंज़ूरी का ब्योरा, इंडियन इन्फ़्रास्ट्रक्चर, 24 फ़रवरी 2026 की सीसीईए मंज़ूरी का ब्योरा, क्रॉनिकल इंडिया, 18 अप्रैल 2026 की सीसीईए मंज़ूरी और ग़ाज़ियाबाद-सीतापुर की लाइन उपयोग दर, द न्यूज़मिल, 5 मई 2026 की मंत्रिमंडल मंज़ूरी का ब्योरा, द ट्रिब्यून, 31 जुलाई 2025 की मंत्रिमंडल मंज़ूरी का ब्योरा, प्रोकेरला, 30 जुलाई 2025 को लोकसभा में रेल मंत्री का उत्तर, मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं का जोड़, विकिपीडिया, बिलासपुर-कटनी रेल मार्ग का विवरण, विकिपीडिया, पेंड्रा रोड स्टेशन का विवरण, डेली एक्सेल्सियर, प्रधानमंत्री की सोशल मीडिया पोस्ट पर रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, अपना छत्तीसगढ़, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का बयान, 9 सितंबर 2026

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