जिस रसायन ने सागर में बारह लोगों को मारा, वह ज़हर अधिनियम की सूची में दर्ज नहीं है
मध्य प्रदेश के बांदा में मरे लोगों के शरीर में मेथनॉल मिला। शराब उत्तर प्रदेश के ललितपुर में बनी थी। बीस लोग नामज़द हुए, दस हिरासत में हैं, और सब स्थानीय हैं।

मध्य प्रदेश के सागर ज़िले की बांदा तहसील में शनिवार से जो लोग बीमार होकर अस्पताल पहुँचे, उनमें से क़रीब बारह की मौत हो गई।
चौरासी लोगों का इलाज चल रहा है। उनमें से उनसठ बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में हैं, सत्रह ज़िला अस्पताल में और सात बांदा के सिविल अस्पताल में।
शवों की जाँच में जो चीज़ मिली, वह मेथनॉल थी, और बड़ी मात्रा में।
पुलिस ने बीस लोगों को नामज़द किया है और दस हिरासत में हैं। मुक़दमा भारतीय न्याय संहिता और मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम, 1915 के तहत दर्ज हुआ है।
अब तक की जाँच में जो बात निकली है, वह यह है कि शराब वहाँ बनी ही नहीं थी।
सीमा के उस पार
शुरुआती जाँच के मुताबिक़ यह शराब उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले में बनाई जा रही थी और सागर की सीमावर्ती बस्तियों में पहुँचाई जा रही थी।
ललितपुर और सागर एक-दूसरे से लगते हैं। बीच में एक राज्य की सीमा है, और उस सीमा के दोनों तरफ़ आबकारी विभाग अलग हैं, पुलिस अलग है, और क़ानून भी अलग हैं।
बनाने वाला एक राज्य में, मरने वाले दूसरे में।
जो बीस लोग नामज़द हुए हैं, वे बेचने और पहुँचाने वाले हैं। यह हर ऐसे मामले में होता है, और यही इस कहानी का सबसे दोहराया जाने वाला हिस्सा है।
बुंदेलखंड का यह इलाक़ा दो राज्यों में बँटा हुआ है और वह बँटवारा प्रशासनिक है, सामाजिक नहीं। यहाँ के गाँवों के रिश्ते, बाज़ार और आवाजाही सीमा के आर-पार चलते हैं। एक तरफ़ का आदमी दूसरी तरफ़ खेत रखता है और दूसरी तरफ़ की मंडी में सामान बेचता है।
यही रोज़मर्रा की आवाजाही इस कारोबार के भी काम आती है।
मेथनॉल है क्या
शराब में जो नशा करने वाला पदार्थ होता है, उसे एथेनॉल कहते हैं। वह अनाज, गन्ने या फल के किण्वन से बनता है।
मेथनॉल दिखने, बहने और गंध में उससे मिलता-जुलता है, पर वह अलग रसायन है। वह लकड़ी, गैस या कोयले से बनाया जाता है और उद्योग में विलायक, ईंधन और कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होता है।
शरीर में जाकर मेथनॉल टूटता है तो फ़ॉर्मलडिहाइड और फिर फ़ॉर्मिक एसिड बनता है। यही दोनों नुक़सान करते हैं। आँख की तंत्रिका पर असर पड़ता है, इसलिए अंधापन आम लक्षण है। ख़ून का अम्ल-क्षार संतुलन बिगड़ता है और अंग काम करना बंद कर देते हैं।
बहुत कम मात्रा जानलेवा होती है, और लक्षण तुरंत नहीं दिखते। कई घंटों की देरी होती है, इसलिए जब तक लोग अस्पताल पहुँचते हैं, नुक़सान हो चुका होता है।
इस देरी का एक और नतीजा है। पीने वाले को उस रात कुछ महसूस नहीं होता, इसलिए वह अगले दिन भी वही शराब पी सकता है, और उसके साथी भी। जब तक पहली मौत होती है, तब तक उसी बैच का बड़ा हिस्सा बिक चुका होता है।
यही वजह है कि ऐसी घटनाओं में मौतों का सिलसिला दो-तीन दिन चलता रहता है और आँकड़ा बढ़ता जाता है। सागर में भी शुरुआती ख़बरों में संख्या नौ थी, फिर ग्यारह, फिर बारह।
यह शराब में जाता क्यों है

इसका जवाब सीधा है और असहज।
मेथनॉल सस्ता है।
अवैध शराब बनाने वाले को नशा बढ़ाना होता है और लागत घटानी होती है। एथेनॉल बनाने में कच्चा माल और समय लगता है। मेथनॉल बाज़ार से मिल जाता है और उसकी थोड़ी मात्रा असर बढ़ा देती है।
बनाने वाला यह जानता है कि यह ज़हरीला है। वह मात्रा कम रखने की कोशिश करता है। और यहीं गड़बड़ होती है, क्योंकि घोल ठीक से मिलाया नहीं जाता।
एक ही बैच से बनी शराब की कुछ बोतलों में मात्रा कम रहती है और कुछ में ज़्यादा। इसलिए एक ही जगह से ख़रीदने वाले कुछ लोग बच जाते हैं और कुछ मर जाते हैं।
यही वजह है कि इन हादसों में मरने वालों की संख्या और बीमार होने वालों की संख्या में इतना बड़ा अंतर होता है। सागर में बारह मौतें हुईं और चौरासी लोग अस्पताल में हैं।
सबसे अहम बात, जो क़ानून की किताब में है
अब उस बात पर आइए जो इस पूरे सिलसिले की जड़ में है।
भारत में ज़हर अधिनियम 1919 से लागू है। उसके तहत जो पदार्थ अनुसूचित किए जाते हैं, उनकी बिक्री, भंडारण और आवाजाही पर अलग नियम लगते हैं और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई होती है।
मेथनॉल इस अधिनियम की अनुसूची में दर्ज नहीं है।
इसका सीधा नतीजा यह है कि मेथनॉल की तस्करी या मोड़-फेर पर वे प्रावधान लागू नहीं होते जो एक अनुसूचित ज़हर पर होते। अभियोजन का दायरा सीमित रह जाता है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक विनियम 2018 में मादक पेयों के लिए मेथनॉल की अधिकतम सीमा तय है। पर वह नियम लाइसेंसी शराब पर लागू होता है, जिसकी जाँच होती है। जो शराब किसी लाइसेंस के बग़ैर बन रही है, उस पर इस नियम का कोई असर नहीं पड़ता।
यह बात दोहराने लायक़ है क्योंकि इसे अक्सर उलटा समझा जाता है। मानक तय होने का मतलब यह नहीं कि उनका पालन कराया जा रहा है। मानक वहाँ लगते हैं जहाँ नमूना लिया जाता है, और अवैध भट्ठी से कोई नमूना नहीं लिया जाता।
तो जिस उत्पाद के लिए सबसे ज़्यादा सुरक्षा नियम बने हैं, वे ठीक उसी उत्पाद पर लागू नहीं होते जो लोगों को मार रहा है।
और एक और खाई, जो संविधान में है
भारत में शराब राज्य का विषय है। हर राज्य अपना आबकारी क़ानून बनाता है, अपने लाइसेंस देता है, अपनी दुकानें तय करता है।
औद्योगिक रसायन राज्य का विषय नहीं है।
इसका मतलब यह है कि जो विभाग शराब पर नज़र रखता है, उसके पास मेथनॉल की आवाजाही देखने का अधिकार नहीं है। और जो व्यवस्था औद्योगिक रसायनों को देखती है, उसका ध्यान इस बात पर नहीं है कि वह रसायन कहाँ जा रहा है।
बीच में एक खाई बनती है, और अवैध शराब का पूरा कारोबार उसी खाई में चलता है।
राज्यों के पास औद्योगिक शराब के प्रवाह पर निगरानी का कोई प्रभावी ढाँचा नहीं है। यह किसी एक राज्य की कमी नहीं, ढाँचे की बनावट है।
पिछली बार, और उससे पिछली बार

यह ख़बर पहली बार नहीं आई है, और यही सबसे ज़रूरी बात है।
जून 2024 में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची में इसी तरह की घटना हुई थी। मरने वालों की संख्या अट्ठावन तक पहुँची।
जुलाई 2020 में पंजाब के तीन ज़िलों में यही हुआ। तरनतारन, अमृतसर और गुरदासपुर के बटाला इलाक़े में मिलाकर सौ से ज़्यादा लोग मरे।
बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी ऐसी घटनाएँ दर्ज हैं।
हर बार वही क्रम चलता है। मौतें होती हैं, मुआवज़ा घोषित होता है, कुछ अधिकारी निलंबित होते हैं, स्थानीय बेचने वाले गिरफ़्तार होते हैं, जाँच बैठती है।
और मेथनॉल की आपूर्ति पर कुछ नहीं बदलता।
एक और चीज़ है जो हर बार दोहराई जाती है। घटना के बाद कुछ हफ़्तों तक छापे पड़ते हैं और अवैध भट्ठियाँ तोड़ी जाती हैं। यह कार्रवाई असली होती है और उसके आँकड़े भी जारी होते हैं।
पर वह आपूर्ति की कड़ी नहीं तोड़ती। भट्ठी टूटने के बाद फिर बन जाती है, क्योंकि उसे बनाने में न पूँजी लगती है न कौशल। जो चीज़ दुर्लभ है वह मेथनॉल तक पहुँच है, और वह छापों से नहीं रुकती।
इसलिए हर हादसे के बाद की कार्रवाई अगले हादसे को नहीं रोक पाती, और यह बात आँकड़ों से साबित है।
गिरफ़्तारियाँ किसकी होती हैं

इस पैटर्न का सबसे साफ़ हिस्सा यही है।
कार्रवाई आम तौर पर उन लोगों पर होती है जो आख़िरी सिरे पर हैं। बेचने वाला, पहुँचाने वाला, वह आदमी जिसके घर से बोतलें मिलीं।
जो लोग रसायन की आपूर्ति करते हैं और जिनके ज़रिए वह उद्योग से निकलकर इस धंधे में पहुँचता है, वे आम तौर पर पकड़ से बाहर रहते हैं।
सागर में बीस नामज़द हैं और दस हिरासत में। ललितपुर में बनने वाली इकाई तक जाँच पहुँची है, यह ख़बर है, पर मेथनॉल वहाँ किसने पहुँचाया, यह अभी सामने नहीं है।
यह सवाल हर बार खुला रह जाता है।
इसकी एक व्यावहारिक वजह भी है। बेचने वाले तक पहुँचना आसान है क्योंकि वह गाँव में जाना-पहचाना है। आपूर्ति की कड़ी तक पहुँचने के लिए काग़ज़ों की जाँच चाहिए, दूसरे ज़िलों और दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है, और उस रसायन के थोक व्यापार का रिकॉर्ड खंगालना पड़ता है जिसका कोई केंद्रीय रजिस्टर नहीं है।
पहला काम दिनों में होता है। दूसरा महीनों में, अगर हो।
जब तक दूसरा पूरा होता है, ख़बर पुरानी पड़ चुकी होती है।
जो लोग यह शराब पीते हैं
एक बात इस पूरे मामले में लगातार छूट जाती है।
अवैध शराब सस्ती इसलिए है कि उस पर आबकारी शुल्क और कर नहीं लगता। लाइसेंसी शराब पर राज्य का बड़ा राजस्व टिका होता है, इसलिए उसकी क़ीमत ऊँची रहती है।
जिन लोगों की रोज़ की कमाई कम है, उनके लिए यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है। इसलिए इन हादसों में मरने वाले लगभग हमेशा एक ही तबक़े से होते हैं: मज़दूर, छोटे किसान, दिहाड़ी पर काम करने वाले।
सागर में मरने वालों में एक स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता भी था, और यही वजह है कि यह घटना उतनी दबी नहीं जितनी ऐसी घटनाएँ अक्सर दब जाती हैं।
आबकारी नीति का अपना हिस्सा
एक पहलू और है जिस पर इस मामले में सवाल उठे हैं।
मध्य प्रदेश में आबकारी नीति को लेकर पिछले कुछ बरसों में कई बदलाव हुए हैं, और उन पर विभाग के भीतर ही अलग-अलग रुख़ रहे हैं। दुकानों की संख्या, अहाते खोलने या बंद करने, और शुल्क की दरों पर फ़ैसले बदले हैं।
ऐसे हर बदलाव का असर उस बाज़ार पर पड़ता है जो वैध और अवैध के बीच खड़ा है। दुकान दूर हो जाए या क़ीमत बढ़ जाए तो अवैध शराब की जगह बनती है। दुकान पास हो और क़ीमत कम हो तो वह जगह घटती है।
यह रिश्ता सीधा नहीं है और उस पर एकराय भी नहीं है। पूरी तरह पाबंदी लगाने वाले राज्यों में भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं, और खुली नीति वाले राज्यों में भी।
जो बात दोनों तरह के राज्यों में एक जैसी है, वह मेथनॉल तक पहुँच है।
क्या किया जा सकता है
इस लेख का मक़सद सिर्फ़ कमी गिनाना नहीं है, इसलिए वे रास्ते भी दर्ज होने चाहिए जो जानकारों ने बार-बार सुझाए हैं।
पहला, मेथनॉल को ज़हर अधिनियम की अनुसूची में लाना, ताकि उसकी बिक्री और भंडारण पर वही नियम लगें जो दूसरे अनुसूचित पदार्थों पर लगते हैं।
दूसरा, औद्योगिक मेथनॉल में ऐसा चिह्नक मिलाना अनिवार्य करना जिससे उसकी पहचान हो सके। कई देशों में ईंधन और रसायनों में रंग या रासायनिक चिह्न मिलाए जाते हैं ताकि मोड़-फेर पकड़ में आए।
तीसरा, थोक ख़रीद-बिक्री का ऐसा रिकॉर्ड जो राज्यों के बीच साझा हो। सागर और ललितपुर वाला मामला ठीक इसी कमी से बना है।
चौथा, अस्पतालों में इलाज की तैयारी। मेथनॉल विषाक्तता का इलाज मौजूद है और वह असरदार है, बशर्ते जल्दी शुरू हो। ग्रामीण अस्पतालों में उसकी दवा और प्रशिक्षण दोनों की उपलब्धता एक अलग सवाल है।
जो इस बार अलग है
हर हादसे में कुछ न कुछ नया होता है, और इस बार वह सीमा का पहलू है।
अगर जाँच यह साबित करती है कि इकाई ललितपुर में थी और खपत सागर में, तो यह मामला किसी एक राज्य की आबकारी नाकामी नहीं रह जाता। यह दो राज्यों के बीच की उस जगह का मामला बन जाता है जिस पर किसी की ज़िम्मेदारी साफ़ नहीं है।
ऐसे मामलों में जाँच अक्सर सीमा पर आकर धीमी पड़ जाती है, क्योंकि आगे बढ़ने के लिए दूसरे राज्य की एजेंसी का साथ चाहिए होता है।
बांदा तहसील के जिन गाँवों में यह शराब पहुँची, वे उसी सीमा पर बसे हैं। यह संयोग नहीं है। ऐसा कारोबार सीमा के पास इसीलिए बसता है।
सीमा पर होने से बनाने वाले को दो फ़ायदे मिलते हैं। पहला, माल थोड़ी दूरी में खप जाता है, इसलिए पकड़े जाने का ख़तरा कम रहता है। दूसरा, अगर एक तरफ़ कार्रवाई तेज़ हो तो काम दूसरी तरफ़ खिसका लिया जाता है।
पुलिस के लिए यही दोनों बातें उलटी पड़ती हैं। उसे सीमा पर रुकना पड़ता है, और आरोपी को नहीं रुकना पड़ता।
बारह लोगों की मौत के बाद यह मामला अब दो राज्यों की एजेंसियों के बीच जाएगा। उस तालमेल पर ही यह तय होगा कि इस बार आपूर्ति की कड़ी तक पहुँचा जाता है या नहीं।
अब तक का रिकॉर्ड इस बारे में ज़्यादा उम्मीद नहीं जगाता।
स्रोतज़हर अधिनियम, 1919, भारत कोड, खाद्य सुरक्षा एवं मानक (मादक पेय) विनियम, 2018, मध्य प्रदेश आबकारी विभाग, विश्व स्वास्थ्य संगठन, मेथनॉल विषाक्तता पर तथ्य पत्र