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पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची पर दाख़िल 38 लाख अपीलों में से 1,02,231 पाँच महीने में निपटी हैं

चुनाव आयोग ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में जो हलफ़नामा दाख़िल किया, उसमें 24 ज़िलों की तालिका है और जोड़ है 38,20,683 अपीलें, 1,02,231 निपटान, 37,18,452 लंबित। दर 2.68 फ़ीसदी बैठती है। अदालत ने 25 अगस्त को चार सवाल पूछे थे और उनमें दूसरा सवाल यह था कि इन अपीलों में कितनी उन लोगों की हैं जिनके नाम कटे और कितनी किसी और का नाम कटवाने के लिए हैं। तालिका में वह ख़ाना नहीं है।

मतदान अधिकारी ईवीएम और बाक़ी सामान के साथ आई मतदाता सूची के पन्ने पलटकर एक नाम मिला रहे हैं, असम की यह तस्वीर 3 अप्रैल 2011 की है; अपील का पूरा झगड़ा इसी छपी सूची की एक पंक्ति का है
तस्वीर: Election Commission of India, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

मुर्शिदाबाद ज़िले में मतदाता सूची को लेकर 7,47,921 अपीलें दाख़िल हैं। इनमें से 514 पर फ़ैसला हुआ है।

यह गिनती चुनाव आयोग की अपनी है। आयोग ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल किया और उसके साथ पश्चिम बंगाल के 24 ज़िलों की तालिका लगाई। तालिका का जोड़ यह है: 38,20,683 अपीलें दाख़िल, 1,02,231 निपटीं, 37,18,452 लंबित। दर 2.68 फ़ीसदी बैठती है। लाइव लॉ ने यह हलफ़नामा 18 सितंबर की शाम रिपोर्ट किया और मिलेनियम पोस्ट ने 19 सितंबर की तड़के।

तालिका ख़ुद जोड़ में पक्की है। हर ज़िले की पंक्ति में दाख़िल में से निपटी घटाने पर लंबित का आँकड़ा ठीक निकलता है, और तीनों स्तंभों का जोड़ हलफ़नामे में दर्ज कुल से मिलता है।

सवाल दर का नहीं है। सवाल यह है कि 2.68 फ़ीसदी जिस संख्या का है, उस संख्या में गिना क्या गया है। यहाँ अपील का मतलब क्या है, वह किसके सामने है, किस अवधि की है, और निपटान के ख़ाने में किस तरह के आदेश गिने गए हैं। इन चारों सवालों के जवाब हलफ़नामे में नहीं, उन दस्तावेज़ों में हैं जिनसे यह पूरा ढाँचा बना है।

अदालत के चार सवाल और हलफ़नामे की 24 पंक्तियाँ

25 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने आयोग से चार बातें पूछी थीं। पहली, अधिकरणों में कितनी अपीलें लंबित हैं। दूसरी, इनमें कितनी उन लोगों की हैं जिनके नाम सूची से बाहर हुए और कितनी किसी और के नाम पर आपत्ति की हैं। तीसरी, अब तक कितनी निपटीं और उनमें माँगी क्या गई थी। चौथी, कितनी मंज़ूर हुईं और उन आदेशों के बाद सूची सुधारने के लिए क्या किया गया।

इससे पहले 11 अगस्त को अदालत ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की याचिका में आयोग से निपटान की मात्रा बताने को कहा था। उस दिन पीठ ने मौखिक रूप से यह भी कहा था कि वह अधिकरणों के लिए समय-सीमा तय नहीं कर सकती, पर उनके कामकाज पर नज़र रखेगी।

16 सितंबर के हलफ़नामे ने पहले सवाल का जवाब दिया और तीसरे का आधा। ज़िलेवार तालिका पहली बार रिकॉर्ड पर आई। दूसरे सवाल का ख़ाना उसमें है ही नहीं। लाइव लॉ की रिपोर्ट यही दर्ज करती है कि आयोग ने बहिष्करण के ख़िलाफ़ और समावेशन के ख़िलाफ़ अपीलों का अलग-अलग आँकड़ा अदालत को नहीं दिया।

यह चूक छोटी नहीं है। जस्टिस बागची ने 25 अगस्त को ही कहा था कि बँटवारा मालूम हो जाए तो प्राथमिकता के निर्देश दिए जा सकते हैं, क्योंकि नाम कटना ही वह चीज़ है जो किसी के अधिकार का तुरंत हनन करती है। बिना बँटवारे के 2.68 फ़ीसदी एक ही अंक है जिसके नीचे दो अलग तरह के मुक़दमे दबे हैं।

ये अधिकरण अनुच्छेद 142 के आदेश से बने हैं

जिन अधिकरणों में 37 लाख अपीलें पड़ी हैं, वे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 में कहीं नहीं हैं।

20 फ़रवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की सघन पुनरीक्षण प्रक्रिया अटकी पाई। आदेश उस दिन की स्थिति को दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच भरोसे की कमी बताता है। रुकावट कहाँ थी, आदेश यह भी बताता है। तार्किक विसंगति या अनमैप्ड श्रेणी में डाले गए लोगों के दावे निपट नहीं पा रहे थे। पीठ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से न्यायिक अधिकारी माँगे ताकि वे हर ज़िले में इन दावों को दोबारा देखें। आदेश का पैराग्राफ़ 11 साफ़ लिखता है कि ये निर्देश असाधारण परिस्थितियों में अनुच्छेद 142 की शक्ति से दिए जा रहे हैं। समय भी तय था। पैराग्राफ़ 5 में लिखा है कि पूरी प्रक्रिया सात से दस दिन में निपटनी है।

10 मार्च के आदेश में अपील का सवाल उठा। उसका पैराग्राफ़ 10 कहता है कि 24 फ़रवरी का आदेश बिना किसी अस्पष्टता के यह बता चुका है कि न्यायिक अधिकारियों के आदेशों के ख़िलाफ़ किसी कार्यपालिक या प्रशासनिक अधिकारी के सामने अपील नहीं होगी। इसके बाद पैराग्राफ़ 11 में अदालत ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि वे पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और पूर्व न्यायाधीशों से अनुरोध करें, और आयोग उनके नाम अपीलीय अधिकरण के तौर पर अधिसूचित करे। पैराग्राफ़ 12 में ख़र्च का ज़िम्मा पूरी तरह आयोग पर डाला गया, और मानदेय तय करने का काम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर।

कोलकाता में कलकत्ता हाई कोर्ट का मुख्य भवन, अगस्त 2010 की तस्वीर; उन्नीस अधिकरणों के लिए पूर्व न्यायाधीशों के नाम इसी अदालत के मुख्य न्यायाधीश से माँगे गए थे
तस्वीर: Matt Stabile, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

आकाशवाणी समाचार की 21 मार्च की रिपोर्ट के मुताबिक़ आयोग ने उसी दिन 19 अधिकरण अधिसूचित किए। एक की अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी.एस. शिवगणनम कर रहे हैं और बाक़ी पूर्व न्यायाधीशों के पास हैं, जिनमें प्रदीप्त राय और तपेन सेन शामिल हैं। उसी रिपोर्ट में अधिसूचना की एक शर्त दर्ज है: जिस ज़िले की सारी अपीलें निपट जाएँगी, वहाँ का अधिकरण ख़त्म हो जाएगा।

24 ज़िलों के लिए 19 अधिकरण हैं। कार्यविधि 7 अप्रैल की मानक संचालन प्रक्रिया में है, जिसे 6 अप्रैल को बनी तीन पूर्व न्यायाधीशों की समिति ने तैयार किया। वह दस्तावेज़ आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ। लॉबीट ने 2 जून को प्रसेनजित बोस की याचिका का यही हिस्सा छापा था कि प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं है और दाख़िले, नोटिस, सुनवाई, समय-सीमा या कारण सहित आदेश देने को लेकर कोई सार्वजनिक दिशानिर्देश मौजूद नहीं हैं।

मतदाता सूची का हिसाब मुख्य निर्वाचन अधिकारी के प्रेस नोट में है

28 फ़रवरी 2026 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने प्रेस नोट CEO/PN-05/2026 जारी किया। तीन पन्ने हैं और नीचे अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी ए. नियोगी के दस्तख़त हैं। पूरा हिसाब उसी में है।

चरणमतदाता
पुनरीक्षण से पहले, 27.10.20257,66,37,529
अप्राप्त गणना प्रपत्र58,20,899
मसौदा सूची, 16.12.20257,08,16,630
फ़ॉर्म-6 और 6क से जुड़े नाम1,82,036
फ़ॉर्म-8 से जुड़े नाम6,671
फ़ॉर्म-7 से कटे नाम5,46,053
विचाराधीन60,06,675
सूची, 28.02.20266,44,52,609

इस तालिका में जो सबसे ज़्यादा पढ़ा गया, वह अप्राप्त प्रपत्रों वाली पंक्ति है। प्रेस नोट उसे पाँच हिस्सों में तोड़ता है: मृत 24,16,852, अनुपस्थित 12,20,039, स्थानांतरित 19,88,076, पहले से नामांकित 1,38,328 और अन्य 57,604। इन पाँचों का जोड़ 58,20,899 है। यह टूट उन लोगों की है जिनका गणना प्रपत्र वापस नहीं आया, किसी कटे नाम की नहीं। अदालती प्रक्रिया में जिन 27 लाख से ज़्यादा नामों को अपात्र पाया गया, उनका कोई श्रेणीवार ब्योरा किसी सरकारी दस्तावेज़ में नहीं छपा है।

प्रेस नोट का अंकगणित ख़ुद वह बात कह देता है जो उसकी बुलेट नहीं कहती। मसौदा सूची में फ़ॉर्म-6, 6क और 8 से आए नाम जोड़िए, फ़ॉर्म-7 से कटे 5,46,053 घटाइए, और फिर विचाराधीन 60,06,675 भी घटाइए। जो बचता है वह ठीक 6,44,52,609 है। आयोग ने यही संख्या प्रकाशित की। पुरुष, महिला और तीसरे लिंग के स्तंभों में भी यही जोड़ अलग-अलग मिलता है। तो विचाराधीन नाम प्रकाशित संख्या से बाहर हैं। प्रेस नोट कहता है कि न्यायिक अधिकारी जिन्हें मंज़ूर करेंगे, उन्हें बाद में पूरक सूची से जोड़ा जाएगा।

तो साधारण अर्थ में, यानी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के सामने फ़ॉर्म-7 पर आपत्ति देकर, बंगाल में इस पूरी क़वायद में सिर्फ़ 5,46,053 नाम कटे। बाक़ी सब कुछ दूसरे रास्ते से हुआ।

इसी पंक्ति पर एक आँकड़ा टकराता है। प्रसेनजित बोस की याचिका में, जिसकी रिपोर्ट पीटीआई के हवाले से बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 17 जुलाई को छापी, दर्ज है कि दावे और आपत्तियों के चरण में नाम हटाने के फ़ॉर्म-7 के 99 हज़ार से कुछ ज़्यादा आवेदन मिले थे। प्रेस नोट उसी चरण की 5,46,053 कटौतियाँ फ़ॉर्म-7 के ख़ाने में गिनता है। 99 हज़ार आवेदनों से 5.46 लाख नाम नहीं कट सकते। दोनों में से कोई दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि वे अलग-अलग चीज़ें क्यों गिन रहे हैं। उसी याचिका में नाम जोड़ने के फ़ॉर्म-6 और 6क के 9.64 लाख आवेदन दर्ज हैं, जबकि प्रेस नोट में जुड़े नाम 1,82,036 हैं। 10 मार्च के आदेश का पैराग्राफ़ 2 बताता है कि 9 मार्च की शाम तक 10,16,000 से ज़्यादा आपत्तियाँ निपट चुकी थीं, बंगाल के 500 से ज़्यादा न्यायिक अधिकारी और ओडिशा तथा झारखंड के 200 अधिकारी इस काम में लगे थे, और 8 मार्च तक 709 लॉगिन आईडी बनाई जा चुकी थीं। उन्हीं अधिकारियों ने 60 लाख से ज़्यादा मामले देखे।

नतीजे का पहला सार्वजनिक ब्योरा 7 अप्रैल को आया। आकाशवाणी समाचार ने उस दिन रिपोर्ट किया कि आयोग ने न्यायिक परीक्षण वाली पूरी सूची पहली बार ज़िलेवार प्रकाशित की है, 60 लाख से ज़्यादा नामों में से 32 लाख से ज़्यादा पात्र पाए गए और लगभग 27 लाख अपात्र। उसी रिपोर्ट में मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है, जहाँ लगभग 4 लाख 55 हज़ार नाम बाहर हुए, और उसके बाद उत्तर 24 परगना, जहाँ लगभग 3 लाख 25 हज़ार।

एक बात प्रेस नोट में ऐसी है जो बाद के आदेशों से मेल नहीं खाती। उसका आख़िरी पन्ना मतदाताओं को बताता है कि अपील जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 24 के तहत होगी, पहली अपील ज़िलाधिकारी के पास धारा 24(क) में और दूसरी मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास धारा 24(ख) में, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 के नियम 27 की रीति से। यह सलाह 28 फ़रवरी की है। 24 फ़रवरी का आदेश तब तक आ चुका था और 10 मार्च का आदेश दर्ज करता है कि वह आदेश न्यायिक अधिकारियों के फ़ैसलों पर कार्यपालिक अपील का रास्ता बंद कर चुका था। जिन 60,06,675 लोगों के नाम उसी प्रेस नोट में विचाराधीन ख़ाने में गए, उनके लिए 28 फ़रवरी को कोई अपीलीय मंच अधिसूचित नहीं था। वह 21 मार्च को बना।

अधिकरण खुलने के दिन 34 लाख अपीलें पहले से दाख़िल थीं

13 अप्रैल 2026 का आदेश यह तारीख़ ख़ुद तय करता है। उसका पैराग्राफ़ 8 कहता है कि 12 अप्रैल को पोर्टल का परिचय सत्र हुआ और अधिकरणों को 13 अप्रैल से काम शुरू करना था। अगला पैराग्राफ़ दर्ज करता है कि उस समय तक 34 लाख से ज़्यादा अपीलें दाख़िल हो चुकी थीं, और वे सिर्फ़ ग़लत बहिष्करण के ख़िलाफ़ नहीं थीं, बड़ी संख्या में उन लोगों की भी थीं जो किसी के नाम जुड़ने से नाराज़ थे।

34 लाख, 38,20,683 का लगभग 89 फ़ीसदी है। अधिकरणों ने पहला दिन इसी ढेर के साथ शुरू किया।

उसी आदेश के पैराग्राफ़ 6 में कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पत्र उद्धृत है। वह बताता है कि बंगाल के न्यायिक अधिकारियों ने झारखंड और ओडिशा के साथियों की मदद से साठ लाख से ज़्यादा आपत्तियाँ अप्रैल के पहले हफ़्ते में निपटा दीं, और उसके बाद सारे अधिकारी अपनी पुरानी तैनाती पर लौट गए। छह हफ़्ते में साठ लाख। फिर पाँच महीने में एक लाख।

फ़र्क़ कहाँ है, यह 1 अप्रैल के आदेश के पैराग्राफ़ 10 में लिखा है, जिसे 13 अप्रैल के आदेश ने ज्यों का त्यों दोहराया। अदालत ने अधिकरणों से कहा कि वे अपील पर फ़ैसला करने से पहले पूरा रिकॉर्ड दोबारा देखें, उसमें न्यायिक अधिकारी के दर्ज किए कारण भी शामिल हैं, पक्षों को वे कारण बताएँ, और सुनवाई का उचित मौक़ा देकर फ़ैसला करें। हर अपील में यह पूरी क़वायद होनी है।

अब हिसाब सीधा है। 13 अप्रैल से 16 सितंबर तक 156 दिन बनते हैं। 1,02,231 निपटान का मतलब है रोज़ाना क़रीब 655, यानी हर अधिकरण के हिस्से रोज़ाना क़रीब 34 मामले। इसी रफ़्तार पर 37,18,452 लंबित अपीलों को निपटने में 5,674 दिन लगेंगे, जो साढ़े पंद्रह साल से ज़्यादा है। रफ़्तार हाल में बढ़ी भी है: 27 अगस्त की स्थिति और 16 सितंबर के हलफ़नामे के बीच बीस दिनों में 19,449 अपीलें निपटीं, यानी रोज़ाना 972। उस तेज़ रफ़्तार पर भी बाक़ी ढेर साढ़े दस साल माँगता है।

आकाशवाणी समाचार की 25 मार्च की रिपोर्ट में राज्य की ओर से पेश वकील श्याम दीवान की यह बात दर्ज है कि अधिकरणों का काम इतना तेज़ हो कि प्रक्रिया 16 अप्रैल तक पूरी हो जाए।

पुरुलिया में 55 फ़ीसदी, मुर्शिदाबाद में 0.07 फ़ीसदी

हलफ़नामे की तालिका का असली मज़मून राज्य का औसत नहीं, ज़िलों का फ़ासला है।

ज़िलादाख़िलनिपटींदर
पुरुलिया15,0058,33955.58%
बाँकुड़ा19,1596,87435.88%
हुगली1,07,11127,35625.54%
दक्षिण दिनाजपुर85,10510,25412.05%
उत्तर 24 परगना3,59,3753010.08%
मुर्शिदाबाद7,47,9215140.07%
पूर्व बर्धमान2,80,0291310.05%

सबसे ऊँची और सबसे नीची दर के बीच का अनुपात एक हज़ार गुना से ऊपर है। पाँच ज़िलों में, यानी मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और उत्तर दिनाजपुर में, राज्य की 59.5 फ़ीसदी अपीलें हैं। दूसरी तरफ़ पुरुलिया, बाँकुड़ा, हुगली, दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना के पास कुल अपीलों का 14.3 फ़ीसदी है। राज्य के 73.2 फ़ीसदी निपटान इन्हीं पाँच ज़िलों से आए हैं।

इसे मतदाता सूची की गिरावट के साथ रखिए। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने कांग्रेस सांसद ईशा ख़ान चौधरी की सूचना-अधिकार अर्ज़ी पर जो जवाब दिया, उसे मिलेनियम पोस्ट ने 27 अगस्त को छापा। उसके मुताबिक़ 2024 की सूची के 7,60,10,006 मतदाता 28 फ़रवरी 2026 तक 6,44,52,609 रह गए, यानी 1,15,57,397 की कमी, जो 15.21 फ़ीसदी है। ज़िलों में यह गिरावट एक जैसी नहीं रही। कोलकाता दक्षिण में 32.29 फ़ीसदी, मालदा में 31.69, कोलकाता उत्तर में 30.39, उत्तर दिनाजपुर में 27.92 और मुर्शिदाबाद में 23.29 फ़ीसदी। सबसे कम गिरावट पूर्व मेदिनीपुर में रही, 3.97 फ़ीसदी, फिर बाँकुड़ा में 4.64 और पश्चिम मेदिनीपुर में 5.75।

दोनों सूचियाँ मिलाकर पढ़िए। जिन ज़िलों में सूची सबसे कम हिली, अधिकरणों की दर वहीं सबसे ऊँची है। बाँकुड़ा में गिरावट 4.64 फ़ीसदी थी और निपटान 35.88 फ़ीसदी है। मुर्शिदाबाद में गिरावट 23.29 फ़ीसदी थी और निपटान 0.07 फ़ीसदी है। दर सबसे तेज़ वहाँ चल रही है जहाँ दाँव पर सबसे कम था।

मुर्शिदाबाद में सिराज उद-दौला रोड पर सवारियों से भरा एक ताँगा और सड़क किनारे की पुरानी दीवार, मार्च 2017 की तस्वीर; ज़िले की 7,47,921 अपीलें इसी आबादी के नाम हैं
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

अपीलों की दिशा पर दो उलटे हिसाब दर्ज हैं

पहला हिसाब आयोग का है। स्क्रॉल ने 19 सितंबर को छापा कि तृणमूल सांसद डेरेक ओ'ब्रायन की अर्ज़ी पर दिए जवाब में आयोग ने बताया है कि 38.2 लाख में से 22.21 लाख अपीलें उन लोगों की हैं जिनके नाम कटे, और कम से कम 16.10 लाख किसी के नाम जुड़ने के ख़िलाफ़ हैं। 27.16 लाख कटे नामों के मुक़ाबले 22.21 लाख का मतलब है कि हर पाँच में चार से ज़्यादा कटे मतदाताओं ने अपील की।

दूसरा हिसाब भी सरकारी है। 25 अगस्त को सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ को बताया कि 38 लाख में से 31 लाख अपीलें किसी के नाम जुड़ने पर आपत्ति की हैं और सिर्फ़ 7 लाख उन लोगों की हैं जिनके नाम कटे। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह आँकड़ा कांग्रेस सांसद ईशा ख़ान चौधरी को मिले सूचना-अधिकार जवाब से आया था, और शंकरनारायणन ने अदालत से कहा कि यह जानकारी आयोग की तरफ़ से आनी चाहिए थी। 27.16 लाख के मुक़ाबले 7 लाख का मतलब है कि हर चार में एक कटे मतदाता ने अपील की।

ये दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। एक ही 38 लाख के बारे में एक कहता है कि ज़्यादातर अपीलें नाम बचाने की हैं, दूसरा कहता है कि ज़्यादातर नाम कटवाने की। पीठ ने 25 अगस्त को इस आँकड़े पर हैरानी जताई थी।

जोड़ में भी एक अंतर है। 22.21 और 16.10 को जोड़िए तो 38.31 लाख बनता है, जबकि हलफ़नामे का कुल 38,20,683 है। फ़र्क़ क़रीब दस हज़ार का है और किसी रिपोर्ट में इसकी वजह नहीं दी गई।

दस्तावेज़ों को लेकर भी दो बयान हैं। लाइव लॉ की 18 सितंबर की रिपोर्ट कहती है कि आयोग ने बँटवारे का आँकड़ा अदालत को दिया ही नहीं। स्क्रॉल और इंडियन एक्सप्रेस की 19 सितंबर की रिपोर्टें कहती हैं कि दिया, ओ'ब्रायन की अर्ज़ी के जवाब में। ये दो अलग दाख़िले हैं या एक ही, यह कोई रिपोर्ट नहीं बताती।

एक ज़िला दोनों हिसाबों पर कसा जा सकता है। मुर्शिदाबाद में आयोग की अपनी 7 अप्रैल वाली सूची के मुताबिक़ लगभग 4.55 लाख नाम अपात्र पाए गए थे, और 16 सितंबर के हलफ़नामे में उसी ज़िले की 7,47,921 अपीलें हैं। अपनी बहिष्करण की अपील वही कर सकता है जिसका नाम कटा हो। तो मुर्शिदाबाद की कम से कम 2.93 लाख अपीलें कटे लोगों की हो ही नहीं सकतीं। उत्तर 24 परगना में भी अपीलें कटे नामों से क़रीब 34 हज़ार ज़्यादा हैं। प्रसेनजित बोस की याचिका में यह भी दर्ज है कि कुछ अपीलें आयोग के अपने अधिकारियों ने उन फ़ैसलों के ख़िलाफ़ की हैं जिनमें नाम बहाल हुए।

निपटी अपीलों का अनुपात चार जगह चार अलग है

सबसे भरोसेमंद जोड़ी वह है जिसमें अंश और हर दोनों छपे हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के सूचना-अधिकार जवाब में, जिसे मिलेनियम पोस्ट ने 27 अगस्त को छापा, निपटी अपीलों में से 75,443 में नाम सूची में जोड़ा गया और 7,339 में नाम बाहर ही रहा। दोनों का जोड़ 82,782 है और 75,443 उसका 91.13 फ़ीसदी है। उसी जवाब में लंबित 37,27,838 दर्ज हैं, जो कुल का 97.83 फ़ीसदी है।

यह आँकड़ा 16 सितंबर वाले से टकराता नहीं, उससे पहले का है। 27 अगस्त की स्थिति में कुल 38,10,620 अपीलें बनती हैं और 16 सितंबर को 38,20,683। बीच में 10,063 नई अपीलें आईं, 19,449 निपटीं और लंबित 9,386 घटीं। तीनों संख्याएँ आपस में मिलती हैं।

बाक़ी तीन आँकड़े अलग-अलग जगह से हैं। स्क्रॉल की 19 सितंबर की रिपोर्ट आयोग के एक अनुलग्नक के हवाले से 93 फ़ीसदी बताती है और निपटी अपीलें क़रीब 1.2 लाख। बाक़ी दो एक ही वकील के हैं। 17 जुलाई को, जब लंबित अपीलें 33.5 लाख थीं, शंकरनारायणन ने पीठ से कहा कि निपटे मामलों में 70 फ़ीसदी दावे मंज़ूर हुए हैं। यह बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी पीटीआई की उसी दिन की रिपोर्ट में दर्ज है। 25 अगस्त को उन्होंने अदालत में 95 फ़ीसदी का रिकॉर्ड बताया।

चारों आँकड़े अलग-अलग तारीख़ों और अलग-अलग दस्तावेज़ों से हैं, और किसी दस्तावेज़ में यह नहीं लिखा कि निपटान के ख़ाने में वापस लेना, लौटाना या हस्तांतरण भी गिना गया है या नहीं। अदालत का चौथा सवाल यही था कि कितनी अपीलें मंज़ूर हुईं। हलफ़नामे की तालिका में निपटान का एक ही स्तंभ है।

अपील अकेला दरवाज़ा भी नहीं है। मिलेनियम पोस्ट की 19 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़ आयोग के आँकड़े बताते हैं कि मसौदा सूची छपने के बाद से 7 अगस्त 2026 तक नाम जोड़ने के फ़ॉर्म-6 के 34.13 लाख आवेदन आए। इनमें नए मतदाता भी हैं और वे लोग भी जिनके नाम पुनरीक्षण में छूट गए थे। यह संख्या अधिकरणों की गिनती से बाहर है।

लंबित अपील वोट का हक़ नहीं देती

13 अप्रैल के आदेश का पैराग्राफ़ 11 इस पर साफ़ है। अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत आयोग को निर्देश दिया कि जहाँ अधिकरण 21 या 27 अप्रैल तक अपील तय कर लें, वहाँ पूरक संशोधित सूची जारी करके उन आदेशों पर अमल हो। इसके तुरंत बाद वही पैराग्राफ़ जोड़ता है कि बाहर किए गए लोगों की अपीलों का महज़ लंबित होना उन्हें वोट देने का हक़ नहीं देगा। पैराग्राफ़ 12 में इसकी वजह भी है: अगर लंबित अपील पर अधिकार मिलने लगे तो आपत्ति करने वाले भी सूची में मौजूद लोगों का वोट रोकने की माँग करेंगे, और स्थिति वहीं लौट जाएगी जहाँ से चली थी।

मतदान 23 और 29 अप्रैल को हुआ। चुनाव आयोग के परिणाम पृष्ठ पर 294 में से 293 सीटें घोषित हैं, बीजेपी 207 और तृणमूल कांग्रेस 80। राज्य पोर्टल पर मुख्यमंत्री श्री शुभेंदु अधिकारी दर्ज हैं। तृणमूल अब विपक्ष में है।

25 अगस्त की सुनवाई में तृणमूल की ओर से सीनियर एडवोकेट कल्याण बंद्योपाध्याय ने अर्ज़ी का हवाला देते हुए कहा कि 31 सीटों पर बीजेपी की जीत का अंतर वहाँ कटे नामों की संख्या से कम था, और सीट क्रमांक 145 पर अंतर 401 वोट का था जबकि कटे नाम 8,785। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या अदालत नए चुनाव का आदेश दे सकती है, और यह भी जानना चाहा कि इन सीटों पर चुनाव याचिकाएँ दाख़िल हुई हैं या नहीं। जस्टिस बागची ने पूछा कि कटे लोगों में से कितनों ने बहिष्करण के ख़िलाफ़ अपील की है, और कहा कि जिसने कटना मान लिया हो, उसके मामले में यह क़वायद सैद्धांतिक रह जाएगी।

आगे की तारीख़ इसी सवाल से जुड़ी है। हलफ़नामे में कोलकाता उत्तर, कोलकाता दक्षिण और हावड़ा की 2,29,060 अपीलें लंबित हैं और इन ज़िलों के नगर निगम चुनाव दिसंबर में हैं। इन तीनों ज़िलों में अब तक 5,485 अपीलें निपटी हैं, यानी रोज़ाना क़रीब 35। दिसंबर की पहली तारीख़ तक 2,29,060 निपटाने के लिए रोज़ाना क़रीब तीन हज़ार चाहिए। यह मौजूदा रफ़्तार से लगभग 86 गुना है।

कोलकाता में एस.एन. बनर्जी रोड पर कोलकाता नगर निगम का लाल भवन और उस पर लगा नाम-पट्ट, फ़रवरी 2014 की तस्वीर; दिसंबर वाले नगर निगम चुनाव इसी निकाय के हैं
तस्वीर: Paul Hamilton, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

दिल्ली की 33 लाख नोटिसें उसी श्रेणी से निकली हैं

17 सितंबर को वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ के सामने दिल्ली के सघन पुनरीक्षण पर नई याचिका का उल्लेख किया। लाइव लॉ की उसी दिन की रिपोर्ट में आँकड़े हैं: 31 अगस्त की मसौदा सूची में 97,53,577 मतदाता हैं, 47,56,722 नाम उससे बाहर हैं, और 33,12,919 लोगों को नोटिस गए हैं। इनमें 13,79,785 नो मैपिंग श्रेणी के हैं और 19,33,134 तार्किक विसंगति के। याचिका नोटिस पाने वालों की खोजी जा सकने वाली सूची माँगती है, पतों के साथ और हर नाम के आगे उस श्रेणी के साथ जिसमें वह डाला गया है। वह यह भी माँगती है कि तार्किक विसंगति की कसौटी, उसकी परिभाषा और उसके एल्गोरिद्म के मानक सार्वजनिक किए जाएँ। बंगाल में यही दो श्रेणियाँ थीं जिनसे 60,06,675 नाम विचाराधीन ख़ाने में गए थे।

सुनवाई की तारीख़ पर रिपोर्टें बँटी हैं। द वायर और मिलेनियम पोस्ट 21 सितंबर लिखते हैं, लॉबीट 22 सितंबर, और लाइव लॉ मंगलवार लिखता है, जो 22 सितंबर पड़ता है।

दिल्ली में अभी कोई अपीलीय अधिकरण नहीं है। बंगाल में भी वह मंच सूची छपने के तीन हफ़्ते बाद बना था, और उसके सामने आज 37,18,452 अपीलें हैं।

स्रोतलाइव लॉ, 18 सितंबर 2026, रात 8:53: चुनाव आयोग के 16 सितंबर के हलफ़नामे की 24 ज़िलों वाली तालिका और कोलकाता तथा हावड़ा के 2,29,060 लंबित मामले, सुप्रीम कोर्ट, मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग, रिट याचिका (सिविल) 1089/2025, आदेश 20 फ़रवरी 2026: न्यायिक अधिकारियों को काम सौंपने का अनुच्छेद 142 वाला आदेश, सुप्रीम कोर्ट, वही मुक़दमा, आदेश 10 मार्च 2026: पैराग्राफ़ 2 में 500 से ज़्यादा न्यायिक अधिकारी और 709 लॉगिन आईडी, पैराग्राफ़ 10 में कार्यपालिका के सामने अपील का निषेध, पैराग्राफ़ 11 से 13 में अधिकरणों का गठन और ख़र्च, सुप्रीम कोर्ट, वही मुक़दमा, आदेश 13 अप्रैल 2026 की मूल प्रति: पैराग्राफ़ 6 में कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पत्र, पैराग्राफ़ 7 में 7 अप्रैल की मानक संचालन प्रक्रिया, पैराग्राफ़ 9 में 34 लाख अपीलें, पैराग्राफ़ 11 में लंबित अपील और मताधिकार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, पश्चिम बंगाल, प्रेस नोट संख्या CEO/PN-05/2026, 28 फ़रवरी 2026, तीन पन्ने: मतदाता संख्या की पूरी तालिका, 58,20,899 अप्राप्त गणना प्रपत्र, 60,06,675 विचाराधीन नाम और धारा 24 वाली अपील की सलाह, आकाशवाणी समाचार, 21 मार्च 2026: चुनाव आयोग की अधिसूचना से 19 अपीलीय अधिकरणों का गठन और यह शर्त कि अपीलें ख़त्म होते ही अधिकरण ख़त्म हो जाएँगे, आकाशवाणी समाचार, 7 अप्रैल 2026: न्यायिक परीक्षण वाली पूरी सूची पहली बार ज़िलेवार प्रकाशित, 32 लाख पात्र और लगभग 27 लाख अपात्र, मुर्शिदाबाद में लगभग 4.55 लाख, लाइव लॉ, 25 अगस्त 2026: सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन का सूचना के अधिकार वाला आँकड़ा, अदालत के चार सवाल और तृणमूल की 31 सीटों वाली अर्ज़ी, मिलेनियम पोस्ट, 27 अगस्त 2026: मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के सूचना-अधिकार जवाब में 75,443 और 7,339 का बँटवारा तथा ज़िलेवार मतदाता गिरावट, मिलेनियम पोस्ट, 19 सितंबर 2026, तड़के 1:12: हलफ़नामे के तीनों आँकड़े और 7 अगस्त 2026 तक मिले 34.13 लाख फ़ॉर्म-6 आवेदन, स्क्रॉल, 19 सितंबर 2026: डेरेक ओ'ब्रायन की अर्ज़ी पर आयोग के जवाब में 22.21 लाख और 16.10 लाख का बँटवारा और निपटी अपीलों में 93 फ़ीसदी, बिज़नेस स्टैंडर्ड, पीटीआई, 17 जुलाई 2026, दोपहर 3:55: प्रसेनजित बोस की याचिका पर सुनवाई, 33.5 लाख लंबित अपीलें, 70 फ़ीसदी का आँकड़ा, और याचिका में दर्ज फ़ॉर्म-6 तथा फ़ॉर्म-7 के आवेदन, लॉबीट, 2 जून 2026: प्रसेनजित बोस की याचिका, जिसमें दर्ज है कि अधिकरणों की मानक संचालन प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई, लाइव लॉ, 17 सितंबर 2026: दिल्ली की मसौदा सूची के 97,53,577 मतदाता, बाहर रहे 47,56,722 नाम और 33,12,919 नोटिस, भारत निर्वाचन आयोग, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव मई 2026 का दलवार परिणाम: 294 में से 293 सीटें घोषित, बीजेपी 207, तृणमूल 80, पश्चिम बंगाल सरकार का राज्य पोर्टल: मुख्यमंत्री श्री शुभेंदु अधिकारी

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