सुप्रीम कोर्ट की आज की सूची में दिल्ली की नोटिस-याचिका मद 13 पर, बंगाल की अपील-याचिका मद 22 पर
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की अदालत आज सुबह साढ़े दस बजे बैठी, और उसकी आज की सूची में अंजलि भारद्वाज बनाम निर्वाचन आयोग तथा मोस्तरी बानू बनाम निर्वाचन आयोग के बारह जुड़े मुक़दमे दर्ज थे। भारद्वाज की याचिका के 33,12,919 नोटिस मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के अपने प्रेस नोट के 31,63,930 से 1,48,989 ज़्यादा हैं, और यह फ़र्क़ किसी दस्तावेज़ में मिलता नहीं। पीठ ने इन दो मद पर क्या किया, वह सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक दर्ज नहीं हुआ था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की अदालत आज सुबह साढ़े दस बजे बैठी। उसी पीठ की आज की सूची में मद 13 दिल्ली का था, मद 22 बंगाल का। दोनों में प्रतिवादी भारत निर्वाचन आयोग है।
पीठ के बैठने का समय बीत चुका है, पर इन दो मद पर क्या हुआ, वह अभी दर्ज नहीं है। सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 22 सितंबर की तारीख़ वाला कोई आदेश नहीं चढ़ा था, और किसी जाँची गई रिपोर्ट में आज की सुनवाई का ब्योरा नहीं मिला। इसमें न कोई दाख़िला दर्ज है, न कोई नोटिस, न कोई मुल्तवी। सूची में नाम होना इनमें से कुछ भी नहीं बताता।
आज की सूची में मद 13 दिल्ली का है, मद 22 बंगाल का
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर मौजूद पीडीएफ़ के मुताबिक़ यह सूची 385 पन्नों की है, और शुक्रवार, 18 सितंबर की रात 8 बजकर 49 मिनट पर अतिरिक्त रजिस्ट्रार ने इसे जारी किया। दस्तावेज़ का पता api.sci.gov.in/jonew/cl/2026-09-22/M_J_1.pdf है। मुख्य न्यायाधीश की अदालत की आज की सूची में मद 13 पर रिट याचिका (सिविल) संख्या 1188/2026 है, अंजलि भारद्वाज और एक अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग और एक अन्य। वकील प्रशांत भूषण के नाम के आगे दर्ज है "Mention Memo", और मामले पर अंग्रेज़ी में लिखा है "FOR ADMISSION"। यानी यह अभी दाख़िले के चरण में है, किसी फ़ैसले के नहीं।
मद 22 पर रिट याचिका (सिविल) संख्या 1089/2025 है, मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग और अन्य, वकील सुभ्रो प्रकाश मुखर्जी। कोष्ठक में अंग्रेज़ी में लिखा है "SIR MATTERS RELATED TO THE STATE OF WEST BENGAL"। दोनों मद एक ही पीठ के सामने हैं, और सूची के पहले पन्ने पर पीठ के बैठने का समय दर्ज है, सुबह साढ़े दस बजे।

दोनों मामलों की तारीख़ पर पहले भी भ्रम रहा है। इस अख़बार ने 21 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया था कि सोमवार, 21 सितंबर के लिए छपीं छहों वाद-सूचियों में न रिट याचिका 1089/2025 थी, न 1188/2026। दोनों मामले केवल आज की सूची में हैं। लाइव लॉ ने मंगलवार लिखा था, यानी 22 सितंबर। अदालत की अपनी सूची इसी तारीख़ की पुष्टि करती है।
आदेश की खोज कैप्चा पर जाकर रुकती है
सुप्रीम कोर्ट की अपनी वेबसाइट पर मामला-संख्या से आदेश खोजने के दोनों रास्ते, केस स्टेटस और डेली ऑर्डर, कैप्चा माँगते हैं। यह डेस्क कैप्चा हल नहीं कर सकता। इसलिए दोनों रास्ते बंद हैं। जो खुला है वह वेबसाइट का अपना लेटेस्ट ऑर्डर्स पन्ना है, जिस पर हाल में चढ़े सारे आदेश दिनांक के साथ दिखते हैं। यह पन्ना आज तीन बार देखा गया, सुबह 9:40, 9:42 और पीठ बैठने के बाद 10:42 बजे। तीनों बार सबसे नया दिनांक 21 सितंबर निकला। 22 सितंबर का कोई आदेश 10:42 बजे तक नहीं चढ़ा था।
लाइव लॉ, वर्डिक्टम, बार एंड बेंच, द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस, पाँचों दोबारा जाँचे गए। एक कड़ी में उम्मीद बँधी। बार एंड बेंच के यहाँ "ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर मामले के लिए: लाइव अपडेट्स" शीर्षक का एक पन्ना मिला। पन्ने की अपनी एचटीएमएल में दर्ज तारीख़ पढ़ने पर वह निकली 4 फ़रवरी 2026, यानी किसी पुरानी सुनवाई की, आज की नहीं। सारांश या शीर्षक से तारीख़ मान ली जाती तो यह ग़लती रिपोर्ट में उतर आती। लाइव लॉ का अपना सुप्रीम कोर्ट डेली राउंड-अप 21 सितंबर तक का मिला, 22 सितंबर वाला अभी छपा नहीं था। गूगल न्यूज़ पर दोनों मामलों के नाम से खोजने पर भी आज की सुनवाई का कोई ब्योरा नहीं मिला। कल, 23 सितंबर के लिए जो सूची पहले से जारी हो चुकी है, उसमें भी न 1188/2026 है, न 1089/2025, न इनसे जुड़ा कोई मुक़दमा।
दो संभावनाएँ बचती हैं। पीठ इन दो मद तक पहुँची और कोई आदेश हुआ, पर वह अभी दर्ज होकर वेबसाइट पर नहीं चढ़ा। या पीठ आज इन तक पहुँची ही नहीं, यानी पास-ओवर हुआ, और वह ख़बर भी अभी नहीं छपी। दोनों में से कौन सच है, यह सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक पता नहीं चल सका। इसलिए यह रिपोर्ट न दाख़िला दर्ज करती है, न नोटिस, न मुल्तवी, न पास-ओवर। यह सिर्फ़ वह दर्ज करती है जो पता चल सका, और वह दर्ज करती है कि 10 बजकर 42 मिनट तक कोई आदेश सार्वजनिक नहीं हुआ था।
भारद्वाज की याचिका जनवरी के आदेश पर टिकी है
भारद्वाज की याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाख़िल है। इसमें अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का आरोप है, साथ ही अनुच्छेद 325 और 326 के तहत मतदाता अधिकारों का भी। लाइव लॉ की 17 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़ याचिका चार चीज़ें माँगती है। पहली, हर नोटिस पाने वाले मतदाता की एक समेकित, खोजी जा सकने वाली सूची, पते और नोटिस की वजह के साथ। दूसरी, तार्किक विसंगति तय करने के मानदंड, परिभाषा, एल्गोरिद्म के पैमाने और कार्यविधि का खुलासा। तीसरी, हर नोटिस में वह ठोस विसंगति और तथ्य बताने का निर्देश जिस पर वह टिका है, ताकि मतदाता सुनवाई में हिस्सा ले सके। चौथी, ऐसे अस्पष्ट नोटिसों के आधार पर नाम काटे जाने पर रोक जिनमें तथ्य नहीं बताए गए।
संख्याएँ भी उसी रिपोर्ट में हैं। 31 अगस्त की मसौदा सूची में 97,53,577 मतदाता दर्ज हुए। 47,56,722 नाम एएसडीडी श्रेणी में, यानी मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या दोहरे, सूची से बाहर रहे। याचिका के मुताबिक़ 33,12,919 मतदाताओं को नोटिस गए, जिनमें 13,79,785 नो-मैपिंग श्रेणी के हैं और 19,33,134 तार्किक विसंगति के। यह वही 33,12,919 है जो अख़बारों में चल रहा है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के 19 सितंबर के प्रेस नोट में यह संख्या 31,63,930 है। फ़र्क़ 1,48,989 का बैठता है। इसे मिलाने वाला कोई आयोग या सीईओ दस्तावेज़ अब तक दर्ज नहीं मिला है।

याचिका का आरोप है कि दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर सिर्फ़ इन श्रेणियों की गिनती है, नाम या और कोई ब्योरा नहीं। यह, याचिका के मुताबिक़, आयोग के अपने 14 मई 2026 के पत्र के पैराग्राफ़ 2(च) के ख़िलाफ़ जाता है, जो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों को नोटिस पाने वालों की सूची मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर छापने और स्थानीय निकाय दफ़्तरों में लगाने को कहता है।
यहीं बंगाल का जनवरी वाला आदेश आता है। सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को मोस्तरी बानू के मामले में, जिसका मूल आदेश इस डेस्क ने पढ़ा है, निर्देश दिया था कि तार्किक विसंगति श्रेणी में डाले गए मतदाताओं के नाम ग्राम पंचायत भवनों, तालुका दफ़्तरों और वार्ड दफ़्तरों में लगाए जाएँ, और उन्हें दस्तावेज़ या आपत्ति देने के लिए दस अतिरिक्त दिन मिलें। भारद्वाज की याचिका के मुताबिक़ आयोग ने वह आदेश बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी तक पहुँचाया भी, और वहाँ तार्किक विसंगति तथा अनमैप्ड, दोनों श्रेणियों के नाम सार्वजनिक जगहों पर लगे। दिल्ली में वैसा कुछ नहीं हुआ, यह याचिका का दावा है। याचिका में कर्नाटक का हवाला भी है, जहाँ याचिकाकर्ताओं के दावे के मुताबिक़ नोटिस पाने वालों की सूचियाँ कारण सहित मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर विधानसभा क्षेत्र और बूथ के हिसाब से मौजूद हैं। यह डेस्क कर्नाटक की वह वेबसाइट स्वतंत्र रूप से जाँच नहीं सका। यह दावा इसलिए याचिका के नाम पर ही दर्ज है।
तार्किक विसंगति शब्द की कोई परिभाषा कहीं नहीं है, याचिका बार-बार यही कहती है। मूल सघन पुनरीक्षण आदेश, जो 24 जून 2025 का है, उसमें भी ऐसी किसी एल्गोरिद्म-आधारित छँटाई का ज़िक्र नहीं। द हिंदू की 11 सितंबर की रिपोर्ट में दिल्ली की तार्किक विसंगतियों की ग्यारह श्रेणियाँ गिनाई गई थीं। याचिका कहती है कि उसे नहीं पता कि वही ग्यारह श्रेणियाँ आयोग इस्तेमाल कर रहा है या कुछ और।
मद 22 में बारह जुड़े मुक़दमे हैं, नौ नहीं
जुड़े मुक़दमों की गिनती ख़ुद जाँच माँगती है। आज की सूची में मुख्य याचिका मोस्तरी बानू के नाम बीस अर्ज़ियाँ सीधे दर्ज हैं, ज़्यादातर उचित आदेश या निर्देश की माँग वाली, कुछ हस्तक्षेप और आवेदन की। इसके अलावा सूची बारह और मुक़दमों को कनेक्टेड यानी जुड़ा हुआ बताती है, क्रमांक 22.1 से 22.12 तक। इस डेस्क की भीतरी योजना में पहले नौ जुड़े मुक़दमे लिखे गए थे, और कल की सूची के स्रोत-नोट में भी यही संख्या दर्ज हुई थी। ख़ुद आज की सूची पढ़ने पर बारह निकले। यह सुधार यहीं दर्ज है।
नाम ये हैं। डेरेक ओ'ब्रायन, रिट याचिका 737/2025। डोला सेन, रिट याचिका 1074/2025। सुभंकर सरकार, रिट याचिका 1088/2025। सनातनी संसद और एक अन्य, रिट याचिका 1216/2025। डॉ. सुबोध चंद्र रॉय, जो ख़ुद अपना मामला लड़ते हैं, रिट याचिका 119/2026। जॉय गोस्वामी, रिट याचिका 126/2026। ममता बनर्जी, रिट याचिका 129/2026। सुदीप कुमार धर, रिट याचिका 159/2026। मो. नौशाद सिद्दीक़ी, डायरी संख्या 68938/2025। मयदुल मोल्ला और एक अन्य, रिट याचिका 966/2026। अधीर रंजन चौधरी, डायरी संख्या 38345/2026। और प्रसेनजित बोस, रिट याचिका 819/2026।
हर मुक़दमे की अपनी शिकायत अलग है। ओ'ब्रायन, सेन, गोस्वामी और बनर्जी की अर्ज़ियाँ उचित आदेश की माँग वाली हैं। रॉय की याचिका दाख़िले के चरण में है। उन्होंने ख़ुद बहस करने की इजाज़त भी माँगी है। सिद्दीक़ी और चौधरी की अर्ज़ियाँ देरी माफ़ करवाने की हैं। यानी वे मुक़दमे अभी शुरुआती दहलीज़ पर हैं। बोस का मामला वही है जिसका ज़िक्र इस अख़बार की 18 सितंबर की रिपोर्ट में हुआ था। उसमें अधिकरणों की मानक संचालन प्रक्रिया सार्वजनिक न होने की शिकायत थी।
सूची में एक चेतावनी भी छपी है, अंग्रेज़ी में: "IT WILL BE APPRECIATED IF THE LEARNED ADVOCATES ON RECORD DO NOT SEEK ADJOURNMENT IN THE MATTERS LISTED BEFORE ALL THE COURTS IN THE CAUSE LIST"। यह वाक्य हर मद पर लागू होता है, सिर्फ़ मद 13 या 22 पर नहीं। इससे यह नहीं निकाला जा सकता कि आज किसी मुल्तवी की गुंजाइश नहीं थी।
पीछे की तालिका: 38,20,683 अपीलें, निपटान 2.68 फ़ीसदी
यह अधिकरण-तंत्र अनोखा है। मद 22 जिस ढाँचे पर टिका है, वह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 में कहीं नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 24 फ़रवरी और 10 मार्च 2026 के आदेशों में अनुच्छेद 142 की शक्ति से पश्चिम बंगाल में उन्नीस अपीलीय अधिकरण बनवाए, कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सिफ़ारिश पर पूर्व न्यायाधीशों की अध्यक्षता में। आयोग ने इन्हें 21 मार्च को अधिसूचित किया।
आयोग ने 16 सितंबर को जो हलफ़नामा दाख़िल किया, उसमें चौबीस ज़िलों की तालिका है। जोड़ है 38,20,683 अपीलें दाख़िल, 1,02,231 निपटीं, 37,18,452 लंबित। दर 2.68 फ़ीसदी बैठती है। इस अख़बार ने 18 सितंबर को इसी हलफ़नामे पर पूरी रिपोर्ट छापी थी। वहाँ दर्ज है कि हलफ़नामे का यह ख़ाना नहीं बताता कि इनमें कितनी अपीलें कटे नामों की हैं और कितनी किसी और का नाम कटवाने की, जबकि 25 अगस्त को पीठ ने आयोग से ठीक यही पूछा था।
इसी सवाल पर दो सरकारी हिसाब आमने-सामने हैं। स्क्रॉल की 19 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़ आयोग ने तृणमूल सांसद डेरेक ओ'ब्रायन की अर्ज़ी के जवाब में बताया कि 38.2 लाख में से 22.21 लाख अपीलें कटे नामों की हैं। 25 अगस्त को सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ को बताया था कि 38 लाख में से सिर्फ़ 7 लाख कटे नामों की हैं, बाक़ी किसी और का नाम जुड़ने पर आपत्ति की। ये दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। दोनों दावे हमारी 18 सितंबर की रिपोर्ट में दर्ज हुए, बिना सुलझाए, और आज की सुनवाई से पहले भी नहीं सुलझे हैं।
बारह जुड़े मुक़दमों में से कम से कम चार, ओ'ब्रायन, सेन, बनर्जी और बोस, इसी अस्पष्ट ज़मीन पर खड़े हैं। आज पीठ के सामने जो भी आए, वह इसी अनसुलझे आधार पर आएगा।
दोनों तरफ़ घड़ी चल रही है
दिल्ली में दावे-आपत्ति की अवधि 30 सितंबर को ख़त्म होती है। नोटिस निपटाने की आख़िरी तारीख़ 29 अक्टूबर है, और अंतिम सूची 4 नवंबर को छपनी है। मई में तय पहला कार्यक्रम अंतिम सूची 7 अक्टूबर को छापने का था, यानी तारीख़ अट्ठाईस दिन खिसक चुकी है। दिल्ली में आज भी कोई अपीलीय अधिकरण नहीं है। भारद्वाज की याचिका जिस पारदर्शिता की माँग कर रही है, वह मान भी ली जाए, तो नाम कटने के बाद अपील कहाँ होगी, इसका जवाब किसी दस्तावेज़ में नहीं है।
बंगाल में घड़ी दूसरी वजह से तेज़ चल रही है। कोलकाता उत्तर, कोलकाता दक्षिण और हावड़ा में नगर निगम चुनाव दिसंबर में हैं, और 16 सितंबर के हलफ़नामे के मुताबिक़ इन तीन ज़िलों में 2,29,060 अपीलें लंबित हैं। हमारी 18 सितंबर की रिपोर्ट के हिसाब से इन तीनों ज़िलों में अब तक क़रीब 5,485 अपीलें निपटीं, यानी रोज़ाना क़रीब 35। दिसंबर की पहली तारीख़ तक बाक़ी ढेर निपटाने के लिए रोज़ाना क़रीब तीन हज़ार चाहिए। यह मौजूदा रफ़्तार का लगभग छियासी गुना है।

दोनों घड़ियाँ आज की सुनवाई से स्वतंत्र चलती रहेंगी। पीठ मद 13 और 22 पर जो भी करे या न करे, 30 सितंबर की तारीख़ और दिसंबर के नगर निगम चुनाव अपनी जगह पर हैं। कोई मुल्तवी इन तारीख़ों को नहीं टालता।
बारह में से हर मुक़दमे का अपना वकील है
जुड़े मुक़दमों की एक और परत उनके वकीलों में है, और यह परत बताती है कि यह बैच कितना बड़ा हो चुका है। ओ'ब्रायन के लिए विवेक सिंह पेश हैं, सेन के लिए भी वही अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड। सरकार और सिद्दीक़ी के लिए उस्मान गनी ख़ान, दोनों मुक़दमों में एक ही नाम। मोल्ला और मुख्य याचिका मोस्तरी बानू के लिए सुभ्रो प्रकाश मुखर्जी। बनर्जी के लिए कुणाल मिमानी। सनातनी संसद की तरफ़ से आलभ्य धमीजा ख़ुद पहले याचिकाकर्ता के तौर पर दर्ज हैं। सूची में आयोग की तरफ़ से हर मद पर प्रतीक कुमार का नाम दोहराया गया है, अलग-अलग मुक़दमों में अलग-अलग क्रमांक के प्रतिवादी के लिए।
इतने वकील और इतने मुक़दमे एक साथ सुनने का मतलब यह भी है कि पीठ के पास आज दो मामलों की आड़ में बारह अलग मुक़दमों की फ़ाइलें हैं। हर फ़ाइल में अपनी अलग अर्ज़ियाँ हैं, कुछ हस्तक्षेप की, कुछ स्पष्टीकरण की, कुछ शुरुआती देरी माफ़ करवाने की। बंगाल के मामलों की सूची पिछले कई महीनों से इसी तरह बढ़ती रही है, हर सुनवाई में एक-दो नए पक्षकार जुड़ते गए। आज की तारीख़ में यह सूची बारह पर है। अगली तारीख़ को यह घट भी सकती है, अगर कोई मुक़दमा अलग सुना जाए, और बढ़ भी सकती है, अगर कोई नया हस्तक्षेप मंज़ूर हो।
अगली तारीख़ अभी दर्ज नहीं है
सुप्रीम कोर्ट की भाषा में दाख़िला, नोटिस, टैगिंग, मुल्तवी और पास-ओवर, पाँचों अलग नतीजे हैं। दाख़िला यानी अदालत ने याचिका सुनने लायक़ मानी। नोटिस यानी दूसरे पक्ष को जवाब के लिए बुलाया गया। टैगिंग यानी मामला किसी और लंबित मामले के साथ जोड़ा गया। मुल्तवी यानी अगली तारीख़ तय हुई। पास-ओवर यानी पीठ आज उस तक पहुँची ही नहीं। सूची में नाम होना इनमें से किसी एक की गारंटी नहीं देता।
23 सितंबर की सूची में न मद 13 है, न मद 22, न इनसे जुड़ा कोई मुक़दमा। आगे की तारीख़ अभी किसी सार्वजनिक सूची में दर्ज नहीं है। यह ख़ाली जगह अपने आप में एक सूचना है, ग़लती नहीं। अगली सूचियाँ आगे का रास्ता बताएँगी, कल नहीं तो उसके बाद।
फ़र्क़ 1,48,989 का बना हुआ है।
अपील 37,18,452 लंबित हैं। दोनों संख्याएँ आज भी उतनी ही सच हैं जितनी कल थीं। दोनों दस्तावेज़ों से निकली हैं। बस इतना नया है कि आज ये दोनों मामले अदालत के सामने सूचीबद्ध थे।
स्रोतसुप्रीम कोर्ट, 22-09-2026 की दैनिक वाद-सूची, मुख्य न्यायाधीश की अदालत, 385 पन्ने, 18 सितंबर की रात 8:49 बजे अतिरिक्त रजिस्ट्रार द्वारा जारी: मद 13 पर रिट याचिका 1188/2026, मद 22 पर 1089/2025 तथा बारह जुड़े मुक़दमे (22.1 से 22.12) और बीस अर्ज़ियाँ, सुप्रीम कोर्ट, 23-09-2026 की दैनिक वाद-सूची, आज की सुबह डाउनलोड कर जाँची गई: न मद 1188/2026 है, न 1089/2025, न इनसे जुड़ा कोई मुक़दमा, सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट, हाल में अपलोड हुए आदेशों की सूची, आज तीन बार देखी गई: सुबह 9:40, 9:42 और पीठ बैठने के बाद 10:42 बजे; तीनों बार सबसे नया दिनांक 21 सितंबर, 22 सितंबर का कोई आदेश दर्ज नहीं, बार एंड बेंच, शीर्षक \"लाइव अपडेट्स\" का है पर पन्ने की अपनी एचटीएमएल में datePublished 4 फ़रवरी 2026 दर्ज है; आज की सुनवाई का नहीं, किसी पुरानी सुनवाई का पन्ना, सुप्रीम कोर्ट, मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग, रिट याचिका 1089/2025, आदेश 19 जनवरी 2026, मूल प्रति पढ़ी गई: तार्किक विसंगति श्रेणी के नाम पंचायत और वार्ड दफ़्तरों में लगाने तथा दस अतिरिक्त दिन देने का निर्देश, लाइव लॉ, 17 सितंबर 2026, सुबह 11:50 (मूल एचटीएमएल से मिली तारीख़): अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की याचिका, 33,12,919 का बँटवारा, आयोग के 14 मई 2026 के पत्र का पैराग्राफ़ 2(च), और 19 जनवरी 2026 के आदेश का हवाला, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 19.09.2026: बिंदु 7 में 31,63,930 नोटिस, लाइव लॉ, 18 सितंबर 2026: चुनाव आयोग के 16 सितंबर के हलफ़नामे की 24 ज़िलों वाली तालिका, कुल 38,20,683 अपीलें, स्क्रॉल, 19 सितंबर 2026: डेरेक ओ'ब्रायन की अर्ज़ी पर आयोग के जवाब में 22.21 लाख और 16.10 लाख का बँटवारा, लाइव लॉ, 25 अगस्त 2026: सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन का 7 लाख वाला आँकड़ा और अदालत के चार सवाल, सुप्रीम कोर्ट, मामला-संख्या से स्थिति खोजने का पन्ना, आज जाँचा गया: खोज कैप्चा के पीछे है