सोन नदी का बँटवारा हो गया, और गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति में एक भी संख्या नहीं है
बिहार और झारखंड के बीच समझौता हुआ। सरकार के अपने दस्तावेज़ में यह नहीं लिखा कि किसे कितना पानी मिला। जो आँकड़े चल रहे हैं वे समारोह में कही गई बातों से आए हैं।
रविवार को नई दिल्ली में बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी पर समझौता ज्ञापन पर दस्तख़त हुए। गृह मंत्री अमित शाह मौजूद थे, दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री भी, और जल शक्ति मंत्री सी आर पाटिल भी।
गृह मंत्रालय ने इस पर जो विज्ञप्ति जारी की, उसमें बिहार के आठ ज़िलों के नाम हैं। भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना। झारखंड की तरफ़ पलामू और गढ़वा।
उसमें यह नहीं लिखा कि किस राज्य को कितना पानी मिला।
जो लिखा है, और जो नहीं
विज्ञप्ति कहती है कि पूर्वी भारत का एक बहुप्रतीक्षित जल विवाद सुलझ गया, कि लाखों किसानों को सिंचाई का पानी मिलेगा, और कि यह इस साल का चौथा जल समझौता है। वह पिछले तीन समझौतों का ब्योरा भी देती है, यमुना वाले में 580 एमसीएम पानी की रक़म तक।
सोन वाले हिस्से में कोई रक़म नहीं है।
न पानी की मात्रा, न समझौते की अवधि, न यह कि नाप किस बिंदु पर होगी। समझौता ज्ञापन का पाठ भी साथ में जारी नहीं हुआ।
जो आँकड़े चल रहे हैं
समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों में बँटवारा इस तरह दर्ज है: बिहार को 5.75 मिलियन एकड़ फ़ीट और झारखंड को 2.00 मिलियन एकड़ फ़ीट। यह समारोह में कही गई बातों से आया है, किसी जारी दस्तावेज़ से नहीं।
इन दोनों का जोड़ 7.75 है।
यह वही संख्या है जो 1973 के बाणसागर समझौते में अविभाजित बिहार को मिली थी।
1973 में क्या तय हुआ था
बाणसागर नियंत्रण बोर्ड अपने पन्ने पर उस समझौते का पाठ रखता है। 16 सितंबर 1973 को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच सोन के पानी और बाँध की लागत, दोनों पर सहमति हुई थी।
बँटवारा यह था: बिहार 7.75, मध्य प्रदेश 5.25, उत्तर प्रदेश 1.25। जोड़ 14.25 मिलियन एकड़ फ़ीट। बाँध की लागत तीनों में 2:1:1 के अनुपात में बँटनी थी।
15 नवंबर 2000 को झारखंड बना और बिहार के उन्हीं 7.75 पर सवाल खड़ा हो गया। तब से यही तय नहीं हो पा रहा था कि दोनों में किसका कितना हिस्सा है।
तो रविवार को नया पानी नहीं बँटा। पुराना हिस्सा दो में बँटा। बिहार के पास उसका 74 फ़ीसदी रहा, झारखंड को 26 फ़ीसदी मिला। ये प्रतिशत हमारी अपनी गणना हैं।
और 7.75 भी पक्की रक़म नहीं है
1973 के समझौते का एक पैराग्राफ़ इससे आगे जाता है, और उसे पढ़े बिना बँटवारे का मतलब अधूरा रहता है।
उसमें लिखा है कि अगर नदी में साल भर का बहाव 14.25 से कम या ज़्यादा रहा, तो तीनों राज्यों के इस्तेमाल में उसी अनुपात में कटौती या बढ़ोतरी होगी। यह हिसाब सोन बैराज की पुरानी सिंचाई की ज़रूरत निकालने के बाद लगेगा, जो 5 मिलियन एकड़ फ़ीट आँकी गई थी और जिसे पहले पानी मिलेगा।
उसके बाद घटने-बढ़ने का अनुपात 5.25 : 2.75 : 1.25 रखा गया, यानी मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश।
बिहार के 7.75 में से 5 पुरानी सिंचाई का हिस्सा है, जिसे प्राथमिकता है। ऊपर-नीचे सिर्फ़ बाक़ी 2.75 होता है।
यानी 5.75 और 2.00 उस संख्या के हिस्से हैं जो नदी के बहाव के साथ बदलती है।
उसी समझौते में यह भी दर्ज है कि बिहार की सिंचाई की ज़रूरत 8.00 मानी गई थी, और जो 0.25 कम पड़ रहा था वह गंगा परियोजना से पंप करके पूरा किया जाना था।
पच्चीस साल या छब्बीस
गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति में विवाद को "लगभग 25 साल पुराना" कहा गया है। कुछ रिपोर्टों में 26 साल लिखा है।
झारखंड 15 नवंबर 2000 को बना। अगस्त 2026 तक यह 25 साल नौ महीने बैठता है। दोनों में से कोई ग़लत नहीं है, पर दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं।
जो अभी पता नहीं है
समझौता ज्ञापन का पाठ सार्वजनिक नहीं हुआ है, इसलिए कई बातें अभी तय नहीं की जा सकतीं।
पानी की नाप किस बिंदु पर होगी। कम बहाव वाले सालों में कटौती दोनों राज्यों में कैसे बँटेगी। कोई विवाद हुआ तो कौन तय करेगा। समझौता कब तक चलेगा और समीक्षा कब होगी।
बाणसागर समझौते ने ये सब लिखा था, नाप के बिंदु से लेकर लागत के अनुपात तक। रविवार वाले समझौते के बारे में हमारे पास अभी वह पाठ नहीं है जिससे यही बातें जाँची जा सकें।
स्रोतगृह मंत्रालय, विज्ञप्ति, बाणसागर नियंत्रण बोर्ड, बाणसागर समझौता, 1973