कोयला मंत्रालय का 114 फ़ीसदी और सीईए की उसी 11 सितंबर की रिपोर्ट का 19 फ़ीसदी, दोनों पंजाब के बिजलीघरों के आँकड़े हैं
रविवार दोपहर कोयला मंत्रालय ने विज्ञप्ति निकालकर कहा कि पंजाब में बिजली कम बनने की वजह कोयले की कमी नहीं है, और 11 सितंबर को पीएसपीसीएल के संयंत्रों में भंडार मानक ज़रूरत का क़रीब 114 फ़ीसदी था। उसी 11 सितंबर की केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की दैनिक कोयला रिपोर्ट में पंजाब के दो निजी बिजलीघर संकटग्रस्त सूची में दर्ज हैं, भंडार 19 और 22 फ़ीसदी। दोनों आँकड़े सरकार के अपने हैं और अलग-अलग संयंत्रों के हैं।

शनिवार, 12 सितंबर की शाम साढ़े चार बजे लुधियाना के औद्योगिक इलाक़ों में श्रेणी दो और तीन के कारख़ानों की बिजली काट दी गई। पीएसपीसीएल के अधिकारियों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि आपूर्ति रविवार सुबह छह बजे तक बंद रहेगी। साढ़े तेरह घंटे। फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल ऑर्गनाइज़ेशन के अध्यक्ष गुरमीत सिंह कुलार ने उसी अख़बार से कहा कि उन्होंने पीएसपीसीएल को सुझाव दिया था कि रोज़-रोज़ काम रोकने के बजाय बारी-बारी से हफ़्ते में एक दिन चौबीस घंटे की बंदी कर दी जाए।
अगले दिन दोपहर 2:13 बजे कोयला मंत्रालय ने विज्ञप्ति संख्या 2309696 जारी की। उसका पहला वाक्य एक अख़बारी सुर्ख़ी को उद्धृत करता है, "पंजाब में बिजली संकट गहराया, 14 घंटे की कटौती से कारख़ाने और खेत प्रभावित", और कहता है कि यह पूरी तस्वीर नहीं है। सुर्ख़ी किस अख़बार की है, विज्ञप्ति नहीं बताती। विज्ञप्ति का सबसे ठोस आँकड़ा यह है कि 11 सितंबर को पीएसपीसीएल के संयंत्रों में कोयले का भंडार मानक आवश्यकता का क़रीब 114 फ़ीसदी था।
उसी 11 सितंबर की केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की दैनिक कोयला रिपोर्ट खुली हुई पड़ी है। उसमें पंजाब की पाँच पंक्तियाँ हैं। तीन पर कोई निशान नहीं है। दो पर तारांकन है, जिसका मतलब संकटग्रस्त भंडार होता है, और उनके सामने भंडार 19 और 22 फ़ीसदी दर्ज है।
दोनों आँकड़े सरकार के अपने हैं, दोनों एक ही तारीख़ के हैं, और दोनों सही हैं। वे अलग-अलग बिजलीघरों के हैं।
विज्ञप्ति के पाँच दावे
कोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति छोटी है और उसमें पाँच बातें हैं, हर एक आँकड़े के साथ।
पहली, पंजाब के दोनों निजी संयंत्रों को कोयले की आवक उनकी खपत से ज़्यादा है। पिछले तीन दिनों में नाभा पावर लिमिटेड की औसत खपत क़रीब 4.3 रेक प्रतिदिन थी और आपूर्ति क़रीब 5 रेक; तलवंडी साबो पावर लिमिटेड की खपत क़रीब 3.8 रेक और आपूर्ति भी क़रीब 5 रेक। सितंबर 2026 में अब तक का औसत नाभा के लिए 4.9 रेक प्रतिदिन और तलवंडी साबो के लिए 4.1 रेक है।
दूसरी, पंजाब अपनी ही कैप्टिव खदान से कोयला ठीक से नहीं उठा रहा। पीएसपीसीएल की पछवाड़ा सेंट्रल खदान में अप्रैल 2026 से 11 सितंबर तक उत्पादन वार्षिक लक्ष्य का 83.67 फ़ीसदी है, पर प्रेषण सिर्फ़ 68.44 फ़ीसदी। विज्ञप्ति कहती है कि इस फ़र्क़ से खदान पर क़रीब 3.21 लाख टन कोयला बिना उठे जमा हो गया है। वार्षिक लक्ष्य कितना है, यह विज्ञप्ति नहीं बताती, इसलिए पाठक इन तीन आँकड़ों को आपस में जाँच नहीं सकता।
तीसरी, पीएसपीसीएल के तीन संयंत्रों में भंडार 114 फ़ीसदी है। विज्ञप्ति तीनों का नाम लेती है: गुरु हरगोबिंद ताप बिजलीघर (लहरा मोहब्बत), गोइंदवाल साहिब और रोपड़, कुल क्षमता 2,300 मेगावाट।
चौथी, इतना कोयला होते हुए भी सितंबर में इन्हीं तीन संयंत्रों का अस्थायी प्लांट लोड फ़ैक्टर क़रीब 59 फ़ीसदी रहा। विज्ञप्ति का निष्कर्ष यहीं है: महीने का कम उत्पादन संयंत्र के सिरे पर कोयले की कमी के खाते में नहीं डाला जा सकता।
पाँचवीं, कोल इंडिया की सहायक कंपनियों ने जो अतिरिक्त कोयला पेश किया, वह पूरा उठाया नहीं गया। सीसीएल ने 30 मार्च 2026 को आरसीआर व्यवस्था के तहत नाभा और तलवंडी साबो को 5 लाख टन की पेशकश की थी, जिसमें से 4.1 लाख टन बुक हुआ और 3.2 लाख टन उठा। बीसीसीएल ने नाभा को 3.5 लाख टन दिए, 1.7 लाख टन बुक हुआ, 1.1 लाख टन उठा। दूसरी तिमाही में लचीलापन नीति के तहत बीसीसीएल से नाभा को 2.30 लाख टन और सीसीएल से तलवंडी साबो को 3 लाख टन और आवंटित हुआ है, जिस पर उठाव शुरू ही नहीं हुआ।
एक बात दोनों भाषाओं में अलग है। अंग्रेज़ी मूल कहता है कि पछवाड़ा का कोयला "पीएसपीसीएल के स्वामित्व वाले नहीं" आईपीपी भी इस्तेमाल कर सकते हैं और उनमें नाभा तथा तलवंडी साबो शामिल हैं। हिंदी पाठ में यही वाक्य "पीएसपीसीएल के स्वामित्व वाले आईपीपी" हो गया है। तथ्य अंग्रेज़ी पाठ के साथ है: नाभा पावर एल एंड टी की पूरी स्वामित्व वाली कंपनी है, जिसे 16 फ़रवरी 2026 को टॉरेंट पावर को बेचने का समझौता हुआ, और तलवंडी साबो वेदांता की है।
सीईए की उसी तारीख़ की रिपोर्ट में पाँचों बिजलीघर
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण का ईंधन प्रबंधन प्रभाग हर दिन एक शीट निकालता है जिसमें देश के हर ताप बिजलीघर की क्षमता, उस महीने का पीएलएफ़, मानक भंडार, वास्तविक भंडार, दोनों का अनुपात, दिन की आवक, दिन की खपत और संकटग्रस्त होने पर उसका कारण दर्ज होता है। 11 सितंबर 2026 की शीट में पंजाब की पाँच पंक्तियाँ इस तरह हैं।
लहरा मोहब्बत, 920 मेगावाट, पीएसपीसीएल का। मानक भंडार 2,34,600 टन, वास्तविक 1,53,800 टन, यानी 66 फ़ीसदी। महीने का पीएलएफ़ 64 फ़ीसदी।
गोइंदवाल साहिब, 540 मेगावाट। मानक 1,32,600 टन, वास्तविक 1,24,500 टन, यानी 94 फ़ीसदी। पीएलएफ़ 85 फ़ीसदी, पाँचों में सबसे ऊँचा।
रोपड़, 840 मेगावाट। मानक 2,24,800 टन, वास्तविक 3,93,700 टन, यानी 175 फ़ीसदी। पीएलएफ़ 38 फ़ीसदी, पाँचों में सबसे नीचा।
तीनों का भंडार जोड़िए तो 6,72,000 टन बैठता है और तीनों की मानक आवश्यकता 5,92,000 टन। अनुपात 113.5 फ़ीसदी, यानी विज्ञप्ति का 114। तीनों का पीएलएफ़ क्षमता के हिसाब से जोड़िए तो 59.4 फ़ीसदी आता है, यानी विज्ञप्ति का 59। मंत्रालय के दोनों प्रमुख आँकड़े प्राधिकरण की शीट से मिल जाते हैं। झगड़ा जोड़-घटाव का नहीं है।
झगड़ा इस बात का है कि 114 का जोड़ किन संयंत्रों पर बना है, और उस जोड़ के भीतर कोयला कहाँ रखा है। पीएसपीसीएल के तीनों संयंत्रों के कुल 6,72,000 टन में से 3,93,700 टन अकेले रोपड़ में है, यानी 59 फ़ीसदी। जिस संयंत्र के पास सबसे ज़्यादा कोयला है, वही सबसे कम बिजली बना रहा है।
बची दो पंक्तियाँ निजी क्षेत्र की हैं।
राजपुरा ताप बिजलीघर, 1,400 मेगावाट, नाभा पावर का। मानक भंडार 3,20,400 टन, वास्तविक 62,300 टन, यानी 19 फ़ीसदी। सामने तारांकन, और कारण के ख़ाने में लिखा है कि एनसीएल और कोयला कंपनियाँ उप-समूह योजना के मुताबिक़ आपूर्ति सुनिश्चित करें।
तलवंडी साबो ताप बिजलीघर, 1,980 मेगावाट, वेदांता का। मानक 5,00,900 टन, वास्तविक 1,08,100 टन, यानी 22 फ़ीसदी। यहाँ भी तारांकन, और कारण के ख़ाने में वही वाक्य।
कोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति इन दो संख्याओं का ज़िक्र नहीं करती। वह इन्हीं दो संयंत्रों के लिए रेक की रोज़ाना आवक गिनाती है और भंडार के दिन नहीं गिनाती। प्राधिकरण की उसी शीट में मानक 20 दिन का है। 9 सितंबर की इकाईवार रिपोर्ट में पाँचों के दिन इस तरह दर्ज हैं: रोपड़ 34, गोइंदवाल 17, लहरा मोहब्बत 14, तलवंडी साबो 4 और राजपुरा 3।

द ट्रिब्यून ने 6 सितंबर को सीईए की 4 सितंबर वाली शीट से यही पाँच संख्याएँ छापी थीं: रोपड़ 29, लहरा 13, गोइंदवाल 14, तलवंडी साबो 5 और राजपुरा 6। एक हफ़्ते में रोपड़ का ढेर बढ़ता गया और दोनों निजी संयंत्रों का घटता गया।
11 सितंबर की शीट में दिन की आवक और दिन की खपत वाले ख़ाने यह और साफ़ कर देते हैं। रोपड़ में उस दिन 20,100 टन कोयला आया और 6,400 टन जला। लहरा मोहब्बत में 8,000 टन आया और 13,000 टन जला, यानी जो संयंत्र असल में बिजली बना रहा था वह अपना भंडार खा रहा था, और जो नहीं बना रहा था उसका भंडार भरता जा रहा था।
12 सितंबर की शीट में तस्वीर नहीं बदलती। राजपुरा 21 फ़ीसदी, तलवंडी साबो 23 फ़ीसदी, दोनों संकटग्रस्त। रोपड़ 181 फ़ीसदी पर पहुँच जाता है और उसका पीएलएफ़ 38 फ़ीसदी ही रहता है। पूरे देश में 11 सितंबर को 63 बिजलीघर संकटग्रस्त सूची में थे, जिनमें 57 घरेलू कोयले पर चलने वाले हैं; 4 सितंबर की शीट में यह संख्या 57 थी, जैसा द ट्रिब्यून ने 6 सितंबर को छापा था।
भंडार और आवक, दो अलग नाप
एक संयंत्र किसी दिन अपनी खपत से ज़्यादा कोयला पा सकता है और उसी दिन बीस दिन की तकिये वाली ज़रूरत के पाँचवें हिस्से पर खड़ा हो सकता है। ये दो अलग चीज़ें हैं, और पंजाब के झगड़े की जड़ यहीं है।
11 सितंबर को राजपुरा में 18,800 टन कोयला आया और 13,900 टन जला। दिन के हिसाब से संयंत्र फ़ायदे में रहा। 85 फ़ीसदी पीएलएफ़ पर उसकी रोज़ की ज़रूरत 16,022 टन है, तो आवक ज़रूरत से भी ऊपर थी। पर भंडार 62,300 टन था और मानक 3,20,400 टन। उस दिन की रफ़्तार पर, यानी रोज़ाना क़रीब 4,900 टन की बढ़त पर, मानक तक पहुँचने में लगभग दो महीने लगते।
उसी दिन तलवंडी साबो में 8,200 टन आया और 12,900 टन जला। भंडार घटा। अगले दिन 23,800 टन आया और 18,600 टन जला, भंडार बढ़ा। रेक की आवक रोज़ एक जैसी नहीं होती, इसीलिए तीन दिन का औसत और महीने भर का औसत अलग निकलते हैं, और इसीलिए विज्ञप्ति दोनों अलग-अलग देती है।
कोयला मंत्रालय का दावा आवक के बारे में है और सही है। सीईए की शीट भंडार के बारे में है और वह भी सही है। जिस दिन एक संयंत्र बीस दिन के मानक के मुक़ाबले चार दिन पर हो, उस दिन उसका मालिक इकाइयों को पूरी क्षमता पर नहीं चलाता, चाहे उस सुबह की गाड़ी भरी हुई ही क्यों न आई हो। 11 सितंबर को राजपुरा 68 फ़ीसदी पीएलएफ़ पर था, तलवंडी साबो भी 68 पर।
उठाव के आँकड़े इसी तस्वीर का दूसरा सिरा हैं। सीसीएल और बीसीसीएल ने मिलाकर 8.5 लाख टन की पेशकश की, 5.8 लाख टन बुक हुआ और 4.3 लाख टन उठा। पेशकश का आधा। दूसरी तिमाही के 5.3 लाख टन पर उठाव शुरू नहीं हुआ। पेशकश और लदान के बीच रेलवे की रेक, खदान की साइडिंग, ढुलाई का भाड़ा और अग्रिम भुगतान, सब आते हैं, और विज्ञप्ति इनमें से किसी पर कुछ नहीं कहती।
नौ सितंबर को बंद तीन इकाइयाँ और उनके कारण
कोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति में एक वाक्य है कि आईपीपी संयंत्रों में ख़राबी की सूचना मिली है और राज्य इस पर नज़र रखे। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की दैनिक मरम्मत रिपोर्ट में यही बात इकाई, मेगावाट, तारीख़, घंटे और कारण के साथ लिखी होती है।
9 सितंबर 2026 की उस रिपोर्ट में पंजाब की तीन पंक्तियाँ हैं। गोइंदवाल साहिब की इकाई एक, 270 मेगावाट, 8 सितंबर की सुबह 11:28 से बंद, कारण बॉयलर के असामान्य परिचालन मानक। रोपड़ की इकाई छह, 210 मेगावाट, 5 सितंबर की तड़के 12:50 से बंद, कारण मिलिंग सिस्टम और आरसी फ़ीडर की ख़राबी। तलवंडी साबो की इकाई एक, 660 मेगावाट, 9 सितंबर की सुबह 11:41 से बंद, कारण एयर प्रीहीटर।

तीनों जोड़कर 1,140 मेगावाट। तीनों रिपोर्ट के "फ़ोर्स्ड मेंटेनेंस" वाले ख़ाने में हैं, नियोजित मरम्मत वाले में नहीं, यानी तीनों अचानक बंद हुईं। इनमें दो पीएसपीसीएल के अपने संयंत्रों की हैं, जहाँ कोयले की कमी का कोई सवाल नहीं है।
उसी दिन की इकाईवार उत्पादन रिपोर्ट में पंजाब की निगरानी में आने वाली कुल क्षमता 6,776.3 मेगावाट दर्ज है, और उसमें से 1,227.6 मेगावाट बंदी में। लहरा मोहब्बत उस दिन अपने कार्यक्रम से ऊपर चला, 13.77 मिलियन यूनिट के लक्ष्य के मुक़ाबले 20.71 मिलियन यूनिट। रोपड़ अपने 13.49 के मुक़ाबले 8.83 पर रहा, 34 दिन का कोयला रखते हुए।
12 सितंबर को पंजाब की चरम माँग 16,519 मेगावाट थी। राज्य की अपनी निगरानी योग्य क्षमता उसका इकतालीस फ़ीसदी है। बाक़ी बाहर से आता है, और द ट्रिब्यून की 8 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़ पीएसपीसीएल उत्तरी ग्रिड से 11,500 मेगावाट से ज़्यादा खींच रहा था। इस ढाँचे में एक 660 मेगावाट की इकाई का बंद होना पंजाब की अपनी कुल क्षमता का दसवाँ हिस्सा है।
बिजली ख़रीद समझौते और स्थिर शुल्क का हिसाब
पीएसपीसीएल इन दोनों निजी संयंत्रों से पच्चीस साल के बिजली ख़रीद समझौतों के तहत बिजली लेता है। ऐसे समझौते में भुगतान दो हिस्सों में बँटा होता है। स्थिर शुल्क, जो संयंत्र के उपलब्ध रहने पर देना पड़ता है चाहे बिजली ली जाए या नहीं; और परिवर्तनीय शुल्क, जो असल में ली गई बिजली पर लगता है और जिसमें ईंधन की क़ीमत बैठती है।
पंजाब राज्य विद्युत नियामक आयोग के 6 मार्च 2026 के टैरिफ़ आदेश में यह हिसाब खुला हुआ है। आदेश याचिका संख्या 70/2025 पर है और उस पर अध्यक्ष विश्वजीत खन्ना तथा सदस्य रविंदर सिंह सैनी और रवि कुमार के हस्ताक्षर हैं। उसके अध्याय तीन में लिखा है कि नाभा पावर का स्थिर ख़र्च 85 फ़ीसदी मानक उपलब्धता मानकर जोड़ा गया है और तलवंडी साबो का 80 फ़ीसदी मानकर।
पूरे साल के लिए आयोग ने 31,533 करोड़ रुपये की बिजली ख़रीद मंज़ूर की है। इसमें परिवर्तनीय लागत 23,787 करोड़ है और स्थिर शुल्क 7,414 करोड़, यानी हर चार रुपये में क़रीब एक रुपया संयंत्र के खड़े रहने का है। राज्य के भीतर के आईपीपी से 3,161.46 मेगावाट अनुबंधित क्षमता पर 26,393 मिलियन यूनिट का हिसाब है, औसत 4.87 रुपये प्रति यूनिट। गोइंदवाल, जिसे पीएसपीसीएल ने जीवीके से ख़रीदा, आदेश में अलग पंक्ति है और वहाँ दर 5.30 रुपये बैठती है।
अनुबंधित 3,161.46 मेगावाट और सीईए की शीट में दर्ज 3,380 मेगावाट अलग-अलग दिखते हैं क्योंकि पहला संयंत्र की अपनी खपत निकालने के बाद का शुद्ध आँकड़ा है और दूसरा सकल स्थापित क्षमता। द ट्रिब्यून ने राजपुरा की क्षमता 1,330 मेगावाट छापी है, सीईए ने 1,400; यही फ़र्क़ है।
इसी अध्याय में आयोग ने पीएसपीसीएल को एक निर्देश दिया है जो इस पूरी कहानी की गाँठ है। बिजली सरेंडर करनी हो तो वह अपने संयंत्रों समेत सभी ताप बिजलीघरों के मेरिट ऑर्डर के हिसाब से हो, और उसमें "सीसीएल को आवंटित कोयले का कम उठाव करने पर देय मुआवज़े" का ध्यान रखा जाए। यानी कम कोयला उठाने पर एक लागत बैठती है, और वह लागत सस्ती बिजली और महँगी बिजली के बीच के फ़ैसले में गिनी जाती है। आयोग यह भी कहता है कि राज्य के भीतर के आईपीपी का मेरिट ऑर्डर तय करते समय घरेलू कोयले वाली परिवर्तनीय लागत तभी ली जाए जब आईपीपी के पास घरेलू कोयला पर्याप्त मात्रा में हो।
बाज़ार से ख़रीद का भाव और उसकी ऊपरी सीमा
जब अपने संयंत्र कम चलें और अनुबंध की बिजली पूरी न पड़े, तो वितरण कंपनी बाज़ार से ख़रीदती है। पीएसपीसीएल ने इसी साल के लिए बिजली एक्सचेंज से 5,689.27 मिलियन यूनिट ख़रीदने का हिसाब लगाया था, 4.90 रुपये प्रति यूनिट के भाव पर, कुल 2,684.20 करोड़ रुपये। यह भाव कैसे तय हुआ, आयोग का आदेश ख़ुद बताता है: पिछले तीन साल के रुझान से, क्योंकि एक्सचेंज के भाव अस्थिर रहते हैं।
सितंबर ने उस रुझान को तोड़ दिया। इंडियन एनर्जी एक्सचेंज के संयुक्त प्रबंध निदेशक रोहित बजाज ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि 1 से 9 सितंबर के बीच वास्तविक समय बाज़ार का औसत मूल्य 7.48 रुपये प्रति यूनिट रहा, जबकि पिछले साल इन्हीं दिनों यह 2.86 रुपये था। पीएसपीसीएल की अपनी योजना से यह ढाई रुपये से ज़्यादा ऊपर है।
ऊपर की तरफ़ एक छत है। सीईआरसी के आदेशों के तहत सभी बिजली एक्सचेंजों के दिन-पूर्व बाज़ार में अधिकतम बोली 10 रुपये प्रति यूनिट है। जो उत्पादक इससे महँगी बिजली बेचना चाहते हैं उनके लिए 2022 में उच्च मूल्य वाला अलग खंड बना, जिसकी सीमा 11 अप्रैल 2023 से 20 रुपये है। पंजाब जैसी कंपनी के लिए असली बंदिश यह छत नहीं है। आयोग ने 2026-27 के लिए आपूर्ति की औसत लागत 615.06 पैसे प्रति यूनिट आँकी है, यानी हर स्रोत को मिलाकर एक यूनिट उपभोक्ता तक पहुँचाने में इतना बैठता है। एक्सचेंज से 7.48 रुपये पर ख़रीदी गई यूनिट अकेले इसी औसत से ऊपर निकल जाती है।
द ट्रिब्यून की 8 सितंबर की रिपोर्ट में इसी का रोज़मर्रा रूप दर्ज है। दिन में पीएसपीसीएल एक्सचेंज से मिलने वाली सस्ती सौर बिजली से चरम माँग सँभाल लेता है। सूरज ढलने के बाद उसे महँगी बिजली ख़रीदनी पड़ती है, और तभी कुछ श्रेणियों के औद्योगिक उपभोक्ताओं पर पाँच घंटे की कटौती लगी थी।
कटौती का क्रम और मिले-जुले फ़ीडर
पंजाब में बिजली किसे मिलेगी और किसकी कटेगी, इसका एक क्रम है। 12 सितंबर की शाम उसका सबसे निचला पायदान श्रेणी दो और तीन के औद्योगिक उपभोक्ता थे, जिन्हें द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ अपने घोषित भार का क्रमशः दस और दो फ़ीसदी से ज़्यादा इस्तेमाल करने की छूट नहीं थी। घरेलू उपभोक्ताओं को दिन में चार से पाँच घंटे की बिना सूचना कटौती मिली।
इस क्रम का आधार बिक्री का ढाँचा है। नियामक आयोग ने 2026-27 के लिए पीएसपीसीएल की कुल बिक्री 73,065 मिलियन यूनिट मंज़ूर की है। इसमें घरेलू 22,784 है, बड़ी आपूर्ति यानी बड़े उद्योग 22,496, और कृषि पंपसेट 16,323। मँझोली और छोटी बिजली मिलाकर 3,531 और है। खेती और घर मिलकर आधे से ऊपर हैं और दोनों पर सब्सिडी है; उद्योग क़रीब छत्तीस फ़ीसदी है और उसका बिल पूरा आता है।
14 जुलाई को बिजली मंत्री तरुनप्रीत सिंह सोंद ने पटियाला में कहा था कि पंजाब ने उस दिन 17,328 मेगावाट की रिकॉर्ड माँग बिना किसी श्रेणी पर कटौती लगाए पूरी की, और खेती को आठ घंटे का वादा था जबकि किसानों को उससे ज़्यादा मिल रहा था। पीएसपीसीएल के सीएमडी बसंत गर्ग ने उसी दिन कहा कि किसानों को बारह घंटे तक बिजली मिल रही है। दो महीने बाद उसी निगम ने लुधियाना के कारख़ानों की बिजली साढ़े तेरह घंटे काट दी।
कटौती साफ़ लकीरों पर नहीं गिरती। द इंडियन एक्सप्रेस ने लुधियाना के सीरा, गौंसगढ़ और बूथगढ़ जैसे गाँवों के नाम दिए हैं, जिनकी बिजली उन्हीं फ़ीडरों से आती है जिन पर ज़्यादातर उद्योग हैं, इसलिए उद्योग की कटौती उनकी भी कटौती है। धांदरी कलाँ, धांदरी ख़ुर्द, गियासपुरा और कंगनवाल में मज़दूर कारख़ानों के पास ही रहते हैं और रात उन्हीं के हिस्से आती है।

यही उलझन दूसरी दिशा में भी है। नियामक आयोग के 2026-27 के आदेश का अध्याय पाँच दर्ज करता है कि कंडी क्षेत्र के 216 मिश्रित कृषि फ़ीडरों को अलग करने का काम आरडीएसएस के तहत 368.3 करोड़ रुपये में होना है और पीएसपीसीएल ने उसे 31 अगस्त 2027 तक पूरा करने की बात कही है। तब तक उन फ़ीडरों पर खेत और घर एक ही तार पर हैं। शहरी फ़ीडरों से जुड़े 1,260 कृषि कनेक्शनों पर मीटर अब तक नहीं लगे, और पीएसपीसीएल ने आयोग को कारण बताया है कि स्थानीय विरोध हो रहा है।
उसी हफ़्ते केरल और तमिलनाडु
इसी सितंबर में देश की चरम माँग 10 सितंबर को 269 गीगावाट पर पहुँची, जो किसी भी सितंबर में दर्ज सबसे ऊँचा आँकड़ा है और मई की सालाना चोटी 270 गीगावाट से बस एक कम। सीईए की 9 सितंबर की क्षेत्रवार रिपोर्ट में 1 अप्रैल से उस दिन तक देश का ताप उत्पादन अपने कार्यक्रम से 1.54 फ़ीसदी ऊपर है और जल विद्युत 10.98 फ़ीसदी नीचे। उत्तरी क्षेत्र अकेला है जहाँ ताप उत्पादन भी कार्यक्रम से 1.26 फ़ीसदी पीछे है।
12 सितंबर को इसी जगह छपे लेख "सितंबर की शाम के लिए केरल को बिजली बेचने कोई तैयार नहीं हुआ" में दर्ज है कि केरल राज्य विद्युत बोर्ड ने शाम के घंटों के लिए बिजली ख़रीदने का टेंडर निकाला और डीप पोर्टल पर एक भी बोली नहीं आई।
तमिलनाडु में 13 सितंबर को राजस्व मंत्री के. ए. सेनगोट्टैयन ने इरोड में कहा कि राज्य में पड़ोसी राज्यों के मुक़ाबले कम कटौती हो रही है, और सरकार दिन में बनी सौर बिजली को रात के लिए जमा करने के रास्ते देख रही है। विपक्ष उसी दिन कटौती पर सरकार को घेर रहा था। तीनों राज्यों में कमी एक ही पहर की है, सूरज ढलने के बाद वाली।
दोनों पक्ष कहाँ तक साथ चलते हैं
कोयला मंत्रालय यह नहीं कह रहा कि पंजाब में बिजली नहीं कट रही। वह यह कह रहा है कि कटौती की वजह कोयले की आपूर्ति नहीं है, और अपने दावे के लिए वह पीएसपीसीएल के तीन संयंत्रों का भंडार, उनका पीएलएफ़, पछवाड़ा से प्रेषण और आईपीपी का उठाव गिनाता है। ये चारों आँकड़े प्राधिकरण की अपनी शीटों से मिल जाते हैं।
पंजाब के बिजली मंत्री सोंद ने 13 सितंबर को ठीक यही बँटवारा माना। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के अपने संयंत्रों में कोयले की कमी नहीं है क्योंकि पछवाड़ा खदान चालू हो चुकी है, और दिक़्क़त तलवंडी साबो तथा राजपुरा की आपूर्ति में है, जो कोल इंडिया को सुनिश्चित करनी है। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि संकट निजी संयंत्रों के सिरे पर है।
फ़र्क़ ज़िम्मेदारी पर है और वहाँ दस्तावेज़ फ़ैसला नहीं करते। मंत्रालय कहता है कोयला पेश किया गया और उठाया नहीं गया; राज्य कहता है आपूर्ति पूरी नहीं हुई। सीईए की शीट दोनों को कुछ न कुछ देती है: आवक खपत से ऊपर है, भंडार मानक से बहुत नीचे है, और कारण के ख़ाने में प्राधिकरण ने ख़ुद लिखा है कि कोयला कंपनियाँ उप-समूह योजना के मुताबिक़ आपूर्ति सुनिश्चित करें।
सोंद का दूसरा दावा अलग है और उसका जवाब विज्ञप्ति में नहीं है। उन्होंने कहा कि पंजाब को केंद्रीय पूल से अपने हिस्से से 1,051 मेगावाट कम मिल रहा है। द ट्रिब्यून ने 7 सितंबर को यही कमी 1,193 मेगावाट बताई थी, 2,814 मेगावाट के तय हिस्से के मुक़ाबले 1,621 मेगावाट की औसत उपलब्धता पर। दोनों आँकड़े राज्य के बिजली विभाग के हैं, छह दिन के अंतर पर, और कोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति केंद्रीय क्षेत्र की इस कमी पर एक शब्द नहीं कहती।
पैसे का हिसाब भी दो तरफ़ से पढ़ा जा रहा है। नियामक आयोग ने 2026-27 के लिए 7,851.91 करोड़ रुपये का संचयी अधिशेष निकालकर उतनी ही राहत सभी श्रेणियों को दे दी। पीएसईबी इंजीनियर्स असोसिएशन ने 7 सितंबर को मुख्यमंत्री भगवंत मान को लिखा कि याचिका में ख़र्च कम आँका गया, इसलिए टैरिफ़ बनावटी तौर पर नीचे तय हुआ, और निगम को इसी साल क़रीब 7,800 करोड़ रुपये की कमी झेलनी पड़ेगी। एक ही आकार की रक़म, एक के लिए अधिशेष और दूसरे के लिए घाटा। यह फ़र्क़ किसी दस्तावेज़ से नहीं सुलझता, क्योंकि दोनों एक ही दस्तावेज़ पढ़ रहे हैं।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, कोयला मंत्रालय, विज्ञप्ति संख्या 2309696, 13 सितंबर 2026, दोपहर 2:13: पंजाब के बिजलीघरों को कोयले की आपूर्ति पर्याप्त (अंग्रेज़ी मूल), पत्र सूचना कार्यालय, कोयला मंत्रालय, 13 सितंबर 2026: उसी विज्ञप्ति का हिंदी पाठ, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, ईंधन प्रबंधन प्रभाग: दैनिक कोयला रिपोर्ट, स्थिति 11 सितंबर 2026, संयंत्रवार भंडार, मानक आवश्यकता और संकटग्रस्त चिह्न, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण: दैनिक कोयला रिपोर्ट, स्थिति 12 सितंबर 2026, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, ग्रिड परिचालन एवं वितरण विंग: 9 सितंबर 2026 की इकाईवार उत्पादन रिपोर्ट, उप-रिपोर्ट 2, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण: 9 सितंबर 2026 की दैनिक मरम्मत रिपोर्ट, उप-रिपोर्ट 10, इकाईवार बंदी और उसका कारण, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण: 9 सितंबर 2026 की क्षेत्रवार उत्पादन समीक्षा, उप-रिपोर्ट 1, पंजाब राज्य विद्युत नियामक आयोग: पीएसपीसीएल के लिए वित्त वर्ष 2026-27 का टैरिफ़ आदेश, याचिका संख्या 70/2025, आदेश दिनांक 6 मार्च 2026, उसी आदेश का अध्याय 3: बिक्री का अनुमान, बिजली ख़रीद की लागत, तालिका 3.25 और 3.28, और आयोग के निर्देश, उसी आदेश का अध्याय 5: निर्देश, कंडी क्षेत्र के मिश्रित कृषि फ़ीडरों के विभाजन और एपी मीटरिंग पर, उसी आदेश का अध्याय 6: वित्त वर्ष 2026-27 की वार्षिक राजस्व आवश्यकता, संचयी अधिशेष और आपूर्ति की औसत लागत, द इंडियन एक्सप्रेस, राखी जग्गा, 13 सितंबर 2026: 12 सितंबर की शाम साढ़े चार बजे से कटौती, 16,519 मेगावाट की चरम माँग, और नाभा व तलवंडी साबो की एक-एक इकाई का बंद होना, द इंडियन एक्सप्रेस, प्रत्यूष दीप, 13 सितंबर 2026: सितंबर में 269 गीगावाट की चरम माँग, आईईएक्स के रोहित बजाज के दिए वास्तविक समय बाज़ार के भाव, और जल विद्युत में गिरावट, द ट्रिब्यून, 7 सितंबर 2026: केंद्रीय क्षेत्र से पंजाब के हिस्से में 1,193 मेगावाट की कमी और राजपुरा की घटी उपलब्धता, द ट्रिब्यून, 13 सितंबर 2026: बिजली मंत्री तरुनप्रीत सिंह सोंद का बयान, केंद्रीय पूल से 1,051 मेगावाट कम मिलने और निजी संयंत्रों की आपूर्ति पर, द ट्रिब्यून, 8 सितंबर 2026: मंडी गोबिंदगढ़, लुधियाना और बठिंडा से कटौती की रिपोर्ट, 3 सितंबर की 16,343 मेगावाट माँग और 31 लाख यूनिट की कमी, द ट्रिब्यून, 7 सितंबर 2026: पीएसईबी इंजीनियर्स असोसिएशन का मुख्यमंत्री को पत्र, राजस्व की कमी और बैंकिंग व्यवस्था पर, द ट्रिब्यून, 14 जुलाई 2026: 17,328 मेगावाट की रिकॉर्ड माँग बिना कटौती पूरी होने का दावा और खेती को आठ घंटे आपूर्ति का वादा, द हिंदू, 13 सितंबर 2026: तमिलनाडु के मंत्री के. ए. सेनगोट्टैयन का बयान और दिन की सौर बिजली रात के लिए जमा करने की योजना, लार्सन एंड टुब्रो की विज्ञप्ति, 16 फ़रवरी 2026: नाभा पावर लिमिटेड की पूरी हिस्सेदारी टॉरेंट पावर को बेचने का समझौता