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पंजाब की भूजल दर 152.22 फ़ीसदी पर आई, और पानी पिछली बार से ज़्यादा निकला

सोमवार, 31 अगस्त को चंडीगढ़ के पंजाब भवन में जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने कहा कि दशकों में पहली बार राज्य के भूजल की हालत सुधरी है: खिंचाई की दर 164 से घटकर 152.22 फ़ीसदी, अति-दोहित ब्लॉक 117 से 110, सुरक्षित ब्लॉक 17 से 20। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अपने 2025 के आकलन में पंजाब से निकाला गया पानी 26.27 अरब घनमीटर था। 2026 के आकलन में वह 26.32 है।

बटाला के पास पानी भरे खेतों में रोपा हुआ धान, उससे आगे हरा खड़ा धान और क्षितिज पर गाँव, यह तस्वीर 5 जुलाई 2026 की है; पंजाब से निकाले गए 26.32 अरब घनमीटर भूजल में से 24.95 सिंचाई के खाते में दर्ज है, और सिंचाई का सबसे बड़ा ग्राहक यही फ़सल है
तस्वीर: Rohitjahnavi, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

सोमवार, 31 अगस्त को चंडीगढ़ के पंजाब भवन में जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने पत्रकारों को सात आँकड़े दिए। पंजाब में भूजल की खिंचाई की दर 164 फ़ीसदी से घटकर 152.22 फ़ीसदी हो गई है। अति-दोहित ब्लॉक 117 से घटकर 110 रह गए हैं। सुरक्षित ब्लॉक 17 से बढ़कर 20 हुए हैं। 153 में से 109 ब्लॉकों में सुधार दर्ज है। सालाना निकासी 28.02 अरब घनमीटर से घटकर 26.32 रह गई है। नहर के पानी का इस्तेमाल 26 फ़ीसदी से बढ़कर 82 फ़ीसदी हो गया है। सिंचाई के ढाँचे पर 7,500 करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं।

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के 2025 के आकलन में पंजाब से निकाला गया पानी 26.27 अरब घनमीटर दर्ज है।

2026 का आँकड़ा 26.32 है। दोनों एक ही सालाना क़वायद से निकले हैं, एक ही पद्धति से, और दोनों में से बड़ा आँकड़ा नया वाला है। खिंचाई की दर फिर भी 156.36 से गिरकर 152.22 फ़ीसदी हो गई, क्योंकि वह दर एक अनुपात है और उसका हर भी बदला है।

दो बातें साथ-साथ सच हैं। पंजाब की खिंचाई की दर 2022 के बाद हर आकलन में गिरी है। और पंजाब आज भी हर साल उतना पानी निकाल रहा है जितना उसके निकालने लायक़ सालाना हिस्से से डेढ़ गुना है।

राज्य-स्तरीय समिति, आईआईटी का सॉफ़्टवेयर और सालाना चक्र

डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट कोई एक दफ़्तर अकेले नहीं करता। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड और राज्य का नोडल भूजल विभाग इसे मिलकर करते हैं, हर राज्य की अपनी राज्य-स्तरीय समिति की देखरेख में, और ऊपर से केंद्रीय स्तर के विशेषज्ञ समूह की निगरानी में। पंजाब की समिति में दस सदस्य हैं और उसकी अध्यक्षता जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव कृष्ण कुमार करते हैं; यह ब्योरा 31 अगस्त को द ट्रिब्यून में रुचिका खन्ना ने छापा था।

गणना का काम काग़ज़ पर नहीं होता। बोर्ड ने आईआईटी हैदराबाद के साथ एक समझौते के तहत "इंडिया ग्राउंडवाटर रिसोर्स एस्टिमेशन सिस्टम" नाम का वेब ऐप्लिकेशन बनाया है, जिसे इन-ग्रेस कहते हैं। आँकड़े उसी में भरे जाते हैं, अंतिम गणना राज्य के स्तर पर होती है, और दोनों समितियों की मंज़ूरी के बाद नतीजे सार्वजनिक होते हैं। 2020 से 2025 तक के सब आकलन इसी सॉफ़्टवेयर से हुए हैं।

पंजाब में 153 आकलन इकाइयाँ हैं: 150 ब्लॉक और तीन शहरी क्षेत्र। राज्य का पुनर्भरण-योग्य क्षेत्रफल 50.18 हज़ार वर्ग किलोमीटर है।

एक बात जो 31 अगस्त की ख़बरों में नहीं आई। बोर्ड का 2025 वाला राष्ट्रीय संकलन नवंबर 2025 में फ़रीदाबाद से निकला था; 2026 वाला अभी छपा नहीं है, इसलिए 152.22 फ़ीसदी का आँकड़ा अभी राज्य की समिति के आकलन का है। बोर्ड ने पंजाब के बारे में जो आख़िरी आँकड़ा संसद को दिया, वह 22 जुलाई 2026 को राज्यसभा में था, और वह 156.36 फ़ीसदी था। सरकारी काग़ज़ों में पंजाब की अति-खिंचाई कहीं 52 फ़ीसदी लिखी मिलती है और कहीं 56 फ़ीसदी; ये दो अलग आकलन-वर्षों के आँकड़े हैं, 2026 और 2025 के, और आपस में टकराते नहीं।

खिंचाई की दर का फ़ॉर्मूला और चार श्रेणियाँ

जीईसी-2015 की रिपोर्ट, जो जल संसाधन मंत्रालय ने अक्टूबर 2017 में जारी की थी, इस पूरी क़वायद की नियम-पुस्तिका है। उसका अनुभाग 5.6.1.12 खिंचाई की दर को इस तरह परिभाषित करता है: सब कामों के लिए निकाला गया कुल भूजल, बँटा हुआ सालाना निकालने लायक़ भूजल संसाधन से, गुणा सौ। ऊपर वाली रक़म में सिंचाई, घरेलू इस्तेमाल और उद्योग तीनों जुड़े होते हैं।

हर पर ग़ौर कीजिए। वह सालाना पुनर्भरण नहीं है। पुनर्भरण में से पहले एक हिस्सा काटा जाता है, जिसे प्राकृतिक निकास कहते हैं। जीईसी-2015 का अनुभाग 5.6.1.10 इसकी वजह बताता है: कुल पुनर्भरण को इंसानी इस्तेमाल के लिए नहीं खोला जा सकता, क्योंकि पहले पारिस्थितिक ज़िम्मेदारियाँ पूरी होनी हैं, और 2012 की राष्ट्रीय जल नीति नदियों के पारिस्थितिक प्रवाह को बनाए रखने पर ज़ोर देती है। जहाँ नदी के स्तर के आँकड़े नहीं हैं, वहाँ यह कटौती पुनर्भरण की 5 या 10 फ़ीसदी मान ली जाती है: जलस्तर के उतार-चढ़ाव वाली विधि से गणना हुई हो तो 5 फ़ीसदी, बारिश के अंतःस्रवण गुणांक वाली विधि से हुई हो तो 10 फ़ीसदी।

पंजाब में यह कटौती दस फ़ीसदी के आसपास बैठती है। 2026 के आकलन में सालाना पुनर्भरण 19.14 अरब घनमीटर है और निकालने लायक़ संसाधन 17.29, यानी 1.85 अरब घनमीटर की कटौती, जो पुनर्भरण का 9.67 फ़ीसदी है।

यहीं से वह ग़लतफ़हमी पैदा होती है जो अख़बारों में बार-बार दिखती है। पंजाब 26.32 अरब घनमीटर निकालता है और उसका सालाना पुनर्भरण 19.14 है; इन दोनों का अनुपात 1.375 है, यानी वह भरने से 37.5 फ़ीसदी ज़्यादा खींचता है। 152.22 फ़ीसदी वाला आँकड़ा दूसरे हर पर बैठा है। वह निकालने लायक़ संसाधन से निकला है: 26.32 बँटा 17.29 बराबर 1.5223। जो रिपोर्टें कहती हैं कि पंजाब भरने से 52 फ़ीसदी ज़्यादा खींच रहा है, वे असल में निकालने लायक़ हिस्से की बात कर रही होती हैं। यह छोटा फ़र्क़ नहीं है: दोनों में क़रीब पंद्रह प्रतिशत अंक का अंतर है, और बीच में पड़ा 1.85 अरब घनमीटर वह पानी है जो नदियों और आर्द्रभूमियों के लिए अलग रखा गया माना जाता है।

वही तालिका दो और हिसाब लगाती है। पहला घरेलू ज़रूरत के लिए अलग रखा गया हिस्सा है, जो आबादी के घनत्व और पेयजल पर भूजल के भार से निकाला जाता है; पंजाब के लिए वह 1.16 अरब घनमीटर है। दूसरा "भविष्य के इस्तेमाल के लिए बची उपलब्धता" है, और पंजाब के आगे वह 1.86 अरब घनमीटर दर्ज है। 156 फ़ीसदी पर चल रहे राज्य के नाम के सामने यह रक़म अटपटी लगती है, और उसकी वजह पद्धति में लिखी है। बोर्ड की 2025 वाली किताब का अनुभाग 2.1.1.13 कहता है कि यह आँकड़ा कभी ऋणात्मक नहीं हो सकता, और ऋणात्मक निकलने पर उसे शून्य दर्ज कर दिया जाता है। पंजाब का 1.86 इसलिए उन्हीं इकाइयों का जोड़ है जिनके पास सचमुच कुछ बचा है; 110 अति-दोहित इकाइयाँ इस जोड़ में शून्य लेकर आती हैं।

चारों श्रेणियाँ इसी दर से तय होती हैं, और नियम एक ही पंक्ति का है। जीईसी-2015 का अनुभाग 5.6.1.14.1 कहता है: 70 फ़ीसदी तक सुरक्षित, 70 से ऊपर और 90 तक अर्ध-संकटग्रस्त, 90 से ऊपर और 100 तक संकटग्रस्त, 100 से ऊपर अति-दोहित। इसमें जलस्तर कहीं नहीं आता। किसी ब्लॉक का पानी कितना गहरा है, इससे उसकी श्रेणी नहीं बदलती; सिर्फ़ यह गिना जाता है कि उसने अपने हिस्से का कितने फ़ीसदी उठा लिया।

कुएँ के चबूतरे पर रखा जलस्तर नापने वाला साउंडर, फीते का चक्का और उस पर लगा डिजिटल काउंटर, यह तस्वीर स्पेन के मायोर्का की है जहाँ इसी से भूजल की निगरानी होती है; निगरानी कुओं का पानी ऐसे ही औज़ार से नापा जाता है और ऊपर की चारों श्रेणियों में वह नाप कहीं नहीं गिनी जाती
तस्वीर: Chixoy, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

पंजाब की 153 इकाइयों में से 110 इस समय सौ फ़ीसदी के ऊपर हैं। 6 संकटग्रस्त हैं, 17 अर्ध-संकटग्रस्त, और 20 सुरक्षित। बोर्ड की 2025 वाली किताब में पूरे देश में सिर्फ़ तीन राज्य सौ फ़ीसदी के ऊपर दर्ज हैं: हरियाणा, पंजाब और राजस्थान। देश की औसत दर 60.63 फ़ीसदी है।

2025 के मुक़ाबले पाँच करोड़ घनमीटर ज़्यादा

अनुपात दो तरह से गिर सकता है। या तो ऊपर वाली रक़म घटे, या नीचे वाली बढ़े। पंजाब में इस बार नीचे वाली बढ़ी।

बोर्ड के 2025 के आकलन में पंजाब का सालाना पुनर्भरण 18.60 अरब घनमीटर था, निकालने लायक़ संसाधन 16.80, और निकासी 26.27। 2026 के आकलन में पुनर्भरण 19.14 हो गया, निकालने लायक़ संसाधन 17.29, और निकासी 26.32। यानी हर 49 करोड़ घनमीटर बढ़ा और अंश 5 करोड़ घनमीटर।

अब दोनों को अलग-अलग चलाकर देखिए। अगर निकालने लायक़ संसाधन 16.80 पर ही रहता और निकासी 26.32 होती, तो दर 156.67 फ़ीसदी बैठती, जो पिछले बरस के 156.36 से ऊपर है। और अगर संसाधन 17.29 हो जाता पर निकासी 26.27 पर ही टिकी रहती, तो दर 151.94 फ़ीसदी होती, यानी असल आँकड़े से भी नीचे। दर में 4.14 प्रतिशत अंक की जो गिरावट दर्ज हुई है, वह पूरी की पूरी हर से आई है; अंश ने उसे 0.29 अंक वापस ऊपर धकेला है।

यह पंजाब के लिए नई बात है। बोर्ड की पंजाब वाली तथ्य-पुस्तिका में 2017 से 2025 तक की निकासी एक ही दिशा में चलती है: 35.78, 33.85, 28.02, 27.80, 27.66, 26.27। पाँच लगातार गिरावटों के बाद 2026 का आँकड़ा पहली बार ऊपर की तरफ़ मुड़ा है, और मुड़ने की मात्रा छोटी है।

मंत्री का 28.02 से 26.32 वाला जोड़ ग़लत नहीं है। वह 2022 के आकलन से 2026 के आकलन की तुलना है, और चार बरस में निकासी सचमुच 1.70 अरब घनमीटर घटी है। जो उस जोड़ में नहीं दिखता, वह यह है कि उन चार बरसों की पूरी गिरावट 2025 तक हो चुकी थी।

दरों की क़तार भी उसी तथ्य-पुस्तिका में है: 2017 में 165.77 फ़ीसदी, 2020 में 164.42, 2022 में 165.99, 2023 में 163.76, 2024 में 156.87, 2025 में 156.36, और राज्य के 2026 के आकलन में 152.22। इस क़तार में एक जगह मंत्री का आँकड़ा बैठता नहीं। उन्होंने 2022 की दर 164 फ़ीसदी बताई थी; बोर्ड की 2022 वाली किताब में वह 165.99 है, 164.42 फ़ीसदी 2020 का आँकड़ा है, और 163.76 फ़ीसदी 2023 का। बोर्ड की अपनी 2023 वाली किताब में एक पर्ची भी है: वह लिखती है कि दर 165.99 से "बढ़कर" 163.76 हुई, जबकि वह घटी थी।

पुनर्भरण में बारिश का हिस्सा 29 फ़ीसदी है

बोर्ड की 2025 वाली किताब के पन्ना 143 पर एक राज्यवार तालिका है जो पुनर्भरण को चार खानों में तोड़ती है: बारिश से और दूसरे स्रोतों से, मानसून में और ग़ैर-मानसून में। पंजाब की पंक्ति इस तरह है: 4.71, 8.76, 0.72, 4.39। जोड़ 18.60।

बारिश वाले दोनों खाने मिलाकर 5.43 अरब घनमीटर हैं, यानी पंजाब के कुल पुनर्भरण का 29 फ़ीसदी। बाक़ी 71 फ़ीसदी "दूसरे स्रोतों" से आता है। पूरे देश के लिए यह अनुपात उलटा है: बोर्ड की अपनी किताब कहती है कि देश के कुल सालाना भूजल पुनर्भरण का क़रीब 60 फ़ीसदी बारिश से आता है।

"दूसरे स्रोत" कोई रहस्य नहीं हैं। जीईसी-2015 के जल-संतुलन समीकरण में वे नाम लेकर गिने गए हैं: नहरों से रिसाव, सिंचाई के खेतों से लौटा पानी, तालाबों और झीलों से रिसाव, जल-संरक्षण ढाँचों से रिसाव, और बग़ल की इकाइयों से आता-जाता पानी। पंजाब के मामले में इनमें सबसे बड़े दो नहर का रिसाव और सिंचाई का लौटा पानी हैं।

सरहिंद के पास की एक छोटी नहर, दोनों किनारे कच्चे और दाईं ओर सटा हुआ खेत, यह तस्वीर दिसंबर 2016 की है; बारिश के अलावा जो 71 फ़ीसदी पुनर्भरण गिना जाता है उसमें ऐसे ही किनारों से नीचे उतरने वाला पानी शामिल है
तस्वीर: Satdeep Gill, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इस ढाँचे का एक सीधा असर है। जब पंजाब नहरों में ज़्यादा पानी छोड़ता है, तो नहरों और खेतों से रिसकर नीचे जाने वाला पानी बढ़ता है, इसलिए आकलन में "पुनर्भरण" का आँकड़ा बढ़ता है, इसलिए निकालने लायक़ संसाधन बढ़ता है, इसलिए खिंचाई की दर घटती है। ज़मीन के नीचे पानी सचमुच पहुँचा भी हो, तब भी यह पूरा रास्ता गणित के भीतर से गुज़रता है और किसी कुएँ के जलस्तर को नापे बिना पूरा हो जाता है।

लोकसभा के जवाब में पंजाब के 174 कुएँ

18 दिसंबर 2025 को जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर दिया। उसके अनुलग्नक तीन में हर राज्य के लिए एक तालिका है जो मानसून-बाद 2024 के जलस्तर को पिछले पाँच बरसों के, यानी 2019 से 2023 के, मानसून-बाद औसत से मिलाती है।

पंजाब की पंक्ति में कुल 174 कुएँ हैं। इनमें 56 कुओं का जलस्तर ऊपर आया है और 117 का नीचे गया है। फ़ीसदी में यह 32.2 और 67.2 है। पूरे देश के लिए उसी तालिका की आख़िरी पंक्ति 13,205 कुएँ गिनती है, जिनमें 7,177 यानी 54.4 फ़ीसदी में उठाव दर्ज है। पड़ोसी हरियाणा के 163 कुओं में से 79 ऊपर हैं और 84 नीचे। पंजाब में गिरने वाले कुओं में से 13 ऐसे हैं जहाँ गिरावट चार मीटर से ज़्यादा है।

बोर्ड की 2025 वाली किताब भी यही बात दूसरे शब्दों में लिखती है। दस बरस के औसत से तुलना करने वाले उसके दोनों अनुभागों में, मानसून से पहले और बाद दोनों में, पंजाब उन राज्यों की सूची में है जहाँ जलस्तर गिरा है।

द इंडियन एक्सप्रेस ने 14 सितंबर को बोर्ड के मानसून-बाद के आँकड़ों को 2022 से 2025 तक जोड़कर देखा। बीस मीटर या उससे गहरे कुओं का हिस्सा 2022 के 34.5 फ़ीसदी से घटकर 2025 में 32.2 हो गया। पर चालीस मीटर से गहरे कुओं का हिस्सा उसी दौरान 7.3 से बढ़कर 9 फ़ीसदी हुआ, जो चारों बरसों में सबसे ऊँचा है; गिनती में यह 267 निगरानी कुओं में से 24 है। ज़िलेवार, संगरूर में चालीस मीटर से गहरे कुओं का हिस्सा 2022 के 46.2 फ़ीसदी से बढ़कर 2025 में सौ फ़ीसदी हो गया, और मोगा में 10 से बढ़कर 40।

श्रेणी बदलने और जलस्तर गिरने का फ़र्क़

जीईसी-2015 इस टकराव से अनजान नहीं है। उसका अनुभाग 5.6.1.13 खिंचाई की दर को "अंतर्निहित अनिश्चितताओं" वाला बताता है और कहता है कि उसे कम से कम दस बरस के जलस्तर रुझान से जाँचना चाहिए, मानसून से पहले और बाद दोनों का।

पर जाँच का जाल सिर्फ़ दो सिरों पर बिछा है। रिपोर्ट की बेमेल-तालिका में केवल दो हालतें दर्ज हैं जिनमें दोबारा गणना ज़रूरी है: जब दर 70 फ़ीसदी से कम हो पर जलस्तर दोनों मौसमों में साफ़ गिर रहा हो, और जब दर सौ फ़ीसदी से ऊपर हो पर जलस्तर दोनों मौसमों में साफ़ न गिर रहा हो। इन दोनों के बीच जो कुछ है, उस पर यह जाँच लागू नहीं होती। और आगे रिपोर्ट यह भी जोड़ती है कि अगर दोबारा गणना के बाद भी बेमेल बनी रहे, तो इकाई की श्रेणी फिर भी खिंचाई की दर से ही तय होगी; बस उसे निगरानी कुओं का जाल मज़बूत करने के लिए चिह्नित कर दिया जाएगा।

फ़िरोज़पुर का मखू ब्लॉक इसका साफ़ नमूना है। बोर्ड की 2025 वाली किताब के पन्ना 437 पर मखू "बिगड़ी हुई" इकाइयों की सूची में है: 2024 में उसकी दर 58.34 फ़ीसदी थी और श्रेणी सुरक्षित, 2025 में दर 77.85 हो गई और श्रेणी अर्ध-संकटग्रस्त। 2026 के आकलन में वह 66.82 फ़ीसदी पर आया है। ब्लॉक अपनी 2024 वाली सुरक्षित श्रेणी में लौट आया है और अपने 2024 वाले आँकड़े से साढ़े आठ अंक ऊपर बैठा है।

फ़ाज़िल्का का अर्निवाला शेख़ सुबानपुर 2025 में अर्ध-संकटग्रस्त था; 2026 के आकलन में उसकी दर 73.34 से घटकर 64.38 फ़ीसदी हुई और वह सुरक्षित श्रेणी में आ गया। पूरे राज्य में 153 में से 109 इकाइयों की दर इस बार गिरी है और श्रेणी सिर्फ़ 14 की बदली है। मंत्री के "109 ब्लॉकों में सुधार" का मतलब पहली गिनती है, यानी वे ब्लॉक जिनकी दर गिरी।

बचे हुए सालों का हिसाब और उसका स्रोत

पंजाब का पानी कितने साल चलेगा, यह सवाल हर रिपोर्ट के साथ लौटता है। जिस आकलन से 152.22 फ़ीसदी निकला है, वह यह हिसाब लगाता ही नहीं।

वजह उसके नाम में है। वह गतिशील संसाधन का आकलन है, यानी उसी पानी का जो जलस्तर के उतार-चढ़ाव वाले क्षेत्र में रहता है और हर बरस भरता है। उसके नीचे पड़े स्थिर संसाधन पर जीईसी-2015 का अनुभाग 3.2.15 एक ही वाक्य में फ़ैसला सुना देता है: "यह हर बरस नहीं भरता और इस पानी को निकालना भूजल-खनन है।" उसी रिपोर्ट का अनुभाग 4.3.6 जोड़ता है कि जब तक दोनों संसाधनों का आकलन नहीं होता, अति-दोहित इलाक़ों में खनन के असर का जवाब नहीं दिया जा सकता। पंजाब के लिए वह स्थिर आँकड़ा किसी राष्ट्रीय संकलन में नहीं है।

बचे हुए सालों की जो दो गिनतियाँ चलन में हैं, उनका स्रोत भी सरकारी प्रकाशन नहीं है। 17 साल वाली बात एनजीटी की निगरानी समिति के अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) जसबीर सिंह ने मई 2022 में कही थी, और 22 साल वाली बोर्ड की एक रिपोर्ट के हवाले से चलती है जिसका शीर्षक सार्वजनिक सूची में नहीं मिलता।

धान का रकबा, ट्यूबवेल और मुफ़्त बिजली

समीकरण का दूसरा सिरा खेत में है। पंजाब में निकाले गए 26.32 अरब घनमीटर में से 24.95 सिंचाई का है, और सिंचाई का सबसे बड़ा ग्राहक धान है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की "पैकेज ऑफ़ प्रैक्टिसेज़ फ़ॉर क्रॉप्स ऑफ़ पंजाब, ख़रीफ़ 2026" का पहला ही पन्ना यह आँकड़ा देता है: 2024-25 में धान 32.43 लाख हेक्टेयर पर था, पैदावार 216.31 लाख टन, और औसत उपज 66.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। उसी किताब की चेतावनियों में पूसा 44, पीली पूसा और डोगर पूसा से बचने को कहा गया है, क्योंकि इन क़िस्मों को 15 से 20 फ़ीसदी ज़्यादा पानी चाहिए और दो अतिरिक्त छिड़काव भी।

बोर्ड इस बारे में चुप नहीं है। पंजाब की दिसंबर 2024 वाली तथ्य-पुस्तिका की सिफ़ारिशों में एक वाक्य सीधा राज्य सरकार को संबोधित है: राज्य किसानों को दी जाने वाली मुफ़्त या रियायती बिजली की नीति की समीक्षा करे, पानी की क़ीमत तय करने की नीति लाए, और भूजल पर निर्भरता घटाने के लिए फ़सल-चक्र तथा विविधीकरण की दिशा में और काम करे। उसी सूची में धान की जगह मक्का, सूरजमुखी, कपास और गर्मी की मूँग को बढ़ावा देने की बात है।

धान का यह रकबा एक बरस की बात नहीं है। पंजाब के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की तालिका 10 में उसका हिस्सा दशक-दर-दशक दर्ज है: कुल बोए गए रकबे का 4.8 फ़ीसदी 1960-61 में, 17.5 फ़ीसदी 1980-81 में, 26.9 फ़ीसदी 1990-91 में, और 41.7 फ़ीसदी 2024-25 में।

यह पानी कितनी मशीनों से उठता है, इसका जवाब एक ही किताब में दो बार अलग-अलग मिलता है। पंजाब के सांख्यिकीय सार 2026-27 की तालिका 8.9, जिसका स्रोत पीएसपीसीएल है, 31 मार्च 2025 तक खेती के 13,92,176 ऊर्जित कनेक्शन गिनाती है। उसी सार की तालिका 6.4, जिसका स्रोत कृषि निदेशक हैं, 2024-25 के लिए 14.09 लाख बिजली वाले ट्यूबवेल गिनाती है और उनके साथ 1.40 लाख डीज़ल वाले, कुल 15.49 लाख। एक प्रकाशन, एक बरस, दो विभाग, दो गिनतियाँ। छठी लघु सिंचाई गणना, जिसका संदर्भ वर्ष 2017-18 है, इतना और जोड़ती है कि देश में गहरे ट्यूबवेलों के मामले में पंजाब पहले नंबर पर है।

रूपनगर ज़िले के रोलू माजरा में एक ट्यूबवेल का कोठा, बाहर निकली डिलीवरी पाइप और पक्का खाल, पीछे जुता खेत और बिजली के खंभे, यह तस्वीर जून 2014 की है; सिंचाई में जाने वाला 24.95 अरब घनमीटर भूजल ऐसी ही मशीनों से नीचे से उठता है
तस्वीर: baljinder kang, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

खेती के पंपों को मुफ़्त बिजली 14 फ़रवरी 1997 से मिल रही है। पीएसईआरसी के 2002-03 वाले टैरिफ़ आदेश का तीसरा अध्याय यह तारीख़ तीन अलग जगहों पर दोहराता है: एक बार अपने शब्दों में, एक बार पीएसईबी के हवाले से, और एक बार मार्च 2002 के पंजाब श्वेत-पत्र के हवाले से। किस सरकार ने यह फ़ैसला किया, यह इनमें से किसी काग़ज़ में दर्ज नहीं है।

उस बिजली का बिल कितना है, इसके दो सरकारी आँकड़े दो दिन के फ़ासले पर आए हैं। पीएसईआरसी ने 6 मार्च 2026 के टैरिफ़ आदेश में 2026-27 के लिए खेती के पंपों की सब्सिडी 8,781.77 करोड़ रुपये तय की, जो 16,323 मिलियन यूनिट को 5.38 रुपये प्रति यूनिट से गुणा करके निकली है; यह छठे अध्याय की तालिका 6.5 में है। 8 मार्च को पेश हुए राज्य बजट के भाषण का पैराग्राफ़ 47 इसी मद पर, "किसानों को मुफ़्त बिजली" शीर्षक के नीचे, 7,715 करोड़ रुपये रखता है। एक ही पखवाड़े के दो सरकारी काग़ज़ों में क़रीब 1,067 करोड़ रुपये का फ़र्क़ है।

आयोग ने बक़ाया भी गिना है। 2025-26 के लिए देय सब्सिडी उसने 29,986.70 करोड़ रुपये तय की थी। 26 फ़रवरी 2026 तक 18,877 करोड़ जारी हुए, और 31 मार्च 2026 पर 11,109.70 करोड़ रुपये की कमी बाक़ी रही।

सरकार ने खपत घटाने का जो रास्ता चुना है, वह धान के भीतर ही है। कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां ने 19 जुलाई को बताया कि ख़रीफ़ 2026 में सीधी बुवाई का रकबा 4 लाख एकड़ के पार गया, जो पिछले बरस के 2.94 लाख एकड़ से 36 फ़ीसदी ज़्यादा है, और 31,478 किसानों ने इसके लिए पंजीकरण कराया। 4 लाख एकड़ क़रीब 1.62 लाख हेक्टेयर है, यानी धान के कुल रकबे का लगभग बीसवाँ हिस्सा।

बिजली का दूसरा सिरा इसी अख़बार ने 14 सितंबर के अंक में पंजाब के बिजलीघरों और मिले-जुले फ़ीडरों पर खोला था, जहाँ कटौती का क्रम और खेती के फ़ीडरों की हालत दर्ज है।

नहर के पानी का दावा और उसका सबूत

राज्य सरकार का पूरा दावा एक ही वाक्य पर टिका है: नहर का पानी टेल तक पहुँचा, इसलिए ट्यूबवेल कम चले। यह दावा जितनी बार दोहराया गया है, उतनी बार अलग आँकड़े के साथ आया है।

31 अगस्त को गोयल ने नहर के पानी का इस्तेमाल 26 फ़ीसदी से बढ़कर 82 फ़ीसदी बताया। 9 मई 2026 को बाबूशाही पर छपी एक ख़बर में, जिसमें गोयल का ही बयान है, शुरुआती आँकड़ा 26.5 फ़ीसदी है और मौजूदा हालत "लक्ष्य का क़रीब 78 फ़ीसदी"। और 18 मई 2024 को द ट्रिब्यून में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा था: "जब मैंने शपथ ली, राज्य में सतही पानी की आपूर्ति 21 फ़ीसदी पर थी, इस वक़्त 59 फ़ीसदी पानी नहर की व्यवस्था से जा रहा है। धान का मौसम ख़त्म होने तक, अक्टूबर तक, यह 70 फ़ीसदी हो जाएगा।" शुरुआती बिंदु ही तीन जगह तीन तरह का है: 21, 26 और 26.5। और किस चीज़ का फ़ीसदी है, यह किसी बयान में नहीं लिखा: बोए गए रकबे का, सिंचित रकबे का, नहरों में छोड़े गए पानी का, या मंज़ूर किए गए मोघों का।

जो ब्योरा ठोस है, वह छोटा है और एक ज़िले का है। 9 मई की उसी ख़बर में रोपड़ की नहर-व्यवस्था का रकबा 29,488 एकड़ से बढ़कर 89,329 एकड़ बताया गया, और रुड़का, पंडोरी तथा जंगपुरा समेत चौदह गाँवों के नाम गिनाए गए जहाँ क़रीब चार दशक बाद नहर का पानी पहुँचा। मंत्री ने इसका श्रेय लिफ़्ट सिंचाई योजनाओं के पुनरुद्धार को दिया।

नहर के पानी और भूजल के बीच का रिश्ता एक-तरफ़ा भी नहीं है। जैसा ऊपर दिखा, नहर से रिसने वाला पानी आकलन में पुनर्भरण की तरफ़ जुड़ता है, इसलिए नहरें ट्यूबवेल की जगह भी लेती हैं और हर को बड़ा भी करती हैं। दोनों असर एक ही दिशा में दर्ज होते हैं और आकलन की तालिका में अलग-अलग नहीं दिखते। जो चीज़ दोनों को अलग कर सकती है, वह निगरानी कुओं का जलस्तर है, और 18 दिसंबर 2025 के संसदीय जवाब में वह 174 में से 117 कुओं पर नीचे है।

स्रोतकेंद्रीय भूमि जल बोर्ड, जल शक्ति मंत्रालय: नेशनल कंपाइलेशन ऑन डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज़ ऑफ़ इंडिया, 2025, फ़रीदाबाद, नवंबर 2025 — अध्याय 2 की पद्धति, अनुभाग 7.20 का पंजाब अध्याय, और पन्ना 143 की राज्यवार तालिका, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड: डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज़ ऐंड ग्राउंड वाटर क्वालिटी ऑफ़ पंजाब, 2024, दिसंबर 2024 — 2017 से 2024 तक के पाँच आकलनों की तुलना-तालिका और बोर्ड की सिफ़ारिशें, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड: डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज़ ऑफ़ इंडिया, 2022, फ़रीदाबाद, अक्टूबर 2022 — अनुभाग 7.21 में पंजाब की दर 165.99 फ़ीसदी, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड: डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज़ ऑफ़ इंडिया, 2023, फ़रीदाबाद, सितंबर 2023 — अनुभाग 7.20, दर 163.76 फ़ीसदी, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड: डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज़ ऑफ़ इंडिया, 2024, फ़रीदाबाद, दिसंबर 2024 — अनुभाग 7.20, दर 156.87 फ़ीसदी और 115 अति-दोहित इकाइयाँ, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय: भूजल संसाधन आकलन समिति (जीईसी-2015) की रिपोर्ट, नई दिल्ली, अक्टूबर 2017 — अनुभाग 5.6.1.10, 5.6.1.12, 5.6.1.13, 5.6.1.14.1, 3.2.15 और 4.3.6, पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 18 दिसंबर 2025: लोकसभा में राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी का लिखित उत्तर, अनुलग्नक एक की राज्यवार संसाधन तालिका और अनुलग्नक तीन की जलस्तर तालिका, पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 15 दिसंबर 2025: राज्यसभा में भूजल की कमी, अति-दोहन और गुणवत्ता निगरानी पर लिखित उत्तर, द इंडियन एक्सप्रेस, चंडीगढ़, 14 सितंबर 2026: कम अति-दोहित ब्लॉकों के बावजूद गहराते जलस्तर, और 2022 से 2025 तक मानसून-बाद के आँकड़ों का ज़िलेवार विश्लेषण, द ट्रिब्यून, रुचिका खन्ना, 31 अगस्त 2026: 2026 के आकलन के आँकड़े, दस सदस्यों की राज्य समिति, और श्रेणी बदलने वाले ब्लॉकों के नाम, द ट्रिब्यून, 22 जुलाई 2026: राज्यसभा में जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल का उत्तर, पंजाब की दर 156.36 फ़ीसदी और 111 अति-दोहित इकाइयाँ, डाउन टू अर्थ: पंजाब के 2026 आकलन की श्रेणीवार गिनती, सिंचाई की 24.95 अरब घनमीटर खपत और राज्य समिति का ब्योरा, डीएनपी इंडिया, 31 अगस्त 2026: पंजाब भवन में बरिंदर कुमार गोयल की प्रेस वार्ता का पूरा ब्योरा, 28.02 से 26.32 अरब घनमीटर, नहर के पानी का 26 से 82 फ़ीसदी और 7,500 करोड़ रुपये, पंजाब राज्य विद्युत विनियामक आयोग: वित्त वर्ष 2026-27 का टैरिफ़ आदेश, 6 मार्च 2026, अध्याय 6 — तालिका 6.5 में खेती के पंपों की सब्सिडी 8,781.77 करोड़ रुपये (मुद्रित पृष्ठ 233), और पृष्ठ 231 पर 2025-26 की सब्सिडी का 11,109.70 करोड़ रुपये का बक़ाया, पंजाब राज्य विद्युत विनियामक आयोग: 2002-03 का टैरिफ़ आदेश, अध्याय 3 — खेती के पंपों को मुफ़्त बिजली की शुरुआत की तारीख़ 14 फ़रवरी 1997, तीन जगह दर्ज (§3.3(d), §3.4(a) में पीएसईबी के हवाले से, §3.4(b) में मार्च 2002 के पंजाब श्वेत-पत्र के हवाले से), पंजाब सरकार, वित्त विभाग: बजट भाषण 2026-27, 8 मार्च 2026, पैराग्राफ़ 47 (मुद्रित पृष्ठ 16) — 'किसानों को मुफ़्त बिजली' मद पर 7,715 करोड़ रुपये; आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की तालिका 10 (मुद्रित पृष्ठ 224) — 1960-61 से 2024-25 तक धान के रकबे का हिस्सा; पंजाब का सांख्यिकीय सार 2026-27, तालिका 8.9 (पीएसपीसीएल) और तालिका 6.4 (कृषि निदेशक) के ट्यूबवेल आँकड़े, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना: पैकेज ऑफ़ प्रैक्टिसेज़ फ़ॉर क्रॉप्स ऑफ़ पंजाब, ख़रीफ़ 2026, खंड 43, अंक 1, मार्च 2026 — धान का रकबा, पैदावार, क़िस्मों की चेतावनी और नर्सरी-रोपाई की तारीख़ें, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 19 जुलाई 2026: कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के हवाले से ख़रीफ़ 2026 में सीधी बुवाई का रकबा 4 लाख एकड़ और 31,478 पंजीकृत किसान, पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 26 अगस्त 2023: छठी लघु सिंचाई गणना की रिपोर्ट, संदर्भ वर्ष 2017-18 — गहरे ट्यूबवेलों में पंजाब पहले नंबर पर, बाबूशाही, चंडीगढ़, 9 मई 2026: रोपड़ की नहर-व्यवस्था का रकबा, नंगल तहसील का 1,539 एकड़, चौदह गाँवों के नाम और बरिंदर कुमार गोयल का बयान, द ट्रिब्यून, 18 मई 2024: मुख्यमंत्री भगवंत मान का बयान कि सतही पानी की आपूर्ति 21 से बढ़कर 59 फ़ीसदी हुई और अक्टूबर तक 70 फ़ीसदी होगी, द ट्रिब्यून, जालंधर, 20 मई 2022: एनजीटी की निगरानी समिति के अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) जसबीर सिंह का 17 साल वाला बयान

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