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ट्रांसजेंडर पहचान का क़ानून बदला, सुप्रीम कोर्ट ने कहा: पुराने अधिकार सुरक्षित रहेंगे

3 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की तीन-जजों की बेंच ने मौखिक तौर पर कहा कि ट्रांसजेंडर पहचान क़ानून में हुआ बदलाव पहले दिए गए अधिकार नहीं छीन सकता, पर कोई लिखित आदेश नहीं दिया। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई में आई जो मार्च 2026 के संशोधन को चुनौती देती है, जिसने स्वयं-अनुभूत लैंगिक पहचान का अधिकार क़ानून से हटाकर उसकी जगह मेडिकल बोर्ड की सिफ़ारिश ज़रूरी कर दी है।

सुप्रीम कोर्ट की इमारत के भीतर का एक हिस्सा, सितंबर 2019 में ली गई तस्वीर। इसी परिसर की किसी अदालत में 3 अगस्त 2026 को यह सुनवाई हुई थी
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सोमवार, 3 अगस्त 2026 की सुबह सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जज से कहा, "यह कोई अर्जेंट मामला नहीं है। यह कोई राशन कार्ड नहीं है कि आपको खाना नहीं मिल रहा।" जवाब में जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि क़ानून भले बदल जाए, जो अधिकार पहले ही मिल चुका है, वह नहीं छिनेगा।

यह टिप्पणी मौखिक थी। बेंच ने उस दिन कोई लिखित आदेश नहीं दिया।

बहस का विषय था ट्रांसजेंडर पर्संस (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) अमेंडमेंट ऐक्ट, 2026, यानी वह क़ानून जिसने मार्च में मूल 2019 के क़ानून की एक उपधारा हटा दी। उस उपधारा ने हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान ख़ुद तय करने का हक़ दिया था। जिनके पास पहले से पहचान कार्ड हैं, उनका अब क्या होगा? नए आवेदन किस प्रक्रिया से गुज़रेंगे? और 2014 के नालसा फ़ैसले का, जिसने यह हक़ पहली बार दिया था, इस बदलाव से क्या रिश्ता है? यह लेख इन सवालों को दस्तावेज़ों से खोलता है: गजट की मूल प्रति, 2019 के क़ानून और 2020 के नियमों का पाठ, चार सुनवाइयों की अदालती रिपोर्टें।

धारा 4(2): क़ानून से हटाई गई एक उपधारा

2019 के ट्रांसजेंडर पर्संस (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) ऐक्ट की धारा 4 में दो उपधाराएँ थीं। पहली में लिखा था कि हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता पाने का हक़ है। दूसरी, यानी धारा 4(2), आगे कहती थी: "उपधारा (1) के तहत ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता पाए व्यक्ति को अपनी स्वयं-अनुभूत लैंगिक पहचान का अधिकार होगा।" यही एक पंक्ति पूरे क़ानून की बुनियाद थी। इसी के सहारे कोई व्यक्ति बिना मेडिकल जाँच के अपनी पहचान दर्ज करा सकता था।

झारखंड सरकार के राजपत्र का एक पन्ना, जुलाई 2025 का, ट्रांसजेंडर क़ानून से जुड़ा नहीं। असली केंद्रीय गजट अधिसूचना जैसी दिखती है, वैसा एक नमूना दिखाने के लिए इस्तेमाल किया गया
तस्वीर: Jharkhand Government Press, Government of Jharkhand, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

13 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश हुए बिल नंबर 79 की धारा 3 सीधी है: "मूल क़ानून की धारा 4 की उपधारा (2) हटाई जाएगी।" न इससे ज़्यादा, न कम। लोकसभा ने इसे 24 मार्च को पास किया, राज्यसभा ने 25 मार्च को। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक़ राष्ट्रपति की मंज़ूरी 31 मार्च को मिली; कुछ अन्य रिपोर्टों में यह तारीख़ 30 मार्च दर्ज है। असली गजट अधिसूचना अलग से जाँची नहीं जा सकी, इसलिए यह एक दिन का फ़र्क़ यहीं दर्ज है, सुलझाया नहीं गया।

इसी बिल की धारा 2 ने एक और बदलाव किया। मूल क़ानून की धारा 2(k) में "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा अब सिर्फ़ किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोगों, या जन्म से इंटरसेक्स विविधता वाले लोगों तक सीमित है। नई परिभाषा के आख़िर में एक शर्त जुड़ी है: इसमें "अलग यौन रुझान और स्वयं-अनुभूत यौन पहचान" वाले लोग शामिल नहीं माने जाएँगे। यानी सिर्फ़ हक़ हटा नहीं, दायरा भी सिकोड़ा गया है।

बिल में एक नया शब्द भी जुड़ा: "अथॉरिटी।" धारा 2 के तहत यह एक मेडिकल बोर्ड है, जिसका मुखिया कोई चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर या डिप्टी चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर होगा; केंद्र, राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की सरकार इसे नियुक्त करेगी। यही बोर्ड अब पहचान प्रमाणपत्र के लिए ज़रूरी है। धारा 4(2) की जो एक पंक्ति हक़ देती थी, उसकी जगह अब यह बोर्ड आ गया है। हक़ की जगह अब मंज़ूरी है।

2020 के नियमों में दर्ज असली प्रक्रिया

मीडिया में अक्सर यह लिखा गया कि 2019 का क़ानून सिर्फ़ एक हलफ़नामे के आधार पर पहचान दर्ज कर देता था। यह पूरी तरह सही नहीं है। 2020 के नियमों का नियम 4 कहता है कि ज़िलाधिकारी आवेदन, हलफ़नामे और सरकारी अस्पताल के किसी मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे बढ़ेगा। नियम में साफ़ लिखा है कि यह जाँच "बिना किसी मेडिकल जाँच के" होगी, सिवाय उस स्थिति के जब कोई सर्जरी के बाद संशोधित प्रमाणपत्र माँगे।

पुणे ज़िला कलेक्टर कार्यालय की इमारत, मार्च 2023 की तस्वीर। पहचान प्रमाणपत्र के लिए आवेदन देश भर में ऐसे ही ज़िलाधिकारी कार्यालयों में जाता है
तस्वीर: DesiBoy101, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

आवेदक को नियम 3 के तहत फ़ॉर्म-1 में आवेदन देना होता था, फ़ॉर्म-2 में हलफ़नामा जोड़ना होता था, और ज़िलाधिकारी के इलाक़े में लगातार एक साल से रहना साबित करना होता था। स्वीकृति के बाद प्रमाणपत्र फ़ॉर्म-3 में, 60 दिन के भीतर मिलना था। साथ ही ज़िलाधिकारी फ़ॉर्म-5 में पहचान कार्ड भी जारी करता था।

2026 के संशोधन ने इसी धारा 6 में एक पंक्ति जोड़ी है। अब ज़िलाधिकारी प्रमाणपत्र तभी जारी करेगा जब वह "अथॉरिटी की सिफ़ारिश" देख चुका हो, और ज़रूरत लगे तो अन्य मेडिकल विशेषज्ञों की मदद भी ले सकता है। मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट पहले भी ज़रूरी थी। नया यह है: अब एक मेडिकल बोर्ड की मंज़ूरी भी चाहिए, और वह मंज़ूरी न मिले तो अकेला हलफ़नामा पर्याप्त नहीं।

धारा 7 में भी एक बदलाव हुआ है। पहले सर्जरी के बाद कोई व्यक्ति संशोधित प्रमाणपत्र के लिए आवेदन "कर सकता" था; अब क़ानून कहता है वह आवेदन "करेगा।" जिस अस्पताल में सर्जरी हुई, उसे अब सीधे ज़िलाधिकारी और अथॉरिटी को तफ़सील भेजनी होगी। यह तकनीकी बदलाव जैसा लगता है। पर इसका असर बड़ा है: अस्पताल अब ख़ुद एक रिपोर्टिंग की कड़ी बन गया है।

सरकार की दलील: गजट में दर्ज वजह

बिल के साथ दर्ज "उद्देश्य और कारण के वक्तव्य" पर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार के दस्तख़त हैं, तारीख़ 12 मार्च 2026। इसमें सरकार अपनी वजह ख़ुद बताती है। वक्तव्य कहता है, "मक़सद यह कभी नहीं था, और आज भी नहीं है, कि विभिन्न लैंगिक पहचान, स्वयं-अनुभूत लिंग-पहचान या तरल लैंगिकता वाले हर वर्ग को संरक्षण दिया जाए।" आगे लिखा है कि पुरानी परिभाषा इतनी अस्पष्ट थी कि असली ज़रूरतमंदों की पहचान ही मुश्किल हो गई थी।

वक्तव्य में एक और तर्क है, जो सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल ने भी दोहराया: उत्तराधिकार जैसे क़ानूनों में उलझन। अगर पहचान सिर्फ़ स्वयं-घोषणा से तय हो, तो संपत्ति और वारिस से जुड़े पुराने क़ानून लागू करना मुश्किल हो जाता है, सरकार का यही कहना है। मेहता ने अदालत में यह दलील एक उदाहरण से रखी: कोई जैविक पुरुष ख़ुद को महिला बताकर मर जाए, तो उत्तराधिकार हिंदू पुरुष वाले नियम से होगा या महिला वाले से? "यही मसले हैं," उन्होंने कहा।

बदलाव सिर्फ़ पहचान की शर्तें सख़्त करने तक सीमित नहीं है। संशोधन ने धारा 18 को पूरी तरह बदलकर सज़ा भी बढ़ाई है। किसी वयस्क का अपहरण कर नपुंसक बनाने जैसे अपराध में अब दस साल से लेकर उम्रक़ैद तक की सज़ा है, और जुर्माना कम से कम दो लाख रुपये तय है; बच्चे के मामले में सज़ा सीधे उम्रक़ैद है, जुर्माना कम से कम पाँच लाख। पुराने क़ानून में हर अपराध की अधिकतम सज़ा दो साल ही थी। फ़र्क़ साफ़ है। सरकार यही कहती रही कि सिर्फ़ परिभाषा नहीं, सुरक्षा भी मज़बूत हो रही है।

4 मई: नोटिस जारी, रोक से इनकार

24 अप्रैल 2026 को लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की। दिलचस्प यह है कि त्रिपाठी ख़ुद नेशनल काउंसिल फ़ॉर ट्रांसजेंडर पर्संस की चेयरपर्सन हैं, वही परिषद जिसे 2019 के क़ानून ने बनाया था। परिषद की एक और सदस्य ज़ैनब पटेल और किन्नर माँ एक सामाजिक संस्था ट्रस्ट सहित कई और याचिकाकर्ता भी अदालत पहुँचे।

पहली सुनवाई 4 मई 2026, सोमवार को हुई, चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के सामने। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से दलील दी कि नया क़ानून स्वयं-पहचान को ही ख़ारिज करता है: "आप फ़ैसले को बेअसर नहीं कर सकते। आधार हटाया जा सकता है। यहाँ नालसा फ़ैसला ही बेअसर किया जा रहा है, आधार हटाने की कोशिश नहीं हुई।" जस्टिस बागची ने जवाब में एक बारीक़ फ़र्क़ बताया: "इस संशोधन ने उस बुनियाद को ही बदल दिया जिस पर नालसा फ़ैसला हुआ था। स्वयं-अनुभूति की जगह अब मेडिकल जाँच ने ले ली है।"

चीफ़ जस्टिस ने एक तीखा सवाल भी पूछा: "140 करोड़ लोगों के इस देश में, कुछ लोग आरक्षण पाने के लिए भी इस सुविधा का बहाना बना सकते हैं, है न?" सिंघवी ने पलटकर कहा, "मैंने जाँच ली है। यहाँ कोई आरक्षण नहीं है।" बेंच फिर भी राहत देने को तैयार नहीं हुई। अदालत ने उसी दिन जो आदेश दर्ज किया, वह छोटा और सीधा था: "नोटिस जारी करें। सभी राज्यों को उनके महाधिवक्ताओं के ज़रिए नोटिस भेजा जाए। मामला पहले सीजेआई की बनाई तीन-जजों की बेंच के सामने रखा जाएगा। फ़िलहाल किसी अंतरिम आदेश का सवाल नहीं, किसी अंतरिम रोक का सवाल नहीं।"

उसी दिन नेशनल काउंसिल फ़ॉर ट्रांसजेंडर पर्संस के दो और सदस्यों, कल्कि सुब्रमण्यम और रितुपर्णा नियोग, ने इस्तीफ़ा दे दिया था; दोनों ने राज्यसभा से बिल पास होने वाले दिन ही यह क़दम उठाया। एक अलग याचिका भी उसी सुनवाई में दर्ज हुई, दो ट्रांस पुरुषों मानवीर यादव और विश्वनाथ मैथिल की, साथ में कार्यकर्ता अभिना आहेर की। उनकी शिकायत अलग थी: 2019 का क़ानून ट्रांस पुरुषों को पूरी तरह छोड़ देता है। बिना प्रमाणपत्र उन्हें आयुष्मान भारत, स्माइल योजना और छात्रवृत्तियों का फ़ायदा भी नहीं मिल पाता, ऐसा याचिका में कहा गया।

15 जून: हाईकोर्टों की कार्यवाही पर रोक

केंद्र सरकार को एक और समस्या दिख रही थी: वही याचिका दिल्ली, केरल, कर्नाटक और राजस्थान की हाईकोर्टों में भी दाख़िल हो चुकी थी। अलग-अलग हाईकोर्ट अलग-अलग राय दे सकते थे। इसलिए केंद्र ने एक ट्रांसफ़र याचिका के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट से सभी मामले अपने पास मँगाने की माँग की।

15 जून 2026, सोमवार को इस पर सुनवाई हुई, चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने दलील दी: "नालसा का एक ही फ़ैसला है, इसलिए कृपया नोटिस जारी करें। मैं आपसे इसे तीन-जजों की बेंच के सामने रखने का अनुरोध करता हूँ। हाईकोर्टों के लिए उससे अलग राय रखना मुश्किल हो सकता है।" एक याचिकाकर्ता ने ट्रांसफ़र का विरोध किया। उन्होंने ख़ुद को एक क्वालिफ़ाइड डॉक्टर बताया और कहा कि उनकी याचिका "सबसे व्यापक" है। चीफ़ जस्टिस ने जवाब दिया, "हमें ज़रूर आपकी मदद चाहिए होगी।"

एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील ने केंद्र की दलील को चुनौती दी: "यहाँ कुछ भी असल में नालसा फ़ैसले पर आधारित नहीं है। यह संशोधन सिर्फ़ असंवैधानिक ही नहीं, बल्कि इसका कोई मेडिकल आधार भी नहीं है।" चीफ़ जस्टिस ने बीच का रास्ता सुझाया: "बेहतर यही है कि सभी मामले साथ लिए जाएँ। या तो हम इसे किसी एक हाईकोर्ट को देंगे, या ख़ुद तय करेंगे, ताकि अलग-अलग राय बिखरी न रहें।" बेंच ने यही रास्ता चुना।

सुनवाई के आख़िर में बेंच ने केंद्र की ट्रांसफ़र याचिका पर नोटिस जारी किया। साथ ही एक औपचारिक आदेश भी दिया: "इस बीच, हाईकोर्टों में आगे की कार्यवाही रुकी रहेगी।" यह मामला अदालत के रिकॉर्ड में टी.पी.(सी) नंबर 1686-1692/2026 के नाम से दर्ज है: भारत संघ बनाम नई भोर संस्था, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और अन्य। तीन-जजों की बेंच अभी बननी बाक़ी थी।

3 अगस्त: "यह राशन कार्ड नहीं है"

तीन-जजों की बेंच आख़िरकार बनी: चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस वी. मोहना। 3 अगस्त 2026 की सुनवाई में मुद्दा बदल गया था। अब सवाल यह नहीं था कि नया क़ानून सही है या ग़लत। सवाल यह था कि जिनके पास पहले से पहचान कार्ड हैं, उनका क्या होगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी ने कार्डधारकों के लिए यथास्थिति का आदेश माँगा। उन्होंने बताया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए बना राष्ट्रीय पोर्टल, जहाँ नए कार्ड के लिए आवेदन होता है, फ़िलहाल बंद पड़ा है। वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधती काटजू ने पासपोर्ट का उदाहरण दिया: कई लोगों ने अपने पासपोर्ट और आधार कार्ड बदलवा लिए हैं। अगर वे नए पासपोर्ट के साथ विदेश यात्रा से लौटें, तो अचानक बीच में फँस सकते हैं।

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने स्वयं-पहचान से जुड़ी उलझनें गिनाईं: "मान लीजिए मैं जैविक रूप से पुरुष हूँ, और सोचता हूँ कि मैं महिला हूँ और टीजी कार्ड ले लेता हूँ, और मान लीजिए मैं महिलाओं के शौचालय का इस्तेमाल शुरू कर देता हूँ... ऐसा हो रहा है।" मद्रास हाई कोर्ट में वकालत करने वालीं, ख़ुद ट्रांसजेंडर वकील कनमणि ने अदालत से कहा कि ट्रांसजेंडर के लिए पहचान कार्ड उतना ही ज़रूरी है जितना किसी और के लिए राशन कार्ड। मेहता ने इसी पर पलटवार किया: "यह कोई अर्जेंट मामला नहीं है। यह कोई राशन कार्ड नहीं है कि आपको खाना नहीं मिल रहा। मुझे यह जल्दबाज़ी समझ नहीं आ रही।"

जस्टिस बागची की टिप्पणी सबसे विस्तृत थी: "हमें चिंताओं का एहसास है। अगर विधायिका को लगता कि सिर्फ़ स्पष्टीकरण वाला संशोधन चाहिए था, तो वह इस नए क़ानून को पहले दिए गए अधिकार छीनने वाला असर देती। ऐसा नहीं किया गया है, और चूँकि यह भावी क़ानून है, इसलिए ट्रांसजेंडर अधिकार के रूप में जो हासिल हो चुका है, वह बना रहेगा। और जब भी कोई मामला फ़र्ज़ी निकले, तो पहले नोटिस दिया जाएगा, उसके बाद ही रद्द होगा।" पर यह सिर्फ़ मौखिक टिप्पणी थी। सॉलिसिटर जनरल के "मैं देखूँगा" कहने के बाद बेंच इसी बात पर कोई लिखित आदेश देने से रुक गई। बेंच ने इतना ज़रूर कहा कि किसी ख़ास व्यक्ति को दिक़्क़त हो तो अदालत के सामने लाई जा सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने एक और तकलीफ़ बताई: डॉक्टर अब हार्मोन थेरेपी जारी रखने से हिचक रहे हैं, क्योंकि नया क़ानून बिना अथॉरिटी की मंज़ूरी के इलाज को अस्पष्ट बना देता है। कुछ हाईकोर्ट पहले ही अपने-अपने राज्यों में अंतरिम आदेश दे चुके थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन पर कोई एक जैसा नियम नहीं बनाया। हर मामला अलग रहा, हर हाईकोर्ट का रुख़ अलग रहा, और सुप्रीम कोर्ट ने किसी को पलटा भी नहीं। मामला 17 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया।

17 अगस्त के बाद: कार्ड बरक़रार, अगली सुनवाई अनिश्चित

17 अगस्त 2026, सोमवार को अगली सुनवाई हुई। इस बार सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि संशोधन से पहले जारी हो चुके सभी पहचान कार्ड मान्य बने रहेंगे। बेंच ने इसे रिकॉर्ड पर लिया: केंद्र या किसी राज्य सरकार ने नालसा फ़ैसले के बाद जो भी कार्ड जारी किए हैं, वे सब, और उनसे जुड़े सभी लाभ, अंतरिम तौर पर चालू रहेंगे, जब तक मामले का अंतिम फ़ैसला नहीं आता।

सुप्रीम कोर्ट की इमारत का अगला हिस्सा, जनवरी 2019 की तस्वीर। यह मामला अभी इसी अदालत में लंबित है, अगली तारीख़ का रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं मिला
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यह राहत अंतरिम है, अंतिम नहीं।

रिपोर्टों में इसे कभी "आदेश" कहा गया, कभी सिर्फ़ केंद्र का "भरोसा।" दोनों में फ़र्क़ है। अदालत की अपनी वेबसाइट इस मशीन से नहीं खुल सकी, इसलिए आदेश की मूल कॉपी सीधे नहीं पढ़ी जा सकी; यह लेख इसी सीमा के साथ लिखा गया है।

बेंच ने अगली सुनवाई क़रीब तीन हफ़्ते बाद रखने का ज़िक्र किया था, यानी सितंबर के पहले हफ़्ते के आसपास। पर उस अगली सुनवाई की कोई रिपोर्ट लॉ पोर्टलों पर 27 सितंबर तक नहीं मिली, चाहे लाइवलॉ हो, बार एंड बेंच हो, वेरडिक्टम हो या लॉबीट। इसका मतलब सुनवाई का न होना नहीं है। मतलब सिर्फ़ यह है कि इस रिपोर्ट में उसकी पुष्टि दर्ज नहीं है। तब तक के लिए स्थिति यही है: पुराने कार्डधारकों को कुछ नहीं करना, नए आवेदकों को अथॉरिटी की सिफ़ारिश के बिना कोई प्रमाणपत्र नहीं मिलेगा।

नालसा, 2014 का निर्देश, और एक अनसुलझी याचिका

15 अप्रैल 2014 को जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और जस्टिस ए.के. सीकरी की बेंच ने नालसा बनाम भारत संघ में जो फ़ैसला दिया, उसका एक हिस्सा आज भी हर बहस में दोहराया जाता है। फ़ैसले के पैराग्राफ़ 129 में दर्ज नौ घोषणाओं में से दूसरी कहती है: "ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अपनी स्वयं-अनुभूत लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार बरक़रार रखा जाता है, और केंद्र व राज्य सरकारों को निर्देश है कि वे उनकी लैंगिक पहचान को पुरुष, स्त्री या तीसरे लिंग के रूप में क़ानूनी मान्यता दें।"

यह निर्देश था, टिप्पणी नहीं।

पर 2019 के क़ानून ने इसे लागू करते वक़्त एक बीच का रास्ता चुना: सीधी मान्यता नहीं, बल्कि ज़िलाधिकारी से प्रमाणपत्र। स्वाति बिधान बरुआ ने इसी बीच के रास्ते को 11 दिसंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी थी, क़ानून बनने के हफ़्तों के भीतर। ग्रेस बानू और कई अन्य कार्यकर्ताओं ने 12 जून 2020 को एक और याचिका जोड़ी। दोनों याचिकाएँ धारा 4, 5, 6, 7, 12(3), 18(a) और 18(d) को चुनौती देती हैं, यह कहते हुए कि प्रमाणपत्र की शर्त ख़ुद नालसा के निर्देश के ख़िलाफ़ है।

यह याचिका आज तक तय नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के रिकॉर्ड में इसकी आख़िरी हलचल फ़रवरी 2022 की दर्ज है, जब मामला जस्टिस बोबडे, जस्टिस बोपन्ना और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की बेंच के सामने लंबित था। यानी 2026 का संशोधन आने से पहले ही यह सवाल छह साल से खुला पड़ा था कि क्या 2019 का क़ानून भी नालसा को पूरी तरह लागू करता है। इसका जवाब अब भी रिकॉर्ड में नहीं है।

नालसा के बाद अदालत पूरी तरह ख़ामोश नहीं रही। 17 अक्तूबर 2025 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने जेन कौशिक बनाम भारत संघ में एक ट्रांसजेंडर शिक्षिका को दो स्कूलों से निकाले जाने पर केंद्र, उत्तर प्रदेश और गुजरात को हर्जाना देने का आदेश दिया, और केंद्र-राज्यों के रवैये को "घोर उदासीन" बताया। साथ ही जस्टिस आशा मेनन की अगुआई में एक समिति बनाई, ताकि रोज़गार में बराबरी की एक राष्ट्रीय नीति बन सके। यह एक तय फ़ैसला था, मौखिक टिप्पणी नहीं। मौखिक टिप्पणी और लिखित आदेश में यही फ़र्क़ है।

राज्यों की तरफ़ से: मई का नोटिस, और एक असत्यापित दावा

4 मई 2026 के आदेश में अदालत ने सिर्फ़ इतना कहा था कि नोटिस "सभी राज्यों को उनके महाधिवक्ताओं के ज़रिए" भेजा जाए। इस लेख के लिए मिले कमीशन में यह भी दर्ज था कि आंध्र प्रदेश ने इस केंद्रीय क़ानून का बचाव अदालत में करने से इनकार कर दिया है, जबकि उत्तराखंड ने कहा है कि यह क़ानून फ़ायदेमंद है। दोनों दावों की पुष्टि अलग से खोजी गई।

लाइवलॉ, बार एंड बेंच, लॉबीट, वेरडिक्टम और सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर की मामले से जुड़ी हर रिपोर्ट, साथ ही अंग्रेज़ी, हिंदी और तेलुगु की कई और ख़बरें खँगालने के बाद भी आंध्र प्रदेश या उत्तराखंड के किसी अलग हलफ़नामे या किसी अलग बयान का कोई सुराग़ नहीं मिला। जो रिकॉर्ड मिला, उसमें राज्यों का ज़िक्र सामूहिक है, राज्यवार नहीं। इसलिए यह दावा इस लेख में तथ्य के तौर पर दर्ज नहीं किया जा रहा। पाठक इसे असत्यापित मानें, ग़लत नहीं और सही भी नहीं।

अगर आगे कोई राज्य-विशेष दस्तावेज़ मिलता है, तो इस लेख की सबसे बड़ी खाली जगह वहीं भरेगी।

स्रोतलाइवलॉ, 3 अगस्त 2026, दोपहर 3:14 बजे (रिपोर्टर अमिषा श्रीवास्तव): 3 अगस्त की सुनवाई की सीधी रिपोर्ट, जस्टिस बागची की मौखिक टिप्पणी का पूरा उद्धरण, कोठारी-काटजू-कनमणि के बयान, केस नंबर टी.पी.(सी) 1686-1692/2026; रॉ एचटीएमएल से datePublished क्रॉस-चेक किया गया, बार एंड बेंच, 4 मई 2026, दोपहर 12:07 बजे (रिपोर्टर देबायन रॉय): पहली सुनवाई, आदेश का मूल पाठ, सिंघवी-सूर्यकांत-बागची की बहस, एनसीटीपी सदस्यों के इस्तीफ़े, ट्रांस पुरुषों की अलग याचिका; रॉ एचटीएमएल से पढ़ा गया, लॉबीट, 15 जून 2026, दोपहर 1:07 बजे: ट्रांसफ़र याचिका की सुनवाई, स्टे ऑर्डर का मूल पाठ, सीजेआई-मेहता की बहस; रॉ एचटीएमएल से पढ़ा गया, स्क्रॉल.इन, 4 अगस्त 2026, सुबह 11:07 बजे: 3 अगस्त की सुनवाई की दूसरी, पुष्टि करने वाली रिपोर्ट, वेरडिक्टम, 17-18 अगस्त 2026: कार्डधारकों को अंतरिम राहत की रिपोर्ट, बार एंड बेंच, 17 अगस्त 2026, सुबह 9:47 बजे: केंद्र के भरोसे की रिपोर्ट, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग II खंड 2, 13 मार्च 2026: बिल संख्या 79/2026 का पूरा पाठ और उद्देश्य व कारण का वक्तव्य (डॉ. वीरेंद्र कुमार के दस्तख़त, 12 मार्च 2026); curl से डाउनलोड कर pdftotext से पढ़ा गया, इंडिया कोड: ट्रांसजेंडर पर्संस (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) ऐक्ट, 2019 (नंबर 40/2019) का पूरा पाठ; मूल पोर्टल टाइमआउट होने पर तेलंगाना हाई कोर्ट की मिरर कॉपी से धारा 4-7 पढ़ी गई, ट्रांसजेंडर पर्संस (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) रूल्स, 2020 का पूरा पाठ, नियम 3-6, मंत्रालय की वेबसाइट से डाउनलोड न होने पर मिरर से पढ़ा गया, इंडियन कानून: नालसा बनाम भारत संघ, 15 अप्रैल 2014, जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन व जस्टिस ए.के. सीकरी की बेंच, पैराग्राफ़ 129 की नौ घोषणाओं का मूल पाठ, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर: स्वाति बिधान बरुआ व अन्य बनाम भारत संघ की केस पृष्ठभूमि, फ़रवरी 2022 तक की अंतिम दर्ज स्थिति, डेक्कन हेराल्ड, 17 अक्तूबर 2025, रात 9:49 बजे: जेन कौशिक बनाम भारत संघ का फ़ैसला; रॉ एचटीएमएल से datePublished पढ़ा गया, पीआरएस इंडिया, बिल-ट्रैक पेज: लोकसभा-राज्यसभा में पेश और पास होने की तारीख़ें, सुप्रीम कोर्ट की अपनी वेबसाइट इस मशीन से नहीं खुली (कनेक्शन विफल); आदेशों का पाठ ऊपर के क़ानूनी पोर्टलों की सीधी रिपोर्टिंग से लिया गया, केस-स्टेटस पेज ख़ुद नहीं पढ़ा जा सका

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।