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बिहार में समान नागरिक संहिता लागू करने से जद(यू) विधायक का इनकार

सोमवार, 14 सितंबर को पटना में जद(यू) विधायक और पूर्व मंत्री श्याम रजक ने कहा कि बिहार में समान नागरिक संहिता किसी क़ीमत पर लागू नहीं होगी। उसी दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर के शीत सत्र में विधेयक लाने की बात कही। ऐसा विधेयक अपनी विधानसभा से होकर राज्यपाल के पास जाता है और इस विषय पर वहाँ से राष्ट्रपति के पास, और अनुच्छेद 201 में राष्ट्रपति के लिए कोई समय-सीमा नहीं है।

पटना में बिहार विधान सभा का अगला हिस्सा, उस पर लगा नाम-पट्ट और सामने का लॉन, यह तस्वीर 16 अक्तूबर 2021 की है; इस इमारत के सदन में 243 सदस्य हैं, उनमें 85 जद(यू) के, और संहिता का विधेयक यहीं से पास होना है
तस्वीर: Itcell.bla, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पटना में सोमवार को सवाल यह था कि बिहार के मुख्यमंत्री तो भाजपा के हैं, फिर रोकिएगा कैसे।

जद(यू) विधायक और पूर्व मंत्री श्याम रजक ने जवाब में साझीदारों के नाम गिनाए। "हाँ, बिहार में मुख्यमंत्री भाजपा के हैं, पर हम गठबंधन की सरकार चला रहे हैं, जिसमें जद(यू), राष्ट्रीय लोक मोर्चा, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) साझीदार हैं। कोई स्वतंत्र सरकार नहीं है। बिहार में किसी क़ीमत पर समान नागरिक संहिता लागू करने का सवाल ही नहीं उठता।"

एक दिन पहले मुंबई में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि भाजपा-राजग शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले समान नागरिक संहिता लाई जाएगी।

जो संहिता आ रही है, वह संसद से नहीं आ रही। वह हर राज्य की अपनी विधानसभा से आ रही है, और बिहार विधान सभा के 243 सदस्यों में जद(यू) के 85 हैं।

पटना में सोमवार का बयान

बिहार विधान सभा की अपनी 'नो योर एमएलए' सूची में क्रम संख्या 188 फुलवारी (अजा) के आगे श्याम रजक का नाम है और दल की जगह जद(यू)। यह सीट अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित है। रजक जद(यू) के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं और नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री भी।

उनका पहला वाक्य इतिहास का था। "हम सबने संसद में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था, पर उसी वक़्त हमारे नेता नीतीश कुमार ने साफ़ कह दिया था कि बिहार में इसे लागू नहीं किया जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि हम सबने उस विधेयक का समर्थन किया था और आज तक हम उसी रुख़ पर क़ायम हैं। पर बिहार में समान नागरिक संहिता कभी लागू नहीं होगी।" द हिंदू ने उनके शब्द इसी तरतीब में दर्ज किए, और वे पटना में पत्रकारों से बात करते हुए कहे गए थे।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पास उसी बातचीत का एक और टुकड़ा है, जिसमें रजक नीतीश कुमार के पद छोड़ने और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के सवाल पर कहते हैं कि सरकार साझीदारों के सहारे चल रही है, इसलिए दल की स्थिति साफ़ है।

पार्टी के भीतर का दूसरा सिरा उतना मुखर नहीं रहा। जद(यू) विधायक दल के नेता और मंत्री श्रवण कुमार, जो नालंदा से विधायक हैं, ने उसी अख़बार से कहा, "यह ऐसा मुद्दा है जिस पर हमारे प्रवक्ता बोलेंगे। पहले मैं सुनना चाहूँगा कि वे क्या कहते हैं, उसके बाद आगे कहूँगा।"

जद(यू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने फ़्री प्रेस जर्नल से कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा इस मामले पर गृह मंत्री से बात करेंगे। झा ने ख़ुद पीटीआई से कहा, "हम जल्द ही गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे।" संजय झा बिहार से राज्यसभा में हैं; विधान सभा सचिवालय की राज्यसभा सदस्यों की सूची में उनका नाम आठवें क्रम पर है और चौदहवें पर नीतीश कुमार का।

संसद के रिकॉर्ड में वह विधेयक

रजक का पूरा तर्क एक विधेयक पर टिका है: संसद में हमने उसका समर्थन किया, और तभी यह भी कहा कि बिहार में लागू नहीं करेंगे। वह विधेयक कौन सा है, यह ढूँढ़ने पर संसद का रिकॉर्ड एक अलग तस्वीर देता है।

केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता का कोई विधेयक किसी सदन में पेश नहीं किया है। 20 जुलाई 2023 को राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि 21वें विधि आयोग ने 31 अगस्त 2018 को 'पारिवारिक विधि में सुधार' पर परामर्श पत्र जारी किया था पर इस विषय पर कोई रिपोर्ट नहीं दी; और परामर्श पत्र को चार बरस से ज़्यादा बीत जाने पर 22वें विधि आयोग ने 14 जून 2023 को आम जनता और धार्मिक संगठनों से राय माँगने का फ़ैसला किया। सरकार का अपना विवरण विधेयक का नहीं, परामर्श का है।

दोनों सदनों में इस विषय पर मत-विभाजन एक ही बार हुआ है। 9 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने निजी विधेयक 'द यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड इन इंडिया बिल, 2020' पेश करने की अनुमति माँगी। विपक्ष के सदस्यों ने विरोध किया, सभापति ने मत-विभाजन कराया, और पेश करने का प्रस्ताव 63 के मुक़ाबले 23 मतों से पारित हुआ। वह वोट विधेयक पर नहीं था, उसे सदन में रखने की अनुमति पर था, और उसके बाद विधेयक चर्चा के लिए कभी नहीं उठा।

रविवार को शाह ने उसी वाक्य में तीन तलाक़ का ज़िक्र किया था। उस विधेयक पर जद(यू) का दर्ज रुख़ उलटा है। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 राज्यसभा में 30 जुलाई 2019 को 99 के मुक़ाबले 84 मतों से पारित हुआ, और जद(यू) के सदस्य अपना विरोध दर्ज कराकर सदन से बाहर चले गए।

उस विरोध का ऐलान डेढ़ महीने पहले करने वाले रजक ही थे। डेक्कन हेराल्ड ने 14 जून 2019 को लिखा कि नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री और जद(यू) के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने एक दिन पहले कहा कि पार्टी संसद में तीन तलाक़ विधेयक पर राजग सरकार का साथ नहीं देगी, वह विधेयक की विरोधी है और विरोध में खड़ी रहेगी। अगले दिन पार्टी के महासचिव के.सी. त्यागी ने लिखित बयान जारी किया कि समान नागरिक संहिता पर अभी विभिन्न धार्मिक समूहों से गहन विचार-विमर्श बाक़ी है, और ऐसी प्रक्रिया के बिना विवाह, विवाह-विच्छेद, गोद लेने, उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार जैसे पुराने धार्मिक व्यवहारों से "असमय या जल्दबाज़ी में छेड़छाड़" साफ़ तौर पर अनुचित होगी।

पार्टी की सबसे पुरानी दर्ज स्थिति इससे भी पहले की है। जनवरी 2017 में नीतीश कुमार ने विधि आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष बी.एस. चौहान को चिट्ठी लिखकर बिहार सरकार को भेजी गई सोलह सवालों की प्रश्नावली लौटा दी थी। द क्विंट ने 21 जून 2023 को उस चिट्ठी का एक अंश छापा, जिसमें लिखा है कि जद(यू) का दृढ़ मत है कि लोकतंत्र रचनात्मक संवाद की बुनियाद पर खड़ा है, समान नागरिक संहिता के मामले में सभी धार्मिक संप्रदायों से व्यापक परामर्श पर टिका ऐसा संवाद विशेष रूप से ज़रूरी है, और "उसी संवाद की भावना में यह आवश्यक है कि समान नागरिक संहिता को पहले संसद में, तथा राज्यों की विधानसभाओं और नागरिक समाज के दूसरे मंचों पर बहस के लिए रखा जाए।"

बिहार विधान सभा की दलगत स्थिति

बिहार विधान सभा सचिवालय अपनी वेबसाइट पर दलगत स्थिति का एक पन्ना रखता है। 17 अगस्त 2026 तक की यथास्थिति में उस पर तेरह दल हैं: भारतीय जनता पार्टी 88, जनता दल (यूनाइटेड) 85, राष्ट्रीय जनता दल 25, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) 19, इंडियन नेशनल कांग्रेस 6, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन 5, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) 5, राष्ट्रीय लोक मोर्चा 4, भाकपा (माले) (लिबरेशन) 2, और माकपा, बहुजन समाज पार्टी, जन सुराज पार्टी तथा इंडियन इंक्लूसिव पार्टी एक-एक। कुल 243, कोई रिक्ति नहीं।

बिहार विधान सभा के सदन में अध्यक्ष की पीठ और उसके सामने सदस्यों की मेज़ें, यह तस्वीर 23 फ़रवरी 2017 के संयुक्त सत्र की है; ऊपर गिनी गई तेरह दलों की सूची इसी कमरे की कुर्सियों पर बैठती है और साधारण बहुमत यहीं गिना जाता है
तस्वीर: Governor's Secretariat, Bihar, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

राजग के पाँच दल मिलाकर 201 हुए। बहुमत का आँकड़ा 122 है। जद(यू) के 85 अलग कर दें तो भाजपा, लोजपा (राम विलास), हम (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास 116 बचते हैं, बहुमत से छह कम।

समान नागरिक संहिता का विधेयक कोई संविधान संशोधन नहीं है। वह साधारण विधेयक है और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित होता है। इस सभा में वह बहुमत जद(यू) के 85 सदस्यों के बग़ैर विपक्ष के वोटों से ही बन सकता है, और विपक्ष में राजद के 25, कांग्रेस के 6, एआईएमआईएम के 5 और वामपंथी दलों के 3 सदस्य हैं।

सदन का गणित इसलिए भी नया है कि मुख्यमंत्री बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय की वेबसाइट पर सम्राट चौधरी के परिचय में लिखा है कि उन्होंने 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उससे पहले वे राज्य के उपमुख्यमंत्री थे। विधान सभा की सूची में उनका नाम क्रम 164, तारापुर के आगे है। नीतीश कुमार अब बिहार से राज्यसभा में हैं।

अठारहवीं बिहार विधान सभा का तीसरा सत्र इसी साल जुलाई में चला; सदन की वेबसाइट पर 20 से 24 जुलाई 2026 तक के प्रश्नों की सूचियाँ टँगी हैं। बिहार में समान नागरिक संहिता का मसौदा बनाने के लिए किसी समिति के गठन की कोई अधिसूचना दर्ज नहीं है।

गठबंधन के बाक़ी दलों के बयान

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन, जो सम्राट चौधरी सरकार में मंत्री हैं, ने रजक के उलट दिशा पकड़ी। "समान नागरिक संहिता को लागू करने में कोई दिक़्क़त होगी तो गठबंधन के सभी नेताओं से बात की जाएगी और उन्हें विश्वास में लिया जाएगा। गृह मंत्री ने कहा है तो उसमें कुछ अच्छी बातें होंगी। हम मुख्यमंत्री से भी बात करेंगे, और कोई समस्या न हुई तो इसे बिहार में भी लागू किया जाएगा।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजग में कोई दरार नहीं है और एक नेता का बयान पूरे दल का बयान नहीं होता।

लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने एक्स पर लिखी पोस्ट में संविधान के प्रावधान गिनाए। द हिंदू ने उसका पाठ इस तरह छापा: "भारत का सामाजिक ताना-बाना विविध है। हर वर्ग की अपनी नागरिक परंपराएँ और रीति-रिवाज हैं। संविधान ने ख़ुद इसे स्वीकार किया है, पाँचवीं-छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371क और 371छ, और अब तक की हर संहिता में अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट इसका प्रमाण है। मेरी पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), समानता और विविधता दोनों के प्रति प्रतिबद्ध है। मसौदा सार्वजनिक हो, सभी हितधारकों के हितों का आकलन हो, व्यापक चर्चा हो, उसके बाद समीक्षा करके पार्टी अपना पक्ष रखेगी।" पासवान जिन छूटों का ज़िक्र कर रहे हैं, उनका दायरा 15 सितंबर के लेख 'अमित शाह ने 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता का भरोसा जताया' में दर्ज है।

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का रुख़ फ़्री प्रेस जर्नल ने इस तरह दर्ज किया कि उनका दल केंद्र सरकार के लाए प्रस्ताव को देखने के बाद अपनी राय तय करेगा। कुशवाहा भी बिहार से राज्यसभा में हैं।

बिहार भाजपा के प्रवक्ता नीरज कुमार शर्मा ने संविधान का हवाला दिया। उनके मुताबिक़ संहिता अनुच्छेद 44 की भावना है, वह महिलाओं के बराबर अधिकार का सवाल उठाती है और किसी धर्म के ख़िलाफ़ नहीं है; राजग शासित राज्य इसे चर्चा, सुझाव और सहमति से लागू करेंगे, बिहार भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा होगा, और 2029 तक समय है।

विपक्ष की तरफ़ से राजद के प्रवक्ता शक्ति यादव ने कहा कि इस देश में अलग-अलग धर्म हैं और लोग अलग संस्कृति और परंपरा मानते हैं, किसी के ख़िलाफ़ नफ़रत की बात नहीं हो सकती, इस्लाम मानने वालों पर कोई हमला हुआ तो राजद चुप नहीं बैठेगा, और संहिता बिहार में किसी क़ीमत पर लागू नहीं होगी।

महाराष्ट्र का शीत सत्र और समिति की समय-सीमा

उसी सोमवार को मुंबई में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि उनकी सरकार समान नागरिक संहिता का विधेयक नागपुर के शीत सत्र में सदन के पटल पर रखना चाहती है। "देखिए, महाराष्ट्र सरकार समान नागरिक संहिता तैयार करने के लिए समिति बना चुकी है। समिति काम कर रही है, और मेरा मानना है कि समिति की रिपोर्ट आते ही हम इसे जल्द लागू करेंगे," उन्होंने पत्रकारों से कहा।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, यह तस्वीर मुंबई के विधान भवन में 3 मार्च 2021 को ली गई थी; विधेयक जिस सत्र में रखने की बात उन्होंने कही वह मुंबई में नहीं नागपुर में बैठता है, और समिति की मियाद उस सत्र के बाद तक चलती है
तस्वीर: Correctinfo86, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

समिति 9 जुलाई 2026 को घोषित हुई थी। अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई हैं और बाक़ी छह सदस्य हैं सेवानिवृत्त हाई कोर्ट न्यायाधीश आर.सी. चव्हाण और एस.जी. मेहरे, पूर्व मुख्य सचिव डी.के. जैन, पूर्व महाधिवक्ता बिरेंद्र सराफ़, रमेश पतंगे और सुवर्णा रावल। समिति को रिपोर्ट देने के लिए छह महीने मिले हैं, यानी जनवरी 2027 की शुरुआत तक।

शीत सत्र उससे पहले बैठ जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने 10 जुलाई 2026 को मानसून सत्र के समापन पर घोषणा की थी कि अगला शीत सत्र 7 दिसंबर से नागपुर में होगा। उस सत्र के खुलने और समिति की अपनी समय-सीमा के बीच क़रीब एक महीने का फ़ासला है।

राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास विधेयक का रास्ता

विधानसभा से पारित होना राज्य के विधेयक की पहली सीढ़ी है, आख़िरी नहीं। संविधान का अनुच्छेद 200 कहता है कि विधानमंडल से पारित विधेयक राज्यपाल के सामने रखा जाएगा और राज्यपाल घोषित करेंगे कि वे या तो उस पर अनुमति देते हैं, या अनुमति रोकते हैं, या विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखते हैं। उसके पहले परंतुक में एक और विकल्प है: धन विधेयक न हो तो राज्यपाल उसे संदेश के साथ सदन को लौटा सकते हैं, और सदन उस पर पुनर्विचार करके विधेयक दोबारा भेज दे तो राज्यपाल अनुमति नहीं रोकेंगे।

अनुच्छेद 201 अगली सीढ़ी है। जब कोई विधेयक राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखते हैं, तब राष्ट्रपति घोषित करेंगे कि वे अनुमति देते हैं या अनुमति रोकते हैं। इसी अनुच्छेद के परंतुक में राष्ट्रपति राज्यपाल को निर्देश दे सकती हैं कि विधेयक सदन को लौटाया जाए, और तब सदन को "ऐसे संदेश की प्राप्ति की तारीख़ से छह मास की अवधि के भीतर" उस पर पुनर्विचार करना होगा।

इन दो अनुच्छेदों में तारीख़ों की एक ही घड़ी है, और वह विधानमंडल पर लगी है। राज्यपाल या राष्ट्रपति कितने दिन में तय करेंगे, इसका कोई उल्लेख नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को इसी बात को रेखांकित किया: उसकी राय के पैरा 109 में लिखा है कि संविधान सभा ने एक जगह, अनुच्छेद 201 के परंतुक में, स्पष्ट समय-सीमा रखी और दूसरी तरफ़ राज्यपाल या राष्ट्रपति पर ऐसी कोई सीमा नहीं रखी, और यह अंतर महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का मध्य खंड, जिसमें मुख्य न्यायाधीश का न्यायालय बैठता है, यह तस्वीर 11 दिसंबर 2019 की है; राज्यपाल और राष्ट्रपति पर अदालती घड़ी न लगाने का फ़ैसला इसी इमारत से 20 नवंबर 2025 को निकला
तस्वीर: Subhashish Panigrahi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

वह राय राष्ट्रपति के भेजे एक निर्देश पर आई थी। राष्ट्रपति ने 13 मई 2025 को अनुच्छेद 143 के तहत चौदह सवाल भेजे, और पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने विशेष निर्देश संख्या 1/2025 में उनका उत्तर दिया। निष्कर्ष 165.5 कहता है कि संविधान में समय-सीमा तय न होने की स्थिति में अदालत के लिए अनुच्छेद 200 की शक्तियों पर न्यायिक समय-सीमा तय करना उचित नहीं होगा। निष्कर्ष 165.6 और 165.7 यही बात अनुच्छेद 201 पर राष्ट्रपति के लिए दोहराते हैं। निष्कर्ष 165.10 में अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान, और विशेष रूप से अनुच्छेद 142 भी, विधेयकों की 'मानी हुई अनुमति' की अवधारणा की इजाज़त नहीं देता। पीठ ने चौदह में से दो सवाल अप्रासंगिक बताकर बिना उत्तर के लौटा दिए।

यही वह लागत है जो राज्यों के रास्ते के साथ आती है, और उसके बदले जो मिलता है वह भी साफ़ है। राज्य के विधेयक को राज्यसभा से नहीं गुज़रना पड़ता, और दिल्ली में किसी सहयोगी के वोट की ज़रूरत नहीं पड़ती; उसे सिर्फ़ उस एक सदन का बहुमत चाहिए जहाँ वह रखा गया है। इसके बाद अनुमति की घड़ी शुरू होती है, जिस पर कोई अंक नहीं लिखा। यह विषय समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 पर है और राज्य का क़ानून अनुच्छेद 254(2) के रास्ते राष्ट्रपति की अनुमति से चलता है; इस प्रक्रिया का ब्योरा 15 सितंबर के लेख में दर्ज है।

केंद्र का रास्ता विधि आयोग पर रुका है

समवर्ती सूची के इस विषय पर संसद के पास वही विधायी शक्ति है जो विधानसभाओं के पास है, और वहाँ यह विषय 2018 के एक परामर्श पत्र से आगे नहीं बढ़ा है।

21वें विधि आयोग का परामर्श पत्र 31 अगस्त 2018 को आया था। उसके पैरा 1.15 का वाक्य यह है कि इसलिए इस आयोग ने भेदभाव करने वाली विधियों पर काम किया है, बजाय एक समान नागरिक संहिता देने के, "जो इस चरण पर न तो आवश्यक है और न वांछनीय।" उसी पैरा में आगे लिखा है कि ज़्यादातर देश अब भिन्नता को मान्यता देने की तरफ़ बढ़ रहे हैं, और भिन्नता का होना भर भेदभाव नहीं दिखाता, बल्कि एक मज़बूत लोकतंत्र का संकेत है। पिछले पैरा में आयोग गिनती देता है: उसकी प्रश्नावली पर 75,378 से ज़्यादा उत्तर आए, और उनमें से ज़्यादातर तीन तलाक़ या तलाक़-उल-बिद्दत के बारे में थे।

ओवैसी ने सोमवार को इसी दस्तावेज़ का हवाला दिया और कहा कि राजग सरकार के नियुक्त किए विधि आयोग ने ख़ुद तय किया था कि समान नागरिक संहिता न ज़रूरी है न वांछनीय। आयोग के अपने वाक्य में इसके साथ तीन शब्द और हैं, "इस चरण पर"।

इसके बाद का हिसाब मंत्री के अपने उत्तर में है। 21वें आयोग ने इस विषय पर रिपोर्ट नहीं दी। 22वें आयोग ने 14 जून 2023 को नए सिरे से राय माँगी, और द क्विंट के छापे उसके बयान में आयोग ने लिखा कि उसने "इस विषय पर फिर से विचार करना उपयुक्त समझा"। जुलाई 2023 में सरकार ने संसद को जो बताया, वह किसी मसौदे की नहीं, उसी परामर्श की ख़बर थी।

विधि आयोग की वेबसाइट के मुताबिक़ हर आयोग तीन बरस के लिए बनता है। 22वें आयोग का कार्यकाल 2024 में पूरा हुआ और 23वाँ आयोग उसके बाद बना। भारत के राजपत्र के 16 अप्रैल 2025 के असाधारण अंक में विधि एवं न्याय मंत्रालय की 15 अप्रैल 2025 की अधिसूचना छपी है, जिसके तहत राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी को 15 अप्रैल 2025 की पूर्वाह्न से आयोग का पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त किया, और उसी दिन से 22वें आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. डी.पी. वर्मा को सदस्य। आयोग की अपनी सूचनाओं पर अंतिम तारीख़ 31 अगस्त 2027 दर्ज है; तीन बरस पीछे गिनने पर आयोग सितंबर 2024 में बैठा ठहरता है, और अध्यक्ष उसे उसके साढ़े सात महीने बाद मिला।

नीतीश कुमार की 2017 की चिट्ठी में जो माँग थी, वह यही थी कि संहिता पहले संसद में बहस के लिए रखी जाए। जो रास्ता चुना गया है, वह संसद से होकर नहीं जाता।

इक्कीस राज्यों में मुख्यमंत्री किन दलों के हैं

एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने सोमवार को शाह के बयान पर जो सवाल उठाया, वह इसी बिंदु पर था: क्या भाजपा के सहयोगियों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ है। उन्होंने कहा कि उन्हें दिखाना चाहिए कि वे महज़ "छोटी भाजपा" नहीं हैं।

इक्कीस की गिनती किन राज्यों से बनती है और वह किस तरफ़ से पूरी नहीं बैठती, यह 15 सितंबर के लेख में दर्ज है। उस गिनती का एक दूसरा हिस्सा यहाँ काम का है: जिन राज्यों में राजग या उसका पूर्वोत्तर सहयोगी गठबंधन सरकार में है, उनमें से चार के मुख्यमंत्री भाजपा के नहीं हैं। आंध्र प्रदेश सरकार के अपने पोर्टल पर मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू हैं, जो तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष हैं। मेघालय के पोर्टल पर कॉनराड के. संगमा हैं, नेशनल पीपुल्स पार्टी के। नगालैंड के पोर्टल पर, जो 14 सितंबर 2026 को अद्यतन हुआ, नेफ्यू रियो हैं, नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के। सिक्किम के पोर्टल पर प्रेम सिंह तमांग हैं, सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा के।

इन दलों में से एक का दर्ज रुख़ जद(यू) जैसा ही है। द इंडियन एक्सप्रेस ने सोमवार को लिखा कि तेदेपा भी चर्चा और सहमति की माँग करती रही है और 2024 में उसने कहा था कि वह मुसलमानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगी।

बिहार पाँचवाँ मामला है, और अलग क़िस्म का। वहाँ मुख्यमंत्री भाजपा के हैं, पर सदन में भाजपा के 88 और जद(यू) के 85 सदस्य हैं, और यही तीन का फ़ासला रजक के जवाब का आधार था।

ओवैसी ने एक और राज्य का नाम लिया। उन्होंने शाह, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को चुनौती दी कि उत्तराखंड, गुजरात और असम वाली संहिता गोवा में लागू करके दिखाएँ। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ उन्होंने गोवा के मौजूदा ढाँचे के भीतर कुछ हालात में दूसरे विवाह के प्रावधान और कैथोलिक विवाह तथा विवाह-विच्छेद से जुड़ी छूटों का ज़िक्र किया, और पूछा कि एक जैसे क़ानून का तर्क इनके साथ कैसे बैठता है।

शाह के वाक्य में एक तारीख़ है, 2029, और कोई राज्य का नाम नहीं। हर राज्य में उस तारीख़ तक पहुँचने का रास्ता एक ही है: विधानसभा का बहुमत, फिर राज्यपाल, और इस विषय पर राष्ट्रपति की अनुमति, जिस पर संविधान ने कोई घड़ी नहीं लगाई।

स्रोतद हिंदू, पटना, 14 सितंबर 2026, रात 8:00 (संशोधित 8:33): अमित भेलारी की रिपोर्ट, जिसमें श्याम रजक, संतोष कुमार सुमन, नीरज कुमार शर्मा और शक्ति यादव के शब्द तथा चिराग पासवान की एक्स पोस्ट का पाठ दर्ज है, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 14 सितंबर 2026: रजक का दूसरा उद्धरण, जद(यू) विधायक दल के नेता श्रवण कुमार की टिप्पणी, और संजय झा का पीटीआई से कहा गया वाक्य, फ़्री प्रेस जर्नल, पटना, 14 सितंबर 2026, रात 10:23: गठबंधन के चारों दलों के रुख़, जद(यू) प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद और राष्ट्रीय लोक मोर्चा की स्थिति, बिहार विधान सभा सचिवालय: 'बिहार विधान सभा में विभिन्न राजनीतिक दलों की दलगत स्थिति', 17 अगस्त 2026 तक यथास्थिति, कुल 243, बिहार विधान सभा: 'नो योर एमएलए' की आधिकारिक सूची, जिसमें क्रम 188 फुलवारी (अजा) पर श्याम रजक, क्रम 164 तारापुर पर सम्राट चौधरी और क्रम 176 नालंदा पर श्रवण कुमार दर्ज हैं, बिहार विधान सभा सचिवालय: बिहार राज्य के राज्य सभा सदस्यों की सूची, जिसमें नीतीश कुमार, संजय कुमार झा और उपेंद्र कुशवाहा के नाम हैं, मुख्यमंत्री सचिवालय, बिहार सरकार: मुख्यमंत्री का आधिकारिक परिचय, जिसमें 15 अप्रैल 2026 को शपथ लेने और उससे पहले उपमुख्यमंत्री रहने का उल्लेख है; 15 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, भारत का संविधान, विधि एवं न्याय मंत्रालय का आधिकारिक पाठ: अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 201 तथा उनके परंतुक, सुप्रीम कोर्ट, विशेष निर्देश संख्या 1/2025, 'इन रे: असेंट, विदहोल्डिंग ऑर रिज़र्वेशन ऑफ़ बिल्स', 20 नवंबर 2025 (2025 INSC 1333): पैरा 109 और पैरा 165 के निष्कर्ष 165.5 से 165.10, आकाशवाणी समाचार, 20 जुलाई 2023: विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल का राज्यसभा में लिखित उत्तर, जिसमें 21वें विधि आयोग की रिपोर्ट न देने और 22वें आयोग के 14 जून 2023 को राय माँगने का ब्योरा है, भारत का विधि आयोग, 'कंसल्टेशन पेपर ऑन रिफ़ॉर्म ऑफ़ फ़ैमिली लॉ', 31 अगस्त 2018: पैरा 1.14 में 75,378 उत्तरों की गिनती और पैरा 1.15 का वह वाक्य जिसमें संहिता को 'इस चरण पर न ज़रूरी, न वांछनीय' कहा गया है, पत्र सूचना कार्यालय, 31 अगस्त 2018, दोपहर 3:03: विधि आयोग के परामर्श पत्र की आधिकारिक घोषणा और उसके सुझावों का सार, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 1 खंड 2, संख्या 16, 16 अप्रैल 2025: विधि एवं न्याय मंत्रालय की 15 अप्रैल 2025 की अधिसूचना, जिससे न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) दिनेश माहेश्वरी 23वें विधि आयोग के पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त हुए, द क्विंट, 21 जून 2023: नीतीश कुमार की 2017 की चिट्ठी का उद्धृत अंश और 22वें विधि आयोग के 14 जून 2023 के बयान का पाठ, डेक्कन हेराल्ड, 14 जून 2019: श्याम रजक का तीन तलाक़ विधेयक पर जद(यू) के विरोध का ऐलान, के.सी. त्यागी का बयान, और नीतीश कुमार की जनवरी 2017 की चिट्ठी का ज़िक्र, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 14 सितंबर 2026, शाम 4:07: देवेंद्र फडणवीस के शब्द और महाराष्ट्र की सात सदस्यीय समिति के सदस्यों के नाम, नागपुर टुडे, 11 जुलाई 2026: विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर की घोषणा कि शीत सत्र 7 दिसंबर से नागपुर में होगा, और मानसून सत्र की 14 बैठकों का हिसाब, द हिंदू, हैदराबाद, 14 सितंबर 2026, शाम 4:55, पीटीआई: असदुद्दीन ओवैसी की एक्स पोस्ट और उनके बयान, द इंडियन एक्सप्रेस, 14 सितंबर 2026, शाम 6:53: दीप्तिमान तिवारी की व्याख्या, जिसमें जद(यू) और तेदेपा के दर्ज रुख़ तथा राज्य-दर-राज्य रास्ते का तर्क है, मेघालय सरकार का आधिकारिक पोर्टल, सितंबर 2026: मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा; इसी तरह nagaland.gov.in पर नेफ्यू रियो (14 सितंबर 2026 को अद्यतन), sikkim.gov.in पर प्रेम सिंह तमांग और apsdps.ap.gov.in पर चंद्रबाबू नायडू

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