अमित शाह ने 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता का भरोसा जताया; चार विधानसभाएँ उसे पारित कर चुकी हैं और अमल में वह एक ही राज्य में है
रविवार, 13 सितंबर को मुंबई में गृह मंत्री ने कहा कि भाजपा-राजग की सरकारों वाले 21 राज्यों में 2029 से पहले समान नागरिक संहिता लाई जाएगी। उत्तराखंड की संहिता 27 जनवरी 2025 से लागू है। गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं ने अपनी-अपनी संहिता पारित कर दी है, और तीनों में से कोई अभी अमल में नहीं आई।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को लागू हुए एक बरस पूरा हुआ तो राज्य सरकार ने गिनती जारी की: 4,74,447 विवाह पंजीकृत, और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण 68।
रविवार, 13 सितंबर को मुंबई में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भाजपा और राजग की सरकारों वाले 21 राज्यों में 2029 से पहले समान नागरिक संहिता लाई जाएगी। उन्होंने किसी राज्य का नाम नहीं लिया।
चार विधानसभाएँ ऐसी संहिता पारित कर चुकी हैं। उनमें से तीन की संहिता आज तक अमल में नहीं आई।
मुंबई का बयान और इक्कीस की गिनती
बयान भाजपा के 'सेवा संकल्प अभियान' की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आया, जिसमें सरकार के बारह और पार्टी के पच्चीस बरस गिनाए जा रहे थे। पीटीआई ने उनके शब्द इस तरह दर्ज किए: तीन तलाक़ ख़त्म हुआ और मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक़ मिला; कई राज्यों में समान नागरिक संहिता लाई जा चुकी है; और उन्हें भरोसा है कि भाजपा-राजग शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले वह लाई जाएगी।
अंग्रेज़ी रिपोर्टों में यहीं एक फ़र्क़ है। द हिंदू, स्क्रॉल और द इंडियन एक्सप्रेस ने क्रिया "introduce" रखी, यानी लाना या पेश करना; द टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इंडिया टुडे ने "implement", यानी लागू करना। हिंदी अख़बारों ने एक सुर में "लागू" लिखा। विधेयक पेश करने, उसे पारित कराने और संहिता को अमल में लाने के बीच की दूरी इस पूरी कहानी का केंद्र है।
गिनती का सवाल अलग है। देश में 28 राज्य हैं और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की अपनी विधानसभा है: दिल्ली, पुदुच्चेरी और जम्मू-कश्मीर। 13 सितंबर 2026 को इनमें से बीस राज्यों में राजग या उसके पूर्वोत्तर सहयोगी गठबंधन की सरकार थी: आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, ओडिशा, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल।
बाक़ी छह राज्यों और जम्मू-कश्मीर में विपक्षी गठबंधन की सरकार है; मिज़ोरम और पंजाब किसी राष्ट्रीय गठबंधन में नहीं। इक्कीस का आँकड़ा किसी तरफ़ से पूरा नहीं बैठता: बीस राज्य हैं, या दिल्ली और पुदुच्चेरी मिलाकर बाईस विधानमंडल।
उत्तराखंड की संहिता: विवाह, विवाह-विच्छेद और उत्तराधिकार
संहिता का पूरा नाम समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड, 2024 है और वह उत्तराखंड अधिनियम संख्या 3, वर्ष 2024 है। 12 मार्च 2024 के उत्तराखंड असाधारण गजट के मुख पृष्ठ पर लिखा है कि विधानसभा से पारित इस संहिता पर राष्ट्रपति ने 11 मार्च 2024 को अनुमति दी। धारा 1(2) कहती है कि संहिता उस तारीख़ से प्रभावी होगी जो राज्य सरकार गजट में अधिसूचित करे; उस अधिसूचना में राज्यपाल ने 27 जनवरी 2025 की तारीख़ तय की।

धारा 4 विवाह की शर्तें गिनाती है: किसी पक्ष का जीवित जीवनसाथी न हो, दोनों सहमति देने में सक्षम हों, पुरुष इक्कीस बरस का और स्त्री अठारह बरस की हो, और दोनों निषिद्ध संबंध की श्रेणियों में न आते हों। धारा 5 रस्मों के नाम लेती है: सप्तपदी, आशीर्वाद, निकाह, होली यूनियन, आनंद विवाह अधिनियम 1909 के तहत आनंद कारज, तथा विशेष विवाह अधिनियम 1954। संहिता रस्म नहीं बदलती, पंजीकरण अनिवार्य करती है।
धारा 6 के तहत संहिता लागू होने के बाद हुआ हर विवाह पंजीकृत होना है, बशर्ते एक पक्ष राज्य का निवासी हो। धारा 7 पीछे जाती है: 26 मार्च 2010 और संहिता के लागू होने के बीच के विवाह भी पंजीकृत होने हैं। धारा 10 में समय-सीमा है, नए विवाह के लिए साठ दिन और पुराने के लिए छह महीने। धारा 17 में चूक पर दस हज़ार रुपये तक की शास्ति है और झूठे बयान पर तीन महीने तक की क़ैद या पच्चीस हज़ार तक का जुर्माना। धारा 20 कहती है कि पंजीकरण न होने से विवाह अमान्य नहीं होता।
सबसे कड़े प्रावधान विवाह तोड़ने पर हैं। धारा 29 कहती है कि कोई भी विवाह इस भाग के प्रावधानों के सिवा किसी तरीक़े से नहीं तोड़ा जाएगा, चाहे किसी पक्ष की प्रथा, परंपरा, रूढ़ि, व्यक्तिगत विधि या कोई दूसरा क़ानून कुछ भी कहता हो। धारा 32(1)(ii) इसके उल्लंघन पर तीन बरस तक की क़ैद रखती है और धारा 32(2)(क) उसे संज्ञेय अपराध ठहराती है। धारा 30(2) तलाक़शुदा पति-पत्नी को बिना शर्त दोबारा विवाह का हक़ देती है, और धारा 32(1)(iii) किसी को तीसरे व्यक्ति से विवाह की शर्त मानने पर मजबूर करने या उकसाने पर तीन बरस तक की क़ैद और एक लाख रुपये तक का जुर्माना रखती है।
उत्तराधिकार में धाराएँ 49 से 51 और अनुसूची 2 एक ही वारिस-सूची सब पर लागू करती हैं; वर्ग-1 में जीवनसाथी, संतानें, पूर्व-मृत संतानों की संतानें और उनके जीवनसाथी, तथा माता-पिता आते हैं। धारा 390 राज्य की हर उस विधि, प्रथा या रूढ़ि को प्रभावहीन कर देती है जो संहिता से असंगत है, और उत्तराखंड अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम 2010 को नाम लेकर निरस्त करती है।
लिव-इन संबंधों का पंजीकरण और उसकी सज़ाएँ
संहिता का भाग 3 पूरी तरह लिव-इन संबंधों पर है और उसमें बारह धाराएँ हैं, 378 से 389 तक। धारा 378 का दायरा निवास से बँधा नहीं है: राज्य के भीतर लिव-इन में रह रहे दो लोगों पर यह लागू है, चाहे वे उत्तराखंड के निवासी हों या न हों, और राज्य के निवासी बाहर रह रहे हों तो अपने निवास के निबंधक के पास बयान दे सकते हैं। धारा 379 कहती है कि लिव-इन से जन्मी संतान दंपती की वैध संतान है।
धारा 380 चार हालात गिनाती है जिनमें पंजीकरण नहीं होगा: दोनों निषिद्ध संबंध की श्रेणी में हों, और इसका अपवाद यह है कि जिनकी प्रथा ऐसे विवाह की इजाज़त देती हो उन पर रोक नहीं; एक पहले से विवाहित हो या किसी लिव-इन में हो; कोई एक अवयस्क हो; या किसी की सहमति बल, दबाव, अनुचित प्रभाव या धोखे से ली गई हो।
धारा 381 प्रक्रिया देती है। दंपती निर्धारित प्रारूप में बयान देते हैं, निबंधक संक्षिप्त जाँच करके संतुष्ट होता है कि मामला धारा 380 में नहीं आता, और किसी को भी तलब कर सकता है। तीस दिन के भीतर उसे या तो पंजी में दर्ज करके प्रमाणपत्र देना है, या लिखित कारणों के साथ मना करना है। धारा 382 जोड़ती है कि यह पंजीकरण सिर्फ़ अभिलेख के लिए है।
धारा 385 वह प्रावधान है जिस पर अदालत में सबसे ज़्यादा बहस हुई है। उसके तहत हर बयान निबंधक स्थानीय थाने के प्रभारी को भेजेगा, और दोनों में से कोई इक्कीस बरस से कम उम्र का हो तो उसके माता-पिता या संरक्षक को भी सूचित करेगा। निबंधक को लगे कि रिश्ता धारा 380 वाली श्रेणी का है, या बयान संदिग्ध है, तो वह थाने को कार्रवाई के लिए सूचित करेगा। धारा 385(3) के तहत संबंध ख़त्म होने की सूचना दूसरे साथी को जाएगी, और इक्कीस से कम उम्र वालों के माता-पिता को भी।
सज़ाएँ धारा 387 में हैं। एक महीने से ज़्यादा बिना बयान दिए लिव-इन में रहने पर तीन महीने तक की क़ैद या दस हज़ार रुपये तक का जुर्माना या दोनों। बयान में जानबूझकर झूठ लिखने पर तीन महीने तक की क़ैद या पच्चीस हज़ार का जुर्माना। धारा 386 के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर छह महीने तक की क़ैद या पच्चीस हज़ार का जुर्माना। धारा 388 उस महिला को भरण-पोषण का हक़ देती है जिसे उसका लिव-इन साथी छोड़ दे।
पहले बरस के पंजीकरण के आँकड़े
संहिता के महानिबंधक वी. षणमुगम ने 15 जनवरी 2026 को श्रेणीवार गिनती दी। पोर्टल पर कुल 4,98,688 आवेदन आए थे, जिनमें 4,75,639 मंज़ूर और 19,120 ख़ारिज हुए। अकेले विवाह पंजीकरण के 4,08,244 आवेदन थे, जिनमें 3,89,125 प्रमाणपत्र जारी हुए। अभिस्वीकृति के 85,016 आवेदनों में 82,223 मंज़ूर हुए, विवाह-विच्छेद के 374 में 312, और वसीयत के 4,816 में 3,849।
लिव-इन की पंक्ति सबसे छोटी है। 156 आवेदन आए, 65 मंज़ूर हुए और 81 ख़ारिज। जिस प्रावधान पर सारी राजनीतिक बहस टिकी रही, उसके तहत मंज़ूर होने से ज़्यादा आवेदन ख़ारिज हुए।
चार दिन बाद, 19 जनवरी 2026 की दोपहर तक, राज्य ने विवाह पंजीकरण की संख्या 4,74,447 बताई। यह पहली गिनती से टकराती नहीं: 3,89,125 विवाह प्रमाणपत्र और 82,223 अभिस्वीकृतियाँ मिलाकर 15 जनवरी को ही 4,71,348 हो जाती हैं। उसी दिन तक लिव-इन के पंजीकरण 68 थे, विवाह-विच्छेद के प्रमाणपत्र 316, और लिव-इन ख़त्म करने के दो। राज्य के मुताबिक़ प्रमाणपत्र औसतन पाँच दिन में जारी हो रहे हैं, जबकि सीमा पंद्रह दिन की है, और रोज़ाना क़रीब 1,400 पंजीकरण हो रहे हैं; 2010 के पुराने क़ानून के तहत यह संख्या क़रीब 67 थी।
एक आँकड़ा इनसे मेल नहीं खाता। द ट्रिब्यून ने 9 जुलाई 2025 को लिखा था कि तब तक दो लाख से ज़्यादा विवाह और 90 लिव-इन दर्ज हो चुके थे, जबकि छह महीने बाद की सरकारी गिनती में लिव-इन के कुल आवेदन ही 156 हैं। दोनों संख्याएँ एक ही चीज़ नहीं गिन रही होंगी, और इस अंतर पर सरकार का कोई स्पष्टीकरण दर्ज नहीं है।
संहिता लागू होने के बाद से तीन बार बदली भी है। पहला संशोधन अध्यादेश 25 जुलाई 2025 को आया। दूसरा 27 जनवरी 2026 को, संहिता के एक बरस पूरे होने के दिन, अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल ने जारी किया। फिर 6 अप्रैल 2026 को उन्होंने संशोधन विधेयक पर अनुमति दी और वह 7 अप्रैल के गजट में उत्तराखंड अधिनियम संख्या 02, वर्ष 2026 के रूप में छपा। उस अधिनियम ने पूरी संहिता में "दंड प्रक्रिया संहिता 1973" की जगह "भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023" रख दी, धाराओं 7, 10 और 11 में "छह माह" की जगह "एक वर्ष" कर दिया, और धारा 13 में यह जोड़ा कि उप-निबंधक तय समय में कार्रवाई न करे तो मामला अपने आप निबंधक के पास और निबंधक भी चूके तो महानिबंधक के पास चला जाएगा।
पारित होने और लागू होने के बीच
धारा 1(2) जैसी एक पंक्ति हर संहिता में है: क़ानून उस दिन से चलेगा जो दिन राज्य सरकार गजट में अधिसूचित करे। विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक राज्यपाल के पास जाता है, समवर्ती सूची के इस विषय पर वह राष्ट्रपति के लिए आरक्षित होता है, अनुमति मिलने पर गजट में छपता है, फिर नियमावली बनती है, और उसके बाद लागू होने की तारीख़ अधिसूचित होती है। उत्तराखंड में राष्ट्रपति की अनुमति की तारीख़ और उस अधिसूचना के बीच साढ़े दस महीने बीते।
गुजरात, असम और मध्य प्रदेश, तीनों में विधानसभा का काम पूरा हो चुका है। तीनों में से किसी के लिए ऐसी अधिसूचना अब तक नहीं छपी है, कोई नियमावली सार्वजनिक नहीं हुई है, और उत्तराखंड जैसा कोई पंजीकरण पोर्टल नहीं खुला है। असम के मुख्यमंत्री ने पारित होने के दिन ही यह रास्ता बता दिया था। दैनिक भास्कर ने 13 सितंबर 2026 को गृह मंत्री के बयान पर लिखते हुए यही दर्ज किया कि संहिता अभी सिर्फ़ उत्तराखंड में लागू है।
गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाएँ
गुजरात में समिति 4 फ़रवरी 2025 को बनी और उसकी अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई थीं, वही जिन्होंने उत्तराखंड की समिति की अध्यक्षता की थी। समिति को बीस लाख से ज़्यादा सुझाव मिले। रिपोर्ट 17 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को सौंपी गई, और ठीक एक हफ़्ते बाद, 24 मार्च 2026 को, सात घंटे से ज़्यादा चली बहस के बाद विधानसभा ने बहुमत से ध्वनिमत पर विधेयक पारित कर दिया। आकाशवाणी ने 25 मार्च की सुबह 6:57 पर लिखा कि विधेयक "कल" पारित हुआ; देशगुजरात और द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में तारीख़ 25 मार्च छपी। संहिता राज्य के बाहर रहने वाले गुजरात के निवासियों पर भी लागू होगी, पर अनुसूचित जनजातियों पर नहीं।
असम में मंत्रिमंडल ने मसौदा 13 मई 2026 को मंज़ूर किया। सोमवार, 25 मई को सोलहवीं असम विधानसभा के पहले ही सत्र में संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की ओर से विधेयक पेश किया, और 27 मई को सत्र के आख़िरी दिन वह पारित हुआ। उसी दिन मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा कि विधेयक अब राज्यपाल के पास जाएगा, फिर राष्ट्रपति की अनुमति के लिए, और मंज़ूरी के कुछ ही समय बाद संहिता लागू कर दी जाएगी। गृह मंत्री ने उसी दिन सोशल मीडिया पर असम को बधाई दी।

मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल ने मसौदा 19 जुलाई 2026 को मंज़ूर किया, अगले कार्यदिवस 20 जुलाई को मंत्री गौतम टेटवाल ने उसे सदन में रखा, और 21 जुलाई को दो घंटे की बहस के बाद वह ध्वनिमत से पारित हो गया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और विधायक आरिफ़ मसूद की यह माँग कि विधेयक प्रवर समिति को भेजा जाए, ध्वनिमत से ख़ारिज हुई। सिटिज़ंस फ़ॉर जस्टिस ऐंड पीस ने 3 अगस्त 2026 को दर्ज किया कि पारित होने के बाद भी विधेयक की प्रति सार्वजनिक पटल पर नहीं रखी गई।
अनुच्छेद 44, प्रविष्टि 5 और राष्ट्रपति की अनुमति
अनुच्छेद 44 का पूरा पाठ एक वाक्य का है: राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। यह भाग 4 के नीति-निदेशक तत्वों में है, और अनुच्छेद 37 कहता है कि इस भाग के उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे।
विधायी शक्ति सातवीं अनुसूची से आती है। समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 का पाठ है: विवाह और विवाह-विच्छेद; शिशु और अवयस्क; दत्तक ग्रहण; विल, निर्वसीयत और उत्तराधिकार; संयुक्त परिवार और विभाजन; वे सभी विषय जिनके संबंध में न्यायिक कार्यवाहियों में पक्षकार इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले अपनी व्यक्तिगत विधि के अधीन थे। इस सूची पर संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों क़ानून बना सकते हैं।
टकराव यहीं से शुरू होता है। इन्हीं विषयों पर केंद्र के क़ानून पहले से चल रहे हैं: हिंदू विवाह अधिनियम 1955, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925, विशेष विवाह अधिनियम 1954 और शरीयत अधिनियम 1937। उत्तराखंड की धारा 390 इनसे असंगत जो कुछ है, उसे राज्य में प्रभावहीन कर देती है।
अनुच्छेद 254(1) कहता है कि राज्य के क़ानून का कोई उपबंध समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद के या किसी विद्यमान क़ानून से प्रतिकूल हो, तो संसद का क़ानून अभिभावी होगा और राज्य का क़ानून प्रतिकूलता की सीमा तक शून्य होगा। 254(2) उसका अपवाद है: वह क़ानून राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया हो और अनुमति मिल गई हो, तो वह उस राज्य में अभिभावी होगा। उत्तराखंड इसी रास्ते से गया, और 11 मार्च 2024 की अनुमति उसी अपवाद का काग़ज़ है।
254(2) के साथ एक परंतुक भी है, और वह कम पढ़ा जाता है। उसके मुताबिक़ इस खंड की कोई बात संसद को उसी विषय पर कभी भी क़ानून बनाने से नहीं रोकेगी, जिसमें राज्य के उस क़ानून को संशोधित या निरस्त करने वाला क़ानून भी शामिल है। राष्ट्रपति की अनुमति राज्य की संहिता को केंद्रीय क़ानूनों के ऊपर बिठा देती है, संसद के ऊपर नहीं।
अनुसूचित जनजातियों की छूट और उसका दायरा
उत्तराखंड की संहिता की धारा 2 का शीर्षक ही "अनुसूचित जनजातियों पर संहिता की प्रयोज्यता" है, और उसका पाठ यह है कि इस संहिता की कोई बात अनुच्छेद 366 के खंड (25) और अनुच्छेद 342 के अर्थ में आने वाली किसी अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर, तथा उन व्यक्तियों और समूहों पर लागू नहीं होगी जिनके रूढ़िगत अधिकार भाग 21 से संरक्षित हैं। नियमावली 2025 का नियम 2 यही दोहराता है। गुजरात और असम की संहिताओं में भी यही छूट है, और मध्य प्रदेश के विधेयक में अनुसूचित जनजातियों के साथ विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह भी बाहर हैं।
अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श के बाद अधिसूचना से तय करते हैं कि किसी राज्य में कौन सी जनजातियाँ अनुसूचित जनजाति मानी जाएँगी, और उस सूची में जोड़ना या घटाना सिर्फ़ संसद कर सकती है। भाग 21 अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंधों का है, और उसी में अनुच्छेद 371क तथा 371छ आते हैं: नगा और मिज़ो की धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं, उनकी रूढ़िगत विधि, और उस विधि के अनुसार न्याय के प्रशासन पर संसद का कोई अधिनियम उन राज्यों में तब तक लागू नहीं होगा जब तक वहाँ की विधानसभा प्रस्ताव पारित करके ऐसा न तय करे।
छूट का आकार राज्य दर राज्य बदलता है। जनजातीय कार्य मंत्रालय के दस्तावेज़ में जनगणना 2011 के आँकड़े राज्यवार दर्ज हैं। उत्तराखंड की कुल आबादी 1,00,86,292 थी, और उसमें अनुसूचित जनजाति के 2,91,903 लोग, यानी 2.9 फ़ीसदी। गुजरात में 6,04,39,692 में से 89,17,174, यानी 14.8 फ़ीसदी। असम में 3,12,05,576 में से 38,84,371, यानी 12.4 फ़ीसदी। मध्य प्रदेश में 7,26,26,809 में से 1,53,16,784, यानी 21.1 फ़ीसदी। चारों जोड़ें तो जिन राज्यों की विधानसभाएँ संहिता पारित कर चुकी हैं, उनमें 2 करोड़ 84 लाख से ज़्यादा लोग उसके दायरे से बाहर रहेंगे।

आगे यह अनुपात और बदलेगा: राजस्थान में 13.5 फ़ीसदी, महाराष्ट्र में 9.4 और पश्चिम बंगाल में 5.8। उसी दस्तावेज़ में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, चंडीगढ़ और पुदुच्चेरी के आगे "एनएसटी" लिखा है, यानी 2011 तक वहाँ कोई अधिसूचित अनुसूचित जनजाति थी ही नहीं। वहाँ यही छूट किसी को बाहर नहीं रखेगी।
समितियाँ और सुझावों की गिनती
चार राज्यों के अलावा तीन और ने समितियाँ बना दी हैं। राजस्थान में जून 2026 में पाँच सदस्यों की समिति बनी, जिसकी अध्यक्ष न्यायमूर्ति देसाई हैं और जिसमें सेवानिवृत्त आईएएस शत्रुघ्न सिंह, अतिरिक्त महाधिवक्ता बंसत सिंह छाबा, सेवानिवृत्त प्राचार्य रामस्वरूप अग्रवाल, डॉ. शुचि चौहान और सदस्य सचिव भास्कर ए. सावंत हैं। महाराष्ट्र में 9 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सात सदस्यों की समिति बनाई, जिसे छह महीने में रिपोर्ट देनी है। पश्चिम बंगाल के मंत्रिमंडल ने 2 जुलाई 2026 को मसौदा विधेयक मंज़ूर किया, और 10 जुलाई की अधिसूचना ने अनुच्छेद 44 का हवाला देकर उसी मसौदे को परखने के लिए नौ सदस्यों की समिति बना दी। न्यायमूर्ति देसाई अब तक छह राज्यों की ऐसी समितियों की अध्यक्षता कर चुकी हैं।
राजस्थान की समिति ने अपने जन परामर्श का ब्योरा छापा है, और वह ब्योरा गिनती के तरीक़े के बारे में ज़्यादा बताता है। कुल उत्तरदाताओं में 12,25,453 व्हाट्सऐप संदेशों से आए, 1,48,431 आधिकारिक वेबसाइट से, 1,657 आईवीआरएस कॉल से, 1,192 ज़िला स्तरीय जनसुनवाइयों से और 40 डाक से। लगभग तेरह लाख सत्तर हज़ार में से नौ में से आठ राय एक मैसेजिंग ऐप से होकर आई।
उसी रिपोर्ट की आयु-तालिका एक और बात दर्ज करती है। व्हाट्सऐप से आई राय में सबसे बड़ा वर्ग अठारह बरस से कम उम्र वालों का है, 3,22,609 उत्तर; 26 से 35 बरस वालों के 2,97,716 और 18 से 25 वालों के 2,46,663। विवाह, तलाक़ और उत्तराधिकार के सवालों पर सबसे ज़्यादा राय उन लोगों से आई जिनकी उम्र विवाह की क़ानूनी उम्र से भी कम है। सुझावों की अंतिम तारीख़ 5 अगस्त 2026 थी और पोर्टल पर अब भी लिखा है कि उनका अध्ययन चल रहा है।
मध्य प्रदेश की गिनती इससे बहुत छोटी है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के हवाले से सिटिज़ंस फ़ॉर जस्टिस ऐंड पीस ने लिखा कि 1,164 से ज़्यादा सुझाव मिले और 93 फ़ीसदी नागरिकों का समर्थन रहा। राज्य की समिति के पोर्टल पर सुझाव की तारीख़ 22 जून 2026 दर्ज है। विधानसभा 21 जुलाई को संहिता पारित कर चुकी है, और 13 सितंबर 2026 को वही पोर्टल अब भी कह रहा है कि प्राप्त सुझावों का समिति परीक्षण और अध्ययन कर रही है।
अदालतों में दायर याचिकाएँ और उनकी स्थिति
संहिता लागू होने के दो हफ़्ते के भीतर उत्तराखंड हाई कोर्ट में चार रिट याचिकाएँ दायर हो गई थीं और 12 फ़रवरी 2025 को अदालत ने राज्य सरकार तथा भारत संघ को नोटिस जारी किए। याचिकाकर्ताओं में भीमताल के सुरेश सिंह नेगी और आरुषि गुप्ता की जनहित याचिकाएँ थीं, और जय त्रिपाठी की अपनी। आपत्ति लिव-इन के अनिवार्य पंजीकरण पर रही: प्रारूप में माँगी जा रही निजी जानकारी को निजता के अधिकार में दख़ल बताया गया।
17 फ़रवरी 2025 की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र की पीठ ने मौखिक रूप से कहा, "राज्य ने यह नहीं कहा है कि आप साथ मत रहिए। जब आप विवाह के बिना खुलेआम साथ रह रहे हैं, तो रहस्य क्या है? किस निजता में दख़ल हो रहा है?" पीठ ने यह याचिका बाक़ी याचिकाओं के साथ नत्थी कर दी और कहा कि किसी पर कार्रवाई हो तो वह अदालत आ सकता है। 20 मई 2025 को अदालत ने केंद्र से तीन हफ़्ते में जवाब माँगा। इन याचिकाओं पर प्रावधानों की वैधता को लेकर कोई फ़ैसला अब तक दर्ज नहीं हुआ है।
इस बीच वही अदालत उसी पंजी का इस्तेमाल दूसरी तरह करती रही है। 10 जून 2026 को हाई कोर्ट ने एक किशोर लिव-इन दंपती को सुरक्षा दी और संहिता के तहत पंजीकरण कराने का निर्देश दिया। 27 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति आलोक महरा ने हरिद्वार के लक्सर थाने के प्रभारी को निर्देश दिया कि संहिता के तहत पंजीकृत एक लिव-इन दंपती को ख़तरे का आकलन करके ज़रूरी सुरक्षा दी जाए; उन्होंने गाँव वालों से ख़तरे की आशंका जताई थी। उन्हीं याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि पुरुष पहले से विवाहित है और पत्नी नवंबर 2024 से अलग रह रही है। संहिता की धारा 380(2) ऐसे संबंध के पंजीकरण पर रोक लगाती है जिसमें एक पक्ष पहले से विवाहित हो। आदेश इस बिंदु को नहीं छूता, और उसमें लिखा है कि यह संरक्षण संपत्ति के किसी दावे तक नहीं फैलेगा और न ही वैवाहिक, दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों पर उसका असर माना जाएगा।
दूसरी संहिताओं पर चुनौती की घोषणाएँ हो चुकी हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 3 अप्रैल 2026 को कहा कि वह गुजरात की संहिता को अदालत में चुनौती देगा, और असम जमीयत उलमा ने 8 जून 2026 को वहाँ की संहिता को "काला क़ानून" कहकर यही बात कही। इससे अलग, 9 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट शरीयत अधिनियम 1937 के उत्तराधिकार प्रावधानों को महिलाओं से भेदभाव बताने वाली याचिका सुन रहा था, और पीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि इसका उत्तर समान नागरिक संहिता है। 16 अप्रैल 2026 को उसी याचिका पर अदालत ने केंद्र से जवाब माँगा।
स्रोतसमान नागरिक संहिता, उत्तराखंड, नियमावली 2025 की आधिकारिक प्रति; इसी दस्तावेज़ के पहले पन्नों पर अधिसूचना संख्या 101/XX-5/25-03(10)2024-टी.सी-II/2025 है, जिसके ज़रिए राज्यपाल ने संहिता के लागू होने की तारीख़ 27 जनवरी 2025 तय की, उत्तराखंड असाधारण गजट, 12 मार्च 2024: समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड, 2024 (उत्तराखंड अधिनियम संख्या 3, वर्ष 2024) का पूरा पाठ, अनुच्छेद 348(3) के तहत प्रकाशित अंग्रेज़ी अनुवाद सहित, उत्तराखंड के समान नागरिक संहिता पोर्टल पर दर्ज शासनादेशों की सूची, जिसमें 27 जनवरी 2026 का अध्यादेश और 7 अप्रैल 2026 का संशोधन अधिनियम शामिल हैं, उत्तराखंड असाधारण गजट, 7 अप्रैल 2026: समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड (संशोधन) अधिनियम, 2026 (उत्तराखंड अधिनियम संख्या 02, वर्ष 2026), राज्यपाल की 6 अप्रैल 2026 की अनुमति के साथ, भारत का संविधान, विधि एवं न्याय मंत्रालय का आधिकारिक पाठ: अनुच्छेद 44, अनुच्छेद 254, अनुच्छेद 342, अनुच्छेद 371क और 371छ, और सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5, जनजातीय कार्य मंत्रालय, 'एसटीज़ स्टैटिस्टिकल प्रोफ़ाइल ऐट अ ग्लांस': जनगणना 2011 के आधार पर राज्यवार कुल आबादी और अनुसूचित जनजाति आबादी, समान नागरिक संहिता समिति, राजस्थान: जन परामर्श सर्वेक्षण की रिपोर्ट, माध्यमवार और आयुवर्गवार आँकड़ों सहित, समान नागरिक संहिता समिति, राजस्थान का आधिकारिक पोर्टल: समिति के सदस्य और 5 अगस्त 2026 की सुझाव-सीमा, 13 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, उच्च स्तरीय समिति, समान नागरिक संहिता, मध्य प्रदेश का आधिकारिक पोर्टल, 13 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, आकाशवाणी समाचार, 27 मई 2026, रात 9:01: असम विधानसभा में संहिता पारित, और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का यह बयान कि विधेयक राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति के पास जाएगा, आकाशवाणी समाचार, 25 मार्च 2026, सुबह 6:57: गुजरात विधानसभा में सात घंटे से ज़्यादा की बहस के बाद विधेयक पारित, आकाशवाणी समाचार, 27 जनवरी 2026, सुबह 8:18: मुख्यमंत्री कार्यालय की विज्ञप्ति के हवाले से पहले बरस के पंजीकरण के आँकड़े और 2026 का संशोधन अध्यादेश, आउटलुक इंडिया, 19 जनवरी 2026: 19 जनवरी की दोपहर तक के राज्य के आँकड़े, जिनमें विवाह, लिव-इन और विवाह-विच्छेद के पंजीकरण अलग-अलग दर्ज हैं, ईटीवी भारत, 15 जनवरी 2026: समान नागरिक संहिता के महानिबंधक वी. षणमुगम के दिए आवेदन, मंज़ूरी और ख़ारिजी के श्रेणीवार आँकड़े, द ट्रिब्यून, 9 जुलाई 2025: 27 जुलाई 2025 की समय-सीमा से पहले दो लाख विवाह और 90 लिव-इन की गिनती, लाइव लॉ, 17 फ़रवरी 2025: उत्तराखंड हाई कोर्ट में लिव-इन पंजीकरण की चुनौती पर मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र की मौखिक टिप्पणियाँ, अमर उजाला, नैनीताल, 27 अगस्त 2026: न्यायमूर्ति आलोक महरा का हरिद्वार के लक्सर थाने को दिया गया सुरक्षा का आदेश, सिटिज़ंस फ़ॉर जस्टिस ऐंड पीस, 3 अगस्त 2026: चार राज्यों के क़ानून और राजस्थान, महाराष्ट्र व पश्चिम बंगाल की समितियों का ब्योरा, सदस्यों के नाम सहित, द वीक, 13 सितंबर 2026: पीटीआई के हवाले से मुंबई की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में गृह मंत्री के शब्द, द सियासत डेली, 13 सितंबर 2026: उसी बयान का पीटीआई पाठ और 'सेवा संकल्प अभियान' का मौक़ा