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काम की बात

नशे की लत है और पुलिस का डर भी: क़ानून में एक धारा है जो इलाज कराने पर मुक़दमे से बचाती है

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 64ए कहती है कि जो व्यक्ति ख़ुद इलाज के लिए आगे आता है, उस पर कम मात्रा वाले मामले में मुक़दमा नहीं चलेगा। शर्त एक है, और उसे न जानने पर यह छूट वापस ली जा सकती है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली का बच्चों का वार्ड, 1962 की तस्वीर। धारा 64ए की छूट सरकारी या सरकार से मान्यता प्राप्त संस्थान में इलाज कराने पर ही मिलती है
तस्वीर: Cecil Stoughton, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

अगर घर में किसी को नशे की लत है, तो सबसे पहले जो डर आता है वह इलाज का नहीं होता।

डर यह होता है कि अस्पताल ले गए तो कहीं पुलिस का मामला न बन जाए।

यही डर सबसे ज़्यादा लोगों को इलाज से दूर रखता है, और इसी डर के लिए क़ानून में एक धारा मौजूद है जिसके बारे में लगभग किसी को पता नहीं।

धारा 64ए क्या कहती है

स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम 1985 में यह धारा जोड़ी गई थी। इसका पाठ वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग की वेबसाइट पर मौजूद है।

इसका सार यह है।

कोई भी नशे का आदी व्यक्ति, जिस पर धारा 27 के तहत या कम मात्रा वाले नशीले पदार्थ से जुड़े अपराध का आरोप है, अगर वह सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा चलाए जा रहे या मान्यता प्राप्त किसी अस्पताल या संस्थान से नशामुक्ति का इलाज कराने के लिए ख़ुद आगे आता है और वह इलाज कराता है, तो उस पर धारा 27 के तहत या कम मात्रा वाले अपराधों के लिए किसी भी धारा के तहत मुक़दमा नहीं चलाया जाएगा।

इसके साथ एक शर्त लगी है। यह छूट वापस ली जा सकती है, अगर वह व्यक्ति नशामुक्ति का पूरा इलाज नहीं कराता।

इस एक वाक्य में तीन चीज़ें हैं जिन्हें अलग-अलग समझना ज़रूरी है। किस पर लागू होता है, किन अपराधों पर लागू होता है, और छूट कब चली जाती है।

धारा 27 क्या है

धारा 27 सेवन का अपराध है, यानी नशीला पदार्थ ख़ुद इस्तेमाल करना।

इसकी सज़ा कुछ पदार्थों के मामले में एक साल तक की क़ैद है, और बाक़ी सभी पदार्थों के मामले में छह महीने तक की।

यानी क़ानून सेवन को अपराध मानता है। धारा 64ए उस अपराध को ख़त्म नहीं करती। वह इतना कहती है कि अगर आदी व्यक्ति ख़ुद इलाज कराने चला जाए, तो उस पर मुक़दमा नहीं चलेगा।

फ़र्क़ यह है कि क़ानून की नज़र में वह व्यक्ति अपराधी से मरीज़ बन जाता है, बशर्ते वह पहल ख़ुद करे।

एक सरकारी अस्पताल का वार्ड। इलाज की पहल ख़ुद करने पर ही धारा 64ए लागू होती है
तस्वीर: Ministry of Ports, Shipping and Waterways, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

"कम मात्रा" कितनी होती है

यह पूरी धारा का सबसे अहम शब्द है, क्योंकि छूट सिर्फ़ कम मात्रा तक है।

कम मात्रा और व्यापारिक मात्रा, दोनों की परिभाषा एक अधिसूचना में दी गई है जो वित्त मंत्रालय ने 19 अक्तूबर 2001 को जारी की थी। उसमें 239 पदार्थों की सूची है और हर एक के लिए दो संख्याएँ।

कुछ उदाहरण।

हेरोइन के लिए कम मात्रा 5 ग्राम है और व्यापारिक मात्रा 250 ग्राम।

गांजे के लिए कम मात्रा 1 किलोग्राम है और व्यापारिक मात्रा 20 किलोग्राम।

चरस के लिए कम मात्रा 100 ग्राम है और व्यापारिक मात्रा 1 किलोग्राम।

इन दोनों के बीच जो मात्रा पड़ती है, उसे मध्यवर्ती मात्रा कहते हैं, और उस पर सज़ा दस साल तक हो सकती है।

धारा 64ए की छूट सिर्फ़ पहली श्रेणी तक है। मध्यवर्ती और व्यापारिक मात्रा में यह लागू नहीं होती।

सबसे बड़ा जोखिम यहाँ है, और वह वज़न का है

अब वह बात जो सबसे कम लोगों को पता है, और जिसकी वजह से लोग यह मानकर चलते हैं कि उनका मामला कम मात्रा का है, जबकि वह नहीं होता।

नशीला पदार्थ शुद्ध रूप में शायद ही मिलता है। उसे किसी और चीज़ में मिलाकर बेचा जाता है। सवाल यह है कि मात्रा नापते समय क्या गिना जाएगा, सिर्फ़ नशीला हिस्सा, या पूरी पुड़िया।

उच्चतम न्यायालय ने 2020 में हीरा सिंह बनाम भारत संघ के मामले में यह तय किया कि मिश्रण की स्थिति में कुल वज़न गिना जाएगा, सिर्फ़ नशीले तत्व का नहीं।

इसका मतलब व्यवहार में यह है।

अगर किसी के पास पाँच ग्राम का पैकेट है जिसमें एक ग्राम हेरोइन है और बाक़ी कुछ और, तो क़ानून की नज़र में मात्रा एक ग्राम नहीं, पाँच ग्राम है।

इस फ़ैसले से पहले 2008 का एक फ़ैसला चलता था जिसमें सिर्फ़ नशीले तत्व की गिनती होती थी। 2020 के फ़ैसले ने उसे पलट दिया।

इसलिए यह मान लेना कि "थोड़ा ही तो था" ख़तरनाक है। जो थोड़ा दिखता है, वह काग़ज़ पर व्यापारिक मात्रा निकल सकता है, और उस स्थिति में धारा 64ए किसी काम की नहीं रहती।

"ख़ुद आगे आना" का मतलब क्या है

धारा में शब्द है कि व्यक्ति स्वेच्छा से इलाज कराने जाए।

इसका सीधा मतलब यह है कि पहल उसकी अपनी होनी चाहिए। किसी अदालत के आदेश पर या हिरासत में जाकर इलाज कराना इस धारा की मंशा नहीं है।

समय भी मायने रखता है। जितनी जल्दी यह पहल होगी, उसका असर उतना साफ़ रहेगा। गिरफ़्तारी के बाद पहली बार इलाज की बात उठाना क़ानूनी रूप से ज़्यादा उलझा हुआ रास्ता है।

इसलिए अगर घर में किसी को लत है और अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं है, तो इलाज शुरू कराना दो वजहों से सही है। पहली, वह ठीक हो सकता है। दूसरी, अगर कभी कोई मामला बना, तो रिकॉर्ड में यह दर्ज होगा कि इलाज पहले से चल रहा था।

इलाज कहाँ से कराना है, यह भी धारा तय करती है

यह हिस्सा अक्सर छूट जाता है और इसी पर पूरी छूट टिकी है।

धारा कहती है कि इलाज सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा चलाए जा रहे या उससे मान्यता प्राप्त अस्पताल या संस्थान से होना चाहिए।

यानी किसी भी निजी केंद्र में भर्ती हो जाना पर्याप्त नहीं है। केंद्र सरकारी होना चाहिए या सरकार से मान्यता प्राप्त।

देश में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय क़रीब 480 एकीकृत पुनर्वास केंद्र चलाने में सहयोग करता है, जिन्हें आईआरसीए कहते हैं। इनमें से ज़्यादातर स्वयंसेवी संस्थाएँ चलाती हैं, पर वे मंत्रालय से जुड़ी होती हैं।

इनमें भर्ती की सुविधा होती है और काम पाँच चरणों में होता है: पहचान, प्रेरक परामर्श, विषहरण यानी शरीर से नशा निकालना, पूरी रिकवरी, और उसके बाद समाज में वापसी।

6 सितंबर 2026 को पणजी में गृह मंत्री ने कहा कि इन केंद्रों की संख्या तीन गुना बढ़ाकर 1,751 की जाएगी।

अपने ज़िले का मान्यता प्राप्त केंद्र ढूँढ़ने के लिए मंत्रालय का उपचार केंद्र पन्ना है, जिसका पता nmba.dosje.gov.in पर मिलता है।

भर्ती कराते समय एक काम ज़रूर करें। केंद्र से यह लिखवाकर लें कि वह सरकार से मान्यता प्राप्त है, और भर्ती की तारीख़ का काग़ज़ संभालकर रखें।

गुड़गाँव में एक कॉल सेंटर की इमारत। मानस हेल्पलाइन 1933 चौबीसों घंटे चलती है और नशामुक्ति से जुड़ी कॉल मंत्रालय की हेल्पलाइन 14446 पर भेजी जाती हैं
तस्वीर: Ekabhishek, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

दो नंबर, और उनका काम अलग-अलग है

यहाँ भ्रम होता है, इसलिए दोनों अलग समझ लीजिए।

1933, यानी मानस। पूरा नाम मादक पदार्थ निषेध आसूचना केंद्र। इसे 18 जुलाई 2024 को शुरू किया गया था। यह टोल-फ़्री है, चौबीसों घंटे चलती है, और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो से जुड़ी है।

इस पर दो अलग काम होते हैं। एक, तस्करी, भंडारण, निर्माण या खेती की जानकारी गुमनाम रहकर देना। दो, नशामुक्ति और पुनर्वास के लिए सलाह माँगना।

इसके साथ एक वेब पोर्टल, एक मोबाइल ऐप और उमंग ऐप भी है।

14446, सामाजिक न्याय मंत्रालय की हेल्पलाइन। यह ख़ास तौर पर नशामुक्ति के लिए है। 1933 पर आई नशामुक्ति से जुड़ी कॉल इसी पर भेजी जाती हैं।

अगर आपको सिर्फ़ इलाज की जानकारी चाहिए, तो सीधे 14446 पर बात कीजिए।

अगर किसी तस्करी की जानकारी देनी है और नाम नहीं बताना, तो 1933।

फ़ोन करने से पहले क्या तैयार रखें

बातचीत तेज़ और काम की हो, इसके लिए ये चीज़ें सामने रखिए।

व्यक्ति की उम्र, और लत कितने समय से है।

कौन-सा पदार्थ, और किस तरह लिया जाता है।

पिछली बार कब लिया, क्योंकि विषहरण की योजना इसी पर बनती है।

कोई और बीमारी या दवा चल रही हो तो उसका ब्योरा।

पहले कभी इलाज कराया हो तो उसका काग़ज़।

और अपना ज़िला, ताकि नज़दीकी केंद्र बताया जा सके।

अगर वह व्यक्ति ख़ुद तैयार न हो

यह सबसे आम स्थिति है, और सबसे मुश्किल भी।

धारा 64ए स्वेच्छा की शर्त लगाती है, इसलिए घरवाले उसकी तरफ़ से यह पहल नहीं कर सकते। पर वे दो काम कर सकते हैं।

पहला, हेल्पलाइन पर ख़ुद बात कर सकते हैं। 14446 पर परिवार के लोग भी सलाह ले सकते हैं, और अक्सर पहली कॉल यही होती है। वहाँ यह बताया जाता है कि व्यक्ति को इलाज के लिए तैयार करने की कोशिश किस तरह की जाए।

दूसरा, नज़दीकी केंद्र में जाकर पहले ख़ुद परामर्श ले सकते हैं। प्रेरक परामर्श का पूरा चरण इसी के लिए बना है, कि जो व्यक्ति तैयार नहीं है उसे तैयार किया जा सके।

जो नहीं करना चाहिए वह है ज़बरदस्ती भर्ती कराना या घर में बंद कर देना। इससे भरोसा टूटता है, और अगली बार वह व्यक्ति मदद माँगने की जगह छिपाना शुरू कर देता है।

अगर पुलिस पहले ही पकड़ चुकी है

तब भी रास्ता बंद नहीं होता, पर वह अलग रास्ता है।

पहली बात ज़मानत की है। एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 ज़मानत पर कड़ी शर्तें लगाती है, और इसी वजह से इस क़ानून की सबसे ज़्यादा चर्चा होती है।

पर वे शर्तें सब पर लागू नहीं होतीं।

धारा 37 की दोहरी शर्त व्यापारिक मात्रा वाले मामलों पर लगती है, और धारा 19, 24 तथा 27ए के अपराधों पर। इनमें अदालत को यह मानना पड़ता है कि आरोपी दोषी नहीं है और ज़मानत पर रहते हुए कोई अपराध नहीं करेगा। यह बहुत ऊँची कसौटी है।

कम मात्रा वाले मामलों पर यह कसौटी लागू नहीं होती। वहाँ ज़मानत आम मुक़दमों की तरह देखी जाती है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने तो यहाँ तक कहा है कि कम मात्रा वाला मामला ज़मानती है और आरोपी को अर्जी दिए बिना भी ज़मानत का हक़ है।

इसलिए अगर मामला कम मात्रा का है, तो सबसे पहले वकील को यही बताइए, क्योंकि कई बार पूरे एनडीपीएस मामले को एक ही तराज़ू में तौल दिया जाता है।

दूसरी बात धारा 64ए की है। अगर इलाज पहले से चल रहा था, तो उसके काग़ज़ अदालत के सामने रखिए। भर्ती की तारीख़, केंद्र की मान्यता, और इलाज पूरा होने का प्रमाणपत्र, तीनों काम आते हैं।

इलाज में होता क्या है

लोग अक्सर यह सोचकर देर करते हैं कि पता नहीं क्या होगा। इसलिए ढाँचा जान लेना ठीक है।

पहला चरण पहचान का है, जिसमें यह देखा जाता है कि निर्भरता किस स्तर की है और कौन-सा पदार्थ है।

दूसरा प्रेरक परामर्श है। यह इसलिए है कि ज़्यादातर लोग पहली बार पूरी तरह तैयार होकर नहीं आते।

तीसरा विषहरण है, यानी शरीर से नशा निकालना। यह चरण चिकित्सकीय निगरानी में होता है, क्योंकि अचानक बंद करने पर शरीर में तकलीफ़ होती है और कुछ पदार्थों में यह गंभीर भी हो सकती है। यही वह हिस्सा है जिसे घर पर करने की कोशिश सबसे ज़्यादा नुक़सान करती है।

चौथा चरण लंबी रिकवरी का है, जिसमें परामर्श और दवा दोनों चल सकती हैं।

पाँचवाँ चरण अनुवर्ती देखभाल और समाज में वापसी का है।

एक बात साफ़ कह देनी चाहिए। दोबारा लत लगना इस बीमारी का हिस्सा है, नाकामी का सबूत नहीं। जो केंद्र यह कहे कि एक बार में हमेशा के लिए ठीक कर देंगे, उससे सावधान रहना चाहिए।

ख़र्च कितना आता है

सरकारी अस्पतालों और मंत्रालय से जुड़े केंद्रों में इलाज नि:शुल्क या नाममात्र शुल्क पर होता है।

निजी केंद्रों की फ़ीस अलग होती है और उस पर कोई एक दर नहीं है।

पर यहाँ ख़र्च से बड़ा एक और कारण है सरकारी या मान्यता प्राप्त केंद्र चुनने का। धारा 64ए की छूट इसी शर्त से बँधी है। महँगा निजी केंद्र चुनने पर इलाज तो हो जाएगा, पर वह क़ानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी जिसके लिए यह पूरा लेख लिखा गया है।

वाराणसी की एक दवा दुकान। विषहरण चिकित्सकीय निगरानी में होता है, और यही वह चरण है जिसे घर पर करने की कोशिश सबसे ज़्यादा नुक़सान करती है
तस्वीर: Jorge Royan, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

यह धारा क्या नहीं करती

इसे साफ़ कह देना ज़रूरी है, वरना ग़लतफ़हमी और नुक़सान करेगी।

यह तस्करी करने वालों को नहीं बचाती। छूट सिर्फ़ आदी व्यक्ति के लिए है, और सिर्फ़ सेवन या कम मात्रा वाले मामलों में।

यह व्यापारिक मात्रा पर लागू नहीं होती, और मध्यवर्ती मात्रा पर भी नहीं।

यह गिरफ़्तारी को अपने आप नहीं रोकती। यह मुक़दमे के स्तर पर काम करती है।

और यह एक बार की छूट नहीं है जो हमेशा चलती रहे। इलाज अधूरा छोड़ने पर छूट वापस ली जा सकती है, और यह शर्त धारा में लिखी है।

आख़िरी बात

यह लेख जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अगर मामला दर्ज हो चुका है, तो वकील से बात कीजिए, और उन्हें धारा 64ए का हवाला दीजिए, क्योंकि यह इतनी कम इस्तेमाल होती है कि अक्सर याद नहीं आती।

पर अगर अभी कोई मामला नहीं है और घर में किसी को लत है, तो इंतज़ार करने की कोई वजह नहीं है।

क़ानून उस व्यक्ति को अपराधी मानने से पहले एक मौक़ा देता है। वह मौक़ा तभी काम आता है जब पहल ख़ुद की जाए।

आख़िरी अपडेट: 7 सितंबर 2026

स्रोतराजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, धारा 64ए का पाठ, राजस्व विभाग, एनडीपीएस अधिनियम में प्रक्रियागत सुरक्षा और छूट, गृह मंत्रालय, मानस हेल्पलाइन की शुरुआत, 18 जुलाई 2024, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, उपचार केंद्रों की सूची, उच्चतम न्यायालय, हीरा सिंह बनाम भारत संघ, 2020, लाइव लॉ, कम मात्रा वाले मामलों में ज़मानत पर पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय

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