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हिसाब-किताब

जेल में बंद हर चार में से तीन लोगों पर मुक़दमा अभी चल ही रहा है, दो में से तीन नहीं

एनसीआरबी की ताज़ा कारागार रिपोर्ट कहती है कि 72.6 फ़ीसदी क़ैदी विचाराधीन हैं। जो आँकड़ा हर जगह दोहराया जाता है, दो-तिहाई वाला, वह 2005 का है।

जेल में बंद हर चार में से तीन लोगों पर मुक़दमा अभी चल ही रहा है, दो में से तीन नहीं

31 दिसंबर 2024 को भारत की जेलों में 5,11,542 लोग बंद थे।

उनमें 3,71,440 विचाराधीन थे। यानी वे लोग जिन पर मुक़दमा चल रहा था और जिनके बारे में अदालत ने कुछ तय नहीं किया था।

एनसीआरबी की कारागार सांख्यिकी भारत 2024 में यह हिस्सा 72.6 फ़ीसदी दर्ज है।

दो-तिहाई वाला आँकड़ा बीस साल पुराना है

हर लेख, हर बहस, हर भाषण में यही सुनाई देता है कि भारत की जेलों में दो-तिहाई क़ैदी विचाराधीन हैं।

5,11,542 का दो-तिहाई 3,41,028 होता है।

असली संख्या 3,71,440 है। यानी दोहराया जाने वाला आँकड़ा 30,412 लोगों को गिनती से बाहर कर देता है।

72.6 फ़ीसदी दो में से तीन नहीं है। वह चार में से तीन के ज़्यादा क़रीब है।

दो-तिहाई कभी सही था। 2005 में विचाराधीन क़ैदियों का हिस्सा 66.2 फ़ीसदी था। तब से बीस साल बीत गए और आँकड़ा आगे चला गया, पर वाक्य वहीं खड़ा रह गया।

72.6%विचाराधीन क़ैदियों का हिस्सा, 31 दिसंबर 2024 को

तारीख़ का सवाल

यह गिनती एक दिन की है, पूरे साल की नहीं। और एनसीआरबी यह बात ख़ुद लिखता है।

रिपोर्ट के पहले अध्याय में दर्ज है कि जेलों में भरे होने का यह आँकड़ा 31 दिसंबर 2024 का है, और यह पूरे साल की सही तस्वीर नहीं हो सकता, क्योंकि यह रोज़ बदलता रहता है।

उसकी शब्दावली में और साफ़ लिखा है कि जेल की आबादी किसी भी एक क्षण की संख्या होती है, जो नए क़ैदी आने और पुराने छूटने से बदलती रहती है।

यह छोटी सी बात आँकड़े का मतलब बदल देती है, और दोनों तरफ़ बदलती है।

एक साल में सोलह लाख लोग

रिपोर्ट के सातवें अध्याय में साल भर की आवाजाही दर्ज है।

2024 में 15,93,234 विचाराधीन क़ैदी जेल से बाहर आए।

साल के आख़िरी दिन खड़े हुए 3,71,440 के मुक़ाबले यह लगभग सवा चार गुना है। यानी उस साल जितने लोग विचाराधीन क़ैद से गुज़रे, यह गिनती उनमें से हर पाँच में से एक को ही देख पाती है।

सिद्धदोष क़ैदियों के साथ ऐसा नहीं होता। उसी साल 1,49,180 सज़ायाफ़्ता क़ैदी छूटे, और साल के आख़िर में 1,36,138 बैठे थे। अनुपात सिर्फ़ 1.1 गुना।

सज़ा पाए लोग जेल में ठहरते हैं। विचाराधीन लोग आते-जाते रहते हैं।

और वे बाहर कैसे आते हैं

उन 15,93,234 में से 15,14,614 ज़मानत पर छूटे। यह 95.1 फ़ीसदी है।

अदालतों ने 44,239 को बरी किया, यानी 2.8 फ़ीसदी। ऊपरी अदालतों की अपील पर 16,059 छूटे।

ज़मानत पर छूटना मुक़दमे का ख़त्म होना नहीं है। जो आदमी मार्च में ज़मानत पर बाहर आया, उस पर मुक़दमा उसी तरह चलता रहता है। वह सिर्फ़ क़ैदी गिना जाना बंद हो जाता है।

तो 72.6 फ़ीसदी वाला आँकड़ा भारत की क़ैद में बिना फ़ैसले वाले हिस्से को बढ़ाकर नहीं, घटाकर बताता है। गिनती अगर गुज़रने वालों की हो, खड़े हुए लोगों की नहीं, तो यह हिस्सा और ऊपर जाएगा।

पर यह भी सच है कि ज़्यादातर लोग सालों नहीं बैठते

एक दिन की गिनती में लंबे समय वाले लोग ज़्यादा दिखते हैं, क्योंकि वे उस दिन मौजूद रहने की संभावना ज़्यादा रखते हैं। रिपोर्ट का छठा अध्याय इसका जवाब देता है।

31 दिसंबर 2024 तक वे कितने समय से बंद थे:

  • तीन महीने तक: 1,25,894 (33.9%)
  • तीन से छह महीने: 72,452 (19.5%)
  • छह महीने से एक साल: 61,262 (16.5%)
  • एक से दो साल: 51,702 (13.9%)
  • दो से तीन साल: 30,194 (8.1%)
  • तीन से पाँच साल: 20,908 (5.6%)
  • पाँच साल से ज़्यादा: 9,028 (2.4%)

सातों बैंड जोड़ने पर ठीक 3,71,440 बनते हैं।

एक साल से कम बैठे लोग 2,59,608 हैं, यानी 69.9 फ़ीसदी। तीन साल से ज़्यादा बैठे 29,936 हैं।

एक चेतावनी ज़रूरी है। यह तालिका बताती है कि उस दिन तक कोई कितने समय से बंद था, यह नहीं कि वह कुल कितने समय बंद रहेगा। तीन महीने वाले ख़ाने में दर्ज आदमी आगे चार साल भी काट सकता है। यह क़ैद की लंबाई का सबसे निचला माप है, लंबाई का माप नहीं।

एनसीआरबी की अपनी रिपोर्ट में एक जाल है

रिपोर्ट के कार्यकारी सारांश में लिखा है कि एक साल तक बंद 2,59,608 लोगों में से सबसे ज़्यादा, 1,25,894, तीन महीने तक बंद थे, जो 48.5 फ़ीसदी बैठता है।

वह 48.5 पूरे विचाराधीन क़ैदियों का हिस्सा नहीं है। वह सिर्फ़ एक साल से कम वाले उपसमूह का हिस्सा है।

सारे विचाराधीन क़ैदियों में तीन महीने तक बंद लोगों का हिस्सा 33.9 फ़ीसदी है।

जो इस 48.5 को उठाकर लिखेगा कि आधे विचाराधीन क़ैदी तीन महीने के भीतर बाहर हैं, वह पंद्रह प्रतिशत अंक की ग़लती करेगा। एनसीआरबी ने 2022 और 2023 की रिपोर्टों में भी यही किया था।

जिन राज्यों के बारे में सब उल्टा समझते हैं

सबसे ज़्यादा विचाराधीन क़ैदी उत्तर प्रदेश में हैं, 59,194। पर उसका अपना हिस्सा 68.2 फ़ीसदी है, जो देश के औसत से नीचे है।

हिस्से के हिसाब से सबसे ऊपर दिल्ली है, 88.0 फ़ीसदी, और बिहार, 87.2 फ़ीसदी।

मध्य प्रदेश देश की तीसरी सबसे बड़ी जेल व्यवस्था है और वहाँ विचाराधीन क़ैदी 51.3 फ़ीसदी हैं। 23,132 विचाराधीन के मुक़ाबले 21,760 सज़ायाफ़्ता। देश के हर छठे सिद्धदोष क़ैदी मध्य प्रदेश में हैं।

और भरे होने का हिस्से से कोई सीधा रिश्ता नहीं दिखता। ओडिशा में विचाराधीन क़ैदी 77.5 फ़ीसदी हैं और जेलें अपनी क्षमता की 66 फ़ीसदी भरी हैं। मध्य प्रदेश में हिस्सा सबसे कम है और जेलें 147.1 फ़ीसदी भरी हैं।

जो क़ानून इनके लिए बना, उसने 627 लोगों को छुड़ाया

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 कहती है कि जिस विचाराधीन क़ैदी ने अपने अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा समय काट लिया हो, अदालत उसे ज़मानत पर छोड़ेगी। पहली बार के अभियुक्त के लिए यह सीमा एक-तिहाई है। सुप्रीम कोर्ट ने 23 अगस्त 2024 को कहा कि यह पुराने मुक़दमों पर भी लागू होगी।

एनसीआरबी की रिपोर्ट में दर्ज है कि 2024 में इस धारा के तहत 968 विचाराधीन क़ैदी पात्र पाए गए।

छोड़े गए 627।

3,71,440 के मुक़ाबले यह 0.17 फ़ीसदी है। पाँच सौ में से एक से भी कम।

341 लोग पात्र पाए गए और छोड़े नहीं गए। दिल्ली में 143 पात्र मिले और 41 छूटे।

उसी साल अदालतों ने 44,239 विचाराधीन क़ैदियों को बरी किया। यह धारा 479 से छूटे लोगों का इकहत्तर गुना है।

पढ़ते वक़्त दो बातें याद रहें

पहली, ये आँकड़े 31 दिसंबर 2024 के हैं और रिपोर्ट 2026 में छपी है।

दूसरी, एनसीआरबी अपने हर चार्ट के नीचे लिखता है कि पश्चिम बंगाल ने 2024 का आँकड़ा नहीं भेजा, इसलिए वहाँ 2023 का आँकड़ा इस्तेमाल किया गया है। यानी राष्ट्रीय जोड़ में बंगाल के 25,774 लोग एक साल पुराने हैं।

स्रोतएनसीआरबी, कारागार सांख्यिकी भारत 2024, गृह मंत्रालय, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता धारा 479, सुप्रीम कोर्ट, रिट याचिका (सिविल) 406/2013

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