भारत पन्ना
देश

किलोकरी में एक संगीतकार शोर की शिकायत करने नीचे उतरा और ज़िंदा नहीं लौटा; बारह साल पहले बनी समिति का क़ानून आज भी नहीं बना है

चोंगथम विक्रम सिंह की मौत के बाद आठ गिरफ़्तारियाँ हुईं और मंत्री ने आठ-नौ दिन में चार्जशीट का भरोसा दिया। पुलिस कहती है कि नस्लीय मक़सद साबित नहीं हुआ। 2014 में निदो तानियम की मौत के बाद जो समिति बनी थी, उसकी सबसे बड़ी सिफ़ारिश आज तक संसद में नहीं पहुँची।

दिल्ली का लाजपत नगर बाज़ार। 29 जनवरी 2014 को यहीं अरुणाचल के छात्र निदो तानियम पर हमला हुआ था, जिसके बाद बेज़बरुआ समिति बनी।
तस्वीर: Ville Miettinen from Helsinki, Finland, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

चंदन मिरोडा देवी सोने की तैयारी कर रही थीं।

6 सितंबर की रात दक्षिण-पूर्व दिल्ली के किलोकरी गाँव में उनके भूतल के घर के बाहर शोर हुआ। चीख़ें, चिल्लाहट। उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला, झरोखे से देखा, फिर छत पर गईं। वहाँ से दो आदमी फ़ोन पर दूसरों को बुला रहे थे: "इधर आओ, इधर आओ।"

उन्होंने पूछा कि क्या हुआ। जवाब नहीं मिला। बेटी साथ थी; वे सो गईं।

सुबह पता चला कि उसी इमारत की तीसरी मंज़िल पर रहने वाले उनके पड़ोसी, मणिपुर के गिटारवादक चोंगथम विक्रम सिंह, सीढ़ियों में पीट-पीटकर मार डाले गए हैं। यह बयान इंडियन एक्सप्रेस ने 8 सितंबर को छापा।

वह रात, मिनट दर मिनट, जितनी दर्ज है

रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे झगड़ा शुरू हुआ, द लॉजिकल इंडियन की समय-रेखा के अनुसार। पड़ोसी ने छत से दो लोगों को फ़ोन पर और लोगों को बुलाते सुना। पीछा सीढ़ियों तक हुआ, जहाँ भूतल से तीसरी मंज़िल के बीच वे बेहोश मिले। अस्पताल पास का था; मौत कुछ घंटों में हुई। सूरज निकलने तक यह हत्या का मामला था।

इन बातों में जो नहीं है, वह उतना ही अहम है: किसने पहला वार किया, कितनी देर पिटाई चली, बीच में किसी ने रोका या नहीं। इंडियन एक्सप्रेस ने सीसीटीवी क्लिप के होने की बात लिखी है; उनकी सामग्री अभी पुलिस के पास है। हम उसका अंदाज़ा नहीं लगा रहे।

जो दर्ज है

पुलिस के अनुसार विक्रम सिंह ने घर के बाहर शराब पीकर शोर कर रहे लोगों पर आपत्ति की, नीचे उतरे, बहस हुई, और लगभग एक दर्जन लोगों ने उनका पीछा तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों तक किया। वे बेहोश मिले और कुछ घंटों में पास के अस्पताल में मर गए। मौत 7 सितंबर की सुबह की है।

हमलावरों के बारे में एक्सप्रेस ने "आठ खाने-पीने की दुकान के कर्मचारी" लिखा है; नॉर्थईस्ट नाउ के अनुसार वे ढाबे और डिलीवरी के काम करने वाले थे।

उम्र पर स्रोत बँटे हैं: अल जज़ीरा, नॉर्थईस्ट नाउ और डेक्कन क्रॉनिकल 54 लिखते हैं, इंडियन एक्सप्रेस 55। दिल्ली में रहने के साल भी: नॉर्थईस्ट नाउ के अनुसार 17, अल जज़ीरा के अनुसार 20। हम दोनों अंक दर्ज कर रहे हैं।

वे कौन थे

इंफाल का कांगला क़िला। चोंगथम विक्रम सिंह इंफाल से थे और मणिपुर के पश्चिमी संगीत के बैंडों में गिटार बजाते थे।
तस्वीर: Meghroddur, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इंफाल के रहने वाले। दिल्ली में एक छोटा संगीत स्कूल चलाते थे और बच्चों को गिटार सिखाते थे। द लॉजिकल इंडियन के अनुसार उन्होंने अल्ट्रा वायर्स, फ़ीनिक्स और ईस्टर्न डार्क नाम के बैंडों के साथ गिटार बजाया था; मणिपुर के पश्चिमी संगीत के दृश्य का हिस्सा थे।

पत्नी जोशना और एक बेटा। पड़ोसी देवी के अनुसार दोनों परिवार एक ही समुदाय के थे; मणिपुर से सब्ज़ियाँ आतीं तो सिंह का परिवार बाँटता था।

धाराएँ, और उनका मतलब

सनलाइट कॉलोनी थाने में दर्ज एफ़आईआर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(2) और 3(5) के तहत है।

धारा 103(2) हत्या की वह उपधारा है जो पाँच या अधिक लोगों के समूह के हाथों जाति, समुदाय, नस्ल जैसे आधारों पर की गई हत्या के लिए है; आम भाषा में इसे भीड़-हत्या की धारा कहा जाता है। धारा 3(5) साझा इरादे की है।

नॉर्थईस्ट नाउ ने पुलिस के हवाले से यह भी लिखा है कि नस्लीय मक़सद स्थापित नहीं हुआ है और जाँच चल रही है। यानी धारा उस श्रेणी की लगी है, पर पुलिस अभी उस आधार को साबित नहीं मानती। यह फ़र्क़ आगे अदालत में मायने रखेगा।

103(2) में अभियोजन को क्या साबित करना होगा

यह धारा दो शर्तें एक साथ माँगती है। पहली, हत्या करने वाले पाँच या अधिक लोग हों और वे मिलकर काम कर रहे हों। दूसरी, हत्या का आधार नस्ल, जाति, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, निजी आस्था या ऐसा ही कोई आधार हो।

पहली शर्त गिरफ़्तारियों की संख्या से पूरी दिखती है: सात वयस्क और एक किशोर। दूसरी शर्त वही है जिसे पुलिस "स्थापित नहीं" कह रही है। अगर चार्जशीट में दूसरा आधार नहीं टिका, तो मामला 103(1) यानी सामान्य हत्या का रह जाता है। सज़ा दोनों उपधाराओं में एक ही है: मृत्युदंड या आजीवन कारावास, और जुर्माना। फ़र्क़ सज़ा की मात्रा का नहीं, अदालत के रिकॉर्ड में लिखे कारण का है: 103(2) में फ़ैसला यह दर्ज करता है कि हत्या समुदाय के आधार पर हुई, और यही दर्ज होना समुदाय की माँग है।

यानी आठ-नौ दिन में आने वाली चार्जशीट का पहला पन्ना यह तय करेगा कि यह मामला "शोर पर झगड़े में हत्या" के रूप में दर्ज होगा या "समुदाय के आधार पर हत्या" के रूप में। समुदाय की माँग दूसरी श्रेणी की है; पुलिस अभी पहली पर है।

आठ गिरफ़्तारियाँ

सात वयस्क पकड़े गए: भरत कुमार, प्रमोद, रमज़ान ख़ान, दीपांशु, मोहन विश्वकर्मा, विजय और मन्नू। एक 15 साल का किशोर भी हिरासत में लिया गया।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 8 सितंबर को कहा कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें आठ से नौ दिन में चार्जशीट का भरोसा दिया है। उनके शब्द, पीटीआई के अनुसार: "सबसे कड़ी संभव सज़ा।" उन्होंने यह भी कहा कि मामले पर राजनीति न हो।

राजनीति हुई

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, अल जज़ीरा के अनुसार: "इतनी घटनाओं के बाद दिल्ली का हर पूर्वोत्तर परिवार आज एक ही सवाल पूछ रहा है: क्या हम यहाँ सुरक्षित हैं?" कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा; रिजिजू ने पूछा कि इसमें भाजपा को क्यों लाया जा रहा है।

मणिपुर स्टूडेंट्स एसोसिएशन दिल्ली के 24 वर्षीय अध्यक्ष लैशराम कांगलेइंगनबा ने अल जज़ीरा से कहा: "यह हमला किसी दिन मेरे दोस्तों पर या मुझ पर हो सकता है, पर यह रोज़ किसी न किसी पर हो रहा है।" यह वाक्य उस डर का है जो पुलिस के "मक़सद स्थापित नहीं" वाले वाक्य के ठीक बगल में खड़ा है।

सोमवार रात समुदाय के लोगों ने सनलाइट कॉलोनी थाने से विक्रम सिंह के घर तक मोमबत्ती मार्च किया। दिल्ली विश्वविद्यालय की नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स सोसाइटी समेत छात्र संगठनों ने निष्पक्ष जाँच की माँग की।

2014 का वह दिन

इस हत्या को पढ़ने का एक ही ईमानदार तरीक़ा है: उससे पिछली हत्या के काग़ज़ों के साथ।

29 जनवरी 2014 को अरुणाचल प्रदेश के 20 साल के छात्र निदो तानियम, जो जालंधर में पढ़ते थे और जिनके पिता कांग्रेस विधायक थे, दक्षिण दिल्ली के लाजपत नगर में एक पता पूछ रहे थे। एक मिठाई की दुकान पर उनके बालों और रूप पर टिप्पणियाँ हुईं, झगड़ा हुआ, पिटाई हुई। पोस्टमार्टम में सिर और फेफड़ों की अंदरूनी चोटें मिलीं।

1 फ़रवरी को पूर्वोत्तर के सैकड़ों छात्र दिल्ली में सड़क पर उतरे और इसे घृणा-अपराध कहा।

साकेत की अदालत का फ़ैसला, पाँच साल बाद

4 सितंबर 2019 को साकेत की अदालत ने चार लोगों को सज़ा दी: फ़रमान को 10 साल, सुंदर और पवन को 7-7 साल, सनी उप्पल को 3 साल। अरुणाचल ऑब्ज़र्वर की रिपोर्ट में यह नहीं है कि नस्लीय अपमान का आरोप अलग से साबित हुआ या नहीं।

पाँच साल, सात महीने। यह उस मामले की समय-रेखा है जिसे उस वक़्त देश का सबसे चर्चित घृणा-अपराध कहा गया था।

बेज़बरुआ समिति

तानियम की मौत के अगले महीने, फ़रवरी 2014 में, गृह मंत्रालय ने पूर्वोत्तर परिषद के सदस्य एम.पी. बेज़बरुआ की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। काम: देश के दूसरे हिस्सों, ख़ासकर महानगरों में रहने वाले पूर्वोत्तर के लोगों की चिंताएँ सुनना और उपाय सुझाना।

समिति ने 11 जुलाई 2014 को रिपोर्ट दी। डेक्कन हेराल्ड और अल जज़ीरा के अनुसार उसमें दर्ज है कि दिल्ली में पूर्वोत्तर के लगभग 86 फ़ीसदी लोगों ने किसी न किसी तरह का नस्लीय भेदभाव झेला, 2005 से 2013 के बीच दो लाख से ज़्यादा लोग पूर्वोत्तर से दिल्ली आए, और महानगरों में दिल्ली सबसे ख़राब है।

चार तरह की सिफ़ारिशें

समिति की सिफ़ारिशें चार खानों में थीं: पूर्वोत्तर के बारे में जागरूकता; पुलिस की त्वरित, सख़्त और निष्पक्ष कार्रवाई; संस्थागत मदद, सूचना और परामर्श; और क़ानूनी उपाय।

क़ानूनी उपाय में सबसे बड़ा प्रस्ताव यह था: या तो नस्लीय अपराधों के लिए नया क़ानून बने, या भारतीय दंड संहिता में संशोधन हो, और अपराध संज्ञेय और ग़ैर-ज़मानती हो। इसी से दो नई धाराओं का मसौदा निकला: 153ग, जो नस्ल के आधार पर मानवीय गरिमा के ख़िलाफ़ कथन या हिंसा को पाँच साल तक की सज़ा वाला ग़ैर-ज़मानती अपराध बनाती, और 509क, जो किसी नस्ल के सदस्य का अपमान करने वाले शब्द या इशारे को तीन साल तक की सज़ा देती।

सरकार ने संसद में क्या कहा

संसद भवन, नई दिल्ली। 22 दिसंबर 2015 को यहीं लोकसभा में लिखित उत्तर आया कि क़ानून में संशोधन का "एक प्रस्ताव है"।
तस्वीर: डेविड कैसल, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

22 दिसंबर 2015 को गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में लिखित उत्तर दिया। पीआईबी की विज्ञप्ति में उसका सार है।

सिफ़ारिशें "स्वीकार कर ली गई हैं और कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं।" सभी राज्यों को परामर्श भेजे गए। दिल्ली, गुड़गाँव और बेंगलुरु पुलिस ने पूर्वोत्तर के लोगों के लिए विशेष हेल्पलाइन शुरू कीं। नोडल अधिकारी नियुक्त हुए। दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण ने वकीलों का पैनल बनाया, जिसमें महिला वकील भी हैं।

और क़ानून पर एक वाक्य: "बेज़बरुआ समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों में संशोधन का एक प्रस्ताव है।"

एक प्रस्ताव। दिसंबर 2015 में।

हेल्पलाइन का इतिहास

2015 के उत्तर में जिन हेल्पलाइनों का ज़िक्र है, वे समिति से पहले की नहीं हैं। दिल्ली पुलिस की पूर्वोत्तर हेल्पलाइन तानियम की मौत के बाद के महीनों में शुरू हुई; गुड़गाँव और बेंगलुरु ने उसकी नक़ल की। समिति ने एक और चीज़ माँगी थी: क़ानूनी मदद के लिए वकीलों का पैनल, जिसमें पूर्वोत्तर के वकीलों को वरीयता और आधी सदस्य महिलाएँ हों।

दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने ऐसा पैनल बनाया; 2015 के उत्तर में "लेडी एडवोकेट्स समेत" शब्द इसी के लिए हैं। पैनल आज किस हालत में है, कितने मामले उसने लिए, यह हमें किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में नहीं मिला, और इस लेख में उसका कोई दावा नहीं है।

2015 में हाई कोर्ट को क्या बताया गया था

उसी साल जुलाई में, बिज़नेस स्टैंडर्ड की पीटीआई रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि वह भारतीय दंड संहिता में नई धाराएँ 153ग और 509क जोड़ने का व्यापक विधेयक "अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में" है।

जुलाई 2015 में अदालत को "प्रक्रिया में", दिसंबर 2015 में संसद को "एक प्रस्ताव"। उसके बाद का कोई विधेयक संसद के रिकॉर्ड में नहीं है, और 2024 में पूरी संहिता ही बदल गई।

जो नहीं हुआ

उसके बाद भारतीय दंड संहिता ख़ुद 2024 में भारतीय न्याय संहिता से बदल दी गई। नई संहिता में 153ग या 509क जैसी कोई अलग नस्लीय-अपराध धारा नहीं है। जो निकटतम प्रावधान है, वह वही 103(2) है, जो हत्या की उपधारा है, अपमान या भेदभाव की नहीं।

यानी 2014 की समिति का सबसे बड़ा वादा, नस्लीय अपमान को अपराध बनाना, न पुरानी संहिता में पहुँचा, न नई में। जो हुआ, वह हेल्पलाइन, नोडल अधिकारी और वकीलों की सूची है।

इसी सप्ताह जब रिजिजू ने कड़ी सज़ा का भरोसा दिया, तो वे उसी मंत्रालय की तरफ़ से बोल रहे थे जिसने ग्यारह साल पहले संसद को "एक प्रस्ताव" के बारे में बताया था।

2012 का बेंगलुरु

बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन। अगस्त 2012 में पूर्वोत्तर के हज़ारों लोग यहीं से ट्रेन पकड़कर शहर छोड़ गए थे।
तस्वीर: Ramesh NG from Bangalore, INDIA, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

बेज़बरुआ से भी पहले एक और तारीख़ है। 15 अगस्त 2012 से बेंगलुरु से पूर्वोत्तर के लोग रेल पकड़कर निकलने लगे; अनुमान 15,000 से 20,000 के बीच के हैं। वजह असम की हिंसा के बाद फैले वे संदेश थे जिनमें हमलों की धमकी थी। कर्नाटक पुलिस ने अफ़वाह फैलाने के आरोप में पाँच लोग गिरफ़्तार किए; मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी ने वे संदेश देखे नहीं थे।

वह पलायन बिना किसी हत्या के हुआ था। डर की गिनती के लिए हत्या ज़रूरी नहीं होती।

जो पड़ोसी ने आगे कहा

चंदन मिरोडा देवी ने एक्सप्रेस को यह भी बताया कि दिल्ली में उन्हें "चाइनीज़", "चिंकी" और "मोमो" कहा गया है, और यह इतना आम है कि अब वे ऐसा कहने वालों से सीधे उलझ जाती हैं।

उनके शब्दों में, यह इसलिए "ख़ास तौर पर तकलीफ़देह" है कि यह राष्ट्रीय राजधानी है, जहाँ देश भर से लोग पढ़ने और काम करने आते हैं।

उस रात का शोर उन्हें असामान्य नहीं लगा था। मोहल्ले का ढाबा रात में अक्सर शोर करता था। वही शोर उस रात तीसरी मंज़िल तक पहुँचा।

आगे की तारीख़ें

चार्जशीट, मंत्री के अनुसार, 16 या 17 सितंबर तक। किशोर का मामला किशोर न्याय बोर्ड में अलग चलेगा। धारा 103(2) टिकेगी या 103(1) रह जाएगी, यह पुलिस के मक़सद वाले निष्कर्ष पर टिका है, जो अभी नहीं है।

और वह क़ानून, जिसकी सिफ़ारिश 11 जुलाई 2014 को हुई थी, आज भी उसी जगह है जहाँ 22 दिसंबर 2015 को था।

लाजपत नगर से किलोकरी की दूरी सड़क से चार किलोमीटर के आसपास है। बारह साल में इस दूरी के बीच जो बदला, वह संहिता का नाम है।

स्रोतअल जज़ीरा, हत्या और समुदाय की प्रतिक्रिया, नॉर्थईस्ट नाउ, एफ़आईआर की धाराएँ और गिरफ़्तारियाँ, पीआईबी, गृह मंत्रालय का लोकसभा उत्तर, 22 दिसंबर 2015, इंडियन एक्सप्रेस, पड़ोसी का बयान, अरुणाचल ऑब्ज़र्वर, निदो तानियम मामले में सज़ा, 2019

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।